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Friday, May 13, 2011

अंगीकार से स्वतंत्रता

एक छोटी कहानी है - एक बालक पत्थर फेंक कर निशाना लगा रहा था, खेलते खेलते गलती से परिवार की बतखों में से एक के पत्थर लगा और वह मर गई। बालक ने आस-पास देखा और जब उसे लगा के किसी ने उसकी यह हरकत नही देखी है, तो उसने मरी हुई बतख को मिट्टी में दबा दिया। शाम को जब वह घर आया तो रात के भोजन के बाद उसकी बहन ने उसे अलग बुलाकर कहा, "मैंने देखा तुमने बतख का क्या किया। अगर तुमने मेरे लिए बर्तन नहीं धोए तो मैं पिताजी को सब कुछ बता दूंगी।" डर के कारण बालक ने बहन की बात मान ली। इसके बाद तो बहन को उससे काम लेते रहने का रास्ता ही मिल गया। बार बार उसे वह डराती और अपने हिस्से के घर के काम उससे करवाती। थोड़े समय में बालक इससे परेशान हो गया, उसने हिम्मत जुटा कर अपने पिता के सामने अपनी गलती का बयान कर दिया। पिता ने तुरंत उसे गले से लगा लिया और बड़े प्यार से बोले, "मैं जानता हूँ, जब तुमसे वह बतख मरी तब मैं घर की खिड़की से सब देख रहा था। मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी बहन कैसे इस बात का तुमसे नाजायज़ फायदा उठा रही है। मैं इस इंतिज़ार में था कि कब तुम अपनी गलती का अंगीकार करोगे। जाओ, मैंने तुम्हें क्षमा किया, आगे से ध्यान रखना।" उस शाम जब बहन ने फिर उसे डरा कर अपना काम करवाना चाहा, तो बालक ने कहा, "मैंने अपनी गलती मान ली है, पिताजी को सब पता है। अब मैं तुम्हारे चुंगुल से स्वतंत्र हूँ।"

हमारी कितनी ही गलतियाँ हम अपने परमेश्वर पिता से छुपाते हैं, जबकि वह सब कुछ देखता और जानता है; और फिर बहानों और झूठ द्वारा अपने आप को सही दिखाने का प्रयास करते हैं, फलस्वरूप शैतान के हाथों में कठपुतली बन कर भारी मन से बोझिल जीवन व्यतीत करते रहते हैं। जबकि पिता परमेश्वर केवल इस प्रतीक्षा में रहता है कि हम अपने पाप का अंगीकार करें और वह हमें क्षमा करके हमारे जीवन के आनन्द को बहाल कर दे।

बाइबल में प्रभु यीशु ने इस बात को ’उड़ाऊ पुत्र’ के दृष्टांत द्वारा समझाया। इस पुत्र ने अपने बाप से सम्पत्ति का अपना हिस्सा लिया और दूसरे स्थान पर चला गया, तथा दोस्तों के साथ व्यर्थ जीवन में सारी सम्पत्ति उड़ा दी। कंगाली की हालत में, हर तरह से भूखा और मजबूर, उसे अपने बाप की याद आई और यह भी कि उसके बाप के नौकर उससे बेहतर हालत में रहते हैं। तब वह इस इरादे से बाप के पास चला कि जाकर अपनी गलती मान लेगा और बाप से मांगेगा कि उसे नौकर ही रख ले क्योंकि अब वह पुत्र होने के लायक नहीं है। लेकिन बाप के पास पहुंचते ही उसके लिए उम्मीद के विपरीत, सारी बात ही बदल गई। अभी बाप के सामने उसने अपने पश्चाताप की बात पूरी भी नहीं करी थी कि बाप ने उसे उसकी गन्दी हालत में ही बड़े प्यार से गले से लगा लिया और उसका खोया स्थान बहाल कर दिया तथा नौकरों से कहा कि उसके पुत्र के लौटने के उपलक्ष में एक बड़ा भोज तैयार किया जाए।

दाउद ने भी अंगीकार की स्वतंत्रता को अनुभव किया। भजन ३२ में उसने लिखा कि कैसे जब वह अपने पाप के विष्य में खामोश रहा तो उसे शारीरिक और मानसिक परेशानियों को झेलना पड़ा, लेकिन जैसे ही उसने परमेश्वर के सामने अपने पाप को मान लिया, उसे क्षमा दान मिल गया और उसका आनन्द और शरीर की सामर्थ उसे वापस मिल गई।

हमारा परमेश्वर पिता कभी हमें दण्ड देकर प्रसन्न नहीं होता "प्रभु यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्न होता हूँ? क्या मैं इस से प्रसन्न नहीं होता कि वह अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे?" (यहेजेकेल १८:२३); वह सदा हमें क्षमा पाने के अवसर देता रहता है और जैसे ही हम उसके सन्मुख अपने पाप का अंगीकार करते हैं, हमें उसका क्षमा दान और हमारे आनन्द की बहाली तुरंत मिल जाते हैं।

अंगीकार ही पाप के दासत्व से स्वतंत्रता का मार्ग है। - हर्ब वैण्डर लुग्ट


जब तक हम अपने पाप का सामना करने को तैयार नहीं हो जाते, हम कभी उन्हें अपने पीछे नहीं कर सकते।

जब मैं चुप रहा तब दिन भर कहरते कहरते मेरी हडि्डयां पिघल गई। - भजन ३२:८


बाइबल पाठ: लूका १५:११-२४

Luk 15:11 फिर उस ने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।
Luk 15:12 उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी।
Luk 15:13 और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ा दी।
Luk 15:14 जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया।
Luk 15:15 और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पड़ा : उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा।
Luk 15:16 और वह चाहता था, कि उन फलियों से जिन्‍हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था।
Luk 1