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Sunday, May 22, 2011

शब्दों की आड़

अकसर लोग अपने मन की बात सच्चाई से कहने में झिझकते हैं और उसे शब्दों की आड़ के पीछे छुपाने का प्रयास करते हैं लेकिन उनके शब्द उनकी मनोभावनाओं के अनुकूल नहीं होते। न्यूयॉर्क के एक वकील जैराल्ड निरेनबर्ग ने इस विष्य पर एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक है Meta Talk: Guide to Hidden Meanings in Conversation. इस पुस्तक में उन्होंने छुपी या गोल-मोल बात बनाने के ३५० उदाहरण दिये हैं।

एक संवाद विशेषज्ञ का मानना है कि लोग इस बात से डरते हैं कि ईमानदारी से कहे गई उनकी बातों के कारण उन्हें मित्रता, प्रेम, आदर का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए या तो वे अपने होंठ बन्द रखते हैं या वे जो कहना चाहते हैं उसे घुमा फिराकर अस्पष्ट रूप से कहते हैं। अपने प्रति हीन भावना या दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का भय भी लोगों के स्पष्ट और सही बात कहने में बाधा बनते हैं।

मसीही विश्वासी भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। ईमानदार रहना और किसी को ठेस पहुँचाए बिना सत्य बोलना, दोनो को एक साथ निभा पाना बहुत कठिन हो सकता। बाइबल इस समस्या का संतुलित हल देती है। प्रभु यीशु का जीवन इस का सजीव उदाहरण है। उन्हों ने सदा ही सत्य बोला, कभी मक्कारी नहीं करी, न ही किसी से घुमा-फिरा कर बातों करीं और न किसी को दोगली बातों में उलझाया; तौ भी कभी किसी ने उन पर अपमान जनक व्यवहार का दोष नहीं लगाया। इस का कारण था उनका सदा नम्रता और करुणा का व्यवहार रखना, कभी घमण्ड न करना और न किसी को नीचा दिखाने का व्यवहार करना और सदा दूसरों की भलाई तथा सहायता में कार्यरत रहना।

परमेश्वर का वचन बाइबल हमें सिखाती है कि हम कैसे सच्चे और ईमानदार रहते हुए भी किसी को ठेस पहुँचाने से बच सकते हैं। याकूब की पत्री के तीसरे अध्याय में स्वर्गीय ज्ञान के बारे में बताया गया है जो हमें ईमानदार और मृदु रख सकता है, क्योंकि "जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहिले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया, और अच्‍छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपट रहित होता है" (याकूब ३:१७)। इसलिए इस स्वर्गीय ज्ञान और समझ बूझ के साथ हम प्रभु यीशु के समान हम अपनी बात चीत और व्यवहार में ईमानदार किंतु मृदु रह सकते हैं।

जो मसीही विश्वासी इस स्वर्गीय ज्ञान को अपना बोलचाल और व्यवहार निर्धारित करने देंगे उन्हें फिर कभी शब्दों की आड़ से अपनी बात नहीं कहनी पड़ेगी। - मार्ट डी हॉन


नम्रता से कहे गए वचन सुनने में हलके लगते हैं किंतु उनका प्रभाव भारी होता है।

बुद्धिमान का मन उसके मुंह पर भी बुद्धिमानी प्रगट करता है, और उसके वचन में विद्या रहती है। - नीतिवचन १६:२३


बाइबल पाठ:
याकूब
Jas 3:1 हे मेरे भाइयों, तुम में से बहुत उपदेशक न बनें, क्‍योंकि जानते हो, कि हम उपदेशक और भी दोषी ठहरेंगे।
Jas 3:2 इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं: जो कोई वचन में नहीं चूकता, वही तो सिद्ध मनुष्य है और सारी देह पर भी लगाम लगा सकता है।
Jas 3:3 जब हम अपने वश में करने के लिये घोड़ों के मुंह में लगाम लगाते हैं, तो हम उन की सारी देह को भी फेर सकते हैं।
Jas 3:4 देखो, जहाज भी, यद्यपि ऐसे बड़े होते हैं, और प्रचण्‍ड वायु से चलाए जाते हैं, तौभी एक छोटी सी पतवार के द्वारा मांझी की इच्‍छा के अनुसार घुमाए जाते हैं।
Jas 3:5 वैसे ही जीभ भी एक छोटा सा अंग है और बड़ी बड़ी डींगे मारती है: देखो, थोड़ी सी आग से कितने बड़े बन में आग लग जाती है।
Jas 3:6 जीभ भी एक आग है: जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है और सारी देह पर कलंक लगाती है, और भवचक्र में आग लगा देती है और नरक कुण्‍ड की आग से जलती रहती है।
Jas 3:7 क्‍योंकि हर प्रकार के वन-पशु, पक्षी, और रेंगने वाले जन्‍तु और जलचर तो मनुष्य जाति के वश में हो सकते हैं और हो भी गए हैं।
Jas 3:8 पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रूकती ही नहीं, वह प्राण नाशक विष से भरी हुई है।
Jas 3:9 इसी से हम प्रभु और पिता की स्‍तुति करते हैं और इसी से मनुष्यों को जो परमेश्वर के स्‍वरूप में उत्‍पन्न हुए हैं श्राप देते हैं।
Jas 3:10 एक ही मुंह से धन्यवाद और श्राप दोनों निकलते हैं।
Jas 3:11 हे मेरे भाइयों, ऐसा नही होना चाहिए।
Jas 3:12 क्‍या सोते के एक ही मुंह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है? हे मेरे भाइयों, क्‍या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।
Jas 3:13 तुम में ज्ञानवान और समझदार कौन है? जो ऐसा हो वह अपने कामों को अच्‍छे चालचलन से उस नम्रता सहित प्रगट करे जो ज्ञान से उत्‍पन्न होती है।
Jas 3:14 पर यदि तुम अपने अपने मन में कड़वी डाह और विरोध रखते हो, तो सत्य के विरोध में घमण्‍ड न करना, और न तो झूठ बोलना।
Jas 3:15 यह ज्ञान वह नहीं, जो ऊपर से उतरता है वरन सांसारिक, और शारीरिक, और शैतानी है।
Jas 3:16 इसलिये कि जहां डाह और विरोध होता है, वहां बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्‍कर्म भी होता है।
Jas 3:17 पर जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहिले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया, और अच्‍छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपट रहित होता है।
Jas 3:18 और मिलाप कराने वालों के लिये धामिर्कता का फल मेल-मिलाप के साथ बोया जाता है।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास १६-१८
  • यूहन्ना ७:२८-५३