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Saturday, September 17, 2011

"उड़ाऊ पुत्र" का स्वरूप

   पापियों के प्रति परमेश्वर के प्रेम को समझाने के लिए प्रभु यीशु द्वारा कही गई "उड़ाऊ पुत्र" की नीतिकथा (लूका १५:११-३२) एक प्रचलित उदाहरण रही है। इस नीतिकथा में एक पुत्र अपने पिता से संपत्ति का अपना भाग लेकर अलग हो जाता है, और उस संपत्ति को व्यर्थ और दुराचारी जीवन में उड़ा देता है। सम्पत्ति के समाप्त हो जाने पर जब वह अकेला पड़ जाता है और बदहाल हो जाता है तो अपने व्यवहार और किये पर पश्चातापी मन के साथ अपनी उसी बदहाल दशा में अपने पिता के पास लौटता है, जो आनन्द के साथ उसे स्वीकार कर के परिवार में उसे पुनः यथास्थान स्थापित कर देता है।

   एक चित्रकार ने इस कथा पर चित्र बनाना चाहा। उसे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जिस के स्वरूप पर वह उड़ाऊ पुत्र के बदहाल स्वरूप को चित्रित कर सके। मार्ग पर चलते समय उसे एक भिखारी बहुत ही बदहाल स्वरूप में दिखाई दिया, और चित्रकार ने उसे अपनी चित्रशाला में आकर चित्र बनाने के लिए नमुना बनने का निमंत्रण दिया। अगले दिन जब वह भिखारी उसकी चित्रशाला में पहुँचा तो उसका स्वरूप बदला हुआ था - वह नहा-धो कर, अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी साफ करवा कर, बाल बना कर, साफ-सुथरे कपड़े पहन कर चित्रकार के समने प्रस्तुत हुआ था। इस हाल में उसे देख कर चित्रकार विस्मय से बोल उठा, "नहीं, ऐसे नहीं, अब इस स्वरूप में मैं तुम्हें प्रयोग नहीं कर सकता।"

   परमेश्वर भी हमें वैसा ही चाहता है, जैसे उड़ाऊ पुत्र अपने पिता के पास आया था - अपनी बदहाल दशा में। यह विचित्र और विनम्र करने वाला अनुभव है, लेकिन यदि हम अपनी ही धार्मिकता और भलाई द्वारा स्वच्छ तथा परमेश्वर को ग्रहणयोग्य होने का प्रयास करते हैं, तो यह परमेश्वर के सामने व्यर्थ है। परमेश्वर की धार्मिकता, भलाई और स्वच्छता - जिसे हमें प्रदान करने के लिए प्रभु यीशु ने अपने प्राण क्रूस पर बलिदान कर दिए, हमें केवल अपने पापों के लिए हमारे पश्चाताप और क्षमा आग्रह द्वारा ही उपलब्ध होती है, हमारे किन्ही कर्मों के द्वारा नहीं।

   प्रभु यीशु के समय में मन्दिर में सेवकाई करने वाले शास्त्री और फरीसी बहुत कड़ाई से अपनी धर्म-व्यवस्था का पालन करते थे। वे समझते थे कि परमेश्वर उनसे प्रसन्न है क्योंकि उन्होंने अपने आप को "स्वच्छ" रखा हुआ है। जब उन्होंने प्रभु यीशु को ऐसे लोगों के साथ संगति करते और उनके घर जाकर भोजन लेते देखा जो उनकी नज़रों में "अशुद्ध" और "दुष्ट" थे तो उन्हें यह बहुत नागवार गुज़रा, और वे प्रभु यीशु के विरुद्ध कुड़कुड़ाने लगे। लेकिन प्रभु यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, "मैं धमिर्यों को नहीं, परन्‍तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं" (लूका ५:३२)। प्रभु यीशु का यह कहना वास्तव में उनके स्वधार्मिक व्यवहार और उस पर उन के घमण्ड पर किया गया कटाक्ष था। उन स्वधर्मी लोगों को भी अपने जीवन में छुपे पाप का अंगीकार करने की आवश्यक्ता थी, जिसे परमेश्वर भली भांति जानता था। यदि वे पश्चाताप करते तो प्रभु यीशु उन्हें भी ग्रहण कर लेते।

   परमेश्वर नहीं चाहता कि कोई भी पाप में नाश हो; "वह यह चाहता है, कि सब मनुष्यों का उद्धार हो और वे सत्य को भली भांति पहिचान लें" (१ तिमुथियुस २:४)। वह सब को पाप क्षमा देना चाहता है, यदि वे अपने पाप के अंगीकार और उससे क्षमा प्रार्थना के लिए तैयार हों। जैसे उड़ाऊ पुत्र, जैसा वह था अपने पिता के पास लौट आया, और पिता से सब कुछ पा लिया, वैसे ही आप भी भी जैसे हैं, प्रभु यीशु के नाम से परमेश्वर की ओर लौट आईये, आप भी उद्धार, अनन्त जीवन का अननत आनन्द, परमेश्वर की संगति और उसके राज्य में प्रवेश के भागीदार हो जाएंगे। - डेनिस डी हॉन


संसार में धनी होने की बजाए परमेश्वर के राज्य में धनी होना कहीं बेहतर है।

धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्‍योंकि स्‍वर्ग का राज्य उन्‍हीं का है। - मत्ती ५:३
 
बाइबल पाठ: लूका १५:११-२४
    Luk 15:11  फिर उस ने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।
    Luk 15:12  उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उस ने उन को अपनी स