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Sunday, February 19, 2012

जीवन के पाठ

   दूसरे विश्वयुद्ध के समय कैनडा के लोगों को युरोप में युद्ध के कारण हो रही त्रासदी से अवगत कराने तथा उसके निवारण के लिए उनके और अधिक सहयोग देने की ओर ध्यान खींचने के लिए फरवरी १९, १९४२ को कैनडा में एक विश्ष दिवस आयोजित किया गया - "अगर दिवस"। उस दिन कैनडा के मैनिटोबा प्रांत के विनिपेग शहर पर नाट्ज़ी सेनाओं के हमले और उनके द्वारा शहर को हथिया कर वहां पर उन सेनाओं द्वारा हो सकने वाले अत्याचारों का एक दिखावटी प्रदर्शन किया गया जिसके द्वारा लोगों ने जाना कि अगर नाट्ज़ी कब्ज़ा कैनडा पर होगा तो उनका क्या हाल होगा।

   जैसा एक व्यक्ति ने इसके बारे में वर्णन दिया, " इस ’अगर दिवस’ ने हमारे समक्ष नाट्ज़ी सेनाओं द्वारा कब्ज़े की वास्तविकता तो सजीव रूप में रखा। इस शहर के लोगों को नाट्ज़ी अत्याचार के हर पहलू को देखने का अनुभव मिला।" यहां मुख्य बात थी ’देखना’। यद्यपि ’अगर दिवस’ लोगों को संसार में घट रही त्रासदी से अवगत कराने का एक साहसी प्रयास था, किंतु वह उस त्रासदी का वास्तविक अनुभव उन लोगों को नहीं करवा सकता था, वह अनुभव जिस में से होकर युरोप के लोग गुज़र रहे थे।

   जीवन के पाठ ’अगर’ या संभावनाओं से नहीं, अनुभव से सीखे जाते हैं। जीवन में आने वाली परीक्षाएं "अगर" नहीं होतीं, वे वास्तविक होती हैं। जीवन के सबसे गंभीर और गहरे पाठ केवल ’देखने’ से नहीं सीखे जाते, उन्हें सीखने के लिए परिस्थितियों में से होकर गुज़रना पड़ता है, अनुभव करना पड़ता है। जब हम वास्तव में दुखः, क्लेष, कमी-घटी आदि में से होकर निकलते हैं, तब ही हम अपने जीवन, विश्वास और परमेश्वर की आवश्यक्ता के बारे में वास्तविक रुप से सीख सकते हैं। इसीलिए परमेश्वर के वचन बाइबल में याकूब ने अपनी पत्री में लिखा: "हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसे पूरे आनन्‍द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्‍पन्न होता है" (याकूब १:२, ३)। क्योंकि हम एक पाप से ग्रसित और टूटे संसार में रहते हैं, इसलिए नाना प्रकार की विष्म परिस्थितियों और परीक्षाओं का आना अवश्यंभावी है; उनसे बच सकना हमारे तो हाथ में नहीं है, किंतु उनसे सार्थक पाठ सीखना और उन्हें अपनी कामयाबी की सीढ़ी बनाना अवश्य ही हमारे हाथ में है।

   हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु भी संसार की हर परीक्षा में से होकर निकला, और निष्पाप निकला, इसी कारण वह हमारा उद्धारकर्ता और उद्धार के मार्ग पर हमारा अगुवा है और हमें सुरक्षित परमेश्वर के पास ला सकता है। क्योंकि जीवन के पाठ उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से सीखे हैं इसलिए हमारे व्यक्तिगत अनुभवों में वह हमारे प्रति संवेदनशील और हमारा सहायक रहता है। साधारण विश्वास से उस के पास आइए और उद्धार पाइए। - बिल क्राउडर


कठिन परिस्थितियां हमें परमेश्वर पर विश्वास करना सिखा सकती हैं।

हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसे पूरे आनन्‍द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्‍पन्न होता है। - याकूब १:२, ३


बाइबल पाठ: इब्रानियों ४:१४-१६; ५:७-९
Heb 4:14 सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायजक है, जो स्‍वर्गों से होकर गया है, अर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशु, तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहें।
Heb 4:15 क्‍योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारी नाई परखा तो गया, तौभी निष्‍पाप निकला।
Heb 4:16 इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्‍धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे।
Heb 5:7 उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्‍द से पुकार पुकारकर, और आंसू बहा बहाकर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई।
Heb 5:8  और पुत्र होने पर भी, उस ने दुख उठा उठाकर आज्ञा माननी सीखी।
Heb 5:9  और सिद्ध बनकर, अपने सब आज्ञा मानने वालों के लिये सदा काल के उद्धार का कारण हो गया।


एक साल में बाइबल: 

  • लैव्यवस्था २५ 
  • मरकुस १:२३-४५