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Monday, February 4, 2013

परिवर्तन


   मेरे मित्र टिम डेविस को अपने बचपन का वह समय याद है जब वह अपने माता-पिता के साथ ट्रिनिडैड में था, और इंग्लैंड की महारानी इलज़ाबेथ उस छोटे से स्थान पर आईं थीं। टिम भी अपने माता-पिता तथा उस भीड़ के साथ महारानी को देखने गया, और शेष भीड़ के साथ उस मार्ग के किनारे हाथ में झंडा लिए हुए वह भी खड़ा हुआ। जिस मार्ग से होकर महारानी को निकलना था उसे अच्छे से साफ करके खूब सजाया गया था। कुछ समय पश्चात महारानी की सवारी आई, पहले पैदल सैनिक, फिर घोड़ों पर सैनिकों का दस्ता, फिर महारानी की गाड़ी जिस में से महारानी इलज़ाबेथ अपने हाथ हिलाकर भीड़ के अभिवादन को स्वीकार कर रहीं थीं। महारानी और भीड़ एक दुसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे, भीड़ उत्साहित और प्रफुल्लित थी, किंतु भीड़ और महारानी का परस्पर कोई व्यक्तिगत परिचय या संबंध नहीं था। टिम और अन्य लोगों के देखते देखते राजसी सवारी का वह जलूस आगे बढ़ गया और फिर सब अपने अपने घरों और कार्यों को लौट गए। कुछ ही समय के बाद उस मार्ग से सारी सजावट हटा ली गई, मार्ग फिर से पहले के समान हो गया और कुछ समय पश्चात पता भी नहीं चलता था कि महारानी इसी मार्ग पर आईं थीं। टिम ने कहा, "वे राजसी अधिकारी आए और शहर के मार्गों से होकर चले गए; शहर में या लोगों में कोई स्थाई परिवर्तन नहीं आया।"

   हम मसीही विश्वासियों के लिए भी एक दिन वह था जब हमारे व्यक्तिगत निमंत्रण पर परमेश्वर का पुत्र तथा जगत का उद्धाकर्ता हमारे दिलों में आया। कुछ ने उसे अपने दिलों में बैठा लिया और उनके मनों को उसने अपने पवित्र आत्मा का मन्दिर बना लिया (१ कुरिन्थियों ६:१९), उनके मनों को स्वच्छ किया और अब भी करता रहता है, उनके जीवन बदल गए तथा यह सुधार दिन-प्रतिदिन ज़ारी रहता है। लेकिन अनेक ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल उसे अपने अन्दर से होकर निकलने भर दिया है, अपने अन्दर रहने और कार्य करने का स्थान तथा अनुमति नहीं दी है; कुछ समय के लिए उनके जीवनों में कुछ भला परिवर्तन दिखाई देता है किंतु समय के साथ सब कुछ फिर से पहले जैसा हो जाता है। ये लोग इसी भ्रम में जीते हैं और संसार के सामने भी इस असत्य को रखते हैं कि वे मसीही विश्वासी हैं, और उनके जीवन मसीही विश्वासी होने का गलत उदहरण संसार के सामने प्रस्तुत करते हैं; जब कि वास्तविकता इस से विपरीत है। इस एक सच्चाई के अनेक अति महत्वपूर्ण आयाम हैं। यदि मसीह यीशु हमारे हृदय में विराजमान है और हमारा मन परमेश्वर की पवित्र आत्मा का मन्दिर है तो अवश्यंभावी है कि उसकी उपस्थिति हमारे जीवनों के अन्दर कुछ स्थायी परिवर्तन लाएगी जो स्वयं हमें तथा हमारे सम्पर्क में आने वाले लोगों पर प्रगट होंगे तथा मसीह की महिमा के कारण ठहरेंगे। हमारी वार्तालाप की विधि विषय और प्रयुक्त शब्द, हमारा व्यवहार विशेषकर जब कोई जानकार हमें देखने वाला ना हो, लोगों के साथ हमारे संबंध और व्यवहार, हमारा अपनी ज़िम्मेवरियों एवं अपने अधिकारियों के प्रति रवैया, सांसारिक उपलब्धियों एवं धन-संपत्ति तथा उन के महत्व तथा उपयोग के प्रति हमारा रवैया, हमारे शत्रुओं के प्रति हमारी मनसा और हमारा व्यवहार इत्यादि; जीवन की हर छोटी बड़ी बात में यह परिवर्तन दिखाई देगा।

   यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो अपने जीवन को जाँच के देखिए कि मसीह यीशु को अपने जीवन में आमंत्रित करने के बाद क्या आपके जीवन में स्थाई रूप से कुछ बदला है, और क्या यह परिवर्तन ज़ारी है? क्या आपके आस-पास के लोग और आपके प्रीय जन इस परिवर्तन को अनुभव करते हैं? यदि नहीं तो गंभीरता से विचार कीजिए और जांचिए कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि आपने मसीह यीशु को हृदय में स्थान देने की बजाए उसे अपने अन्दर से होकर जाने भर का केवल समय और मार्ग भर दिया हो। आपके निमंत्रण पर वह आया और उसके साथ ही थोड़े समय का भला परिवर्तन भी आया; फिर ठहरने के स्थाई स्थान और आपके जीवन को स्वच्छ तथा परिवर्तित करने के कार्य की अनुमति के अभाव मे