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Thursday, March 7, 2013

ध्यान


   मैं पिछली गर्मियों में निकट की एक छोटी नदी में मछली पकड़ रहा था, मेरा ध्यान पास में ही आई हुई मछली पर था। एक हलकी सी हलचल के कारण मैंने आस-पास देखा और पाया कि मेरा एक जानकार और राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मछलीमार प्रशिक्षक डेव टकर पास ही में खड़ा था। उसे देख कर मैं एकदम मछली पकड़ने के अपने प्रयास के प्रति सचेत हो गया और इसी हड़बड़ी में मछली पकड़ने की डोर ठीक से नहीं फेंक सका तथा मेरे पास आई वह मछली बच कर निकल गई। जब हम अपना ध्यान कार्य की बजाए अन्य बातों या अपने ही ऊपर लगाने लगते हैं तो वह कुछ नुकसान ही करता है।

   डब्ल्यु. एच. औडेन ने एक छोटी कविता लिखी है, उन लोगों के विषय में जो आपने अपने कार्य में खो जाते हैं - उस कविता में वे कहते हैं कि चाहे खाना पका रहा रसोइया हो या ऑपरेशन कर रहा सर्जन अथवा लदान का पर्चा बनाने वाला कोई क्लर्क, जब वे अपने कार्य में रत होते हैं तो सभी के चेहरे पर एक सा ही भाव होता है जो उनका उनके कार्य में खोए हुए होने को दिखाता है। यह ध्यान लगाना केवल कार्य के लिए ही नहीं वरन परस्पर संबंधों के लिए भी अति आवश्यक है। जब हम किसी मित्र से या रिश्तेदार से या अन्य किसी ऐसे जन से जो हमारी सहायता लेने आया हो संवाद में हों तो उसकी बात को ध्यान लगाकर सुनना अच्छे संबंधों के लिए अति आवश्यक है। उसके बोलते समय यदि हमारा ध्यान और कहीं होगा तो वह शीघ्र ही समझ जाएगा कि हमारी दिलचस्पी उसमें नहीं है और यह संबंधों में दूरी लाएगा।

   हमारा परमेश्वर भी हमें यही सिखाता है, क्योंकि वह ध्यान लगाकर हमारी हर बात सुनता है: "तब यहोवा का भय मानने वालों ने आपस में बातें की, और यहोवा ध्यान धर कर उनकी सुनता था; और जो यहोवा का भय मानते और उसके नाम का सम्मान करते थे, उनके स्मरण के निमित्त उसके साम्हने एक पुस्तक लिखी जाती थी" (मलाकी 3:16)। वह सारी सृष्टि का ध्यान रखता है और उसे हर पल संचालित करता रहता है, तौ भी उसका ध्यान हमारी ओर से कभी नहीं हटता। 

   कैसी अजीब बात है कि समस्त सृष्टि के संचालक के पास अपने प्रत्येक संतान की बात ध्यान से सुनने का समय है किंतु संसार और संसार की बातों में अपनी व्यस्तता की दुहाई देकर हमारे पास कितनी ही दफा उस महान प्रेमी सृष्टिकर्ता परमेश्वर की बात ध्यान से सुनने का समय नहीं होता। हम उसके वचन के अध्ययन के समय और उससे प्रार्थना में वार्तालाप करने के समय के महत्व को नहीं समझते और इन्हें एक औपचारिकता मात्र मानकर व्यर्थ कर देते हैं। जब प्रभु यीशु मार्था और मरियम के घर आया तो मरियम सब कुछ छोड़कर उसके चरणों पर बैठकर उससे सीखने लगी और प्रभु यीशु ने इस बात के लिए मरियम की सराहना करी: "परन्तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उस से छीना न जाएगा" (लूका 10:42)।

   ध्यान से सुनिए, मनुष्यों की भी और परमेश्वर की भी; यह आपके लिए सदैव हितकारी ही होगा।


ध्यान से सुनना प्रेम की अच्छी निशानी है।

...इसलिये हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्‍पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो। - याकूब 1:19

बाइबल पाठ: लूका 10:38-42
Luke 10:38 फिर जब वे जा रहे थे, तो वह एक गांव में गया, और मार्था नाम एक स्त्री ने उसे अपने घर में उतारा।
Luke 10:39 और मरियम नाम उस की एक बहिन थी; वह प्रभु के पांवों के पास बैठकर उसका वचन सुनती थी।
Luke 10:40 पर मार्था सेवा करते करते घबरा गई और उसके पास आकर कहने लगी; हे प्रभु, क्या तुझे कुछ भी सोच नहीं कि मेरी बहिन ने मुझे सेवा करने के लिये अकेली ही छोड़ दिया है? सो उस से कह, कि मेरी सहायता करे।
Luke 10:41 प्रभु ने उसे उत्तर दिया, मार्था, हे मार्था; तू बहुत बातों के लिये चिन्‍ता करती और घबराती है।
Luke 10:42 परन्तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उस से छीना न जाएगा।

एक साल में बाइबल: 
  • व्यवस्थाविवरण 3-4 
  • मरकुस 10:32-52