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Saturday, April 6, 2013

महानायक


   आज के समाज और संस्कृति में महानायकों की कमी नहीं है। किसी खेल के अच्छे और नामी खिलाड़ी इतने लोकप्रीय हो जाते हैं कि उनकी एक झलक पाने या उनके खेल को देखने जाने के लिए प्रशंसक कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहते हैं; फुटबॉल आदि खेल स्पर्धाओं के नतीजों को लेकर कितने ही दंगे हो चुके हैं। लोकप्रीय संगीतज्ञों और गायकों के प्रशंसक घंटों खड़े रहकर भी उनके संगीत और गाने को सुनने को आतुर रहते हैं। फिल्मी सितारों और नायकों की तो बात ही कुछ और है, उन्हें तो अपने प्रशंसकों से बचने के लिए अंगरक्षक तक रखने पड़ते हैं और उन से प्रेम करने वालों के व्यवहार और कारनामों के समाचार आए दिन सुनने-पढ़ने को मिलते रहते हैं।

   मसीही विश्वासीयों की आरंभिक मण्डली में भी लोगों ने अपने आत्मिक महानायक बना लिए थे और इससे उन महानायकों के अनुयायीयों के गुट और आपसी मनमुटाव मण्डली के कार्यों को प्रभावित करने लगे थे। प्रेरित पौलुस ने इस व्यवहार और विचारधारा की भर्त्सना करते हुए इसे पुराने मनुष्यत्व की पाप-प्रवृति का अंश बताया और लिखा: "इसलिये कि जब एक कहता है, कि मैं पौलुस का हूं, और दूसरा कि मैं अपुल्लोस का हूं, तो क्या तुम शारीरिक नहीं?" (1 कुरिन्थियों 3:4)

   पौलुस ने इस विषय में परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में सिखाते हुए समझाया कि मसीह यीशु की यह सेवकाई किसी मनुष्य द्वारा अपनी प्रशंसा और पद-प्रतिष्ठा पाने के लिए नहीं वरन सब सेवकों के परस्पर मेलजोल और एक दूसरे के पूरक कार्यों द्वारा मसीह कि देह अर्थात उसके विश्वासीयों की मण्डली के उत्थान के लिए है: "मैं ने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया" (1 कुरिन्थियों 3:6)| हर एक ने अपना अपना कार्य किया और योगदान दिया, पौलुस ने अपने प्रचार द्वारा आत्मिक जीवन का बीज बोया, अपुल्लोस ने अपनी प्रभावी व्याख्या और परमेश्वर के वचन की उत्कृष्ठ शिक्षा द्वारा उस बीज को सींचा, लेकिन वह परमेश्वर ही है जिसने उस बीज को उगाया, बढ़ाया और फलदायक बनाया। इसलिए यदि कोई महानायक है तो वह केवल और केवल परमेश्वर ही है।

   हम मसीही विश्वासीयों को बहुत सावधान रहना है कि हम परमेश्वर के स्थान पर किसी मनुष्य को इतना ऊँचा और प्रतिष्ठित ना कर दें कि उससे मण्डली में गुट और फूट, उस व्यक्ति में दंभ आ जाए तथा यह परमेश्वर के समाज की लोक-भर्त्सना तथा निन्दा का कारण हो जाए। वरन इसके बजाए हम इस बात को पहचानें और उसकी सराहना करें कि कैसे परमेश्वर विभिन्न लोगों और उनके जीवनों तथा गुणों को परस्पर साझा रूप में अपनी महिमा के लिए उपयोग कर लेता है। हमारा महानायक कोई मनुष्य नहीं वरन मनुष्यों को प्रतिभा और सामर्थ देने वाला परमेश्वर ही है। - डेनिस फिशर


परमेश्वर कि सेवकाई में प्रत्येक जन का अपना स्थान और योगदान है लेकिन महिमा के योग्य केवल परमेश्वर ही है।

मेरा कहना यह है, कि तुम में से कोई तो अपने आप को पौलुस का, कोई अपुल्लोस का, कोई कैफा का, कोई मसीह का कहता है। क्या मसीह बँट गया? क्या पौलुस तुम्हारे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया? या तुम्हें पौलुस के नाम पर बपतिस्मा मिला? - 1 कुरिन्थियों 1:12-13

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 3:1-15
1 Corinthians 3:1 हे भाइयों, मैं तुम से इस रीति से बातें न कर सका, जैसे आत्मिक लोगों से; परन्तु जैसे शारीरिक लोगों से, और उन से जो मसीह में बालक हैं।
1 Corinthians 3:2 मैं ने तुम्हें दूध पिलाया, अन्न न खिलाया; क्योंकि तुम उसको न खा सकते थे; वरन अब तक भी नहीं खा सकते हो।
1 Corinthians 3:3 क्योंकि अब तक शारीरिक हो, इसलिये, कि जब तुम में डाह और झगड़ा है, तो क्या तुम शारीरिक नहीं? और मनुष्य की रीति पर नहीं चलते?
1 Corinthians 3:4 इसलिये कि जब एक कहता है, कि मैं पौलुस का हूं, और दूसरा कि मैं अपुल्लोस का हूं, तो क्या तुम शारीरिक नहीं?
1 Corinthians 3:5 अपुल्लोस क्या है? और पौलुस क्या है? केवल सेवक, जिन के द्वारा तुम ने विश्वास किया, जैसा हर एक को प्रभु ने दिया।
1 Corinthians 3:6 मैं ने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया।
1 Corinthians 3:7 इसलिये न तो लगाने वाला कुछ है, और न सींचने वाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ाने वाला है।
1 Corinthians 3:8 लगाने वाला और सींचने वाला दानों एक हैं; परन्तु हर एक व्यक्ति अपने ही परिश्रम के अनुसार अपनी ही मजदूरी पाएगा।
1 Corinthians 3:9 क्योंकि हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं; तुम परमेश्वर की खेती और परमेश्वर की रचना हो।
1 Corinthians 3:10 परमेश्वर के उस अनुग्रह के अ