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Thursday, May 2, 2013

परमेश्वर से प्रेम


   क्या कभी आपने जीवन जीने से संबंधित नियमों एवं आज्ञाओं से अपने आप को दबा हुआ तथा मुक्त होने के लिए छटपटाता हुआ अनुभव किया है? ज़रा विचार कीजिए कि परमेश्वर के वचन बाइबल में पुराने नियम में दिए गए 600 से भी अधिक नियमों और धर्म-गुरुओं तथा धर्म-शिक्षकों द्वारा मानने के लिए स्थापित किए गए इनके अतिरिक्त और भी अनेक नियमों को लेकर इस्त्राएली लोग कैसा अनुभव करते होंगे! और फिर उनके उस आश्चर्य के बारे में भी सोचिए जब प्रभु यीशु मसीह ने धार्मिकता की उनकी खोज को सरल करके, इन बेहिसाब नियमों के पालन को केवल दो नियमों में ही सीमित कर दिया - "...तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख (मत्ती 22:37)"; तथा "...तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख (मत्ती 22:39)"।

   प्रभु यीशु के कहने का तात्पर्य, तब उन इस्त्राएली लोगों से और आज हम सब से भी यही है कि परमेश्वर की सृष्टि के प्रति हमारा प्रेम ही परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम की पहचान है, और इसमें कुछ विशेष मनुष्यों के प्रति लगाव और अन्यों के प्रति अलगाव, तिरस्कार या फिर घृणा आदि का चुनाव करने का कोई स्थान कदापि नहीं है। हमारा यह प्रेम सब मनुष्यों के लिए एक समान ही होना है क्योंकि सभी समान रूप से ही परमेश्वर की सृष्टि हैं। अपने पड़ौसी से प्रेम रखना एक चुनौती भी हो सकता है; किंतु चाहे वह हमारे प्रेम के योग्य हो अथवा ना हो, फिर भी यदि परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की पहचान के रूप में, हम अपने पड़ौसी से प्रेम रखते हैं तो इससे हम एक बहुत प्रभावी और सकारात्मक प्रेरणा को उत्पन्न करते हैं जिसके समाज के निर्माण और व्यक्ति के उत्थान से संबंधित दूरगामी परिणाम होते हैं।

   यदि मैं अपने पड़ौसी से वास्तव में सच्चा प्रेम रखूँगा तो मैं उसके विरुद्ध झूठी साक्षी नहीं दूँगा, कोई गलत बात नहीं कहूँगा और ना ही कोई अफवाह फैलने में सहायक होऊँगा; मैं उसकी किसी चीज़ का लालच नहीं करूँगा, उसकी पत्नि और परिवार जनों की ओर भी गलत नज़र से कभी नहीं देखूँगा; मैं उसकी किसी चीज़ की चोरी नहीं करूँगा और उसकी कोई हानि नहीं होने दूँगा। परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम के कारण, जैसे परमेश्वर मेरी गलतियों को क्षमा करता है, मैं भी अपने प्रति उसकी गलतियों को क्षमा करूँगा और उससे बदला लेने या उसे नीचा दिखाने की कोई भावना नहीं रखूँगा। सोचिए कि समाज पर कैसा अद्भुत प्रभाव होगा यदि हम प्रभु यीशु की इस शिक्षा को अपने जीवन में लागू कर लें।

   लेकिन यह कहना जितना सरल है, करना उतना सरल नहीं है क्योंकि हमारा पाप स्वभाव, हमारा अहम हमें ऐसा कदापि करने नहीं देता। यह सब करना हमारे लिए केवल तब ही संभव है जब हमने प्रभु यीशु में होकर परमेश्वर के प्रेम, अनुग्रह और क्षमा को व्यक्तिगत रीति से अनुभव किया हो और अपने पाप स्वभाव तथा अहम को अपने उद्धारकर्ता प्रभु यीशु को पूर्णतः समर्पित कर दिया हो; परमेश्वर के उस प्रेम, अनुग्रह और क्षमा के लिए अपने सर्वथा अयोग्य होने को जाना और माना हो, लेकिन साथ ही यह भी जाना हो कि सर्वथा अयोग्य होने के बावजूद भी परमेश्वर ने यह हमारे लिए किया और कर रहा है। इसलिए अब परमेश्वर के प्रति हमारा यह कर्तव्य है कि उसके इस प्रेम को दूसरों पर भी ऐसे ही निस्वार्थ भाव से प्रकट करें। परमेश्वर से मिली सामर्थ के बिना परमेश्वर के प्रेम को प्रकट कर पाना संभव नहीं, और परमेश्वर की यह सामर्थ प्रभु यीशु में मिलने वाली पापों की क्षमा और नए जीवन के अनुभव के साथ ही प्राप्त होती है।

   क्या आप परमेश्वर से प्रेम रखते हैं? स्वयं प्रभु यीशु मसीह के शब्दों में आपके दावे के यथार्थ की केवल एक ही पहचान है - अन्य लोगों के प्रति आपका प्रेम (यूहन्ना 13:34-35); अन्य हर पहचान मन गढ़ंत है, महज़ एक दिखावा है। - जो स्टोवैल


दूसरों के प्रति प्रेम ही परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची पहचान है।

मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूं, कि एक दूसरे से प्रेम र