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Sunday, July 28, 2013

उपवास

   कुछ वर्ष पहले हमारे चर्च में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल के पुराने नियम में मिलाप वाले तम्बू को विषय बनाकर एक अध्ययन श्रंखला करी थी। जब इस श्रंखला में मेज़ पर रखी भेंट की रोटियों का विषय आया तो मैंने कुछ ऐसा किया जो उससे पहले कभी नहीं किया था - मैंने कई दिनों तक भोजन तज कर उपवास रखा। मैंने उपवास इसलिए रखा क्योंकि मैं परमेश्वर के वचन "...इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुंह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है" (व्यवस्थाविवरण 8:3) की सच्चाई को व्यक्तिगत रीति से अनुभव करना चाहता था। मैं चाहता था कि मैं किसी विवशता के अन्तर्गत नहीं वरन पूर्ण स्वेच्छा से एक ऐसी वस्तु का इन्कार करूँ जिससे मैं बहुत प्रेम रखता था - भोजन, उसके लिए जिससे मैं और भी अधिक प्रेम रखता हूँ - परमेश्वर।

   जब मैंने यह उपवास रखा तो प्रभु यीशु मसीह की उपवास से संबंधित शिक्षाओं (मत्ती 6:16-18) का पालन भी किया। इस खंड में प्रभु यीशु ने पहले एक नकारात्मक आज्ञा दी: "जब तुम उपवास करो, तो कपटियों की नाईं तुम्हारे मुंह पर उदासी न छाई रहे, क्योंकि वे अपना मुंह बनाए रहते हैं, ताकि लोग उन्हें उपवासी जानें; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके" (मत्ती 6:16)। फिर एक सकारात्मक आज्ञा दी: "परन्तु जब तू उपवास करे तो अपने सिर पर तेल मल और मुंह धो" (मत्ती 6:17)। इन दोनों आज्ञाओं के द्वारा प्रभु यीशु ने सिखाया कि हमें परमेश्वर के लिए कोई कार्य दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने या उन पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से नहीं करना है। हमारे यह कार्य परमेश्वर के प्रति प्रेम और आराधना का एक व्यक्तिगत बलिदान और उपासना हैं जिसमें किसी प्रकार के धार्मिक घमण्ड या किसी विवशता का कोई स्थान नहीं है। यह समझाने के बाद प्रभु यीशु ने इस बात के पालन पर आधारित आशीष की प्रतिज्ञा भी दी: "ताकि लोग नहीं परन्तु तेरा पिता जो गुप्‍त में है, तुझे उपवासी जाने; इस दशा में तेरा पिता जो गुप्‍त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा" (मत्ती 6:18)।

   मसीही विश्वास में उपवास रखना ना कोई विवशता है और ना ही परमेश्वर हमें इसके लिए बाध्य करता है कि उसकी निकटता में आने के लिए हम अपने आप को किसी भोजन वस्तु से वंचित करें। परमेश्वर की इच्छा यही है कि हम अपने जीवनों को उसके निर्देशों और नियमों के अनुसार संचालित करते रहें और संसार के समान जीने से बचे रहें, यही अपने आप में एक उपवास है जिसका परमेश्वर की नज़रों में बड़ा मोल है और जिसका परमेश्वर से प्रतिफल महान है (यशायाह 58:1-14)। - मार्विन विलियम्स


परमेश्वर के निकट आने के लिए संसार की लालसाओं से दूरी बना लेना लाभदायक होता है।

सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के लिये अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो अपने स्‍वर्गीय पिता से कुछ भी फल न पाओगे। - मत्ती 6:1

बाइबल पाठ: यशायाह 58:1-14
Isaiah 58:1 गला खोल कर पुकार, कुछ न रख छोड़, नरसिंगे का सा ऊंचा शब्द कर; मेरी प्रजा को उसका अपराध अर्थात याकूब के घराने को उसका पाप जता दे।
Isaiah 58:2 वे प्रति दिन मेरे पास आते और मेरी गति बूझने की इच्छा ऐसी रखते हैं मानो वे धर्मी लोग हैं जिन्होंने अपने परमेश्वर के नियमों को नहीं टाला; वे मुझ से धर्म के नियम पूछते और परमेश्वर के निकट आने से प्रसन्न होते हैं।
Isaiah 58:3 वे कहते हैं, क्या कारण है कि हम ने तो उपवास रखा, परन्तु तू ने इसकी सुधि नहीं ली? हम ने दु:ख उठाया, परन्तु तू ने कुछ ध्यान नहीं दिया? सुनो, उपवास के दिन तुम अपनी ही इच्छा पूरी करते हो और अपने सेवकों से कठिन कामों को कराते हो।
Isaiah 58:4 सुनो, तुम्हारे उपवास का फल यह होता है कि तुम आपस में लड़ते और झगड़ते और दुष्टता से घूंसे मारते हो। जैसा उपवास तुम आजकल रखते हो, उस से तुम्हारी प्रार्थना ऊपर नहीं सुनाई देगी।
Isaiah 58:5 जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूं अर्थात जिस में मनुष्य स्वयं को दीन करे, क्या तुम इस प्रकार करते हो? क्या सिर को झाऊ की नाईं झुकाना, अप