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Saturday, November 9, 2013

प्रतीक्षा


   मेरे प्रदेश मिशिगन में शरद ऋतु शिकार करने का समय होता है। कुछ सप्ताहों के लिए शिकारी शिकार करने का लाईसेन्स लेकर कुछ प्रकार के वन्य-जीवों का शिकार कर सकते हैं। कुछ शिकारी शिकार के लिए पेड़ों पर मचान बना कर धरती से काफी ऊँचाई पर जाकर बैठ जाते हैं और शांति-पूर्वक किसी शिकार योग्य जानवर के निकट आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। जिन्हें अपने मचान के स्थान पर और अपने शिकार कौशल पर विश्वास होता है वे लंबी प्रतीक्षा कर लेते हैं, जो अभी नए शिकारी हैं, उन्हें लंबी प्रतीक्षा करना कुछ भारी लगता है, वे अधीर रहते हैं।

   जब मैं उन शिकारियों के धैर्य के विषय में सोचती हूँ जो घंटों ऐसे ही बैठे जानवरों के आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं, तो मेरा ध्यान इस बात की ओर जाता है कि परमेश्वर को समय देने के लिए हम कितने अधीर हो उठते हैं! हम अकसर प्रतीक्षा को बर्बादी के साथ जोड़ कर देखते हैं। यदि हमें किसी बात की अथवा किसी जन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है तो हमें लगता है कि हम कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं, और हमारे तुरंत परिणाम एवं उपलब्धि पाने की लालसा रखने वाले समाज में यह प्रतीक्षा समय की बर्बादी मानी जाती है।

   लेकिन प्रतीक्षा कुछ उद्देश्य भी पूरे करती है, जिनमें से एक है हमारे विश्वास को प्रमाणित करना। जिनका विश्वास कमज़ोर होता है वे अधिक प्रतीक्षा नहीं करने पाते, लेकिन जिनका विश्वास दृढ़ होता है वे लंबे समय तक प्रतीक्षा कर लेते हैं - यह बात केवल आत्मिक संदर्भ में ही नहीं, वरन परस्पर मानवीय संबंधों पर भी उतनी ही लागू होती है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में हम लूका के 2 अध्याय में, प्रभु यीशु के जन्म से संबंधित घटनाओं में हम दो जनों शमौन और हन्नाह का उल्लेख पाते हैं, जिन्हें बहुत समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। उन दोनों को परमेश्वर की ओर से आश्वासन था कि जब तक वे परमेश्वर द्वारा भेजे गए समस्त जगत के उद्धारकर्ता को अपनी आँखों से देख नहीं लेंगे, वे संसार से विदा नहीं होंगे; और प्रभु यीशु के आगमन कि प्रतीक्षा में उन दोनों ने परमेश्वर के मन्दिर में प्रार्थना और धार्मिकता के जीवन के साथ एक लंबी उम्र बिताई। उनकी यह प्रतीक्षा और इस प्रतीक्षा के साथ उनका प्रार्थना तथा धार्मिकता का जीवन अनेक लोगों के लिए गवाही बना, और आज भी मसीही विश्वासियों के लिए शिक्षा का स्त्रोत है।

   प्रार्थना का तुरंत उत्तर ना मिलना विश्वास को छोड़ देने का कारण नहीं होना चाहिए। विश्वास की परिपक्वता प्रतीक्षा को दिए गए समय से भी आँकी जा सकती है। - जूली ऐकैर्मैन लिंक


परमेश्वर के उत्तर की प्रतीक्षा कभी समय की बर्बादी नहीं होती।

तौभी यहोवा इसलिये विलम्ब करता है कि तुम पर अनुग्रह करे, और इसलिये ऊंचे उठेगा कि तुम पर दया करे। क्योंकि यहोवा न्यायी परमेश्वर है; क्या ही धन्य हैं वे जो उस पर आशा लगाए रहते हैं। - यशायाह 30:18

बाइबल पाठ: लूका 2:22-38
Luke 2:22 और जब मूसा की व्यवस्था के अनुसार उन के शुद्ध होने के दिन पूरे हुए तो वे उसे यरूशलेम में ले गए, कि प्रभु के सामने लाएं। 
Luke 2:23 (जैसा कि प्रभु की व्यवस्था में लिखा है कि हर एक पहिलौठा प्रभु के लिये पवित्र ठहरेगा)। 
Luke 2:24 और प्रभु की व्यवस्था के वचन के अनुसार पंडुकों का एक जोड़ा, या कबूतर के दो बच्‍चे ला कर बलिदान करें। 
Luke 2:25 और देखो, यरूशलेम में शमौन नाम एक मनुष्य था, और वह मनुष्य धर्मी और भक्त था; और इस्राएल की शान्‍ति की बाट जोह रहा था, और पवित्र आत्मा उस पर था। 
Luke 2:26 और पवित्र आत्मा से उसको चितावनी हुई थी, कि जब तक तू प्रभु के मसीह को देख ने लेगा, तक तक मृत्यु को न देखेगा। 
Luke 2:27 और वह आत्मा के सिखाने से मन्दिर में आया; और जब माता-पिता उस बालक यीशु को भीतर लाए, कि उसके लिये व्यवस्था की रीति के अनुसार करें। 
Luke 2:28 तो उसने उसे अपनी गोद में लिया और परमेश्वर का धन्यवाद कर के कहा, 
Luke 2:29 हे स्‍वामी, अब तू अपने दास को अपने वचन के अनुसार शान्‍ति से विदा करता है। 
Luke 2:30 क्योंकि मेरी आंखो ने तेरे उद्धार को देख लिया है। 
Luke 2:31 जिसे तू ने सब देशों के लोगों के साम्हने तैयार किया है। 
Luke 2:32 कि वह अन्य जातियों को प्रकाश देने के लिये ज्योति, और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो। 
Luke 2:33 और उसका पिता और उस की माता इन बातों से जो उसके विषय में कही जाती थीं, आश्चर्य करते थे। 
Luke 2:34 तब शमौन ने उन को आशीष देकर, उस की माता मरियम से कहा; देख, वह तो इस्राएल में बहुतों के गिरने, और उठने के लिये, और एक ऐसा चिन्ह होने के लिये ठहराया गया है, जिस के विरोध में बातें की जाएगीं -- 
Luke 2:35 वरन तेरा प्राण भी तलवार से वार पार छिद जाएगा-- इस से बहुत हृदयों के विचार प्रगट होंगे। 
Luke 2:36 और अशेर के गोत्र में से हन्नाह नाम फनूएल की बेटी एक भविष्यद्वक्तिन थी: वह बहुत बूढ़ी थी, और ब्याह होने के बाद सात वर्ष अपने पति के साथ रह पाई थी। 
Luke 2:37 वह चौरासी वर्ष से विधवा थी: और मन्दिर को नहीं छोड़ती थी पर उपवास और प्रार्थना कर कर के रात-दिन उपासना किया करती थी। 
Luke 2:38 और वह उस घड़ी वहां आकर प्रभु का धन्यवाद करने लगी, और उन सभों से, जो यरूशलेम के छुटकारे की बाट जोहते थे, उसके विषय में बातें करने लगी।

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 46-47 
  • इब्रानियों 6