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Tuesday, February 4, 2014

वचन और शांति


   लगभग 85 वर्ष पहले हंगरी देश के एक लेखक ने एक लघु-कथा लिखी थी जिसका शीर्षक था ’चेन-लिंक्स’, जिसमें उसने यह विचार दिया था कि संसार में कोई भी दो व्यक्तियों के बीच संबंध की कड़ी में अधिक से अधिक पाँच व्यक्तियों तक की दूरी की कड़ी होती है। यह विचार अब पुनः जागृत किया गया है और इसे अब Six Degrees of Separation अर्थात ’अलगाव के छः स्तर’ कहा जाता है। इस विचार का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन यह हमारा ध्यान इस बात कि ओर खींचती है कि संसार में कुछ ऐसा कार्य कर रहा है जो हमें एक दूसरे के साथ संबंधित करता है, और वह है परमेश्वर की समझ-बूझ और प्रावधान जो उसके वचन में होकर कार्य कर रहे हैं।

   कुछ वर्ष पहले मुझे एक पत्र मिला, जो एक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखा गया था जिसे मैं ना तो जानता था और ना कभी उससे मिला था, और ना ही उससे मेरा कोई संबंध था। उसने मुझे बताया कि मेरे द्वारा मेरे एक मित्र को भेजा गया एक पत्र (जिसे मैंने अपने उस मित्र को उसकी घोर निराशा और परेशानी में प्रोत्साहित करने के लिए लिखा था) उस व्यक्ति तक पहुँच गया था और उस व्यक्ति को उसकी घोर निराशा और परेशानी में उस पत्र से बहुत प्रोत्साहन मिला था। जो पत्र मैंने अपने मित्र को भेजा था, वह उस ने अपने किसी अन्य मित्र को भी दिया, जिसने उसे फिर आगे किसी अन्य मित्र को दे दिया और इस प्रकार एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुड़ती चली गई और चलते चलते वह पत्र उस व्यक्ति तक पहुँच गया जिसने मुझे पत्र लिखा था। एक व्यक्ति को दिया गया प्रोत्साहन आगे चलकर ना जाने कितने लोगों के लिए प्रोत्साहन का कारण बन गया।

   यह संभव है कि परमेश्वर की समझ-बूझ में होकर लिखा गया प्रेम का एक छोटा सा सन्देश, परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में अनन्तकालीन प्रभाव ले आए। इसलिए क्या हमें अपने आप को परमेश्वर के वचन से भर नहीं लेना चाहिए और फिर उस वचन को आगे किसी अन्य तक इस प्रार्थना के साथ पहुँचा नहीं देना चाहिए कि परमेश्वर उस वचन को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग करे (यशायाह 55:11), जिससे वह शांति जो हमने परमेश्वर के वचन से प्राप्त करी है दूसरों को भी प्राप्त हो सके? - डेविड रोपर


जैसे फूल नहीं जानता कि उसकी सुगंध कहाँ क्या प्रभाव ला रही है वैसे ही हम नहीं जानते कि हमारा मसीही प्रेम से भरा व्यवहार कहाँ क्या प्रभाव लाएगा।

क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग कर के, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है। - इब्रानियों 4:12

बाइबल पाठ: यशायाह 55:8-11
Isaiah 55:8 क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। 
Isaiah 55:9 क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है।
Isaiah 55:10 जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहां यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिस से बोने वाले को बीज और खाने वाले को रोटी मिलती है, 
Isaiah 55:11 उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 24-27