बाइबल और मसीही विश्वास सम्बन्धी अपने प्रश्नों के लिए यहाँ क्लिक करें:

GotQuestions?org

Thursday, April 3, 2014

नाम


   किसी नाम में ऐसा क्या हो सकता है कि हम उसे विशेष समझें? यह प्रश्न मेरे मन में तब उठा जब मैं जैमैका में एक इतवार की प्रातः एक चर्च के बाहर खड़े होकर उस चर्च की एक किशोरी से बात कर रहा था। उस किशोरी ने मुझ से पूछा, "क्या आप मेरा नाम का Our Daily Bread में उल्लेख करेंगे?" मैंने पूछा, "क्या तुम्हारे पास बताने को कोई बात है?" उसने उत्तर दिया, "नहीं, बस मेरे नाम का उल्लेख कर दीजिए।"

   उसके इस आग्रह और उसके नाम के बारे में विचार करते हुए मैं सोचने लगा, उसके माता-पिता ने उस किशोरी का नाम ’जॉयथ’ क्यों रखा होगा? उसके प्रसन्न स्वभाव को देखकर मैंने निषकर्ष निकाला कि यह नाम रखने के पीछे यदि उनका उद्देश्य उसे जीवन में आनन्दित रहने वाली बनाना रहा होगा तो वे अपने उद्देश्य में सफल रहे। अधिकांशतः अभिभावकों के पास यह विकल्प रहता है कि वे अपनी सन्तान का नाम चुनें। लेकिन एक बालक ऐसा भी था जिसका नामकरण बिलकुल अलग रीति से हुआ - ना तो उसके माता-पिता को नाम चुननें की स्वतंत्रता मिली, और ना ही उसे कोई ऐसा नाम दिया गया जो उसे किसी विशेष व्यक्तित्व की ओर जाने को उकसाता।

   वह बालक था यीशु, जिसका नाम और उस नाम का अर्थ एक स्वर्गदूत नें उसके होने वाले सांसारिक पिता को बताया: "वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा" (मत्ती 1:21)। इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि ऐसे अद्भुत उद्देश्य वाला नाम, परमेश्वर द्वारा सब नामों में सर्वश्रेष्ठ ठहराया गया, "इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है। कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें" (फिलिप्पियों 2:9-10), क्योंकि सारे जगत के लोगों के पापों से मुक्ति और उद्धार पाने के लिए वह ही ठहराया गया, और उसने ही उद्धार का मार्ग सबके लिए तैयार करके दिया है।

   यदि उल्लेख, वर्णन और विश्वास के लायक कोई नाम है तो निसन्देह वह यीशु नाम ही है। - डेव ब्रैनन


यीशु - उसके नाम का अर्थ और उसका उद्देश्य, दोनों एक ही हैं।

और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें। - प्रेरितों 4:12

बाइबल पाठ: मत्ती 1:18-25
Matthew 1:18 अब यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार से हुआ, कि जब उस की माता मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो गई, तो उन के इकट्ठे होने के पहिले से वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पाई गई। 
Matthew 1:19 सो उसके पति यूसुफ ने जो धर्मी था और उसे बदनाम करना नहीं चाहता था, उसे चुपके से त्याग देने की मनसा की। 
Matthew 1:20 जब वह इन बातों के सोच ही में था तो प्रभु का स्वर्गदूत उसे स्‍वप्‍न में दिखाई देकर कहने लगा; हे यूसुफ दाऊद की सन्तान, तू अपनी पत्‍नी मरियम को अपने यहां ले आने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। 
Matthew 1:21 वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा। 
Matthew 1:22 यह सब कुछ इसलिये हुआ कि जो वचन प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था; वह पूरा हो। 
Matthew 1:23 कि, देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा जिस का अर्थ यह है “ परमेश्वर हमारे साथ”। 
Matthew 1:24 सो यूसुफ नींद से जागकर प्रभु के दूत की आज्ञा अनुसार अपनी पत्‍नी को अपने यहां ले आया। 
Matthew 1:25 और जब तक वह पुत्र न जनी तब तक वह उसके पास न गया: और उसने उसका नाम यीशु रखा।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 राजा 14-16