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Tuesday, April 15, 2014

शांत और विश्राम से


   जब मेरे नेत्र विशेषज्ञ मुझे शांत होकर विश्राम करने का परामर्ष देते हैं तो मैं वैसा ही करती हूँ; मैं उन से बहस नहीं करती, उनकी अनाज्ञाकारी नहीं होती और उनके पीठ पीछे अपने आप को काम में व्यस्त नहीं कर लेती। क्यों? क्योंकि मैं जानती हूँ कि वे एक बहुत प्राख्यात नेत्र विशेज्ञ हैं, वे मेरी दृष्टि को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं और इस कार्य में उन्हें मेरा पर्याप्त सहयोग चाहिए। उनके निर्देशों की अवहेलना कर के अपनी मन मर्ज़ी करना मेरे लिए मूर्खता होगी।

   तो, जब मैं शारीरिक बातों के लिए एक चिकित्सक के निर्देशों का पालन इतनी गंभीरता से करती हूँ तो आत्मिक बातों के लिए परमेश्वर के निर्देशों का पालन करने में आनाकानी क्यों करती हूँ? यदि मैं एक मनुष्य के कहने पर शांत होकर विश्राम करने को तैयार हो जाती हूँ जिससे मुझे लाभ हो सके तो परमेश्वर के कहने पर शांत होकर विश्राम करने को तैयार क्यों नहीं होती? जैसे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वैसे ही आत्मिक स्वास्थ्य के लिए भी शांत हो जाना और उचित विश्राम करना अति आवश्यक है। परमेश्वर ने विश्राम को इतना महत्व दिया है कि उसे जीवन की लय में पिरो दिया है। बिना पर्याप्त विश्राम के हम ठीक से कोई भी कार्य नहीं कर पाते, हमारी शक्ति क्षीण होने लगती है, हमारी गलतियाँ करने की प्रवृति बढ़ने लगती है। यही हमारे आत्मिक जीवन में भी होता है यदि हम कुछ थम के, शांत होकर, परमेश्वर के साथ बैठकर कुछ समय व्यतीत ना करें।

   जब परमेश्वर के नबी एलियाह ने दुष्ट राजा आहाब और उसकी पत्नि इज़ेबेल का सामना किया तो उस तनावपूर्ण संघर्ष के बाद वह थक गया। परमेश्वर ने उसकी सेवा करने के लिए अपना एक दूत भेजा, और शांत हो जाने के बाद एलियाह के पास परमेश्वर का वचन आया। उस समय उस तनाव की स्थिति में एलियाह को लग रहा था कि केवल वह ही परमेश्वर के प्रति वफादार है और उसके लिए कार्य कर रहा है। लेकिन परमेश्वर ने उसे बताया कि अभी उसके अलावा 7000 और लोग हैं जिन्होंने बाल देवता के आगे घुटने नहीं टेके हैं।

   हो सकता है कि हमें लगे कि यदि हम शांत होकर विश्राम करने लगेंगे तो फिर कैसे काम चलेगा; हमारे कार्य किए बिना क्या हो सकेगा? लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यदि वे शांत होकर विश्राम नहीं करेंगे तो उसका परिणाम क्या होगा? क्योंकि शारीरिक या आत्मिक रीति से थकित होकर तो हम कुछ भी सही नहीं कर सकते। जब हम शांत और विश्राम में होते हैं तब ही शरीर और आत्मा को स्वस्थ करने की क्रियाएं हमारे जीवनों में कार्य कर पाती हैं और हमें और अधिक कार्य के लिए तैयार तथा मज़बूत कर पाती हैं।

   जैसे मेरे लिए आवश्यक था कि मैं अपने नेत्र विशेषज्ञ की बात मानकर अपनी दृष्टि को ठीक रखने के लिए शांत और विश्राम में हो जाऊँ, वैसे ही हम सब को परमेश्वर की बात मानकर शांत और एकाग्र होकर उसके साथ समय बिताने की आवश्यकता है जिससे हमारे शरीर और मन स्वस्थ रहें। - जूली ऐकैअरमैन लिंक


हमारी सबसे बड़ी सामर्थ हमारा परमेशवर के सम्मुख शांत होकर खड़े रहना और उसपर भरोसा रखना ही है।

चुप हो जाओ, और जान लो, कि मैं ही परमेश्वर हूं। मैं जातियों में महान हूं, मैं पृथ्वी भर में महान हूं! - भजन 46:10

बाइबल पाठ: 1 राजा 19:1-18
1 Kings 19:1 तब अहाब ने ईज़ेबेल को एलिय्याह के सब काम विस्तार से बताए कि उसने सब नबियों को तलवार से किस प्रकार मार डाला। 
1 Kings 19:2 तब ईज़ेबेल ने एलिय्याह के पास एक दूत के द्वारा कहला भेजा, कि यदि मैं कल इसी समय तक तेरा प्राण उनका सा न कर डालूं तो देवता मेरे साथ वैसा ही वरन उस से भी अधिक करें। 
1 Kings 19:3 यह देख एलिय्याह अपना प्राण ले कर भागा, और यहूदा के बेर्शेबा को पहुंच कर अपने सेवक को वहीं छोड़ दिया। 
1 Kings 19:4 और आप जंगल में एक दिन के मार्ग पर जा कर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहां उसने यह कह कर अपनी मृत्यु मांगी कि हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ। 
1 Kings 19:5 वह झाऊ के पेड़ तले लेटकर सो गया और देखो एक दूत ने उसे छूकर कहा, उठ कर खा। 
1 Kings 19:6 उसने दृष्टि कर के क्य