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Thursday, May 15, 2014

दूर और निकट


   दो स्वस्थ आँखें होना ही स्पष्टता से देख पाने के लिए काफी नहीं है - यह मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से जाना है। मेरी आंख का पर्दा खराब हो गया था जिसके लिए मुझे कई ऑपरेशनों से होकर निकलना पड़ा। उन ऑपरेशनों के द्वारा मेरी दोनों आँखों को ठीक से दिखाई तो देने लगा, लेकिन वे दोनों परस्पर ताल-मेल के साथ कार्य नहीं कर रहीं थीं। एक आँख से दूर की चीज़ें स्पष्ट दिखती थीं तो दूसरी से पास की, और एक साथ मिलकर कार्य करने की बजाए, दोनों ही एक दूसरे पर हावी होने के प्रयास में रहती थीं, जिससे मैं किसी भी चीज़ पर दृष्टि केंद्रित कर के उसे स्पष्ट देख नहीं पाती थी। अन्ततः 3 महीने के अंतराल के बाद मुझे एक नया चश्मा दिया गया जिसकी सहायता से मैं दृष्टि केंद्रित कर के स्पष्ट देखने पाई।

   कुछ ऐसा ही परमेश्वर के प्रति हमारे दृष्टिकोण के साथ भी होता है। कुछ लोग परमेश्वर को निकटता से जान पाने पर ही - अर्थात उसे अपने प्रतिदिन के जीवन में निकटता से स्क्रीय अनुभाव कर के ही उस पर अपना ध्यान केंद्रित करने पाते हैं। अन्य लोगों को दूर का परमेश्वर ही स्पष्ट दिखाई देता है - अर्थात वे उसे किसी भी सोच-विचार से ऊपर और महान, सारी सृष्टि पर सामर्थी, प्रभावी और महिमामय जान कर ही उस पर केंद्रित रहने पाते हैं।

   जब इन दोनों दृष्टिकोणों में विवाद हो और सहमति नहीं बने, तब परमेश्वर का वचन बाइबल ही मेरे उस चश्मे के समान कार्य करती है, दोनों दृष्टिकोणों में तालमेल बनाती है और यह दिखाती है कि दोनों ही दृष्टिकोण सही हैं। राजा दाऊद ने अपने लिखे भजन - भजन 145 में दोनों ही दृष्टिकोणों को रखा है। वह कहता है: "यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है" (पद 3); और फिर यह भी कि, "जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात जितने उसको सच्चाई से पुकारते हें; उन सभों के वह निकट रहता है" (पद 18)।

   हमारा स्वर्गीय परमेश्वर पिता हमारे इतना निकट है कि हमारी हर दशा को जानता है और हमारी हर प्रार्थना को सुनता है; लेकिन साथ ही इतना महान, महिमामय और सामर्थी है कि हमारी हर समस्या एवं आवश्यकता से कहीं बड़ा और उन्हें पूरा करने की क्षमता रखने वाला है। - जूली ऐकैरमैन लिंक


परमेश्वर इतना बड़ा है कि हमारी छोटी से छोटी आवश्यकता को समझ सकता है, उसे पूरा कर सकता है।

देखो, कौन ऐसी बड़ी जाति है जिसका देवता उसके ऐसे समीप रहता हो जैसा हमारा परमेश्वर यहोवा, जब कि हम उसको पुकारते हैं? - व्यवस्थाविवरण 4:7

बाइबल पाठ: भजन 145
Psalms 145:1 हे मेरे परमेश्वर, हे राजा, मैं तुझे सराहूंगा, और तेरे नाम को सदा सर्वदा धन्य कहता रहूंगा। 
Psalms 145:2 प्रति दिन मैं तुझ को धन्य कहा करूंगा, और तेरे नाम की स्तुति सदा सर्वदा करता रहूंगा। 
Psalms 145:3 यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है। 
Psalms 145:4 तेरे कामों की प्रशंसा और तेरे पराक्रम के कामों का वर्णन, पीढ़ी पीढ़ी होता चला जाएगा। 
Psalms 145:5 मैं तेरे ऐश्वर्य की महिमा के प्रताप पर और तेरे भांति भांति के आश्चर्यकर्मों पर ध्यान करूंगा। 
Psalms 145:6 लोग तेरे भयानक कामों की शक्ति की चर्चा करेंगे, और मैं तेरे बड़े बड़े कामों का वर्णन करूंगा। 
Psalms 145:7 लोग तेरी बड़ी भलाई का स्मरण कर के उसकी चर्चा करेंगे, और तेरे धर्म का जयजयकार करेंगे। 
Psalms 145:8 यहोवा अनुग्रहकारी और दयालु, विलम्ब से क्रोध करने वाला और अति करूणामय है। 
Psalms 145:9 यहोवा सभों के लिये भला है, और उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है। 
Psalms 145:10 हे यहोवा, तेरी सारी सृष्टि तेरा धन्यवाद करेगी, और तेरे भक्त लोग तुझे धन्य कहा करेंगे! 
Psalms 145:11 वे तेरे राज्य की महिमा की चर्चा करेंगे, और तेरे पराक्रम के विषय में बातें करेंगे; 
Psalms 145:12 कि वे आदमियों पर तेरे पराक्रम के काम और तेरे राज्य के प्रताप की महिमा प्रगट करें। 
Psalms 145:13 तेरा राज्य युग युग का और तेरी प्रभुता सब पीढ़ियों तक बनी रहेगी। 
Psalms 145:14 यहोवा सब गिरते हुओं को संभालता है, और सब झुके हुओं को सीधा खड़ा करता है। 
Psalms 145:15 सभों की आंखें तेरी ओर लगी रहती हैं, और तू उन को आहार समय पर देता है। 
Psalms 145:16 तू अपनी मुट्ठी खोल कर, सब प्राणियों को आहार से तृप्त करता है। 
Psalms 145:17 यहोवा अपनी सब गति में धर्मी और अपने सब कामों में करूणामय है। 
Psalms 145:18 जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात जितने उसको सच्चाई से पुकारते हें; उन सभों के वह निकट रहता है। 
Psalms 145:19 वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करता है, ओर उनकी दोहाई सुन कर उनका उद्धार करता है। 
Psalms 145:20 यहोवा अपने सब प्रेमियों की तो रक्षा करता, परन्तु सब दुष्टों को सत्यानाश करता है। 
Psalms 145:21 मैं यहोवा की स्तुति करूंगा, और सारे प्राणी उसके पवित्र नाम को सदा सर्वदा धन्य कहते रहें।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्यूब 5-7