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Saturday, October 18, 2014

अनुग्रह और प्रेम


   मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई जिसका यह मानना था कि उसके कार्य इतने बुरे थे कि उनके लिए परमेश्वर उसे कभी क्षमा नहीं कर सकता। एक अन्य व्यसक और परिपक्व जन ने उसे अपने साथ लिया और उसे संभाला, और फिर एक वर्ष बाद जब मैं उससे मिला तब तक वह पहला व्यक्ति प्रभु यीशु में पापों की क्षमा और उद्धार को पा चुका था और बड़ी लगन से परमेश्वर के वचन बाइबल को पढ़ने में लगा हुआ था। लेकिन और तीन वर्ष के बाद जब मेरी उससे बातचीत हुई तो मुझे आभास हुआ कि मसीही विश्वास के जीवन का उसका वह आरंभिक उत्साह अब क्षीण हो गया था, उसके स्थान पर कुड़कुड़ाहट उसके जीवन में आ गई थी; उसने कहा, "मुझे यह समझ नहीं आता कि परमेश्वर कैसे बुराई को पनपने और समृद्ध होने देता है जबकि उसके अपने पुत्र और पुत्रियाँ (उसका संकेत स्वयं अपनी ओर था) जीवन यापन के लिए संघर्ष में लगे हैं।" उसकी कुड़कुड़ाहट ने उसके मसीही विश्वास के आनन्द को समाप्त कर दिया था।

   बहुतेरे अन्य लोगों के समान ही, वह भी यह भूल गया था कि एक समय वह स्वयं भी उस बुराई में पड़ा था, और यह केवल मसीह यीशु में होकर उपलब्ध परमेश्वर का अनुग्रह ही था जिसके द्वारा उसका जीवन बदला और वह पापों से छूट सका। आज वह उस पाप क्षमा और उद्धार के लिए अपनी आरंभिक कृतज्ञता को भूल गया था, उसने अपने प्रति प्रभु के अनुग्रह का मूल्यांकन करने और अपना जीवन प्रभु के समक्ष बिताने की बजाए दूसरों का मूल्यांकन करने और अपनी तुलना उनसे करना आरंभ कर दिया था, जिससे उसका दृष्टिकोण बदल गया और उसका आनन्द जाता रहा। उसके इस व्यवहार से मुझे प्रभु यीशु द्वारा दाख की बारी में काम करने के लिए मज़दुरों को बुलाए जाने वाले दृष्टांत (मत्ती 20:1-16) की याद आई। स्वामी ने जिन्हें उस बारी में कार्य करने के लिए बुलाय था, उनमें से कुछ अपने कर्त्वय को भूल कर दुसरों के बारे में सोचने लग गए थे (पद 10-12), और परिणाम दुखदायी था।

   परमेश्वर हम में से किसी का भी, किसी भी रीति से, किसी भी बात के लिए लेशमात्र भी कर्ज़दार नहीं है। यदि हमारे पापों के बावजूद वह हमें अपनी पृथ्वी पर बने रहने देता है, हमें खाने-पीने-रहने-ओढ़ने को देता है, हमारे जीवनों में आनन्द के अवसर आने देता है, तो यह सब उसका हमारे प्रति अनुग्रह और प्रेम ही है। लेकिन इससे भी बढ़कर उसका प्रेम इसमें प्रदर्शित होता है कि वह संसार के सभी लोगों को प्रभु यीशु में होकर सेंत-मेंत उद्धार उपलब्ध कराता है, उनके पाप क्षमा करने को तैयार रहता है, उन्हें अपने परिवार में जोड़ने को लालायित रहता है। वह चाहता है कि हम सब उसके साथ अनन्तकाल तक स्वर्ग में निवास करें, और जो कोई प्रभु यीशु में होकर उसके पास आता है, उसके अन्दर वह अपना आत्मा निवास करने को देता है जिससे वह व्यक्ति उस अनन्तकाल के जीवन के लिए तैयार किया जा सके।

   किसी के भी जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव उसके प्रति परमेश्वर के इस महान अनुग्रह और प्रेम को किसी रीति से कमतर नहीं आँक सकते। जब तक हमारी नज़रें अपने उद्धारकर्ता प्रभु परमेश्वर यीशु मसीह पर लगी रहेंगी, और हम उसके वचन की रौशनी में स्वयं अपना आँकलन उसके समक्ष करते रहेंगे, हम उसके अनुग्रह के महत्व तथा हमारे प्रति उसके प्रेम की महानता को समझते रहेंगे। फिर हमारे जीवन में ना तो कुड़कुड़ाने का कोई अवसर होगा और ना ही प्रभु में हमारा आनन्द कभी छिन्न हो सकेगा। - रैन्डी किल्गोर


जीवन में तृप्त और आनन्दित रहने के लिए कभी यह ना भूलें कि परमेश्वर भला है और अपने बच्चों के लिए सदा भला ही करता है।

हे भाइयों, एक दूसरे पर दोष न लगाओ ताकि तुम दोषी न ठहरो, देखो, हाकिम द्वार पर खड़ा है। - याकूब 5:9

बाइबल पाठ: मत्ती 20:1-16
Matthew 20:1 स्वर्ग का राज्य किसी गृहस्थ के समान है, जो सबेरे निकला, कि अपने दाख की बारी में मजदूरों को लगाए। 
Matthew 20:2 और उसने मजदूरों से एक दीनार रोज पर ठहराकर, उन्हें अपने दाख की बारी में भेजा। 
Matthew 20:3 फिर पहर एक दिन चढ़े, निकल कर, और औरों को बाजार में बेकार खड़े देखकर, 
Matthew 20:4 उन से कहा, तुम भी दाख की बारी में जाओ, और जो कुछ ठीक है, तुम्हें दूंगा; सो वे भी गए। 
Matthew 20:5 फिर उसने दूसरे और तीसरे पहर के निकट निकलकर वैसा ही किया। 
Matthew 20:6 और एक घं