ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

पर्याप्त



   मुझे Our Daily Bread पुस्तिका के लिए सन्देश लिखना अच्छा लगता है। लेकिन मैं यह भी मान लेती हूँ कि कई बार मैं अपने मित्रों के सामने इस बात को लेकर कुड़कुड़ाई हूँ कि 220 शब्दों के एक छोटे से सन्देश में जो कुछ मैं कहना चाहती हूँ, वह सब कह पाना कितना कठिन हो जाता है; काश मुझे इससे अधिक शब्दों का प्रयोग कर पाने की अनुमति होती।

   इस वर्ष जब मैं परमेश्वर के वचन बाइबल को पढ़ने के अपने क्रम में मत्ती रचित सुसमाचार पर आई तो पहली बार मेरा ध्यान कुछ ऐसे पर गया जिस पर इससे पहले कभी नहीं गया था। जब मैं प्रभु यीशु की परीक्षा के विवरण को पढ़ रही थी (मत्ती 4:1-11), तो मेरे ध्यान में आया कि यह विवरण कितना संक्षिप्त था; मत्ती ने 250 से भी कम शब्दों में एक ऐसी घटना को लिखा जिसका परमेश्वर के वचन में अभूतपूर्व स्थान तथा महत्व है। फिर मुझे ध्यान आया बाइबल में अन्य ऐसे ही जाने-पहिचाने, संक्षिप्त किंतु अति सशक्त तथा महत्वपूर्ण खण्ड और भी हैं, जैसे भजन 23 और प्रभु की प्रार्थना (मत्ती 6:9-13)।

   स्पष्ट था कि मुझे अधिक शब्दों की नहीं, वरन शब्दों को अधिक उचित रीति से उपयोग करने की आवश्यकता थी। यही तथ्य जीवन के अन्य क्षेत्रों पर - जैसे समय, धन, स्थान आदि पर भी लागू होता है। परमेश्वर का वचन हमें आश्वस्त करता है कि परमेश्वर उन लोगों की सभी आवश्यकताएं पूरी करता है जो उसके राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में रहते हैं (मत्ती 6:33)। राजा दाऊद ने अपने एक भजन में कहा, "जवान सिंहों तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं; परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होवेगी" (भजन 34:10)।

   यदि आज आप किसी वस्तु या बात के लिए यह सोचे बैठे हैं कि "मुझे यह बस थोड़ी सी और चाहिए", तो ज़रा थम कर थोड़ा विचार कीजिए; परमेश्वर ने आपकी आवश्यकता के अनुसार आपको पर्याप्त दिया है, संभवतः आपकी आवश्यकता "थोड़ी और" की नहीं वरन दिए हुए के "थोड़े और उचित प्रयोग" की है। - जूली ऐकैरमैन लिंक


वह धनी है जो उतने में संतुष्ट है जितना उसके पास है।

मैं लड़कपन से ले कर बुढ़ापे तक देखता आया हूं; परन्तु न तो कभी धर्मी को त्यागा हुआ, और न उसके वंश को टुकड़े मांगते देखा है। - भजन 37:25

बाइबल पाठ: मत्ती 6:25-34
Matthew 6:25 इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्‍ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्‍त्र से बढ़कर नहीं? 
Matthew 6:26 आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते। 
Matthew 6:27 तुम में कौन है, जो चिन्‍ता कर के अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है 
Matthew 6:28 और वस्‍त्र के लिये क्यों चिन्‍ता करते हो? जंगली सोसनों पर ध्यान करो, कि वै कैसे बढ़ते हैं, वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं। 
Matthew 6:29 तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे वैभव में उन में से किसी के समान वस्‍त्र पहिने हुए न था। 
Matthew 6:30 इसलिये जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्‍त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्योंकर न पहिनाएगा? 
Matthew 6:31 इसलिये तुम चिन्‍ता कर के यह न कहना, कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएंगे, या क्या पहिनेंगे? 
Matthew 6:32 क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्‍तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए। 
Matthew 6:33 इसलिये पहिले तुम उस के राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी। 
Matthew 6:34 सो कल के लिये चिन्‍ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्‍ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुख बहुत है।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 34-35
  • मत्ती 22:23-46



2 टिप्‍पणियां: