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Thursday, February 1, 2018

प्रार्थना


   क्या आप ऐसे समय से निकल रहे हैं जब लगता है कि समस्या के समाधान के प्रत्येक प्रयास का सामना एक नई समस्या से होता है? आप रात्रि को सोने से पहले परमेश्वर को धन्यवाद करते हैं कि समस्या सुलझा गई, परन्तु जब प्रातः उठते हैं तो पता चलता है कि कुछ बिगड़ गया है और समस्या वहीं की वहीं है।

   ऐसे ही एक अनुभव से निकलते समय, मैं परमेश्वर के वचन बाइबल में लूका रचित सुसमाचार पढ़ रहा था, और 18वें अध्याय के आरंभिक पद को पढ़कर चकित हो गया; वहाँ लिखा था : “फिर उसने इस के विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ना चाहिए उन से यह दृष्‍टान्‍त कहा” (पद 1)। मैंने निरंतर निवेदन करते रहने वाली विधवा का यह दृष्टान्त अनेकों बार पहले भी पढ़ा था, परन्तु यह नहीं समझ पाया था कि प्रभु यीशु ने उसे क्यों सुनाया था (पद 2-8)। लेकिन अब मैं उन आरंभिक शब्दों का शेष कहानी के साथ मेल बैठा सका। प्रभु यीशु की, अपने शिष्यों को दी गई शिक्षा स्पष्ट थे – “निरंतर प्रार्थना करते रहो और कभी हिम्मत न टूटने दो।”

   प्रार्थना परमेश्वर को हमारी इच्छा को पूरा करने के लिए मजबूर करने का तरीका नहीं है। प्रार्थना परमेश्वर की सामर्थ्य को समझाने, पहचानने और हमारे जीवनों के लिए उसकी योजनाओं को जानने, की प्रक्रिया है। प्रार्थना में हम अपने जीवन और परिस्थितयों को उसके हाथों में समर्पित करते हैं और भरोसा करते हैं कि अपने समय और तरीके से वह हमारे पक्ष में कार्य करेगा।

   हम जैसे जैसे परमेश्वर के अनुग्रह पर न केवल अपने निवेदन के परिणाम के लिए, वरन, उस परिणाम की प्रक्रिया के लिए भी भरोसा रखते हैं, हम बारंबार परमेश्वर के पास प्रार्थना में लौट कर आते हैं, उसके द्वारा हमारी देखभाल और उसकी बुद्धिमता पर विश्वास रखते हुए।

   हमारे लिए हमारे प्रभु परमेश्वर का प्रोत्साहन स्पष्ट है: “निरंतर प्रार्थना करते रहो और कभी हिम्मत न टूटने दो।” – डेविड मैक्कैस्लैंड


प्रार्थना सब कुछ बदल देती है।

इसलिये जागते रहो और हर समय प्रार्थना करते रहो कि तुम इन सब आने वाली घटनाओं से बचनेऔर मनुष्य के पुत्र के साम्हने खड़े होने के योग्य बनो। - लूका 21:36

बाइबल पाठ: लूका 18:1-8
Luke 18:1 फिर उसने इस के विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ना चाहिए उन से यह दृष्‍टान्‍त कहा।
Luke 18:2 कि किसी नगर में एक न्यायी रहता था; जो न परमेश्वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था।
Luke 18:3 और उसी नगर में एक विधवा भी रहती थी: जो उसके पास आ आकर कहा करती थी, कि मेरा न्याय चुकाकर मुझे मुद्दई से बचा।
Luke 18:4 उसने कितने समय तक तो न माना परन्तु अन्‍त में मन में विचारकर कहा, यद्यपि मैं न परमेश्वर से डरता, और न मनुष्यों की कुछ परवाह करता हूं।
Luke 18:5 तौभी यह विधवा मुझे सताती रहती है, इसलिये मैं उसका न्याय चुकाऊंगा कहीं ऐसा न हो कि घड़ी घड़ी आकर अन्‍त को मेरा नाक में दम करे।
Luke 18:6 प्रभु ने कहा, सुनो, कि यह अधर्मी न्यायी क्या कहता है?
Luke 18:7 सो क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा, जो रात-दिन उस की दुहाई देते रहते; और क्या वह उन के विषय में देर करेगा?
Luke 18:8 मैं तुम से कहता हूं; वह तुरन्त उन का न्याय चुकाएगा; तौभी मनुष्य का पुत्र जब आएगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?


एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 27-28
  • मत्ती 21:1-22