गुरुवार, 9 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 15

 

पाप का समाधान - उद्धार - 11

कल से हमने उद्धार से संबंधित तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” पर विचार आरंभ किया था। पाप और उसके प्रभावों, तथा सभी मनुष्यों के लिए उद्धार की अनिवार्यता के संदर्भ में हमने देखा था कि पाप के कारण उत्पन्न परिस्थिति से यदि परमेश्वर निष्पक्ष, खरे, न्यायी के समान व्यवहार करता, तो मनुष्य नाश हो जाते; और यदि वह उनके प्रति अपने प्रेम में होकर उनके पाप को अनदेखा कर देता, तो उसका निष्पक्ष, खरा, न्यायी होने की प्रतिष्ठा जाती रहती। इस विडंबना के समाधान के लिए परमेश्वर को कोई ऐसा मनुष्य चाहिए था जो पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो, इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके, और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। केवल ऐसा मनुष्य ही पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था। 

साथ ही हमने देखा था ऐसा मनुष्यों में से यह हो पाना संभव नहीं था, क्योंकि आदम और हव्वा के पाप के बाद से प्रत्येक मनुष्य पाप के स्वभाव के साथ ही अपनी माता के गर्भ में आता है और शिशु अवस्था से ही पाप की प्रवृत्ति को प्रकट करता रहता है। इसलिए मनुष्यों की प्रणाली के अनुसार माता के गर्भ में पड़ने और जन्म लेने वाला कोई भी मनुष्य पूर्णतः निष्पाप, पवित्र, और निष्कलंक नहीं ठहर सकता। अब समस्या थी कि पाप का निवारण करने वाले को मनुष्य भी होना था, और अपने अस्तित्व के बिल्कुल आरंभ से ही पाप से पूर्णतः विहीन भी होना था। 

परमेश्वर ने यह समाधान अदन की वाटिका में ही प्रदान कर दिया था। शैतान द्वारा सर्प के शरीर में होकर आदम और हव्वा को पाप में गिराने के कारण, परमेश्वर की ओर से पहला श्राप और दण्ड सर्प पर आयातब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तू ने जो यह किया है इसलिये तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा” (उत्पत्ति 3:14)। फिर अपनी इसी बात को आगे ज़ारी रखते हुए शैतान को संबोधित करते हुए, उसे उसका अंत बताया, “और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा” (उत्पत्ति 3:15)। यहाँ पर परमेश्वर द्वारा कही गई बात में शैतान द्वारा उद्धारकर्ता को डसे जाने - मृत्यु चखने, और शैतान के सिर को कुचले जाने, अर्थात शैतान के अंत होने की बाइबल की पहली भविष्यवाणी दी गई है - शैतान जिस उद्धारकर्ता की एड़ी को डसेगा, अर्थात उसे मृत्यु चखाएगा, वही उद्धारकर्ता शैतान के सिर को कुचल डालेगा। हम इस बात को बाद में और विस्तार से देखेंगे। अभी ध्यान देने के लिए हमारे संदर्भ से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण वाक्यांश यहाँ पर भविष्यवाणी के रूप में दिया गया है -इसके वंश”, अर्थात स्त्री का वंश!

सामान्यतः, संसार भर के सभी लोगों में वंश पिता से माना जाता है, इसीलिए लोग पुत्रों की इतनी लालसा रखते हैं - ताकि उनका वंश चलता रहे। किन्तु यहाँ पर परमेश्वर ने स्त्री के वंश की बात की; अर्थात वह उद्धारकर्ता संसार की सामान्य रीति के अनुसार जन्म नहीं लेगा, उसके स्त्री के गर्भ में आने और जन्म लेने में किसी पुरुष का कोई कार्य नहीं होगा। साथ ही, क्योंकि उस जगत के उद्धारकर्ता को एक सामान्य मनुष्य के समान ही होना था, मनुष्यों के अनुभवों में से होकर निकलना था, और उन परिस्थितियों में भी अपने निष्पाप, पवित्र, निष्कलंक होने को बनाए रखना था, इसलिए उसका जन्म भी मनुष्यों के समान ही होना था। मानवीय जीवन का कोई ऐसा अनुभव नहीं बचना था, जिससे होकर वह न निकले और फिर भी पूर्णतः निर्दोष और पवित्र रहे। 

प्रभु यीशु मसीह ही संसार के इतिहास में एकमात्र हैं जो मनुष्यों की रीति से तो गर्भ में नहीं आए, किन्तु फिर भी किसी भी अन्य मनुष्य के समान गर्भ में रहने, जन्म की पीड़ा और अनिश्चितता सहने, असहाय और माँ पर पूर्णतः निर्भर शिशु होने, फिर बाल्यावस्था से लेकर वयस्क होने के सभी अनुभवों में से होकर निकले। प्रभु यीशु मसीह का अपनी माँ के गर्भ में आना परमेश्वर का किया आश्चर्यकर्म था: उन के संसार में आने के लिए परमेश्वर की ओर से एक देह तैयार की गईइसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, कि बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार किया” (इब्रानियों 10:5), और फिर उस देह को मरियम के गर्भ में रखा गया, जहाँ वह किसी भी अन्य मनुष्य के समान उन सभी परिस्थितियों से होते हुए विकसित हुई और फिर उन्होंने एक सामान्य मनुष्य के समान संसार में जन्म लियाअब यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार से हुआ, कि जब उस की माता मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो गई, तो उन के इकट्ठे होने के पहिले से वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पाई गई” (मत्ती 1:18)। उत्पत्ति 3:15 में कही गई परमेश्वर की बात और भविष्यवाणी, सारे जगत के उद्धारकर्ता कास्त्री का वंशहोना पूरी हुई। 

परमेश्वर कभी झूठ या गलत नहीं बोलता है, उसका कहा कभी नहीं टलता है, वह असंभव लगने वाली स्थिति में से भी मार्ग बना देता है। जैसे उसने समस्त जगत के उद्धारकर्ता की भविष्यवाणी की, वैसे ही जगत के अंत और न्याय की भी भविष्यवाणी की है, और यह भी बात दिया कि जब ऐसा होना निकट होगा, उस समय संसार के क्या हाल होंगे, क्या परिस्थितियाँ होंगी (मत्ती 24 अध्याय) जिससे वह समय लोगों पर अनायास और अनपेक्षित न आ जाए, लोग सचेत हो जाएं, अपने आप को उसके पुनः आगमन, और न्याय के लिए उसके सामने खड़े होने के लिए तैयार कर लें। आज की संसार की परिस्थितियाँ और बातें स्पष्ट दिखा रहे हैं कि हम अंत और न्याय के समय के बहुत निकट हैं। क्या आपने अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख खड़े होने के लिए तैयार कर लिया है? जैसा हम पीछे देख चुके हैं, केवल वे ही बचाए जाएंगे जिन्होंने नया जन्म, उद्धार पाया है; धर्म के निर्वाह, धार्मिकता के कामों, वचन का ज्ञान आदि पर भरोसा रखने वाले यहीं पीछे छूट जाएंगे। 

यदि आप ने अभी भी नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपको जगत के न्याय से बचाकर स्वर्ग की आशीषों का वारिस बना देगा। क्या आप आज, अभी यह निर्णय लेंगे?

बाइबल पाठ: लूका 1:26-38 

लूका 1:26 छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया।

लूका 1:27 जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरुष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था।

लूका 1:28 और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।

लूका 1:29 वह उस वचन से बहुत घबरा गई, और सोचने लगी, कि यह किस प्रकार का अभिवादन है?

लूका 1:30 स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है।

लूका 1:31 और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।

लूका 1:32 वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उसको देगा।

लूका 1:33 और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।

लूका 1:34 मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरुष को जानती ही नहीं।

लूका 1:35 स्वर्गदूत ने उसको उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

लूका 1:36 और देख, और तेरी कुटुम्बिनी इलीशिबा के भी बुढ़ापे में पुत्र होने वाला है, यह उसका, जो बांझ कहलाती थी छठवां महीना है।

लूका 1:37 क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभाव रहित नहीं होता।

लूका 1:38 मरियम ने कहा, देख, मैं प्रभु की दासी हूं, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो: तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 6-7

·      2 कुरिन्थियों

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें