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रविवार, 30 अप्रैल 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 1 - Sabbath or Sunday? / सबत या सन्डे?

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प्रश्न: सबत क्या है; क्या यह और सन्डे एक ही हैं? मसीहियों को आराधना सन्डे को करनी चाहिए या सबत के दिन करनी चाहिए?


उत्तर:

     सीधा, स्पष्ट और एक वाक्य का उत्तर है कि सबत और सन्डे एक ही दिन नहीं है, और बाइबल के अनुसार मसीहियों को सन्डे के दिन आराधना करनी चाहिए।


     ‘सबत’ शब्द का अर्थ होता है विश्राम। सामान्यतः इसका अभिप्राय यहूदी कैलेंडर के सातवें दिन, और हमारे वर्तमान कैलेंडर के शनिवार का दिन होता है, क्योंकि इस दिन परमेश्वर ने अपनी सृष्टि के कार्य को पूर्ण करके विश्राम किया (उत्पत्ति 2:2-3) और यह सातवाँ दिन अपनी दस आज्ञाओं में अपने लोगों के विश्राम के लिए ठहरा दिया (निर्गमन 20:8-11)। किन्तु पुराने नियम में सबत या विश्राम दिन अनिवार्यतः यहूदी सप्ताह का सातवाँ दिन नहीं है – कोई भी ‘विश्राम दिन’ या ‘काम न करने का दिन,’ सबत का दिन कहा जा सकता है – लैव्यव्यवस्था 23 अध्याय देखें, जहाँ परमेश्वर के अन्य पर्व और उन्हें मनाने की विधियां दी गई हैं, और 25 अध्याय देखें, जहाँ एक पूरे निर्धारित वर्ष को ही सबत या विश्राम का वर्ष कहा गया है। इसी प्रकार निर्गमन 31:13 और लैव्यव्यवस्था 19:3 तथा 26:2 में भी बहुवचन ‘विश्राम दिनों आया है (अंग्रेज़ी अनुवादों में शब्द sabbaths का प्रयोग हुआ है), अर्थात एक ही दिन सबत का दिन नहीं था, जो यह स्पष्ट करता है कि पुराने नियम में शब्द ‘सबत’ केवल यहूदी सप्ताह के सातवें दिन के लिए ही नहीं था, वरन परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी विश्राम या काम से अवकाश लेने के समय के लिए था। शब्द के प्रयोग का संदर्भ निर्धारित करता था कि यह किस अभिप्राय से कहा जा रहा है; किन्तु सामान्यतः यह यहूदी सप्ताह के सातवें दिन, हमारे शनिवार, के लिए था, जिसे परमेश्वर की व्यवस्था और दस आज्ञाओं के अनुसार कोई भी कार्य करने के लिए नहीं वरन परमेश्वर की उपासना के लिए व्यतीत किया जाना था – यह व्यवस्था की माँग थी, उनके लिए जो व्यवस्था के अंतर्गत परमेश्वर के लोग थे, वे चाहे जन्म से अब्राहम के वंशज हों, या स्वेच्छा से यहूदियों के साथ रहने वाले हों (निर्गमन 20:10), या जिन्होंने यहूदी धर्म और व्यवस्था को अपना लिया हो – जैसे कि उन लोगों की वह मिली-जुली भीड़ जो इस्राएलियों के साथ मिस्र से निकलकर आई थी (निर्गमन 12:38), या बाद में जो लोग यहूदी बने (एस्तेर 8:17; 9:27; यशायाह 14:1; 45:14; ज़कर्याह 8:20-23) – उन सभी पर परमेश्वर द्वारा दी गई व्यवस्था लागू होती थी, और उसका उन्हें पालन करना था, सबत का दिन या शनिवार परमेश्वर के लिए पृथक एवं पवित्र रखना था और व्यवस्था में दी गई विधि के अनुसार उसका पालन करना था।


     हमारा आज का इतवार, या सन्डे, यहूदी कैलेंडर का सप्ताह का पहला दिन है; और हमारे वर्तमान कैलेंडर का सातवाँ दिन। यह दिन हम मसीही विश्वासियों के लिए विशेष इस लिए है क्योंकि इस दिन प्रभु यीशु मसीह मृतकों में से जी उठे थे (मरकुस 16:9, देखें पद 1-9)। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह के अनुयायी, प्रभु की आराधना करने और प्रभु-भोज में सम्मिलित होने के लिए ‘सप्ताह के पहले दिन अर्थात सन्डे के दिन एकत्रित हुआ करते थे (प्रेरितों 20:7; 1 कुरिन्थियों 16:2) – और यह बात परमेश्वर के पवित्र आत्मा ने लिखवाई है (2 तिमुथियुस 3:16-17), हमारी शिक्षा और पालन के लिए। और नए नियम में कहीं भी ऐसा करने के लिए मसीही विश्वासियों की न तो निन्दा की गई है और न ही इसे सुधारने, तथा वापस ‘सबत’ या शनिवार के दिन पर जाने के लिए कहा गया है। अर्थात, सब्त के स्थान पर सन्डे के दिन आराधना करने की यह बात परमेश्वर की ओर से है, परमेश्वर को स्वीकार्य है, और मसीही विश्वासियों के लिए उचित एवं मान्य है। बाद में इसे ‘प्रभु का दिन भी कहा गया है (प्रकाशितवाक्य 1:10) – और यह भी पवित्र आत्मा ही के द्वारा लिखवाया गया है। इसे वापस यहूदी सबत पर पलट देने का न तो कोई निर्देश है, और न ही कोई औचित्य, अथवा अनिवार्यता है।


     आज बहुत से लोग मसीही विश्वासियों को भरमा कर सन्डे के स्थान पर सबत के दिन की ओर ले जाना चाहते हैं, और अपनी बात के समर्थन में पुराने नियम से व्यवस्था के हवाले देते हैं। किन्तु वे बाइबल से यह नहीं दिखाते हैं कि मसीह यीशु ने हमारे लिए व्यवस्था को पूरा कर दिया, उसे हमारे सामने से हटा कर क्रूस पर ठोक दिया, और व्यवस्था के पालन के लिए हम भी मसीह के साथ क्रूस पर मर गए हैं (रोमियों 7:4; 10:4; कुलुस्सियों 2:13-15) – इन पदों में ध्यान कीजिए, मसीह में व्यवस्था पूरी हो गई, अर्थात, उसकी सभी आवश्यकताएँ पूरी कर दी गई हैं; और अब उसका अन्त, अर्थात परिपूर्ण होने के कारण समापन हो गया है; अब व्यवस्था टूट नहीं सकती है – उसका संपूर्ण पालन कर के, उस पुस्तक को बन्द कर के, उसके स्थान पर परमेश्वर ने मसीह यीशु में लाए गए विश्वास के द्वारा अपने अनुग्रह की धार्मिकता लागू कर दी गई है। मसीह ने व्यवस्था को क्रूस पर जड़ कर उसे हमारे सामने से हटा दिया है – अब धार्मिकता के लिए हमें उसके मार्ग पर चलने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह गई है; मसीह में होकर हम व्यवस्था के लिए मर गए हैं – इसलिए अब न तो व्यवस्था का हम पर कुछ अधिकार रह गया है और न ही हम उसके पालन कर पाने की दशा में हैंअब हम मसीह में विश्वास के द्वारा जीते हैं – अब हमें व्यवस्था और उसकी बातों के पालन करने की कोई आवश्यकता नहीं है; हम प्रभु यीशु मसीह में विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरते हैं, न कि व्यवस्था के पालन के द्वारा (रोमियों 3:22-31; 10:8-11)।


      इस पर भी ध्यान करें कि पहली कलीसिया और प्रेरितों – प्रभु यीशु के शिष्यों, के समय पर ही इस बात पर खुलकर और विस्तार से चर्चा हुई थी, और निष्कर्ष निकाल कर यह आज्ञा दे दी गई थी कि न तो कभी कोई व्यवस्था को पूरा करने पाया है (प्रेरितों 15:10) और न ही व्यवस्था की बातों को पूरा करने की कोई आवश्यकता है (प्रेरितों 15:24)। साथ ही, पौलुस ने पवित्र आत्मा के अगुवाई में अपनी पटरियों में यह बिलकुल स्पष्ट कर दिया था कि व्यवस्था के पालन से कोई भी परमेश्वर के दृष्टि में धर्मी नहीं ठहरेगा (रोमियों 3:20; गलातियों 3:11), और जो भी व्यवस्था के अनुसार जीना चाहता है वह संपूर्ण व्यवस्था का पालन करने के श्राप के अधीन है (गलातियों 3:10), परन्तु मसीह यीशु ने हमें इस श्राप के अधीन आने से छुड़ा लिया है (गलातियों 3:13); और याकूब लिखता है कि जो व्यवस्था के एक भी बिंदु का दोषी है, वह संपूर्ण व्यवस्था का दोषी है (याकूब 2:10) – तो हम क्यों अपने आप को इस असम्भव और पूर्णतया अनावश्यक बोझ के नीचे ले कर आएँ?  


     अब, जो भी अपने आप को व्यवस्था की बातों के पालन के अधीन लाना चाहता है, उसके लिए कहा गया है कि वह श्रापित है’, व्यवस्था के द्वारा धर्मी नहीं ठहरता है, और व्यवस्था का विश्वास से कोई संबंध नहीं है (गलातियों 3:10-13)। और शैतान के ये लोग, धर्मी बनकर (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15), मसीह यीशु के नाम में हमें वापिस व्यवस्था के पालन में ढकेलने का प्रयास कर रहे हैं हमें श्रापित करना चाह रहे हैं जिससे हम मसीह में विश्वास की हमारी आशीषों को गँवा दें, व्यर्थ कर दें।


     इनसे सावधान रहें, इनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में न आएँ, क्योंकि सबत के पालन का यह झूठ बहुत बल के साथ अनेकों रीतियों और सभी माध्यमों से प्रचार किया जा रहा है, लोगों को भरमाया जा रहा है। इनसे बच कर रहें, इनकी बातों से दूर रहें।



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English Translation


Question: What is the Sabbath; is it the same as Sunday? Should Christians worship on Sunday or on Sabbath day?

 

Answer:


     The simple, straightforward, one line answer is that Sabbath and Sunday are not the same, and Biblically, Christians ought to worship on Sunday.


     The word ‘sabbath’ means rest. Usually this alludes to the seventh day of the Jewish calendar, which is the Saturday of our current calendar, because on this day the Lord God completed His Creation work and rested (Genesis 2:2-3) and He established this seventh day as a day of rest for His people in His Ten Commandments (Exodus 20:8-11). But in the Old Testament, a sabbath day or a day of rest is not necessarily the seventh day of the Jewish week – it can be any ‘day of rest’ or of ‘cessation of work’ – see Leviticus chapter 23, where the feasts of the Lord and the methods of celebrating them are given, and see chapter 25, where the whole particular year is called the sabbath year. Similarly, in Exodus 31:13 and Leviticus 19:3 and 26:2 also the word is used in plural sabbaths’ indicating more days than one were designated as ‘sabbath’ and this makes it clear that in the Old Testament the word ‘Sabbath’ was not used for just the seventh day of the Jewish week, but was for any day appointed by God for rest or not doing the routine work. The context of the word decided the meaning of the word; but generally speaking it meant the seventh day of the Jewish week, our Saturday, that, according to God’s Law and the Ten Commandments was to be a day of not doing any work, but to be spent in worshiping the Lord God – this was the demand of the Law, from them who were the people of God under the Law, whether they were the natural descendants of Abraham, or those residing with the Jews (Exodus 20:10), or those who had accepted to follow Judaism – like those people of the mixed-multitude who came out of Egypt with the Jews (Exodus 12:38), or those who became Jews later on (Esther 8:17; 9:27; Isaiah 14:1; 45:14; Zechariah 8:20-23) – they were all under the Law of Godand it was necessary for them to follow itthey were to maintain the sanctity of the Sabbath, or Saturday and observe it appropriately as commanded in the Law.


     Our Sunday is the first day the Jewish week; and is the seventh day of our current calendar. This day is of special significance for the Christians, because the Lord Jesus rose from the dead on this day (Mark 16:9, see verses 1-9). Therefore the followers of the Lord Jesus, started to gather for worshiping the Lord and participating in the Lord’s Table or Holy Communion on ‘the first day of the week’ i.e. on Sunday (Acts 20:7; 1 Corinthians 16:2) – and this God’s Holy Spirit got recorded for us (2 Timothy 3:16-17), for our instruction and observance. Nowhere in the New Testament have the Christian Believers been reprimanded for doing this, and neither have they been instructed at any place to rectify this and revert back to the ‘Sabbath’ or Saturday. In other words, worshiping God on Sunday, is from God, is accepted by God, and is appropriate to observe for the Christians. Later, this ‘first day of the week’ was also called the Lord’s Day’ (Revelation 1:10) – again recorded in the Bible through the Holy Spirit. There is no instruction, reason, or compulsion to revert this back to the Jewish Sabbath day.


     Today many people are deceiving Christians into reverting to the Sabbath day in place of Sunday, and they quote from the Old Testament to support their arguments. But what they do not show from the Bible is that Christ Jesus has fulfilled the Law for ushas nailed it to the Cross and has taken it out of our way, and we too have died on the Cross with Christ for the Law (Romans 7:4; 10:4; Colossians 2:13-15) – pay attention to these verses, the Law has been fulfilled in Christ, in other words, all its requirements have been completedand now it has come to its conclusioni.e. by having been fulfilled it is now closed; now the Law cannot be broken – because it has been fully fulfilled, it is a closed chapter, and in its place God has made applicable the righteousness of His grace through coming to faith in the Lord Jesus. By nailing the Law to the Cross Christ has taken it out of our way – we simply don’t have to walk that path to righteousness anymore; in Christ we have died to the Law – therefore neither does the Law have any hold on us nor are we in any state to follow it; now we live by faith in Christ – now we have no reason to observe the Law and its instructions; we are made righteous by our faith in Christ, and not by observing the things of the Law (Romans 3:22-31; 10:8-11).


     In any case, right at the time of the first Church and the Apostles – the disciples of Christ, it had been thoroughly discussed and unanimously accepted and decreed for all times that no one had been able to keep the Law (Acts 15:10) and there is no need for observing the Law (Acts 15:24). Moreover, Paul, writing his letters under the guidance of the Holy Spirit has very clearly stated that no one is justified before God by observing the Law (Romans 3:20; Galatians 3:11), and anyone wanting to live by the Law is condemned to striving to fulfill all of it (Galatians 3:10), but Christ has redeemed us from coming into this condemnation (Galatians 3:13); and James wrote that anyone who breaks even one point of the Law is guilty of breaking the whole Law (James 2:10) – so why at all should we bring ourselves under such an impossible and absolutely unnecessary burden?


    Now whosoever wants to bring himself under observing the things of the Law, he is called ‘cursed’, he is not justified and made righteous by the Law, and the Law has nothing to do with Faith (Galatians 3:10-13).And these agents of Satan, under the garb of being religious and righteous (2 Corinthians 11:3, 13-15), in the name of the Lord Jesus are trying to push us back into observing the Law, are trying to make us cursed, so that we end up loosing our blessings in Christ, rendering them infructuous.

Beware of them, do not fall for their smooth talk, for the lie of the necessity of observance of Sabbath is being very energetically being preached in many ways and by all means, people are being deceived and led astray. Stay safe from such people, stay away from them.


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शनिवार, 29 अप्रैल 2023

परमेश्वर का वचन – बाइबल, और विज्ञान / Word of God – Bible & Science – 13

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बाइबल और भौतिक-विज्ञान - 2


पिछले लेख में हमने पानी के चक्र के बारे में देखा था, और यह भी देखा था कि जब प्रदूषण और जल-वायु के बिगड़ने की कोई समझ या ज्ञान अथवा संभावना का भी संसार के लोगों को पता नहीं था, तब ही 2000 वर्ष पहले, परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में लिखवा दिया था कि पृथ्वी को बिगाड़ने वालों को उनके किए के लिए परमेश्वर के न्याय का सामना करना पड़ेगा। आज हम भौतिक विज्ञान की, पानी के चक्र से भी जटिल बातों के संबंध में बाइबल में लिखी कुछ बातों के बारे में देखेंगे, जो हमारे पहले कहे गए एक तथ्य की पुष्टि करती हैं कि परमेश्वर की सृष्टि, अपने रचयिता के पक्ष में ही गवाही देगी, उसके विरुद्ध नहीं।


  • सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइज़क न्यूटन ने प्रकाश के बारे में बहुत खोज की, उसके गुणों का, और उसके विषय कुछ नियमों पता लगाया। जैसे कि, उन्होंने दिखाया, सूर्य के प्रकाश को सात रंगों में फैलाया जा सकता है और उन्हें फिर से एक साथ कर के पहले जैसे प्रकाश में परिवर्तित किया जा सकता है; और यह कि प्रकाश का अपना का एक निश्चित मार्ग होता है, जिसके अनुसार वह जाता है। आज से लगभग 4000 वर्ष पहले रहने वाले अय्यूब के वृतांत में, सृष्टि के विषय अय्यूब से प्रश्न करते समय, परमेश्वर ने उससे पूछा और लिखवा दिया था, “उजियाले के निवास का मार्ग कहां है, और अन्धियारे का स्थान कहां है?” (अय्यूब 38:19); “किस मार्ग से उजियाला फैलाया जाता है, ओर पुरवाई पृथ्वी पर बहाई जाती है?” (अय्यूब 38:24); अर्थात, प्रकाश के जाने का एक निर्धारित मार्ग है और उजियाले को फैलाया [बाइबल के विभिन्न अंग्रेजी अनुवाद यह ‘फैलाया’ से और भी अधिक सटीक शब्द divided, parted, diffused, dispersed आदि के प्रयोग द्वारा व्यक्त करते हैं] जा सकता है। जिस वैज्ञानिक तथ्य को पहचानने और प्रमाणित करने में न्यूटन जैसे वैज्ञानिक को समय और परिश्रम लगाना पड़ा, उसे परमेश्वर ने एक सामान्य मनुष्य पर पहले ही प्रकट कर दिया था। 

  • अय्यूब के साथ अपने वार्तालाप में परमेश्वर उससे एक और अद्भुत प्रश्न पूछता है, “क्या तू बिजली को आज्ञा दे सकता है, कि वह जाए, और तुझ से कहे, मैं उपस्थित हूँ?” (अय्यूब 38:35)। मूल इब्रानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद यहाँ पर “बिजली” किया गया है, उसका शब्दार्थ होता है “चमकने वाली”; अर्थात प्रकाश या “चमक” में वह गुण है कि उसको एक से दूसरे स्थान पर भेजा जा सकता है, और उसे ध्वनि में परिवर्तित किया जा सकता है, इस गुण की सहायता से उसके माध्यम से संदेश भेजे जा सकते हैं। जिसे परमेश्वर ने 4000 वर्ष पहले कहा था, उसे विज्ञान ने अब पहचाना है कि प्रकाश, रेडियो तरंगें, और ध्वनि तरंगें एक ही प्रकार की ऊर्जा के, उसकी भिन्न आवृत्तियों (frequencies) के अनुसार, भिन्न स्वरूप हैं, एक से दूसरे स्थान पर स्वरूप परिवर्तित करके भेजे जा सकते हैं और इस गुण के उपयोग के द्वारा संदेश एक से दूसरे स्थान पर भेजे जा सकते हैं - हमारे टी.वी. रेडियो, फोन, औडियो और वीडियो कौल प्रणालियाँ, आदि सभी इसी सिद्धांत पर कार्य करती हैं, जिसे परमेश्वर ने इन बातों के पता होने से पहले ही पहले ही साधारण शब्दों में व्यक्त कर दिया था। 

  • पहले यह माना जाता था कि वायु में कोई भार नहीं है। किन्तु अय्यूब की पुस्तक में ही परमेश्वर द्वारा वायु का तौल निर्धारित करने की बात कही गई है “जब उसने वायु का तौल ठहराया, और जल को नपुए में नापा” (अय्यूब 28:25)। जिसे विज्ञान को पहचानने में सदियाँ लग गईं, उसे परमेश्वर ने 4000 वर्ष पहले बता दिया था।

  • सृष्टि के आरंभ, उत्पत्ति के समय से ही परमेश्वर ने आकाश की ज्योतियों और तारागणों को  चिह्नों, दिन और रात के समय निर्धारण, दिनों और वर्षों के निर्धारण के लिए बनाया था, “फिर परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षों के कारण हों। और वे ज्योतियां आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देने वाली भी ठहरें; और वैसा ही हो गया। तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं; उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया: और तारागण को भी बनाया” (उत्पत्ति 1:14-16)। मनुष्य ने परमेश्वर के इस उद्देश्य को हजारों वर्ष बाद पहचाना और उसका सही उपयोग किया। 

  • जगत के अंत और न्याय होने के लिए परमेश्वर के सम्मुख खड़े होने के समय की भविष्यवाणी करते समय प्रभु यीशु का शिष्य पतरस, जो पहले एक अनपढ़ मछुआरा हुआ करता था, लिखता है, “परन्तु प्रभु का दिन चोर के समान आ जाएगा, उस दिन आकाश बड़ी हड़हड़ाहट के शब्द से जाता रहेगा, और तत्‍व बहुत ही तप्‍त हो कर पिघल जाएंगे, और पृथ्वी और उस पर के काम जल जाऐंगे। तो जब कि ये सब वस्तुएं, इस रीति से पिघलने वाली हैं, तो तुम्हें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए। और परमेश्वर के उस दिन की बाट किस रीति से जोहना चाहिए और उसके जल्द आने के लिये कैसा यत्‍न करना चाहिए; जिस के कारण आकाश आग से पिघल जाएंगे, और आकाश के गण बहुत ही तप्‍त हो कर गल जाएंगे” (2 पतरस 3:10-12), जो परमाणु हथियारों के प्रयोग का सटीक वर्णन है, अंत के समय के लिए भविष्यवाणी है। आज से 2000 वर्ष पहले, जब ऐसे कोई हथियार या तरीके नहीं थे, जिनसे तत्व बहुत ही गर्म होकर पिघल जाएं, पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएं, भयानक ध्वनि हो, आकाश की उपस्थिति दृष्टि से लुप्त हो जाए, तब इन बातों को बताना, जिन्हें आज हम परमाणु अस्त्रों के प्रयोग के परिणाम के रूप में जानते हैं, क्या किसी मानवीय बुद्धि की कल्पना से हो सकता है?


इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज संसार परमाणु युद्ध की कगार पर खड़ा है। परमाणु अस्त्र रखने वाली शक्तियाँ एक-दूसरे पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की होड़ में लगी हैं। संसार भर में हर स्थान, हर जाति, हर देश में तनाव है; बात-बात में एक-दूसरे पर चढ़ाई करने की या तो धमकी दी जाती है अथवा हमला कर दिया जाता है। सबसे अधिक भय अब इस बात का होने लगा है कि आतंकी संघटन और देश अब परमाणु हथियारों को अर्जित करने के प्रयास में लग गए हैं, और कर भी लेंगे। ऐसे में परमाणु विश्व-युद्ध को रोक पाना यदि असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य हो जाएगा। संसार के हालात, प्रकृति में होने वाली अप्रत्याशित, अभूतपूर्व विनाशकारी बातें, सभी 2000 वर्षे पहले प्रभु यीशु की भविष्यवाणियों (मत्ती 24 अध्याय) के अनुसार, प्रभु के दूसरे आगमन और जगत के अंत तथा सभी मनुष्यों न्याय के शीघ्र ही होने की ओर संकेत कर रही हैं। अब यह आपको विचार करना है कि क्या आप इस अवश्यंभावी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं कि नहीं। 


चाहे जगत का अंत आपके जीवन काल में न भी हो, तो भी जीवन समाप्त होने के पश्चात, प्रभु परमेश्वर के सामने जीवन का हिसाब देने के लिए तो खड़ा होना ही है। यदि आत्मा पर पाप के दाग लिए हुए जाएंगे, तो फिर परमेश्वर के साथ नहीं रह पाएंगे। आज ही स्वेच्छा से, प्रभु यीशु से अपने पापों की क्षमा माँगकर पापों के दागों को धो लीजिए, परमेश्वर के साथ अनन्तकाल की आशीष और सुख में रहने के लिए तैयार हो जाइए। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना, आपके जीवन को विनाश से आशीष में लाकर खड़ा कर सकती है - निर्णय आपका है। आपको बस कुछ इस प्रकार से सच्चे मन से, स्वेच्छा से, पापों के लिए पश्चाताप की मनसा के साथ प्रभु को पुकारना है, “हे प्रभु यीशु, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं आपकी अनाज्ञाकारिता का दोषी हूँ, पापी हूँ। मैं मानता हूँ कि आपने मेरे सभी पाप अपने ऊपर लेकर, क्रूस पर अपना बलिदान देने के द्वारा उनके सारे दण्ड को मेरे लिए सह लिया, मेरे स्थान पर आपने उनकी पूरी कीमत चुका दी। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाएं, और अपने साथ बनाकर रखें।” समय रहते सही निर्णय कर लें, कही बाद में बहुत देर न हो जाए, मौका हाथ से निकाल न जाए। 



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English Translation


Bible and Physical Sciences - 2 - Facts from Physics


In the previous article we saw about the water cycle, and also saw that about 2000 years ago, when the people of the world did not have any concept, understanding, or knowledge of such severe and significant deterioration of water and air qualities because of pollution, and its existence threatening effects on life in general and on mankind in particular, and did not even think about the possibility of this to ever occur, yet God had it written in His Word, the Bible, that those who ruined the earth would face God's judgment for their actions. Today we'll look at some of the Biblical things related to Physics, things that are even more complicated than the water cycle, and which confirm as fact what we had said earlier, that God's creation will testify only in favor of its creator, not against Him.


  • The famous scientist Sir Isaac Newton discovered a lot of things about light and its properties, and found out some laws about it. For example, he showed, sunlight can be dispersed into seven colors and can be re-combined into the same light as before; And that light travels in a definite, set path of its own. In the account of Job, who lived about 4000 years ago, while questioning Job about creation, God asked him and had it written, "Where is the way to the dwelling of light? And darkness, where is its place?" (Job 38:19); "By what way is light diffused, Or the east wind scattered over the earth?" (Job 38:24); implying that there is a set, definite path for the light to traverse [various English translations of the Bible express this with the more precise words like, divided, parted, diffused, dispersed, etc.]. The scientific fact that a scientist like Newton took a long time and much effort to identify and prove, had already been revealed by God to an ordinary man, thousands of years ago.

  • In his conversation with Job, God asks him another wonderful question, "Can you send out lightnings, that they may go, And say to you, 'Here we are!'?" (Job 38:35). The original Hebrew word here translated as "lightning" literally means "shine", or something that shines; i.e., light or its "shine" has the quality that it can be made to go from one place to another, and it can be made “to say” things, i.e., it can be converted into sound, with the help of this quality messages can be sent through it. What God said 4000 years ago, science has now recognized that light, radio waves, and sound waves are different forms of the same type of energy, of different frequencies, and messages can be sent from one place to another using this property - our TVs, radio, phone, audio and video call systems, etc., all work on this principle, which God had already expressed in simple understandable words before these things about energy forms, waves and frequencies etc. were known to mankind.

  • Earlier it was believed that there is no weight in air. But it is written in the book of Job that God determined the weight of air "To establish a weight for the wind, And apportion the waters by measure" (Job 28:25). What science took centuries to recognize had already been told by God 4000 years ago.

  • From the time of creation, since the beginning of the universe, God created the lights and stars of the sky to determine the time of day and night, to determine the days and years, “Then God said, "Let there be lights in the firmament of the heavens to divide the day from the night; and let them be for signs and seasons, and for days and years; and let them be for lights in the firmament of the heavens to give light on the earth"; and it was so. Then God made two great lights: the greater light to rule the day, and the lesser light to rule the night. He made the stars also” (Genesis 1:14-16). Man could recognize this purpose of God, thousands of years later and then made good use of it.

  • When prophesying the end of the world and the time to stand before God for judgment, the disciple of the Lord Jesus, Peter, formerly an illiterate fisherman, wrote, “But the day of the Lord will come as a thief in the night, in which the heavens will pass away with a great noise, and the elements will melt with fervent heat; both the earth and the works that are in it will be burned up. Therefore, since all these things will be dissolved, what manner of persons ought you to be in holy conduct and godliness, looking for and hastening the coming of the day of God, because of which the heavens will be dissolved, being on fire, and the elements will melt with fervent heat?” (2 Peter 3:10-12), which is an accurate description of the destruction caused by the use of nuclear weapons. This, in a prophecy for the end times, given 2000 years ago, when there were no weapons or methods by which the elements would become very hot and melt, the earth and the works on it would burn, there would be a terrible sound of a blast, the visibility of the sky disappearing from sight. We know these things today by our knowledge of the use of nuclear weapons, but it is humanly impossible for Peter or any other person to even imagine and then to write and tell about these things at the time this was written. It simply cannot be through the thoughts or imaginations of any human intelligence.


There is no doubt that today the world is standing on the verge of nuclear war. The powers possessing nuclear weapons are competing to establish their supremacy over each other. There is tension all over the world in every place, in every race, in every country. Countries and alliances keep trying to have an upper hand over their rivals, they either threaten each other, or indirectly terrorize their rivals, or even attack and invade. The biggest fear now is that terrorist organizations and their supporting countries are now trying to acquire nuclear weapons, and eventually will acquire them in some way. In such a situation, it will be very difficult, if not impossible, to avert a nuclear world war. The prevailing political and economic state of the world; the unpredictable, unprecedented destructive things that are happening in nature, are all according to the prophecies of the Lord Jesus given 2000 years ago (Matthew 24). All of these current events are pointing to the second coming of the Lord, the end of the world, and the judgment of all human beings, in the near future. Now it is for you to consider and decide whether you are prepared and ready to face this inevitable situation or not.


Even if the end of the world does not happen in your lifetime, still, after the end of this earthly life, everyone will have to stand before the Lord God to give the account of their life to Him. If the soul has stand before God, tainted with sin, then it will not be able to live with God. Voluntarily today, just now, ask the Lord Jesus for forgiveness of your sins, ask Him to wash away the stains of your sins, and to make you ready to live in eternal blessings and happiness with God. A single prayer from a sincere and submissive heart can lift your life from destruction to blessing - the decision is yours. All you have to do is call upon the Lord with a sincere heart, voluntarily, with a heartfelt sincere repentance of your sins; you can pray something like this, “Lord Jesus, I confess that I am guilty of disobeying you, I am a sinner. I believe and accept that you took all my sins upon yourself, bore all their punishment for me by sacrificing yourself on the Cross, and paid their full price in my place. Please forgive my sins, take me under your care, make me your obedient disciple, and keep me with you." Take the right decision while you have the time and opportunity, before it is too late, and you miss the opportunity.


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शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान / Word of God – Bible & Science – 12

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बाइबल और भौतिक-विज्ञान - 1

न केवल जीव-विज्ञान, वरन अन्य प्रकार के विज्ञान से संबंधित बातें भी परमेश्वर के वचन बाइबल की पुस्तकों में हजारों वर्ष पहले लिख दी गईं हैं। इनमें से कुछ को हम पहले सृष्टि की रचना, अंतरिक्ष, आदि शीर्षकों में देख चुके हैं। भौतिक विज्ञान से संबंधित कुछ अन्य बातों को हम आज से देखेंगे। 

एक बहुत ही सामान्य सी बात से आरंभ करते हैं - पानी का चक्र - किस प्रकार पानी सागर, आकाश और पृथ्वी के मध्य एक निरंतर चलती रहने वाली क्रिया में घूमता रहता है, और सारी पृथ्वी की सिंचाई होते रहती है, तथा सभी के पीने के लिए पानी उपलब्ध बना रहता है। किन्तु मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए और “ज्ञान” के नाम पर परमेश्वर द्वारा बनाए गए और सुचारु रीति से चलते रहने वाले इस पूरे चक्र बिगाड़ दिया है जिससे आज स्थान-स्थान पर या तो सूखा पड़ रहा है, अथवा अप्रत्याशित और अनपेक्षित बाढ़ आ रही हैं, जिससे सभी के लिए बहुत खतरा उत्पन्न हो गया है। यह कि प्रकृति के विधान मनुष्यों के द्वारा इस प्रकार से बिगाड़ दिए जाएंगे भी परमेश्वर ने अपने वचन में पहले से ही लिखवा रखा है।


पहले पानी के चक्र को देखते हैं - आज यह सामान्य ज्ञान में स्कूलों में सिखाया जाता है कि सागर का पानी, सूर्य की गर्मी से भाप बनकर उठता है, हवा के साथ बहकर ठन्डे इलाकों, मैदानों, पहाड़ों आदि की ओर जाता है, ओस और वर्षा के रूप में उन सभी स्थानों पर पड़ता है। यहाँ से उसका कुछ भाग धरती में सोख लिया जाता है वह पृथ्वी के भीतरी भागों में स्थित जलाशयों में भी जाता है और सतह पर बहने वाली नदियों में भी जाता है, तथा फिर नदी के साथ बहकर सागर में जा मिलता है। आज जो खोज-बीन तथा उपकरणों आदि के माध्यम से उपलब्ध जानकारी हमें साधारण, सामान्य ज्ञान की बात लगती है, उसे आज से हजारों वर्ष पहले रहने वाले मनुष्यों के लिए जान पाना कितनी जटिल और असंभव सी बात रही होगी, इसकी कल्पना कीजिए। उस समय बहुत कम आबादी थी, शिक्षा बहुत सीमित थी, तथा मुख्यतः स्थानीय बातों से संबंधित होती थी; आज के समान यातायात के साधन नहीं थे, लंबी दूरी की यात्राएँ करना जान जोखिम में डालने की बात होती थी; जानकारी एकत्रित करके उसका परस्पर ताल-मेल बैठाने और विश्लेषण करने की ऐसी क्षमता नहीं थी जैसी आज है। जो पर्वतों पर या उनके आस-पास रहते थे उनमें से अधिकांश यह नहीं जानते होंगे कि सागर भी होते हैं। इसी प्रकार जो सागर तट के आस-पास रहते थे उन्हें पहाड़ों और पर्वतों की जानकारी होने की कम ही संभावना होगी, और जो विशाल मैदानी क्षेत्रों में रहते थे, उनके लिए पर्वत और सागर, दोनों के बारे पता भी होगा कि नहीं, यह कल्पना की बात है। ऐसे में पानी कहाँ से आया, कहाँ को गया, और कैसे, यह सब यदि उस समय के जीवन के आधार पर देखें, तो इसका विश्लेषण करना और उसकी सटीक जानकारी लिख दिया जाना, और वह भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा जो न विज्ञान और न वैज्ञानिक जानकारी रखने वाला व्यक्ति हो, लगभग असंभव बात है।

 

अब बाइबल के कुछ पदों को देखिए:

अय्यूब 36:27-28 क्योंकि वह तो जल की बूंदें ऊपर को खींच लेता है वे कुहरे से मेंह हो कर टपकती हैं, वे ऊंचे ऊंचे बादल उंडेलते हैं और मनुष्यों के ऊपर बहुतायत से बरसाते हैं। 

आमोस 9:6 जो आकाश में अपनी कोठरियां बनाता, और अपने आकाशमण्डल की नेव पृथ्वी पर डालता, और समुद्र का जल धरती पर बहा देता है, उसी का नाम यहोवा है।

यिर्मयाह 10:13 जब वह बोलता है तब आकाश में जल का बड़ा शब्द होता है, और पृथ्वी की छोर से वह कुहरे को उठाता है। वह वर्षा के लिये बिजली चमकाता, और अपने भण्डार में से पवन चलाता है

सभोपदेशक 1:7 सब नदियां समुद्र में जा मिलती हैं, तौभी समुद्र भर नहीं जाता; जिस स्थान से नदियां निकलती हैं; उधर ही को वे फिर जाती हैं।


साथ ही इस तथ्य पर भी विचार कीजिए कि अय्यूब आज से लगभग 4000 वर्ष पहले का एक समृद्ध जमींदार था; आमोस आज से लगभग 2750 पहले का एक चरवाहा था; यिर्मयाह आज से लगभग 2600 वर्ष पूर्व परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता था; और सभोपदेशक के लेखक राजा सुलैमान ने यह पुस्तक लगभग 3000 वर्ष पहले लिखी थी। उस समय के इन लिखने वाले लोगों के जीवन, ज्ञान, और वैज्ञानिक समझ तथा विश्लेषण करने की क्षमता के बारे में विचार कर के, बाइबल के उपरोक्त पदों पर विचार कीजिए - क्या यह सामान्य, साधारण मानवीय बुद्धि में आने वाली, और उससे उत्पन्न होने वाली बात हो सकती है? 


अब पृथ्वी को बिगाड़ने वालों के बारे में बाइबल में लिखा हुआ देखते हैं। आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व, जब प्रदूषण और उसके प्रभावों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, तब बाइबल की अंतिम पुस्तक, प्रकाशितवाक्य, जो जगत के अंत और संसार के सभी लोगों के न्याय किए जाने की भविष्यवाणी की पुस्तक है, उसमें परमेश्वर ने प्रभु यीशु मसीह के शिष्य यूहन्ना के द्वारा, जो प्रभु का शिष्य बनने से पहले मछुआरा हुआ करता था, यह लिखवाया था, “और अन्यजातियों ने क्रोध किया, और तेरा प्रकोप आ पड़ा और वह समय आ पहुंचा है, कि मरे हुओं का न्याय किया जाए, और तेरे दास भविष्यद्वक्ताओं और पवित्र लोगों को और उन छोटे बड़ों को जो तेरे नाम से डरते हैं, बदला दिया जाए, और पृथ्वी के बिगाड़ने वाले नाश किए जाएं” (प्रकाशितवाक्य 11:18)। विवाद उत्पन्न करने, और तर्क देने वाले यह कह सकते हैं कि जिस “बिगाड़” की बात की गई है वह नैतिक पतन और भ्रष्टाचार भी हो सकता है। किन्तु मूल यूनानी भाषा में जो शब्द प्रयोग किया गया है, और जिसका अनुवाद “बिगाड़ना” किया गया है, वह है “डायाफ्थीरियो” जिसका शब्दार्थ होता है पूर्णतः सड़ा-गला कर नष्ट कर देना। यह वही शब्द है जिससे घातक बीमारी ‘डिफथीरिया’ का नाम आया है।


क्रमिक विकासवाद (Evolution) कहता है कि मनुष्य, पृथ्वी, और सृष्टि सुधर रहे हैं, उन्नत होते जा रहे हैं; जबकि हमारे समक्ष विदित व्यावहारिक वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत, और परमेश्वर के वचन बाइबल की बातों के अनुरूप है - मनुष्य, पृथ्वी और सृष्टि बिगड़ते जा रहे हैं, अपने अंतिम दिनों में पहुँच चुके हैं। सारे संसार भर में हर जाति, हर सभ्यता का मनुष्य शारीरिक, भौतिक, नैतिक, और आध्यात्मिक, हर रीति से सुधरने की बजाए बिगड़ता ही जा रहा है।


अब यह आपके लिए विचार करने और निर्णय लेने का समय है - क्या आप परमेश्वर के उस अवश्यंभावी न्याय का सामना करने, उसके सामने खड़े होकर अपने जीवन के हर एक पल का हिसाब देने, अपने मन, ध्यान, विचार, और व्यवहार की हर बात, हर सोच, हर कल्पना का हिसाब देने को तैयार हैं? क्योंकि परमेश्वर के दृष्टि से कुछ छिपा नहीं है, कुछ अज्ञात नहीं है, जैसा दाऊद ने अपने पुत्र सुलैमान को समझाया “और हे मेरे पुत्र सुलैमान! तू अपने पिता के परमेश्वर का ज्ञान रख, और खरे मन और प्रसन्न जीव से उसकी सेवा करता रह; क्योंकि यहोवा मन को जांचता और विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है उसे समझता है। यदि तू उसकी खोज में रहे, तो वह तुझ को मिलेगा; परन्तु यदि तू उसको त्याग दे तो वह सदा के लिये तुझ को छोड़ देगा” (1 इतिहास 28:9); और बाद में इब्रानियों के लेखक ने भी कहा, “क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग कर के, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है। और सृष्‍टि की कोई वस्तु उस से छिपी नहीं है वरन जिस से हमें काम है, उस की आंखों के सामने सब वस्तुएं खुली और बेपरदा हैं” (इब्रानियों 4:12-13)।


परमेश्वर आपको अवसर दे रहा है; यदि आज तक भी आपने उसकी आपको दी जाने वाली पापों की क्षमा के इस अवसर को स्वीकार नहीं किया है, तो अभी फिर आपके पास मौका है। आप अभी स्वेच्छा से, सच्चे मन से, अपने पापों के लिए पश्चातापी मन के साथ यह छोटी सी प्रार्थना कर सकते हैं, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने मन, ध्यान, विचार, और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किया है। मैं यह भी मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों की सजा को अपने ऊपर उठाया लिया, और उसे पूर्णतः चुका दिया है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और अपना आज्ञाकारी शिष्य बना लें, और अपने साथ बनाकर रखें।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी यह छोटी सी प्रार्थना आपके मन और जीवन को बदल देगी, आपको परमेश्वर की संतान बनाकर, पापों के दण्ड से मुक्ति तथा अब से लेकर अनन्तकाल तक के लिए स्वर्गीय आशीषों का वारिस बना देगी। निर्णय आपका है।  



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English Translation

 

Bible and Physical Sciences - 1 - Water Cycle


Not just things related to Bio-sciences, but also related to the other sciences, have been written down in the books of God's Word, the Bible thousands of years ago. We have seen some of these earlier in the articles on Creation of Universe, Space, etc. We will now see some other things related to physical sciences.


Let's start with a very simple thing - the cycle of water - how water circulates between the ocean, the sky and the earth in a continuous cycle, irrigating the whole earth, and providing drinking water for all creatures. But man for his selfishness and in the name of "knowledge", like all other things, has spoiled this water cycle made by God and running smoothly since creation. Consequently, today there are either droughts at many places, or unexpected and unforeseen floods, that have posed great danger of existence for all. This too, that the laws of nature will be disturbed in this way by humans, and their consequences, God has already written in his Word.


First let's look at the water cycle - today it is taught in schools in “general knowledge” that ocean water, vaporizes by the heat of the sun, is carried by the wind towards cold areas, of the land plains, mountains etc., and it falls in the form of dew and rain over all those places. From here some part of it is absorbed into the earth, and goes into the water bodies located below the surface of the earth and some flows into the rivers flowing on the earth’s surface, and then flows back into the ocean. Today, because of the investigative equipment and tools etc. this information available through research done by various people at various places, seems to us to be a matter of simple, common sense. But imagine how complex and impossible it must have been for humans living thousands of years ago to know all this and put it together as parts one cycle. At that time the population was quite sparse, learning and education was not only very limited, but was mainly concerned with local matters; there were no means of transport or communication and exchange of information as we have today; traveling long distances was at a risk to life. There were no such facilities to collect, collate together and analyze information as are available today. Most of those who lived on or near mountains would not know that there are oceans. Similarly, those who lived near the sea coast quite likely would not be aware of hills and mountains, and those who lived in the vast plains would be not aware of either the mountains or the oceans. In such a situation, looking at all this on the basis of the life and circumstances of that time thousands of years ago, for anyone to know and accurately document this information, and that too by a person who was neither a scientist nor knew any science is almost impossible.


With this background, now consider some verses from the Bible:

Job 36:27-28 “For He draws up drops of water, Which distill as rain from the mist, Which the clouds drop down And pour abundantly on man.”

Amos 9:6 “He who builds His layers in the sky, And has founded His strata in the earth; Who calls for the waters of the sea, And pours them out on the face of the earth-- The Lord is His name.”

Jeremiah 10:13 “When He utters His voice, There is a multitude of waters in the heavens: "And He causes the vapors to ascend from the ends of the earth. He makes lightning for the rain, He brings the wind out of His treasuries."”

Ecclesiastes 1:7 “All the rivers run into the sea, Yet the sea is not full; To the place from which the rivers come, There they return again.”


Now, also consider the facts that Job was a prosperous landlord who lived about 4000 years ago; Amos was a shepherd from about 2750 ago; Jeremiah was God's prophet about 2600 years ago; And King Solomon, the author of Ecclesiastes, wrote this book about 3000 years ago. Considering their life, their knowledge, and their inability of scientific understanding, interpretation and analysis of scientific data by these writers of those times, think again about the above verses of the Bible — is it at all possible that these simple, unlearned, unscientific people could have known and written down this information by themselves?


Now let's see what is written in the Bible about the “destroyers”, i.e., the corrupters and spoilers of the earth. About 2000 years ago, when there was no information about environmental pollution and its effects, in the last book of the Bible, Revelation, which is the book of the prophecy about the end of the world and the judgment of all the people of the world, it was written by the guidance of God by John, a disciple of the Lord Jesus Christ, who was a fisherman before becoming a disciple of the Lord that, "The nations were angry, and Your wrath has come, And the time of the dead, that they should be judged, And that You should reward Your servants the prophets and the saints, And those who fear Your name, small and great, And should destroy those who destroy the earth” (Revelation 11:18). Those who engage in debates and arguments, may say that the "destroy" spoken of can be moral degradation and even corruption. But the word used in the original Greek and translated "destroy" is "diaphtherio" which means to destroy completely by rotting. It is the same word from which the name of the deadly disease 'Diphtheria' has come.


Evolution says that humans, the earth, and creation are improving, becoming advanced and better. Whereas the evident, practical reality before us is quite the opposite, and is in line with what God's Word the Bible says - man, the earth and creation are deteriorating; the world has reached its last days. All over the world, human beings of every race and every civilization, are only deteriorating instead of improving physically, morally, and spiritually, in every conceivable manner.


Now it's time for you to reflect and decide - are you ready and prepared to face that inevitable judgment of God? To stand before Him and give an account of every single moment of your life, of everything in your mind, attitude, thought, and behavior? For nothing is hidden from God, nothing is unknown to Him, as David explained to his son Solomon, “As for you, my son Solomon, know the God of your father, and serve Him with a loyal heart and with a willing mind; for the Lord searches all hearts and understands all the intent of the thoughts. If you seek Him, He will be found by you; but if you forsake Him, He will cast you off forever" (1 Chronicles 28:9); And later the author of Hebrews also said, "For the word of God is living and powerful, and sharper than any two-edged sword, piercing even to the division of soul and spirit, and of joints and marrow, and is a discerner of the thoughts and intents of the heart. And there is no creature hidden from His sight, but all things are naked and open to the eyes of Him to whom we must give account” (Hebrews 4:12-13).


God is giving you the opportunity; If till today you have not accepted this opportunity of forgiveness of your sins, that has been given to you, then you still have this opportunity available to you. You can utilize it just now by voluntarily, sincerely, with a repentant heart for your sins, saying this short prayer, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You and sinned in mind, attitude, thought, and behavior. I also believe that you have taken upon yourself the punishment for my sins by your sacrifice on the Cross, and have paid for them in full. Please forgive my sins, take me under your care, make me your obedient disciple, and keep me with you." This small prayer of yours, said with a sincere and committed heart will transform your mind and life, make you a child of God, free you from the punishment of your sins, and make you an heir of heavenly blessings from now to eternity. The decision is yours.


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