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गुरुवार, 30 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 96 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 25

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पवित्र आत्मा से सीखना – 5

 

  परमेश्वर द्वारा प्रत्येक नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी को, उसके उद्धार पाने के क्षण से ही, परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रदान किया गया है, ताकि सर्वदा उस में निवास करे। पवित्र आत्मा, विश्वासी को उसके मसीही जीवन को सही रीति से जीने तथा परमेश्वर द्वारा उसे सौंपी गई सेवकाई का ठीक से निर्वाह करने में उस का सहायक, साथी, शिक्षक, और मार्गदर्शक होने के लिए दिया गया है। इसलिए यह अनिवार्य है कि पवित्र आत्मा का योग्य भण्डारी होने, तथा उसकी सेवाओं का उचित उपयोग करने के लिए प्रत्येक मसीही विश्वासी बाइबल में से पवित्र आत्मा के बारे में सीखे। पवित्र आत्मा के बारे में प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों को दी गई मुख्य शिक्षाएँ यूहन्ना रचित सुसमाचार के 14 से 16 अध्याय में मिलती हैं। इन लेखों में हम वहीं से उन्हें सीख रहे हैं; वर्तमान में हम यूहन्ना 14:17 से सीख रहे हैं। विश्वासी में पवित्र आत्मा के विद्यमान होने का प्रमाण वे प्रभाव, वे बदलाव हैं जो पवित्र आत्मा उस के जीवन में लाता है।


पवित्र आत्मा के प्रभावों में से एक है विश्वासी का परमेश्वर के वचन, बाइबल, को सीखना। यद्यपि पवित्र आत्मा विश्वासी में निवास करता है, उसे परमेश्वर के वचन को सिखाना चाहता है, लेकिन इसके लिए विश्वासी में पवित्र आत्मा के प्रति एक अनुशासन, सही इच्छा, पूर्ण आज्ञाकारिता, और प्रतिबद्धता का भी होना आवश्यक है। क्योंकि इस के लिए यत्न से प्रयास करने की आवश्यकता होती है, इसलिए विश्वासी, बजाए पवित्र आत्मा से सीखने के लिए मेहनत करने के, बहुधा सरल तरीका अपना लेते हैं, और मनुष्यों तथा पुस्तकों से सीखने की ओर मुड़ जाते हैं। यह उन्हें गलत शिक्षाओं में पड़ जाने के खतरे में डाल देता है; और शैतान इस अवसर का पूरा लाभ उठाता है, उनके आत्मिक जीवन को नष्ट करने या बाधित करने के लिए उनके जीवनों में कई झूठी शिक्षाएँ और गलत सिद्धान्त ले आता है। इस संदर्भ में हम देख चुके हैं कि तीन मुख्य कारण हैं जो विश्वासी को पवित्र आत्मा से सही रीति से सीखने नहीं देते हैं, और इन में से दो को हम पिछले लेखों में देख चुके हैं। आज से हम तीसरे कारण को देखना आरंभ करेंगे; यह है विश्वासी द्वारा मनुष्यों से प्राप्त की गई उन शिक्षाओं के साथ जिन पर वह भरोसा करता है, पवित्र आत्मा द्वारा दी जाने वाली शिक्षाओं को मिलाना।


इसे बेहतर समझने के लिए, हम एक बार फिर से साँसारिक शिक्षा पाने के उदाहरण का उपयोग करेंगे। यह एक जाना-माना तथ्य और लगभग प्रत्येक माता-पिता का अनुभव है कि जब बच्चे स्कूल जाना आरंभ करते हैं, शीघ्र ही वे अपने शिक्षक पर पूरा भरोसा करने लगते हैं, उसी पर निर्भर हो जाते हैं। बच्चे के लिए, शिक्षक जो भी करता और कहता है, केवल वही सही हो जाता है; और बच्चे सामान्यतः उसे ही एकमात्र और अकाट्य सत्य समझते हैं। शिक्षक ने स्कूल में जो सिखाया और जैसा करवाया है, वे उस से भिन्न कुछ भी सुनने और करने के लिए तैयार नहीं होते हैं, चाहे उनके अपने माता-पिता भी शिक्षक क्यों न हों। बच्चे अपने शिक्षकों को ही मानक मानते हैं, और दृढ़ता के साथ उन्हीं का अनुसरण करना चाहते हैं, चाहे शिक्षक उन्हें कुछ गलत ही क्यों न बता या करवा रहा हो। यही आत्मिक शिक्षा में भी ऐसे ही देखा जाता है। एक नया विश्वासी, यद्यपि परमेश्वर के वचन से उसका परिचय करवाया जाता है, उस से उसे पढ़ने, अध्ययन करने, और सीखने के लिए कहा जाता है, लेकिन वह यह सब उसी तरह से करने की प्रवृत्ति रखता है जैसा वह, जिस कलीसिया में वह जाता है, वहाँ के प्राचीनों, प्रचारकों, और अगुवों, तथा वहाँ के अन्य सदस्यों को करते हुए देखता है। नए विश्वासी की प्रवृत्ति अपनी कलीसिया के अन्य लोगों का अनुसरण करने की ही होती है, विशेषकर उनकी जो लोगों में परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हैं, उसकी शिक्षाएँ देते हैं, और साथ ही यह करने के द्वारा वे वहाँ के लोगों को स्वीकार्य भी बने रहना चाहते हैं।


यह केवल आज ही की बात नहीं है, यह आरंभिक कलीसिया में भी देखा जाता था (1 कुरिन्थियों 1:10-13; 3:3-7), और पौलूस को आरंभिक विश्वासियों को प्रभु की बजाए मनुष्यों का अनुसरण करने की प्रवृत्ति से बाहर निकालने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ा। जैसा कि इन हवालों से प्रकट है, प्रभु की बजाए मनुष्यों के पीछे चलने की इस प्रवृत्ति के कारण कलीसिया में डाह, झगड़े, और विभाजन होते हैं; यह विश्वासियों की आत्मिक उन्नति को बाधित करता है,वे अपरिपक्व बच्चों के समान ही रहते हैं; और उन्हें शारीरिक विश्वासी बना देता है। जैसा कि पहले 13 नवंबर के एक लेख में बाइबल के उदाहरणों से दिखाया गया है, कोई भी मनुष्य सिद्ध नहीं है; और सभी, सर्वाधिक भक्त जन भी, गलतियाँ कर सकते हैं, और करते भी हैं। इसलिए प्रत्येक विश्वासी को न केवल प्रेरितों 17:11 तथा 1 थिस्सलुनीकियों 5:21 की शिक्षा का पालन करना चाहिए और किसी भी शिक्षा को स्वीकार और पालन करने से पहले वचन से उसकी पुष्टि कर लेनी चाहिए, चाहे वह शिक्षा देने वाला प्रचारक या शिक्षक कोई भी हो, कितना भी भक्त और ख्याति प्राप्त क्यों न हो; साथ ही प्रत्येक विश्वासी को, यदि वह पवित्र आत्मा से सीखना चाहता है तो, अपने जीवन में केवल बाइबल के अनुसार सही शिक्षाओं को ग्रहण करने और उनका ही पालन करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, अन्यथा वह परमेश्वर का वचन सीखने के लिए हमेशा ही मनुष्यों पर ही निर्भर बना रहेगा, और कभी वचन में उन्नति नहीं करने पाएगा (इब्रानीयों 5:11-14)।


हम अगले लेख में इस से आगे देखेंगे और देखेंगे कि क्यों मनुष्यों से मिलने वाली शिक्षाओं पर भरोसा बनाए रखने और उन्हें थामे ही रहने के कारण परमेश्वर पवित्र आत्मा से सीखना गंभीर रीति से बाधित हो जाता है।

 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation

Learning from the Holy Spirit – 5

 

God the Holy Spirit has been given by God to every Born-Again Christian Believer, to reside in him at all times, from the very time of his salvation. The Holy Spirit has been given to be the Believer’s Helper, Companion, Teacher, and Guide in living his Christian life and fulfilling his God entrusted ministry. Therefore, it is imperative for the Believers, to be worthy stewards of the Holy Spirit, and to well utilizes His services, they learn about the Holy Spirit from the Bible. The Lord Jesus’s main teachings to His disciples about the Holy Spirit are given in John’s gospel, chapters 14 to 16. In these articles we are learning about Him from there; presently we are learning from John 14:17. The presence of the Holy Spirit in the Believer is evidenced by the effects He produces, the changes He brings in the Believer’s life.

 

One of the effects the Holy Spirit produces is the Believer learning God’s Word, the Bible. Although the Holy Spirit residing within the Believer is ready and willing to teach him the Word of God, but, learning from Him also requires a certain discipline, appropriate willingness, complete obedience, and a firm commitment from the Believer. Therefore, the Believers, instead of putting in diligent efforts to learn from the Holy Spirit, often prefer to take a ‘short-cut’, and go after learning from men and books. This makes them prone to receiving and following erroneous teachings; and Satan fully exploits the opportunity to bring in many false teachings and wrong doctrines into their lives to destroy or hamper their spiritual lives. In this context we have seen that there are three main reasons for the Believer not being properly able to learn from the Holy Spirit, and we have seen the first two of them in the previous articles. Today, we will begin with the third reason, i.e., the Believers wanting to mix up the teachings given to them by men, that they have received and rely upon, with the teachings given by the Holy Spirit to them. 


To understand this better, once again we will take help from the example of secular education. It is a well-known fact and the experience of nearly every parent, that when children start going to school, very soon they develop an absolute reliance and trust in their teachers. For the child, whatever the teacher says and does, only that is what is right; and the children often take that as the absolute and only truth. They are unwilling to do anything in any other way than what the teacher has told and taught them in school, even if their own parents are teachers. The children look up to their teachers as standards to emulate, and do this resolutely. The same holds true in spiritual learning as well. A new Believer, though he is introduced to, and asked to read, study, and learn God’s Word, but he tends to do it in the same way as the elders, preachers, and leaders of the Church he attends, do. The new Believer’s natural tendency is to emulate the people in their Church, especially those who preach and teach God’s Word, and also in so doing, to remain acceptable to them. 


This is not a present day phenomenon, it was present even in the first Church (1 Corinthians 1:10-13; 3:3-7), and Paul strived to get the early Believers out of this tendency of following men rather than the Lord. As is apparent from these references, this tendency to follow men rather than the Lord and His Word, gives rise to envy, strife, and divisions within the Church; prevents the spiritual growth of the Believers, leaving them as immature children; and makes them carnal Christians. We always need to keep in mind, as has been shown through Biblical examples in an earlier article of 13th November, that no man is perfect; and everyone, even the most godly, can, and do make mistakes. Therefore, every Believer not only needs to follow the teaching of Acts 17:11 and 1 Thessalonians 5:21, and first verify from God’s Word before accepting any teaching from anyone, no matter how godly and reputed the preacher or teacher may be; but the Believers should also be willing and ready to accept and apply Biblically based corrections to their lives, if they desire to learn from the Holy Spirit; else they will remain dependent upon men to learn God’s Word, and never really grow up in it (Hebrews 5:11-14).


We will carry on from here in the next article, and see further why reliance or insistence on adhering to man’s teachings will seriously hamper learning from God the Holy Spirit.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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बुधवार, 29 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 95 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 24


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पवित्र आत्मा से सीखना – 4

 

        नया जन्म पाया हुआ मसीही विश्वासी, उसे उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए परमेश्वर पवित्र आत्मा का भण्डारी है। पवित्र आत्मा उसे उसका मसीही जीवन जीने तथा सेवकाई को भली-भाँति पूरा करने में सहायक, साथी, और मार्गदर्शक होने के लिए दिया गया है। इसलिए पवित्र आत्मा की सहायता को योग्य रीति से उपयोग करने के लिए, विश्वासी को परमेश्वर के वचन से उस के बारे में सीखना चाहिए, जिस से कि पवित्र आत्मा के बारे में प्रचलित झूठी शिक्षाओं और गलत धारणाओं में पड़ कर भटक न जाए। हम यह प्रभु यीशु द्वारा यूहन्ना 14 से 16 अध्याय में पवित्र आत्मा के बारे में दी गई शिक्षाओं को सीखने के द्वारा कर रहे हैं। वर्तमान में हम यूहन्ना 14:17 से सीख रहे हैं, जहाँ से हमने पवित्र आत्मा का ‘सत्य का आत्मा’ होने के बारे में देखा है; और फिर उसके बाद सीखा था कि क्यों सँसार उसे जान नहीं सकता है, ग्रहण नहीं कर सकता है, लेकिन मसीही विश्वासी उसे जान सकता है क्योंकि वह उस में निवास करता है।


        हमने देखा है कि विश्वासी में पवित्र आत्मा होने का प्रमाण है विश्वासी के जीवन में दिखने वाले पवित्र आत्मा के प्रभाव, उसके जीवन में पवित्र आत्मा द्वारा लाए गए बदलाव। इन प्रभावों में से एक है विश्वासी का परमेश्वर के वचन बाइबल को पवित्र आत्मा से सीखना। किन्तु विश्वासी में पवित्र आत्मा के होते हुए, और पवित्र आत्मा के उसे सिखाने का इच्छुक होने पर भी, बहुधा विश्वासियों को पवित्र आत्मा से परमेश्वर के वचन को सीखने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और इसलिए विश्वासी अकसर मनुष्यों और पुस्तकों से वचन सीखने की ओर मुड़ जाते हैं, जो उन्हें बाइबल के बाहर की और गलत शिक्षाओं में पड़ जाने के खतरे में डाल देता है। हम ने देखा था कि विश्वासी के पवित्र आत्मा से न सीख पाने के मुख्यतः तीन कारण हैं। इन तीनों में से हम पहले कारण, विश्वासी में परमेश्वर के वचन का पर्याप्त संग्रह अथवा भण्डार न होना जिस में से पवित्र आत्मा उसे स्मरण दिला सके – क्योंकि पवित्र आत्मा इसी विधि से सिखाता है, को हम देख चुके हैं।


        अब हम दूसरे कारण को देख रहे हैं, विश्वासी का परमेश्वर के वचन को पढ़ने और अध्ययन करने में पर्याप्त समय न लगाना; और यह विश्वासी के पवित्र आत्मा के निर्देशों का पालन करने के लिए जितना प्रतिबद्ध होना चाहिए, उतना न होने के कारण होता है। पिछले लेख में इस कारण पर विचार करते हुए हम इस बात पर आ कर रुके थे कि पवित्र आत्मा से सीखने के लिए विश्वासी को ‘आत्मा के अनुसार चलना’ (गलतियों 5:16, 25) भी सीखना चाहिए, अर्थात, पवित्र आत्मा के कहे के प्रति संवेदनशील और आज्ञाकारी भी होना चाहिए। इस दूसरे कारण के दोनों भाग – परमेश्वर के वचन को पर्याप्त पढ़ना और अध्ययन नहीं करना, तथा पवित्र आत्मा के निर्देशों का पालन करने के लिए उचित रीति से प्रतिबद्ध नहीं होना, आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। विश्वासी जितना आधिक परमेश्वर के वचन को पढ़ेगा और सीखेगा, वह पवित्र आत्मा के प्रति उतना अधिक प्रतिबद्ध और आज्ञाकारी होगा, अर्थात, वह उतना आधिक ‘आत्मा के अनुसार’ चलने वाला बन जाएगा; और वह जितना अधिक प्रतिबद्ध और आज्ञाकारी होगा, वह जितना अधिक ‘आत्मा के अनुसार’ चलने वाला बनेगा, पवित्र आत्मा उसे उतना अधिक परमेश्वर के वचन को सिखाएगा, तथा वचन में विश्वासी की रुचि उतनी अधिक बढ़ती जाएगी। इस प्रकार से, एक चक्र के समान, एक बात दूसरी को बढ़ाती रहती है।


विश्वासी के पवित्र आत्मा के प्रति प्रतिबद्ध और आज्ञाकारी न रहने का एक और कारण है उसका सँसार की बातों में फँसे रहना। पवित्र आत्मा की अगुवाई में प्रेरित पतरस ने मसीही विश्वासियों को लिखा है, “इसलिये सब प्रकार का बैर भाव और छल और कपट और डाह और बदनामी को दूर करके। नये जन्मे हुए बच्‍चों के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ” (1 पतरस 2:1-2)। दूसरे शब्दों में, निर्मल आत्मिक दूध के द्वारा बढ़ने के लिए यह अनिवार्य है कि पहले विश्वासी अपने रवैये और जीवन-शैली में बदलाव लाए – “सब प्रकार का बैर भाव और छल और कपट और डाह और बदनामी को दूर करके” सँसार से बिल्कुल भिन्न हो जाए। प्रेरित पौलुस ने भी इसी बात पर 1 कुरिन्थियों 3:1-3 में बल दिया; उसने इस प्रकार के व्यवहार में बने रहने वाले विश्वासियों को शारीरिक कहा, जिस के कारण वे ठोस आत्मिक भोजन, अर्थात और परिपक्व आत्मिक शिक्षाएँ ग्रहण कर पाने में असमर्थ थे, और उन्हें बच्चों का ही भोजन, अर्थात बिल्कुल आरंभिक शिक्षाएँ ही दी जा सकती थीं।

1 पतरस 2:1 की एक और ध्यान देने योग्य बात है कि पतरस पवित्र आत्मा के द्वरा मसीही विश्वासियों को यह लिख रहा है कि उन्हें ही स्वयं इन बुरे साँसारिक रवैयों और बातों को अपने से दूर करना होगा, कोई और उन के लिए यह कर के नहीं देगा। पवित्र आत्मा यह करने में उनकी सहायता और मार्गदर्शन करेगा, लेकिन उनके स्थान पर उनके लिए इसे नहीं करेगा – ध्यान कीजिए, वह उनका सहायक और मार्गदर्शक है, न कि उनके स्थान पर काम करने वाला या उनका सेवक। विश्वासियों को इसे करने के लिए स्वयं ही पहल करनी होगी, प्रयास करने होंगे, दृढ़ निश्चय बने रहना होगा, और जब वे दृढ़ निश्चय होकर उस के लिए उचित कदम उठाते हैं, तब परमेश्वर पवित्र आत्मा इन बाधाओं पर जयवंत होने और उन्हें हटाने में उनका सहायक होगा, मार्गदर्शन करेगा, जिस से वे परमेश्वर के वचन को सीखें, आत्मिक उन्नति करें, और परिपक्व हों।

मसीही विश्वासी को इस बात का एहसास रखना है कि प्रभु यीशु मसीह को उद्धारकर्ता स्वीकार करने, नया-जन्म प्राप्त करने के बाद से अब वे एक पूर्णतः नई सृष्टि बन गए है, “सो यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्‍टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17)। इसलिए विश्वासी अब पुराने जीवन की बातों के साथ बना नहीं रह सकता है; यदि वह बना रहेगा, तो वे उसकी आत्मिक बढ़ोतरी में बाधा बनेंगी, और परमेश्वर के द्वारा उसे दिए गए शिक्षक से परमेश्वर के वचन को सीखने नहीं देंगी। पुराने जीवन की बातों को छोड़ कर नए जीवन के अनुसार जीने का उपाय है सँसार के लोगों और बातों के साथ संबंध को काट लेना, और उस समय को परमेश्वर का वचन सीखने, परमेश्वर का कार्य करने, और परमेश्वर के लोगों की संगति में रहने में बिताना।

अगले लेख में हम उस तीसरे कारण को देखना आरंभ करेंगे जो मसीही विश्वासी के पवित्र आत्मा से वचन को सीखने में बाधा डालता है, अर्थात, उन्होंने मनुष्यों से जो शिक्षाएँ पाई हैं और जिन पर वे भरोसा रखते आए हैं, उन्हीं में पवित्र आत्मा से मिली शिक्षाओं को मिलाने का प्रयास करना।

        यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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English Translation

Learning from the Holy Spirit – 4

 

    The Born-Again Christian Believer is the steward of the Holy Spirit, given to him by God at the very moment of his salvation, to be his Helper, Companion, and Guide for his Christian living and ministry. Therefore, to utilize the Holy Spirit’s services worthily, the Believer has to learn about Him from God’s Word to avoid being misled by false teachings and wrong doctrines so prevalent about the Holy Spirit. We are doing this through studying the teachings about the Holy Spirit given by the Lord Jesus in John chapters 14 to 16. Presently we are learning from John 14:17, and there we have seen about the Holy Spirit being ‘The Spirit of Truth’; and then we have learnt about why the world cannot know and receive Him, but the Christian Believer can know Him since He resides in him.


    We have seen that the proof of the Holy Spirit being present in the Believer are the effects that He produces, the changes that the Holy Spirit brings in the Believer’s life. One of these effects is that the Believer learns God’s Word, the Bible, from the Holy Spirit. But despite the Holy Spirit being present in the Christian Believers and wanting to teach them, they still face considerable problems in properly learning God’s Word from Him, and therefore the Believers often resort to learning from men and books, which makes them prone to learning unBiblical things as well. We had seen that there are three main reasons for the Believer not being able to learn from God the Holy Spirit present in him. Of these three reasons, we have seen the first, i.e., the Believer not having a ‘stock’ or repository of God’s Word in him, for the Holy Spirit to be able to bring things written in God’s Word to the Believer’s remembrance – since that is how the Holy Spirit teaches the Believers.


    We are now looking at the second reason, the Believer’s not giving adequate time to read and study God’s Word; and this usually is due to the Believer’s not being committed enough to follow and obey the instructions of the Holy Spirit. In the last article, while considering this second reason, we had stopped at the point that to learn from the Holy Spirit, the Believer also has to learn to ‘walk in the Spirit’ (Galatians 5:16, 25), i.e., learn to be sensitive and obedient to the promptings of the Holy Spirit. The two components of this second reason – not reading and studying enough of God’s Word, and not being committed enough to follow and obey the instructions of the Holy Spirit, are inter-linked and inter-dependent. The more the Believer reads and studies God’s Word, the more committed and obedient he will become to the Holy Spirit, i.e., the better he will ‘walk in the Spirit’; the more committed and obedient he is, i.e., the better he ‘walks in the Spirit’, the more the Holy Spirit will teach God’s Word to him, and the more interest he will develop in it. So, cyclically, one will keep promoting the other.


    Another reason why the Believer does not remain committed and obedient to the Holy Spirit is his remaining entangled in the things of the world. The Apostle Peter, under the guidance of the Holy Spirit, has written to the Christian Believers “Therefore, laying aside all malice, all deceit, hypocrisy, envy, and all evil speaking, as newborn babes, desire the pure milk of the word, that you may grow thereby” (1 Peter 2:1-2). In other words, for the Believer to grow by the pure milk of the Word, the preliminary condition is a changed attitude and life-style – “laying aside all malice, all deceit, hypocrisy, envy, and all evil speaking”, into one that is absolutely unlike that of the world. The Apostle Paul too emphasized on this in 1 Corinthians 3:1-3; calling the Believers still persisting in this kind of behaviour as ‘carnal’, because of which they were unable to receive solid spiritual food, i.e., more mature spiritual teachings, and had to be fed only milk – the food of the babies, i.e., the very basic spiritual teachings.


    Another thing to be noted from 1 Peter 2:1 is that Peter through the Holy Spirit is writing to the Believers that it is they themselves who have to lay aside these bad, worldly attitudes; no one else is going to do it for them. The Holy Spirit will help and guide them in it, but will not do it for them – remember, He is their Helper and Guide, not their substitute or servant. The Believers have to take the initiative, make the efforts, make a resolve, and as they take determined steps about it, God the Holy Spirit will help and guide them overcome and remove these impediments in their learning God’s Word, spiritual growth, and maturation.


    The Christian Believer has to realize that having accepted the Lord Jesus as savior, having been Born-Again, now he is a totally new creation, “Therefore, if anyone is in Christ, he is a new creation; old things have passed away; behold, all things have become new” (2 Corinthians 5:17). Therefore, the Believer cannot be carrying with him the old things; if he does, they will hamper his spiritual growth, and not let him learn God’s Word from his God given Teacher – the Holy Spirit. The way to giving up on the past and living according to the new life is by cutting off the time with the people and things of the world, and using that time in learning God’s Word, doing God’s work, being in the company of God’s people.

    In the next article we will begin looking at the third thing that obstructs the believer from learning God’s Word, i.e., their wanting to mix up man’s teachings that they have received and rely upon, with the teachings given by the Holy Spirit to them.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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मंगलवार, 28 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 94 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 23


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पवित्र आत्मा से सीखना – 3

 

    परमेश्वर द्वारा प्रत्येक मसीही विश्वासी को, उसका सहायक, साथी, मार्गदर्शक, और शिक्षक होने के लिए प्रदान किए गए परमेश्वर पवित्र आत्मा का भण्डारी होने के नाते, यह प्रत्येक मसीही विश्वासी की ज़िम्मेदारी है कि वह पवित्र आत्मा के बारे में सीखे। यह करना पवित्र आत्मा की सहायता को सही रीति से उपयोग कर पाने के लिए अनिवार्य है, ताकि विश्वासी अपने जीवन और सेवकाई के द्वारा परमेश्वर की सेवा कर सके। यह करना इस लिए भी अनिवार्य है ताकि विश्वासी पवित्र आत्मा के बारे में फैली हुई गलत शिक्षाओं से भ्रमित न हो जाए, और न ही उस के बारे में कोई भी मन-गढ़न्त धारणा बना ले, और शैतान द्वारा किसी गलत मार्ग पर न डाल दिया जाए।


    पिछले कुछ लेखों से हम यूहन्ना 14:17 से से अध्ययन करते आ रहे हैं। आरंभ में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, और फिर सीखा था कि सँसार उन्हें नहीं जान सकता है, किन्तु विश्वासी जान सकता है, और वह विश्वासी में निवास करता है। व्यक्ति में पवित्र आत्मा के विद्यमान होने का प्रमाण वे बदलाव हैं जो पवित्र आत्मा उस व्यक्ति में लाता है, अर्थात, उन की उपस्थिति के कारण उस व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव। इन प्रभावों में से एक है विश्वासी का पवित्र आत्मा से परमेश्वर के वचन को सीख पाना। लेकिन अधिकांश विश्वासी यहाँ पर आ कर समस्या का सामना करते हैं, अपने आप को सही रीति से परमेश्वर का वचन सीख पाने में असमर्थ पाते हैं, और इसलिए वे मनुष्यों और पुस्तकों से वचन को सीखने की ओर मुड़ जाते हैं, बजाए पवित्र आत्मा से सीखने के प्रयासों में लगे रहने के।


    तीन मुख्य कारण हैं जिन के कारण विश्वासी पवित्र आत्मा से परमेश्वर का वचन नहीं सीखने पाता है, यद्यपि वह प्रत्येक विश्वासी में निवास करता है। हमने पिछले लेख में इन तीन में से पहले कारण को देखा था – विश्वासी में परमेश्वर के वचन का पर्याप्त संग्रह या भण्डार उपलब्ध न होना जिससे कि पवित्र आत्मा उसे परमेश्वर के वचन में लिखी हुई बातों को याद दिला सके। हमने यूहन्ना 14:26 और यूहन्ना 16:14-15 से देखा था कि पवित्र आत्मा द्वारा सिखाए जाने का तरीका है विश्वासी जिस परिस्थिति का सामना कर रहा है उसके अनुसार परमेश्वर के वचन के भाग उसे याद दिलाना। इसलिए, पवित्र आत्मा से सीखने के लिए, विश्वासी को यत्न के साथ परमेश्वर के वचन को पढ़ना और अध्ययन करना है; उसे प्रार्थना के साथ नियमित, योजनाबद्ध रीति से क्रमवार पढ़ना है और अपने अन्दर वचन को भर लेना है। आज से हम दूसरे कारण को देखना आरंभ करेंगे, विश्वासी का परमेश्वर के वचन को पढ़ने और अध्ययन करने के लिए पर्याप्त और उचित समय न लगाना, और सामान्यतः यह तब होता है, जब विश्वासी का पवित्र आत्मा के निर्देशों को जानने और मानने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होता है।


    यदि अधिकांश नहीं तो बहुतेरे विश्वासियों के लिए, नया-जन्म पा लेने के बाद परमेश्वर और साँसारिक धन के मध्य संघर्ष रहता है (मत्ती 6:24)। प्रभु यीशु मसीह ने जो मत्ती 6:25-34 में कहा है, वे उस पर भरोसा नहीं करने पाते हैं, और अपने जीवन में सही प्राथमिकताओं को नहीं रखते हैं। उनके जीवनों में सँसार तथा सँसार की बातें ही प्राथमिकता रखती हैं, और उसके बाद ही, यदि समय बचा तो वे परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के कार्य के बारे में सोचते हैं। सामान्यतः पालन किया जाने वाला नमूना है, मिल सकने वाले धन और लाभ के आधार पर प्रस्ताव, नौकरी, और अवसर कितने अच्छे हैं, उसके अनुसार स्वयं ही अपने लिए निर्णय ले लेना, विशेषकर कमाई और पारिवारिक बातों के बारे में। पहले अपने ही आँकलन के आधार पर स्वयं ही काम को कर लेने का निर्णय ले लेने के पश्चात, फिर एक औपचारिकता को पूरी करने के लिए वे उसके लिए प्रार्थना और परमेश्वर की आशीष मांगते हैं। लेकिन कुछ समय के बाद उन्हें यह एहसास होता है कि जो साँसारिक धन-संपत्ति और समृद्धि के लिए बहुत लाभदायक है, वही उनके आत्मिक जीवन के लिए एक फँदा बन गया है। उस ने उन्हें परमेश्वर और आत्मिक जीवन से दूर कर दिया है; अब उनके पास परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के काम के लिए न तो इच्छा है, न ही समय या सामर्थ है; और अब वे केवल औपचारिकता निभाने वाले ‘इतवार के मसीही’ से अधिक और कुछ नहीं रह गए हैं। वह विश्वासी याकूब 4:3 और 1 यूहन्ना 2:15-17 की अनदेखी करने के जाल में फँस गया है। वह विश्वासी उस जाल में फँसा हुआ नाशमान साँसारिक बातों के लिए कार्य करने और उन्हें एकत्रित करने में पड़ गया है, जो अन्ततः नष्ट हो जाएँगी, उसे अनन्त काल के लिए छूछे हाथ छोड़ देंगी (1 कुरिन्थियों 3:13-15)।


    विश्वासी यह भूल जाते हैं कि परमेश्वर के राज्य में नया-जन्म लेने के पल से ही, उनमें निवास करने वाले पवित्र आत्मा का मंदिर होने के नाते, वे अब अपने नहीं रहे हैं, परमेश्वर के हो गए हैं (1 कुरिन्थियों 6:19)। उस पल के बाद से उन्हें प्रभु के अनुसार और प्रभु के लीए जीना है (2 कुरिन्थियों 5:15), उन के लिए परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई ज़िम्मेदारी (इफिसियों 2:10) के बारे में जानना और सीखना है तथा उसे निभाना है, क्योंकि उनके जीवन की सफलता और आशीष उसी पर निभर करती है। जब विश्वासी परमेश्वर के लिए काम करता है, तब परमेश्वर भी उसके लिए काम करता है (1 कुरिन्थियों 5:58; 2 इतिहास 15:2, 7), और उसे समृद्ध बनाता है, भौतिक रीति से भी (व्यवस्थाविवरण 8:18; व्यवस्थाविवरण 15:4-5; व्यवस्थाविवरण 26:11; नीतिवचन 10:22; सभोपदेशक 5:19)। एक मसीही विश्वासी की समृद्धि उसकी आत्मिक उन्नति के प्रयास करने के साथ जुड़ी है और उसी के अनुपात में है (3 यूहन्ना 1:2)। वह अपनी आत्मा की उन्नति के लिए, परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के कार्य को समय और प्राथमिकता देने के द्वारा जितना अधिक प्रयास करेगा, उतना ही अधिक परमेश्वर उसे इस सँसार में तथा आने वाले सँसार में आशीषित करेगा (मरकुस 10:29-30)।


    शैतान भी साँसारिक लाभ और समृद्धि के द्वारा मसीही विश्वासी को बहका कर परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के कार्य से दूर कर सकता है। तो फिर यह कैसा पहचान जा सकता है कि कौन सी समृद्धि परमेश्वर से है, और कौन सी शैतान से? परमेश्वर जब ये भौतिक आशीषें देता है तो उनके साथ कोई दुःख नहीं मिलाता है (नीतिवचन 10:22)। जब समृद्धि परमेश्वर की ओर से होती है, तब परमेश्वर की सँतान, मसीही विश्वासी, अपनी साँसारिक ज़िम्मेदारियाँ भी पूरी कर सकता है, और साथ ही उसके पास परमेश्वर के लिए सक्रीय बने रहने की लालसा, समय, और अवसरों का सदुपयोग करने की प्रवृत्ति भी रहेगी, और वह परमेश्वर की निकटता में बढ़ता रहेगा। किन्तु जो साँसारिक समृद्धि शैतान उपलब्ध करवाता है, उसका उद्देश्य होता है विश्वासी को परमेश्वर की सेवा और उसके कार्यों से दूर करना और रखना। इसलिए, शैतानी समृद्धि में हमेशा ही परमेश्वर और उसके कार्यों के प्रति अनिच्छा, समय का अभाव, और अवसरों का परमेश्वर के लिए सदुपयोग नहीं करने की प्रवृत्ति होगी। वरन, ऐसा विश्वासी प्रभु के लिए काम करने से कतराता रहेगा, उसके पास वचन के अध्ययन के लिए समय नहीं होगा, और परमेश्वर के काम में जुड़ने से बचने के लिए वह बहाने बनाता रहेगा। लेकिन, इसकी तुलना में, उसके पास हमेशा ही साँसारिक कार्यों, जिम्मेदारियों, मौज-मस्ती, और अन्य बातों के लिए इच्छा, समय, समझ-बूझ, और अवसरों का उपयोग करने की प्रवृत्ति होगी। साथ ही या तो उसके व्यक्तिगत जीवन में, या परिवार में, या कार्य और व्यवसाय के जीवन में, या इन सभी में अथवा किसी न किसी में, कोई न कोई विरोध या अशान्ति बनी रहेगी; वह अपने जीवन में, किसी न किसी बात के कारण, कभी भी शान्ति से नहीं होगा।


    विश्वासी को इसका भी एहसास रखना चाहिए कि परमेश्वर, परमेश्वर है, सर्वोच्च हस्ती; वह कभी भी कहीं भी कोई निचला स्तर स्वीकार नहीं करेगा, अपने मंदिर – मसीही विश्वासी में तो कदापि नहीं। या तो वह विश्वासी के जीवन में हर बात के लिए प्राथमिक स्थान रखने वाला परमेश्वर रहेगा, (मत्ती 22:37; लूका 14:26-27; फिलिप्पियों 3:7-9), नहीं तो वह कोई अन्य स्थान ग्रहण नहीं करेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि, तब वह एक ओर हट जाएगा और विश्वासी को उसकी ही युक्तियों और मार्गों पर चलने के लिए छोड़ देगा, उड़ाऊ पुत्र के समान, वह जो करना चाहे उसे कर लेने देगा, जब तक कि वह कठोर दुःखदायी अनुभवों से होकर जीवन की शिक्षाओं को सीख नहीं लेगा, और पूरे समर्पण के साथ मुड़कर वापस नहीं आ जाएगा। इसलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा से सीखने के लिए, विश्वासी को पहले उसे जीवन में प्राथमिकता देना सीखना होगा, उसका आज्ञाकारी बनना होगा, अर्थात, उसे ‘आत्मा के अनुसार चलना’ (गलतियों 5:16, 25) सीखना पड़ेगा। अगले लेख में हम इस से आगे देखेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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English Translation

Learning from the Holy Spirit – 3

 

    As stewards of the Holy Spirit given by God to every Born-Again Christian Believer, to be his Helper, Companion, Guide, and Teacher it is the responsibility of every Believer to learn about the Holy Spirit. This is necessary or him to be able to worthily utilize the Holy Spirit’s services, and thereby to serve God through their lives and ministry. It is also necessary to avoid being carried away into wrong teachings, or assuming things about the Holy Spirit, and being misled by Satan.


    For the past few articles, we have been studying from John 14:17. Initially we had seen that the Holy Spirit is the Spirit of truth, and then learnt how the world cannot know Him, but the Believer can, and he dwells in the Believer. The evidence of the Holy Spirit being in a person are the changes He brings in that person, i.e., the effects of His presence in him. One of the effects is the Believer being able to learn God’s Word from the Holy Spirit. But this is where most Believers face a problem, find themselves being unable to learn God’s Word properly, and therefore they turn to learning form persons and books, instead of striving to learn from the Holy Spirit.


    There are three main factors that do not allow the Believer to learn God’s Word from the Holy Spirit, though He resides in the Believer. We have seen the first of these factors in the last article – the Believer not having a ‘stock’ or repository of God’s Word in him, for the Holy Spirit to be able to bring things written in God’s Word to the Believer’s remembrance. We have seen from John 14:26 and John 16:14-15 that the Holy Spirit’s method of teaching is by bringing to the remembrance of the Believer, portions of God’s Word appropriate to the situation the Believer is facing. Hence, to learn from the Holy Spirit, the Believer has to diligently read and study God’s Word; do it prayerfully, regularly, systematically and sequentially, to fill himself up with God’s Word. From today we will take up the second factor, the Believer’s lack of giving adequate time to read and study God’s Word; and this usually is due to the Believer’s not being committed enough to follow and obey the instructions of the Holy Spirit.


    For many, if not most of the Believers, after being Born-Again, there is a struggle between God and mammon (Matthew 6:24). They fail to trust what the Lord Jesus said in Matthew 6:25-34, and do not maintain the correct priorities in their lives. The world and things of the world still get the first priority in their lives, and then if time permits, they think about God, God’s Word, and God’s Work. The usual pattern is to take one’s own decisions, especially for earnings and family matters, depending upon how lucrative or beneficial the offer, job, or opportunity seems. First having accepted based on their own assessment, they then perfunctorily pray and ask for God’s blessings upon what they have already decided to do. Only to realize after some time that what is very rewarding in terms of worldly wealth and prosperity, has become a snare for their spiritual lives. It has drawn them away from God and spiritual living; now they simply do not have the will, the time, or the energy to give to God, His Word, and His work; and they are unable to rise above fulfilling the formality of being a “Sunday Christian”. The Believer has fallen into the trap of going contrary to James 4:3 and 1 John 2:15-17. The Believer has got himself ensnared in working for and accumulating temporary things of the world, which will eventually perish, leaving him empty-handed for eternity (1 Corinthians 3:13-15).


    The Believer forgets that from the moment of his being Born-Again into the Kingdom of God, as the temple of the Holy Spirit residing in him, he is no longer his own, but belongs to God (1 Corinthians 6:19). From that moment onwards he has to live for and according to the Lord (2 Corinthians 5:15), learn about and fulfil his God determined responsibility (Ephesians 2:10), because his blessings and success in life are dependent on it. When the Believer works for God, God works for him (1 Corinthians 15:58; 2 Chronicles 15:2, 7), and prospers him even materially (Deuteronomy 8:18; Deuteronomy 15:4-5; Deuteronomy 26:11; Proverbs 10:22; Ecclesiastes 5:19). A Believer’s physical prosperity is linked to, and proportional to his laboring to prospering his soul (3 John 1:2). The more he labors to prosper his soul, by giving God, God’s Word, and God’s work the first priority, the more God will bless and prosper him in this world and the next (Mark 10:29-30).


    Satan can also entice the Believers through worldly gains and prosperity, to draw them away from God, His Word, and from working for God. How can one discern whether prosperity is from God or from Satan? When God gives these material blessings, He gives no sorrow with them (Proverbs 10:22). When the prosperity is from God, God’s child, the Believer can fulfil his secular responsibilities, and also have the will, the time, and opportunities to stay active for the Lord, and grow in the Lord. But the worldly prosperity Satan provides is primarily to draw the Believer away from serving God and being useful in God’s work. Hence in the satanic prosperity there will always be a lack of willingness, of time, and of utilizing opportunities to serve the Lord. Rather, the Believer will keep shying away from working for the Lord, spending time with God’s Word, and will keep finding excuses for not being involved in God’s work. But, in contrast, he will always have the willingness, time, mind, and desire of capitalizing on opportunities related to worldly works, responsibilities, pleasures, and other things. Moreover, either his personal, or family, or his work life, any or all of them, will always have some discord or the other going on; he will never be at peace in his life, because of one thing or the other.


    The Believer should also realize that God being God, the Supreme personality, He will never take a secondary place anywhere, least of all in His temple – the Believer. Either He will be God, having the primary place in the Believer’s lives for everything (Matthew 22:37; Luke 14:26-27; Philippians 3:7-9), or He will take no place in our lives. That is to say, He will step aside and leave the Believer to his own ways and devices, to do what he feels like; till like the Prodigal Son, he learns the bitter lessons the hard way, and turns back to Him whole-heartedly. So, to learn from God the Holy Spirit, the Believer has to learn and be willing accord Him the first priority in his life, has to submit fully to Him, become obedient to Him, i.e., he has to learn to ‘walk in the Spirit’ (Galatians 5:16, 25). We will carry on from here in the next article.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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सोमवार, 27 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 93 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 22

 

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पवित्र आत्मा से सीखना – 2

 

    प्रत्येक नया जन्म पाया हुआ मसीही विश्वासी उसे परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए प्रावधानों का भण्डारी भी है; और परमेश्वर के उन प्रावधानों में से एक है परमेश्वर पवित्र आत्मा जो विश्वासी में उसके उद्धार पाने के पल से निवास करने लगता है। विश्वासी को पवित्र आत्मा उसका सहायक और साथी होने के लिए, उसे परमेश्वर का वचन सिखाने, उसका मार्गदर्शन करने के लिए दिया गया है जिस से वह परमेश्वर द्वारा उसे दी गई सेवकाई का सही निर्वाह कर सके। आज, पवित्र आत्मा के बारे में बहुत सारी गलत शिक्षाएँ और धारणाएँ व्याप्त हैं। जब तक कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के बारे में बाइबल के अनुसार सही तथ्य व्यक्ति के पास नहीं होंगे, तब तक वह परमेश्वर द्वारा उसे उपलब्ध करवाए गए पवित्र आत्मा की सहायता, मार्गदर्शन, और सामर्थ्य का सही और उचित उपयोग नहीं करने पाएगा। पवित्र आत्मा से संबंधित मुख्य शिक्षाएँ यूहन्ना रचित सुसमाचार के 14 से 16 अध्याय में, जो प्रभु यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए पकड़वाए जाने से पहले शिष्यों के साथ किया गया अंतिम वार्तालाप का भाग है, में मिलती हैं। पिछले कुछ समय से हम यूहन्ना 14:17 से सीख रहे हैं, और हाल ही में हमने सँसार के उसे न जान पाने किन्तु प्रभु के शिष्यों के उसे जानने के बारे में सीखना आरंभ किया है। इस संदर्भ में, पिछले लेख से हमने पवित्र आत्मा से परमेश्वर के वचन को सीखने के बारे में सीखना आरंभ किया है।


    हमने देखा है कि परमेश्वर ने हमें अपना वचन इसलिए नहीं दिया है कि वह एक रहस्यमयी, बँद पुस्तक हो; वरन हमारे उसे पढ़ने और सीखने के लिए दिया है। परमेश्वर स्वयं हमें उसे सिखाना चाहता है, यदि हम उस से सीखने के लिए तथा उसकी शिक्षाओं का पालन करने के लिए तैयार हों, तो। परमेश्वर पवित्र आत्मा के दिए जाने का एक उद्देश्य है कि वह परमेश्वर की सँतानों को परमेश्वर का वचन सिखाए। किन्तु प्रत्येक विश्वासी के लिए इस में धोखा खाने का एक कारण है कि यदि वे पवित्र आत्मा से परमेश्वर का वचन सीखने का यत्न करने की बजाए, सरल रीति से किसी मनुष्य अथवा पुस्तकों पर निर्भर हो जाएँ। तब तो शैतान के पास गलत शिक्षाओं को लाने का पूरा अवसर उपलब्ध होगा, और वह इस अवसर का भरपूरी से उपयोग करता है, मसीही विश्वासियों को गलत शिक्षाओं, सिद्धांतों, और अनुचित व्ययवाहरिक उपयोग में फँसा देता है। पिछले लेख में हम तीन मुख्य कारणों पर आ कर रुके थे, जिनके कारण मसीही विश्वासी परमेश्वर पवित्र आत्मा से परमेशर के वचन को सीखने में बाधित अनुभव करता है। इन तीन कारणों के महत्व को हम साँसारिक शिक्षा को प्राप्त करने के उदाहरण से समझ सकते हैं; क्योंकि साँसारिक शिक्षा अर्जित नहीं कर पाने के लिए भी, और आत्मिक शिक्षाएँ प्राप्त न कर पाने तथा पवित्र आत्मा से वचन नहीं सीख पाने में यही तीनों कारण समान रीति से लागू होते हैं। आज हम इन तीन में से पहले कारण को देखेंगे।


    मसीही विश्वासी के पवित्र आत्मा से सीख नहीं पाने का पहला कारण है उस के अंदर, दोनों, मात्रा और गुणवत्ता में, परमेश्वर के वचन की घटी होना। हम साँसारिक शिक्षा के अपने अनुभव से यह भली-भाँति जानते हैं कि विद्यार्थी जितना अधिक अपने विषय को पढ़ता और सीखता है, और जितना अधिक वह उन शिक्षाओं को अपने अंदर समावेश कर लेता है, दोनों, मात्रा और गुणवत्ता में, वह अपनी परीक्षाओं में उतना ही बेहतर करने पाता है तथा व्यावाहरिक जीवन में जहाँ भी उन शिक्षाओं की आवश्यकता होती है, उनका अच्छे से उपयोग करने पाता है। यह कर पाने के लिए, विद्यार्थी को अपनी पाठ्य-पुस्तकों को बारंबार पढ़ते रहना होता है, संबंधित प्रश्न-उत्तर के कार्यों को करना होता है, और जो पढ़ा है, उस पर औरों के साथ चर्चा करनी होती है। जितने भी लोग व्यक्तिगत रीति से और यत्न से यह सब नहीं करते हैं, वे कभी भी विषय को सीखने नहीं पाते हैं। एक बार पढ़ लेने से, या कभी-कभी यहाँ-वहाँ से पढ़ लेने से, या केवल शिक्षक द्वारा दिए जाने वाले व्याख्यान को अथवा किसी और के द्वारा पढ़े जाने को सुन लेने भर से कभी भी कोई भी विषय-वस्तु को ठीक से और सच में सीख नहीं सकता है।


    ठीक यही बात परमेश्वर के वचन को सीखने पर भी ऐसे ही लागू होती है। पवित्र आत्मा के द्वारा शिष्यों को सिखाने के बारे में प्रभु यीशु मसीह द्वारा कही गई कुछ बातों पर विचार कीजिए: प्रभु ने यूहन्ना 14:26 में कहा, “...वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।” ध्यान देने योग्य पहली बात है कि पवित्र आत्मा प्रभु के शिष्यों को “सब बातें सिखाएगा”; इसे 2 पतरस 1:3 के साथ मिला कर देखें – जीवन और भक्ति से संबंधित सभी बातें विश्वासियों को पहले ही दे दी गई हैं, और इस से हमारे सामने परमेश्वर पिता के द्वारा अपने बच्चों के सीखने के लिए बनाया गया, हर संभव बात का समावेश करने वाला एक व्यापक पाठ्यक्रम आ जाता है, जिस में इस पृथ्वी पर और उसके बाद भी हमें जो कुछ भी चाहिए, वह सभी तैयार कर के रखा गया है, और जिसे सर्वोत्तम संभव शिक्षक – स्वयं परमेश्वर, हमें सिखाना चाहता है।


    यहाँ पर ध्यान देने योग्य दूसरी बात है कि प्रभु ने कहा कि पवित्र आत्मा “जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा”, अर्थात, पवित्र आत्मा द्वारा सिखाए जाने की विधि होगी, विश्वासी के सामने आने वाली प्रत्येक परिस्थिति, प्रत्येक बात से संबंधित वचन में दी गई प्रभु की बातों का ध्यान करवाना, उन बातों को याद दिलाना, और इसकी पुष्टि प्रभु ने एक बार फिर से यूहन्ना 16:14-15 में भी की। यहाँ पर यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि सम्पूर्ण पवित्र शास्त्र, पुराना नियम भी प्रभु यीशु के बारे में बात करता है (लूका 24:47; यूहन्ना 5:39, 46)। प्रभु यीशु ने अपनी पृथ्वी के सेवकाई के दिनों में, अपनी अन्य शिक्षाओं के अतिरिक्त, उन के बारे में पुराने नियम पवित्र शास्त्र में दी गई बातों को भी अपने शिष्यों को समझाया और सिखाया था (पहाड़ी उपदेश – मत्ती 5-7 में दिए और सिखाए गए सपष्टीकरण; मरकुस 4:34; मरकुस 10:32; लूका 24:44)। इसलिए, पवित्र आत्मा शिष्यों को न केवल वह याद दिलाएगा जो प्रभु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई के दौरान कहा, बल्कि समस्त पवित्र शास्त्र में से लेकर आवश्यकता अनुसार स्मरण करवाएगा। लेकिन इसके लिए, पवित्र आत्मा के लिए विश्वासियों को याद करवाने और सिखाने के लिए, उनके पास आसानी से उपलब्ध हो सकने वाला प्रभु की बातों का एक संग्रह, एक भण्डार होना अनिवार्य है, जिस में से लेकर वह ध्यान या स्मरण करवा सके, और उस बात का व्यावाहरिक उपयोग सिखा सके। सहज रीति से उपलब्ध होने के लिए इस संग्रह या भण्डार को दो स्वरूपों में उपलब्ध होना चाहिए – एक तो भौतिक, बाहरी स्वरूप – परमेश्वर का लिखित वचन – बाइबल, जिसका मूल लेखक पवित्र आत्मा है, जिसकी प्रेरणा और जिस की अगुवाई से ही विभिन्न लेखेकों ने वचन को लिखा है (2 तीमुथियुस 3:16), और हमारे लिए लिखित स्वरूप में उपलब्ध करवाया है; और दूसरा, वह वचन हर समय हमारे मन-मस्तिष्क में उपलब्ध रहना चाहिए (यहोशू 1:8; Job 22:22; भजन 37:31; भजन 40:8; नीतिवचन 2:1)। पवित्र आत्मा ने अपना कार्य पूरा कर दिया है, उसने परमेश्वर के वचन को लिखित रूप में हमें उपलब्ध करवा दिया है; अब विश्वासी को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है – अपने मन-मस्तिष्क में परमेश्वर के वचन को समावेश कर लेना है, भर लेना है, जिस से वह, जब भी आवश्यकता हो, हर परिस्थिति के लिए, हमेशा उसे उपलब्ध रहे। जब परमेश्वर का वचन इन दोनों ही स्वरूपों में विश्वासी के पास उपलब्ध रहता है, तब पवित्र आत्मा हर बात, हर परिस्थिति के लिए, जिस  का भी वह सामना करे, उपयुक्त वचन को स्मरण करवाएगा, जिस से उसे मार्गदर्शन मिले, सामर्थ्य मिले, और वह वचन के द्वारा बुद्धिमान किया जाए।


    जैसे कोई भी विद्यार्थी अपनी साँसारिक पढ़ाई को लापरवाही से और यूँ ही, अपने मन-मस्तिष्क को ठीक से तैयार किए बिना, यहाँ-वहाँ से यदा-कदा पढ़ने के द्वारा सही रीति से नहीं कर सकता है; उसी प्रकार से परमेश्वर के वचन के अध्ययन को भी प्रार्थना के साथ, नियमित, योजनाबद्ध रीति से, क्रमवार, और विचार करते हुए यत्न के साथ पढ़ना चाहिए (भजन 119:4)। जब विश्वासी बारंबार पढ़ने, उस की शिक्षाओं को व्यावाहरिक रीति से अपने जीवन में लागू करने, और उसके बारे में औरों के साथ चर्चा करने के द्वारा अपने मन-मस्तिष्क को वचन से भर लेता है, तब पवित्र आत्मा भी विश्वासी की सहायता करता रहता है कि उस वचन के अर्थ और उपयोगिता को उसे बताए और समझाए, कदम-ब-कदम वचन में परिपक्व होते जाने में सहायता करे। अगले लेख में हम दूसरी बात, अर्थात, परमेश्वर के वचन को पढ़ने और अध्ययन करने के लिए पर्याप्त और उचित समय न लगाना, और सामान्यतः यह तब होता है, जब विश्वासी पवित्र आत्मा के निर्देशों को जानने और मानने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होता है, को देखेंगे; और यह उस बात का जो हमने अभी देखी है, उसे आगे ज़ारी रखना है।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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English Translation

Learning from the Holy Spirit – 2

 

    Every Born-Again Christian Believer is a steward of the provisions God has given him for his Christian living and ministry; and one of the provisions is God the Holy Spirit residing in him since the moment of his salvation. The Holy Spirit has been given to be a Helper and Companion to every child of God, and to teach him God’s Word, and guide him in fulfilling his God assigned ministry. Nowadays, there are many prevalent misconceptions and wrong teachings about the Holy Spirit. Unless one has a clear Biblical understanding of the facts about God the Holy Spirit, he cannot utilize the help, guidance, and power of the Holy Spirit made available to him by God. The main teachings about the Holy Spirit are found in John’s gospel, chapters 14 to 16, in the Lord Jesus’s last discourse with His disciples before being caught and taken for crucifixion. We have been studying from John 14:17 for the past some time about the Holy Spirit, and of late we have been learning about the world not knowing Him, but the disciples of the Lord knowing Him. In this context, since the previous article, we have started on learning about learning God’s Word from the Holy Spirit.


    We have seen that God has given us His Word, not to be a closed and enigmatic book; but to study and learn it. God desires to teach it to us, provided we are willing to learn it from Him and obey His teachings. One of the purposes of God the Holy Spirit is to teach the children of God the Word of God. The pitfall for every Believer is that if they do not diligently learn God’s Word from the Holy Spirit, but take the easy way out and depend upon some person and books to learn, then Satan has good opportunity to bring in wrong teachings, and he makes full use of it to mislead and misguide Believers into wrong teachings, doctrines, and practices. In the last article we had stopped at the three main reasons which prevent the Christian Believer from learning God’s Word from the Holy Spirit. We can understand the importance of these three reasons by taking our secular education as an example; these reasons are equally applicable to not being able to acquire a secular education, as well as not being able to acquire a spiritual education and learning God’s Word from the Holy Spirit. Today we will take up the first of these three reasons.


    The first main reason for a Believer not being able to learn from the Holy Spirit is the deficiency of God’s Word in him, in quantity as well as quality. We know very well from our secular education, the more the student reads and studies his subjects, and the more he assimilates them in quantity and quality, the better he does in his exams and in their practical applications in life where they are required. To do this, the student has to keep reading his textbooks over and over again, completing his assignments, and discussing with others about the topics covered. All those who do not spend time in personally and diligently doing these, will never learn the subject. A single reading, or relying on occasional erratic readings, or merely listening to lectures given by the teacher or someone else reading the lessons, never suffices to actually and adequately learn the subject matter.


    The same holds equally true for learning God’s Word. Ponder over some things that the Lord Jesus said about the Holy Spirit teaching the disciples: in John 14:26, the Lord said “…He will teach you all things, and bring to your remembrance all things that I said to you.” The first thing to note is that the Holy Spirit will teach to the Lord’s disciple “all things”; couple this with 2 Peter 1:3 – all things for life and godliness have already been given to the Believers, and we have an all-encompassing  comprehensive curriculum prepared by God the Father for His children, consisting of everything we will ever need on this earth and beyond, kept ready for their learning, to be taught by the best teacher that ever could be – God Himself.


    The second thing to note here is that the Lord said that  the Holy Spirit will “bring to your remembrance all things that I said to you”; i.e., the main method of the Holy Spirit’s teaching will be by making us recall or remember what the Lord Jesus has said regarding any given situation, for anything that comes our way, as the Lord again affirmed in John 16:14-15. It is important to bear in mind that all of Scriptures, even the Old Testament speak of the Lord Jesus (Luke 24:27; John 5:39, 46)। The Lord Jesus during His earthly ministry, besides His other teachings, also explained things about Him from the Old Testament Scriptures to the disciples (Clarifications given in the Sermon on the Mount – Matthew 5-7; Mark 4:34; Mark 10:32; Luke 24:44). Therefore, the Holy Spirit would not only remind the disciples of what the Lord taught in His earthly Ministry, but, according to the need, He will also remind from all of the Scriptures. But for the Holy Spirit to be able to remind and teach us, there has to be a readily available a ‘stock’, a repository of what the Lord Jesus has said, from which He can bring to our remembrance what we need to learn and apply in any given situation. To be readily referred to, this stock or repository has to be available in two forms – firstly, in a physical, external form – the written Word of God – the Bible, authored by the Holy Spirit through inspiring the various authors who have written it (2 Timothy 3:16), and made available to us in the written form; and secondly, it should at all times also be present in our hearts and minds (Joshua 1:8; Job 22:22; Psalm 37:31; Psalm 40:8; Proverbs 2:1). The Holy Spirit has already done His part, He has given to us the Word of God in a written form; now it is up to us to do our part – assimilate God’s Word in our hearts and minds and always keep it readily available for any occasion, as and when required. When God’s Word is present with us in both forms, then the Holy Spirit will be able to make us recall and remember the Word appropriate for each and everything, every situation that we may face, and thus be guided, be strengthened, and be made wise by that Word.


    Just as no student can properly study for his secular education by randomly and carelessly reading from here and there, off and on, without preparing himself and his mind for the study; similarly, God’s Word too should be read prayerfully, regularly, systematically, sequentially, and pondered over, diligently (Psalm 119:4). As one fills his heart and mind with God’s Word by repeatedly going through it, practically applying its teachings in life, and talking about it with others, the Holy Spirit also helps and guides the Believer in learning the meanings and applications of God’s Word and maturing in it, step by step. In the next article we will take up the second reason, i.e., lack of giving adequate time to read and study God’s Word, and this usually is due to the Believer’s not being committed enough to follow and obey the instructions of the Holy Spirit, which actually is a continuation of what we have just seen.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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