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बुधवार, 31 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 23 - Primary Basis of Faith / विश्वास का प्राथमिक आधार

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प्रभु में विश्वास का प्राथमिक आधार – आश्चर्य कर्म, या परमेश्वर का वचन?


    प्रभु यीशु में हमारे विश्वास का प्राथमिक आधार प्रभु का वचन होना चाहिएन कि उसके नाम में किए गए आश्चर्य कर्म। प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई का आरंभ प्रचार के द्वारा किया थान कि आश्चर्य कर्मों के द्वारा (मरकुस 1:14-15)। जब प्रभु यीशु ने अपने बारह शिष्यों को चुनाउन्हें सामर्थ्य प्रदान की और उन्हें अपने प्रतिनिधि बनाकर उनकी प्रथम सेवकाई के लिए भेजातब प्रभु द्वारा उन्हें दी गई प्राथमिक आज्ञा थी कि वे जा कर प्रचार करें कि स्वर्ग का राज्य निकट हैआश्चर्य कर्म करने के लिए कहना प्रचार के बाद था (मत्ती 10:1, 5-8; मरकुस 3:14-15)। यहाँ पर ध्यान देने के लिए यह महत्वपूर्ण बात है कि जो उन आश्चर्य कर्मों के लिए संदेह करेंगे उनके विरुद्ध कुछ नहीं कहा गया हैपरन्तु जो उस वचन का तिरस्कार करें उनके लिए एक भयानक भविष्य रखा है (मत्ती 10:14-15)। यहाँ पर एक और भी ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात है जिसे प्रभु यीशु ने उस समय के लिए कहा यदि ये शिष्य उनकी सेवकाई के कारण उच्च अधिकारियों के सामने ले जाए जाते। प्रभु ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी परिस्थिति में उनके बचाव के लिएउन्हें पवित्र आत्मा की सामर्थ्य द्वाराबता दिया जाएगा कि क्या ‘कहें’बजाय इसके कि क्या आश्चर्य कर्म ‘करें’ (मत्ती 10:18-20).

    युहन्ना 17 पढ़िएजो प्रभु की वह महायाजकीय प्रार्थना हैजो उन्होंने क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए पकड़े जाने से पहले की थी। इस प्रार्थना में ध्यान कीजिए कि कैसे प्रभु बारंबार उस वचन पर ज़ोर दे रहे हैं जो उन्होंने अपने शिष्यों को दिया थाऔर जिसे उन्हें अपनी सेवकाई के दौरान औरों को पहुंचाना था। प्रभु के स्वर्गारोहण से ठीक पहलेजो महान आज्ञा प्रभु ने अपने शिष्यों को दीवह थी कि वे जा कर उस वचन का प्रचार करें जिसे प्रभु ने उन्हें सौंपा था (मत्ती 28:18-20; प्रेरितों 1:8)। प्रथम कलीसिया का जन्म, जो हम प्रेरितों 2 में देखते हैं, पतरस द्वारा किए गए प्रचार से हुआ था न कि किसी आश्चर्य’ कर्म के द्वारा – ‘अन्य भाषाएं’ बोलने के चमत्कार ने तो लोगों में असमंजस और उपहास उत्पन्न कियाविश्वास नहींकिन्तु वचन के प्रचार के द्वारा पश्चाताप, विश्वास, और उद्धार आया। हम देखते हैं कि बाद मेंजो मसीही विश्वासी सताव के कारण यरूशलेम से खदेड़े गएवे भी वचन का प्रचार करते हुए गए (प्रेरितों 8:1-4)। पौलुस ने तिमुथियुस को बल देकर कहा कि परमेश्वर के वचन को सही रीति से और ठीक-ठीक सिखाया जाना चाहिए (2 तिमुथियुस 2:2, 15) क्योंकि वचन ही है जो विश्वास के द्वारा उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है (2 तिमुथियुस 3:14-17)

    प्रभु यीशु मसीह वचन हैंवह वचन जो परमेश्वर के साथ हैवह वचन जो परमेश्वर हैवह वचन जिसने देहधारी होकर हमारे बीच में डेरा किया (यूहन्ना 1:1, 14) – वहजो जीवित वचन है, वही जो मसीही विश्वास का विषय और आधार है। आश्चर्य कर्म विश्वास का आधार नहीं हैंवरन जो वचन या सुसमाचार लोगों को सुनाया जाता है उसकी पुष्टि करने के चिन्ह हैं (मरकुस 16:15-20); सदा से ही परमेश्वर का वचन ही मसीही विश्वास का आधार रहा है। इसीलिए शैतान हमें सदा ही परमेश्वर के वचन से दूर ले जाने का प्रयास करता हैऔर ऐसा करने के लिए आश्चर्य कर्म और अद्भुत चिन्हों को विश्वास का आधार बनाना उसके धोखे और बहकावे के कार्यों में बहुत सहायक होते हैं। लोगपरमेश्वर के वचन के अध्ययन और आज्ञाकारिता में संलग्न होने के स्थान परऐसी लालसाओं में पड़ जाते हैं कि वे भी आश्चर्य कर्म करने वाले हो जाएं, या आश्चर्य कर्मों के द्वारा उन्हें कुछ लाभ मिल जाएया आश्चर्य कर्म करने वाले कहलाए जाने के द्वारा उनका नाम और ख्याति हो जाए, आदि।

    आश्चर्य कर्म तो शैतान, उसके दूत, और उसका अनुसरण करने वाले भी कर सकते हैं (निर्गमन 7:11-12, 22; 8:7; प्रेरितों 16:16-18; 2 थिस्सलुनीकियों 2:9-10; प्रकाशितवाक्य 13:11-15), और यदि व्यक्ति परमेश्वर के वचन – “सत्य में दृढ़ता से स्थापित न होतो शैतान के धोखों और अद्भुत चिन्हों द्वारा बहकाए जाने के द्वारा उन के विनाश में जाने का खतरा बना रहता हैउसी विनाश में जिसमें इस प्रकार के चिन्ह और अद्भुत कार्य करने वाले अंततः जाएंगे (प्रकाशितवाक्य 19:20; 20:10).

    इसलिए हमारे लिए यह सुनिश्चित कर लेना अनिवार्य है कि परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह में हमारा विश्वास किसी चिन्ह अथवा आश्चर्य कर्म आदि पर आधारित नहीं है वरन परमेश्वर के वचन – जो अचूक और दोषरहित है, पर विश्वास लाने और भरोसा रखने पर आधारित है। हमें परमेश्वर के वचन बाइबल  को प्रार्थना सहित पढ़ने और उस पर मनन करने में समय बिताना चाहिए,और उसमें होकर परमेश्वर से मार्गदर्शन के खोजी होना चाहिए (1 शमुएल 3:21; भजन 119:105)। परमेश्वर के वचन में दृढ़ और स्थापित होना ही शैतान के द्वारा बहकाए जाने से बचे रहने का अचूक उपाय है – इसके लिए कुलुस्सियों 2 पर भी मनन करें।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

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Primary Basis of Belief in the Lord – Miracles or God’s Word?


    The primary basis of our belief in the Lord Jesus ought to be His Word, not miracles done in His name. The Lord Jesus started His ministry with preaching, not miracles (Mark 1:14-15). When the Lord Jesus chose twelve of His disciples, empowered them and sent them out on their first mission as His emissaries, the Lord’s primary instruction to them was to go and preach that the Kingdom of heaven is at hand; to perform miracles was the secondary instruction (Matthew 10:1, 5-8; Mark 3:14-15). Here it is also important to note that although nothing is said against those who would be skeptical about the miracles, but those who rejected the Word had a terrible fate awaiting them (Matthew 10:14-15). Another important thing to note here is what the Lord said to those disciples in the event of their being brought before high ranking officials because of their ministry for the Lord Jesus. The Lord assured them that for their defense in such a situation, through the power of the Holy Spirit, they will told what to ‘say’, rather than being given a miracle to ‘do’ (Matthew 10:18-20).

    Read John 17, the High Priestly prayer of the Lord, which He prayed before His being taken captive for crucifixion. See in this prayer how He repeatedly emphasizes upon the Word that He gave to His disciples, which they were to pass on to others in their ministry. At the time of His ascension to heaven, The Great Commission that the Lord gave to His disciples, was to go and preach the Word He had given them (Matthew 28:18-20; Acts 1:8). The first Church was born by the preaching of Peter in Acts 2, not by any miracles – the miracle of ‘tongues’ brought consternation amongst those present and witnessing the miracle, not faith; it was the preaching of the Word that brought repentance, faith and salvation. We see later, that those Christian Believers who were being persecuted and chased out of Jerusalem, went out preaching the Word (Acts 8:1-4). Paul emphasizes to Timothy that it is the Word of God that is to be judiciously taught (2 Timothy 2:2, 15) for it is the Word that is able to make wise for salvation through faith (2 Timothy 3:14-17).

    The Lord Jesus is the Word; the Word with God; the Word was God; the Word that became flesh and dwelt amongst us (John 1:1, 14) – He, the Living Word is the object and basis of the Christian faith. Miracles are not the basis of faith, rather they are meant to be signs to affirm the Word or Gospel that is preached to the people (Mark 16:15-20); it is the Word of God that has always been the basis of the Christian faith. Therefore Satan always tries to draw us away from God’s Word, and to this end using miraculous signs and wonders as the basis of faith serve his purpose to beguile and deceive quite well. People, instead of being involved in studying God’s Word and being obedient to the word, get caught up either in the desire to be those who perform miracles, or in the expectations of being benefited through miracles, or to gain a name and fame through performing miracles.

    Even Satan, his angels, and his followers can perform miracles (Exodus 7:11-12, 22; 8:7; Acts 16:16-18; 2 Thessalonians 2:9-10; Revelations 13:11-15), and unless one is firmly established in the Word of God – “the Truth”, people are prone to get carried away to their destruction by these satanic deceptions and lying wonders, just as those who perform these deceiving signs and wonders will eventually perish (Revelation 19:20; 20:10).

    Therefore it is essential to see that the basis of our belief and faith in God and Lord Jesus is not on the basis of any signs and miracles etc. but through believing and trusting in His Word – which is infallible and inerrant. We need to spend time prayerfully reading, and meditating upon the Word of God – the Bible, and seeking the Lord’s guidance through it (1 Samuel 3:21; Psalms 119:105). Being established in God’s Word is our only sure-shot safety and security against being deceived by Satan – ponder over Colossians 2 for this.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

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मंगलवार, 30 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 22d - Bible & Other Ancient Religious Writings / बाइबल और अन्य प्राचीन धार्मिक लेख - (4)

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अन्य प्राचीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के धार्मिक लेखों की तुलना में बाइबल - भाग - 4

बाइबल अपने आप में अनुपम हैयह संसार के कैसे भी, कहीं के भी, कभी के भी, किसी के भी द्वारा लिखे गए धार्मिकता संबंधी लेखों से बिलकुल भिन्न और अतुल्य है; क्योंकि यह ऐसी पुस्तक नहीं है जिसे ज्ञान के लिए पढ़ा जाता है, वरन यह परमेश्वर का जीवित वचन है जो अपने पाठक के जीवन को पढ़ता है और उसके जीवन को उसके सामने अन्दर-बाहर संपूर्णतः खोल कर रख देता है। यह किसी धर्म से संबंधित पुस्तक नहीं है, वरन यह पापों से पश्चाताप और प्रभु यीशु में विश्वास करने तथा यह स्वीकार कर लेने से संबंधित है कि प्रभु यीशु ने अनंत उद्धार का एकमात्र संभव मार्ग एक ही बार में सदा के लिए उपलब्ध करवा दिया है। बाइबल ऐसे अनेकों व्यक्तित्वों के बारे में नहीं है जिन्हें यद्यपि ईश्वरीय गुणों वाला माना जाता है फिर भी जिनमें बताया गया है कि उन में परस्पर अहंकार से संबंधित तथा भावनात्मक समस्याएँ हैं, जिनमें परस्पर एक-दूसरे पर वर्चस्व और सामर्थ्य प्रमाणित करने की स्पर्धा देखी जाती है, जो मनुष्यों से उपासना पाने की होड़ में रहते हैं, जो मादक पेय और पदार्थों का सेवन करते हैं, तथा कामुक भावनाएं जागृत करने वाली गतिविधियों में आनन्द लेते हैं – अर्थात वे सभी बातें पाई जाती हैं जिन्हें मनुष्यों को करने के लिए मना किया जाता है जिससे मनुष्य धर्मी और भला बन सके। और इन ईश्वरीय गुणों वाले व्यक्तित्वों द्वारा मनुष्यों के पवित्र हो जाने के लिए निर्धारित धर्म के कामों, रीतियों, अनुष्ठानों, तपस्याओं आदि के करने पर भी ये व्यक्तित्व कभी यह देखने को तैयार नहीं होते हैं कि कोई भी मनुष्य किसी प्रकार से उनके समान या उनके स्तर तक पहुँच सके। यदि कोई मनुष्य कभी अपने किसी प्रयास से उनके स्तर के निकट पहुँचने लगता है तो तुरंत ही षड्यंत्र बनाए और कार्यान्वित किए जाते हैं जिससे वह मनुष्य किसी प्रकार से पाप में गिरकर फिर से नाशमान अस्तित्व में पहुँच जाए। वरन, बाइबल उस एकमात्र सच्चे और सिद्ध पवित्र परमेश्वर के बारे में है जो बुराई के साथ रहना या समझौता करना तो बहुत दूर की बात है, उसे देख भी नहीं सकता है, “तेरी आंखें ऐसी शुद्ध हैं कि तू बुराई को देख ही नहीं सकताऔर उत्पात को देखकर चुप नहीं रह सकताफिर तू विश्वासघातियों को क्यों देखता रहताऔर जब दुष्ट निर्दोष को निगल जाता हैतब तू क्यों चुप रहता है?” (हबक्कूक 1:13)। परन्तु फिर भी वह पतित मानव जाति से इतना प्रेम करता है कि उसे बचा कर पुनः उसी सिद्ध स्वरूप में, जिसमें उसने मनुष्य को रचा था, लाना चाहता है, “फिर परमेश्वर ने कहाहम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएंऔर वे समुद्र की मछलियोंऔर आकाश के पक्षियोंऔर घरेलू पशुओंऔर सारी पृथ्वी परऔर सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैंअधिकार रखें। तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न कियाअपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न कियानर और नारी कर के उसने मनुष्यों की सृष्टि की। और परमेश्वर ने उन को आशीष दी: और उन से कहाफूलो-फलोऔर पृथ्वी में भर जाओऔर उसको अपने वश में कर लोऔर समुद्र की मछलियोंतथा आकाश के पक्षियोंऔर पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो” (उत्पत्ति 1: 26-28); “परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता हैजिस प्रकार दर्पण मेंतो प्रभु के द्वारा जो आत्मा हैहम उसी तेजस्‍वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18), और उसके लिए प्रावधान भी कर दिया है। यह वह पुस्तक है जो प्रोत्साहित करती है कि सारे संसार में जाकर मानव जाति के हित के सुसमाचार को सभी को बताया जाए, न कि मनुष्यों के लिए लाभकारी बातों को अपने तक सीमित कर के, छुपा कर रखा जाए, जिससे कि उनसे फिर लोगों से लाभ उठाया जाए या शोषण किया जाए।

बाइबल इस लिए भी संसार की किसी भी पुस्तक या लेख से अनुपम तथा अतुल्य है क्योंकि यह:
·         मनुष्य द्वारा अपने लिए अर्जित किए गए नाशमान लाभ के बारे में नहींवरन उस अनन्त जीवन तथा स्वर्गीय आशीषों के बारे में है जिन्हें परमेश्वर ने अपने प्रेम और अनुग्रह में मानव जाति को बिना किसी कीमत के प्रदान करना प्रस्तावित किया है।
·         लोगों को वर्गों और जातियों में बाँट कर उन्हें विभाजित कर के पृथक रखने के बारे में नहीं, वरन सभी लोगों को उद्धार तथा नया जन्म पाए हुए परमेश्वर की एक समान संतान बनाकर परमेश्वर के परिवार में एक करके जोड़ देने के बारे में है।
·         सांसारिक साम्राज्यों को स्थापित करने तथा औरों पर प्रभुता करने के बारे में नहीं, वरन प्रभु यीशु के समान नम्रता और प्रेम के साथ औरों की सहायता और सेवा करने के बारे में है।
·         संघर्षों और युद्धों को जीतने के बारे में नहीं, वरन दिलों को जीतने तथा लोगों के हृदयों में परमेश्वर के सिंहासन को लगाने के बारे में है।
·         नाश्मान वस्तुओं के ज्ञान को प्राप्त करने और उनमें उन्नत होने के बारे में नहींवरन उद्धार पाने – परमेश्वर के प्रेम और अनुग्रह से एक ही बार सदा काल के लिए पाप के दुष्परिणाम से बचाए जाने के बारे में है;
·         क्योंकि यह सृजी गई वस्तुओं के बारे में नहींवरन सृजनहार प्रभु परमेश्वर के बारे में है जो मानवजाति को बचाने के लिए मनुष्य बन गया;
·         पापियों का नाश करने के बारे में नहींवरन उनसे प्रेम करने और उन्हें एक ही बार में अनन्तकाल के लिए बचा लेने के बारे में है।

इसलिए, बाइबल की तुलना संसार के किसी भी अन्य लेख से कर के बाइबल को गौण दिखाने का प्रयास करना ऐसे है जैसे रॉकेट विज्ञान पर एक उच्च प्रशंसा एवं मान्यता प्राप्त पाठ्य-पुस्तक को लेकर उसका इसलिए तिरस्कार कर के उसे एक ओर रख दिया जाएक्योंकि उस पुस्तक में वर्णमाला के “क, ख, ग, घ...’ और बच्चों की कविताओं के सीखने के बारे में कुछ नहीं लिखा गया है  बाइबल को लेकर ऐसा कोई भी विश्लेषण करने, कोई भी ऐसी तुलना करने या इस प्रकार का कोई भी निष्कर्ष निकालने के लिए कोई आधार है ही नहीं, कदापि नहीं।

संसार का कोई भी ज्ञान, कोई भी लेख, कभी बाइबल के कहीं भी निकट नहीं पहुँच सकता है क्योंकि बाइबल ही एक मात्र स्वर्ग की पुस्तक है, जो पृथ्वी के मनुष्यों को उनके छुटकारे के लिए प्रदान की गई है।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

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The Bible, in Comparison to the Religious Writings of Other Ancient Civilizations & Cultures - Part - 4

The Bible is unique, is different and incomparable in any manner to any religious writings of any people, anywhere in the world, ever; since it is not a book to be read for knowledge, rather it is the Living Word of God that reads and lays bare the life of the reader, through and through. It is not a book of religion, but of repentance from sins and faith in the Lord Jesus, of accepting and believing that He has provided once and for all the only possible way to eternal salvation. The Bible is not about the activities and behavior of a myriad of personalities to whom though divinity has been ascribed, but yet it is stated that they go around mutually having ego related and emotional issues, seeking and plotting superiority and power over each other, vying with each other for receiving human worship, being involved in the use of intoxicating and inebriating substances and drinks, and in lustful activities – i.e. all the things that human beings are asked not to be involved in so that they can be righteous and good, are found in them. And despite all the religious works, rites, rituals, penances etc. prescribed for humans by these divine personalities to attain holiness, they are not in the least ready to see that any human ever attains to their level and stature. If perchance anyone through their efforts comes anywhere near reaching near to them, conspiracies are hatched and executed to ensure their downfall into sin and mortal existence. Rather, The Bible is about the one true and perfectly Holy God that cannot even see evil “You are of purer eyes than to behold evil, And cannot look on wickedness. Why do You look on those who deal treacherously, And hold Your tongue when the wicked devours A person more righteous than he?” (Habakkuk 1:13), let alone live with it or compromise with it. But He loves the fallen humanity so much that He wants to redeem them and restore them into His image, the image that He had created them in, “Then God said, "Let Us make man in Our image, according to Our likeness; let them have dominion over the fish of the sea, over the birds of the air, and over the cattle, over all the earth and over every creeping thing that creeps on the earth." So God created man in His own image; in the image of God He created him; male and female He created them. Then God blessed them, and God said to them, "Be fruitful and multiply; fill the earth and subdue it; have dominion over the fish of the sea, over the birds of the air, and over every living thing that moves on the earth."” (Genesis 1:26-28); “But we all, with unveiled face, beholding as in a mirror the glory of the Lord, are being transformed into the same image from glory to glory, just as by the Spirit of the Lord”; 2 Corinthians 3:18), and has provided the way for this to be done. It is the book that exhorts to go out into the whole world to spread the good news for the benefit of mankind at every place, rather than being possessive, secretive and exploitative about things beneficial for mankind.

The Bible is also incomparable to any other text or writing anywhere in the world since it not about:
·         the temporal and perishing gains that man accrues for himself, but about the eternal life and heavenly blessings that God in His love and grace has freely offered to mankind.
·         dividing and keeping the people apart by segregating them into classes and castes, but it is about uniting all people as one, as the equal, saved and Born Again children of God into God’s family.
·         establishing worldly kingdoms and dominating others, but about the heavenly kingdom of God and reaching out to help and serve others in humility and love like the Lord Jesus.
·         winning strifes and wars, but about winning hearts and establishing God’s throne in the hearts of people.
·         gaining and excelling in knowledge about temporal things, but about receiving salvation – being saved by the love and grace of God once and for all from sin and its consequences for all eternity;
·         the created things, but about the very Creator Lord God who became man to save mankind;
·         destroying the sinners, but about loving and saving them for eternity once and for all.

So, looking down upon the Bible through trying to compare it to any other writings of the world is like taking up a highly acclaimed textbook on Rocket Science and then rejecting it, putting it away, simply because it says nothing about learning the alphabets and nursery rhymes – there simply are no grounds, none whatsoever, for any such analysis, comparisons or for drawing any such conclusions related to the Bible.

No knowledge, no writing of earth can ever attain to it, since The Bible is the one and only Book of Heaven, given for the deliverance of people of the earth.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

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सोमवार, 29 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 22c - Bible & Other Ancient Religious Writings / बाइबल और अन्य प्राचीन धार्मिक लेख - (3)

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अन्य प्राचीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के धार्मिक लेखों की तुलना में बाइबल - भाग - 3

पृथ्वी पर के मनुष्य के जीवन का अंत होने के साथ ही, उनके अनंतकाल से संबंधित उनके द्वारा पृथ्वी के जीवन काल में लिए गए निर्णय लागू हो जाते हैं और अब वे अपरिवर्तनीय हैं। जिन्होंने प्रभु यीशु को और उनके द्वारा दिए जा रहे पापों की क्षमा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया हैऔर उसके अनुसार अपने पापों से पश्चाताप कर लिया हैउससे अपने पापों की क्षमा मांग ली हैअपने जीवन उसे समर्पित कर दिए हैंऔर उसकी तथा उसके वचन – बाइबल की आज्ञाकारिता में जीने का निर्णय ले लिया है, “तब सुनने वालों के हृदय छिद गएऔर वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगेकि हे भाइयोंहम क्या करेंपतरस ने उन से कहामन फिराओऔर तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लेतो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे। क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुमऔर तुम्हारी सन्‍तानोंऔर उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा। उसने बहुत और बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ। सो जिन्हों ने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लियाऔर उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गए। और वे प्रेरितों से शिक्षा पानेऔर संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे (प्रेरितों 2:37-42), वेपरमेश्वर की संतान होने के नाते से “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण कियाउसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दियाअर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लोहू सेन शरीर की इच्छा सेन मनुष्य की इच्छा सेपरन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं (यूहन्ना 1:12-13), अपने पिता के पास उसके निवास-स्थान – स्वर्ग में रहने के लिए जाएंगे (कृपया रोमियों अध्याय 5 पढ़िए)। जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह को और उसके साथ अनन्त जीवन स्वर्ग में व्यतीत करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हैपृथ्वी पर उनके द्वारा किए गए उनके इस निर्णय के अनुसारउन्हें फिर अनंतकाल के लिएपरमेश्वर की उपस्थिति से बाहर नरक भेज दिया जाएगा – जो कि शैतान और उसके दूतों का स्थान है: “तब वह बाईं ओर वालों से कहेगाहे श्रापित लोगोमेरे साम्हने से उस अनन्त आग में चले जाओजो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है” (मत्ती 25:41  आयतें 31 से 46 देखिए)

इस तथ्य से कदापि मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि, जैसा उस का दावा है, केवल बाइबल ही एक मात्र परमेश्वर का वचन है जिसके इस दावे की पुष्टि के लिए संसार के प्राचीन लेखों से, जिनमें गैर-मसीही लेख तथा वर्णन भी हैं, ऐतिहासिक प्रमाणों, और पुरातत्व विज्ञान से भी अटल और अकाट्य प्रमाण विद्यमान हैं। स्वयं बाइबल भी अपने विषय यही कहती है:
2 शमूएल 23:1-2 दाऊद के अन्तिम वचन ये हैं: यिशै के पुत्र की यह वाणी हैउस पुरुष की वाणी है जो ऊंचे पर खड़ा किया गयाऔर याकूब के परमेश्वर का अभिषिक्तऔर इस्राएल का मधुर भजन गाने वाला है: यहोवा का आत्मा मुझ में हो कर बोलाऔर उसी का वचन मेरे मुंह में आया।
2 तीमुथियुस 3:15-17 और बालकपन से पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ हैजो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है। हर एक पवित्रशास्‍त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेशऔर समझानेऔर सुधारनेऔर धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बनेऔर हर एक भले काम के लिये तत्‍पर हो जाए।
पतरस 1:21 क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जा कर परमेश्वर की ओर से बोलते थे

केवल बाइबल ही वह एकमात्र पूर्णतः दोषरहितअचूक एवं अटलअनन्तकालीनअपरिवर्तनीयपरमसिद्धपरमेश्वर का वचन है, “तेरा सारा वचन सत्य ही हैऔर तेरा एक एक धर्ममय नियम सदा काल तक अटल है” (भजन 119:160) जो सदा काल के लिए स्वर्ग में स्थापित है, “हे यहोवातेरा वचनआकाश में सदा तक स्थिर रहता है” (भजन 119:89) – इसलिए वह किसी के भी द्वारा कभी भी न तो बदला जा सकता है और न ही कभी नष्ट किया जा सकता हैकिसी भी प्रकार से नहींकोई चाहे कुछ भी कहता रहे या कैसे भी दावे करता रहे। बाइबल प्रभु यीशु का लिखित प्रगटीकरण हैजो कि बाइबल की विषय-वस्तु और अंतर्वस्तु हैं, और इसीलिए बाइबल को ‘जीवित वचन’ भी कहा जाता है: “आदि में वचन थाऔर वचन परमेश्वर के साथ थाऔर वचन परमेश्वर था। यही आदि में परमेश्वर के साथ था। सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ हैउस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई। उस में जीवन थाऔर वह जीवन मुनष्यों की ज्योति थी” (यूहन्ना 1:1-4)। केवल प्रभु यीशु ही एक मात्र हैं जो परमेश्वर होते हुए भी, अपने आप को शून्य करके मानव जाति के उद्धार के लिए संसार में देहधारी हो कर आए, और एक सामान्य मनुष्य के समान जीवन बिताया तथा दुःख उठाएवरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दियाऔर दास का स्‍वरूप धारण कियाऔर मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन कियाऔर यहां तक आज्ञाकारी रहाकि मृत्युहांक्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:7-8); परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण कियाउसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दियाअर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लोहू सेन शरीर की इच्छा सेन मनुष्य की इच्छा सेपरन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। और वचन देहधारी हुआऔर अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा कियाऔर हम ने उस की ऐसी महिमा देखीजैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:12-14); “सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक हैजो स्‍वर्गों से हो कर गया हैअर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशुतो आओहम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहे। क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहींजो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सकेवरन वह सब बातों में हमारी समान परखा तो गयातौभी निष्‍पाप निकला। इसलिये आओहम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्‍धकर चलेंकि हम पर दया होऔर वह अनुग्रह पाएंजो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे” (इब्रानियों 4: 14-16)। क्योंकि परमेश्वर में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता हैउसे कभी भी किसी भी प्रकार से बदला, या झूठा अथवा कपटी, या नष्ट नहीं किया जा सकता है इसी लिए उसके लिखित प्रगटीकरण बाइबल को भी कभी भी, किसी के भी द्वाराबदला, या झूठा अथवा दोगला, या नष्ट नहीं किया जा सकता है।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।
- क्रमशः
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The Bible, in Comparison to the Religious Writings of Other Ancient Civilizations & Cultures - Part - 3

Once men's life on earth comes to an end, their individual decisions for their eternity immediately come in to effect and they now are irrevocable. Those who have accepted the Lord Jesus and His offer of forgiveness of sins, and accordingly have repented of their sins, having asked forgiveness of their sins from Him, have submitted their lives to Him, to live in obedience to Him and His Word – the Bible Now when they heard this, they were cut to the heart, and said to Peter and the rest of the apostles, "Men and brethren, what shall we do?" Then Peter said to them, "Repent, and let every one of you be baptized in the name of Jesus Christ for the remission of sins; and you shall receive the gift of the Holy Spirit. For the promise is to you and to your children, and to all who are afar off, as many as the Lord our God will call." And with many other words he testified and exhorted them, saying, "Be saved from this perverse generation." Then those who gladly received his word were baptized; and that day about three thousand souls were added to them. And they continued steadfastly in the apostles' doctrine and fellowship, in the breaking of bread, and in prayers” (Acts 2:37-42), they will, as the children of God But as many as received Him, to them He gave the right to become children of God, to those who believe in His name: who were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God” (John 1:12-13), go to be with their Father God in His abode – Heaven (please read Romans chpt. 5). Those who have rejected the Lord Jesus Christ and His offer of eternal life with Him in heaven, will, as per their choice and decision made on earth, be sent away for all eternity, from the presence of God into hell – the place of the devil and his angels: “Then He will also say to those on the left hand, 'Depart from Me, you cursed, into the everlasting fire prepared for the devil and his angels” (Matthew 25:41 – see verses 31 to 46).

There is no escaping the fact that, as it claims to be, The Bible is the one and only Word of God, that has irrefutable ancient textual, even from non-Christian texts and records, historical accounts and archeological proofs to back its claims. The Bible too states this for itself:
2 Samuel 23:1-2 Now these are the last words of David. Thus says David the son of Jesse; Thus says the man raised up on high, The anointed of the God of Jacob, And the sweet psalmist of Israel: "The Spirit of the Lord spoke by me, And His word was on my tongue.
2 Timothy 3:15-17 and that from childhood you have known the Holy Scriptures, which are able to make you wise for salvation through faith which is in Christ Jesus. All Scripture is given by inspiration of God, and is profitable for doctrine, for reproof, for correction, for instruction in righteousness, that the man of God may be complete, thoroughly equipped for every good work.
2 Peter 1:21 for prophecy never came by the will of man, but holy men of God spoke as they were moved by the Holy Spirit.

The Bible is the one and only inerrant, infallible, eternal, irrevocable, absolute, Word of God, “The entirety of Your word is truth, And every one of Your righteous judgments endures forever” (Psalms 119:160) that is settled in heaven for all times, “Forever, O Lord, Your word is settled in heaven” (Psalms 119:89) – therefore it can never ever be altered or destroyed by any one, through any means, no matter what any one might say or claim. The Bible is the written revelation of the Lord Jesus Christ, who is the theme and content of the Bible and therefore the Bible is also known as the ‘Living Word’: “In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God. He was in the beginning with God. All things were made through Him, and without Him nothing was made that was made. In Him was life, and the life was the light of men” (John 1:1-4). Lord Jesus is the one and only God who made Himself of no reputation and came to earth in the flesh, lived and suffered as any other common man of earth, all for the salvation of the whole of mankind: but made Himself of no reputation, taking the form of a bondservant, and coming in the likeness of men. And being found in appearance as a man, He humbled Himself and became obedient to the point of death, even the death of the cross” (Philippians 2:7-8); But as many as received Him, to them He gave the right to become children of God, to those who believe in His name: who were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God. And the Word became flesh and dwelt among us, and we beheld His glory, the glory as of the only begotten of the Father, full of grace and truth.” (John 1:12-14); “Seeing then that we have a great High Priest who has passed through the heavens, Jesus the Son of God, let us hold fast our confession. For we do not have a High Priest who cannot sympathize with our weaknesses, but was in all points tempted as we are, yet without sin. Let us therefore come boldly to the throne of grace, that we may obtain mercy and find grace to help in time of need” (Hebrews 4: 14-16). Since God can never change, never in any way be altered by any onenor be falsified or made a liarnor be destroyed, therefore neither can His written revelation the Bible ever be changed, be altered, falsified or made hypocritical, or be destroyed by anyone.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.
- To Be Continued
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रविवार, 28 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 22b - Bible & Other Ancient Religious Writings / बाइबल और अन्य प्राचीन धार्मिक लेख - (2)

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अन्य प्राचीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के धार्मिक लेखों की तुलना में बाइबल - भाग - 2

बाइबल के आरंभ से लेकर अंत तक, उसकी विषय-वस्तु और अंतर्वस्तु प्रभु यीशु मसीहऔर केवल उन ही के द्वारा प्रदान की जा सकने वाले पापों से मुक्ति और उद्धार ही हैं, “और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहींक्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गयाजिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों 4:12)। यह विषय-वस्तुअर्थात, प्रभु यीशुउनका जीवनउनके गुण और चरित्रउनके कार्य और सेवकाईउनसे मिलने वाला उद्धार आदि, सभी को प्रभु यीशु मसीह के पृथ्वी पर जन्म लेने से सदियों पूर्व बाइबल के पुराने नियम खंड में विभिन्न प्रकार से बतायासिखाया, और उदहारणों द्वारा दर्ज किया गया है; विभिन्न शिक्षाओंनियमोंघटनाओंव्यवहारोंकुछ ऐतिहासिक लोगों के जीवनों और उनके लेखोंतथा अनेकों परिस्थितियों में मनुष्यों के साथ परमेश्वर के व्यवहारइत्यादि के द्वारा। इस बात को स्वयं प्रभु यीशु मसीह और बाइबल के अन्य लेखकों ने कहा है, और बारंबार इसकी पुष्टि की हैजैसा कि बाइबल के कुछ निम्नलिखित संबंधित हवालों से प्रकट है:
यूहन्ना 5:39 तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते होक्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता हैऔर यह वही हैजो मेरी गवाही देता है।
यूहन्ना 5:46 क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करतेतो मेरी भी प्रतीति करतेइसलिये कि उसने मेरे विषय में लिखा है।
यूहन्ना 12:41 यशायाह ने ये बातें इसलिये कहींकि उसने उस की महिमा देखीऔर उसने उसके विषय में बातें कीं।
लूका 24:27 तब उसने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरंभ कर के सारे पवित्र शास्‍त्रों में सेअपने विषय में की बातों का अर्थउन्हें समझा दिया।
1 कुरिन्थियों 15:1-4 हे भाइयोंमैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूं जो पहिले सुना चुका हूंजिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिस में तुम स्थिर भी हो। उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता हैयदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते होनहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दीजो मुझे पहुंची थीकि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया। और गाड़ा गयाऔर पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।
इब्रानियों 10:7 तब मैं ने कहादेखमैं आ गया हूं, (पवित्र शास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूं।

बाइबल का नया नियम खण्ड चार वृतांतों के साथ आरंभ होता है, जो प्रभु यीशु मसीह के पृथ्वी के जीवनतथा उन के द्वारा सम्पूर्ण मानव जाति, समस्त संसार के सभी लोगों के लिए उद्धार का मार्ग बनाने और उपलब्ध करवाने के बारे में हैं। यह उद्धार जो उन्होंने सभी के लिए मुफ्त में उपलब्ध करवाया है, उसे अब प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के लिए स्वेच्छा से अपनाना तथा कार्यान्वित करना हैबिना कोई भी कीमत चुकाएबिना किन्ही कर्मों या अनुष्ठानों के: “और उसने तुम्हें भी जिलायाजो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे। जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति परऔर आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थेजो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है। इन में हम भी सब के सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थेऔर शरीरऔर मन की मनसाएं पूरी करते थेऔर और लोगों के समान स्‍वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे। परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी हैअपने उस बड़े प्रेम के कारणजिस से उसने हम से प्रेम किया। जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थेतो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।) और मसीह यीशु में उसके साथ उठायाऔर स्‍वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर हैआने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए। क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ हैऔर यह तुम्हारी ओर से नहींवरन परमेश्वर का दान है। और न कर्मों के कारणऐसा न हो कि कोई घमण्‍ड करे (इफिसियों 2:1-9)। और प्रभु यीशु द्वारा इस प्रकार से उपलब्ध करवाई गई पापों की क्षमा के द्वारा उस व्यक्ति का परमेश्वर के साथ मेल होता है: “कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करेकि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलायातो तू निश्चय उद्धार पाएगा। क्योंकि धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता हैऔर उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है। क्योंकि पवित्र शास्त्र यह कहता है कि जो कोई उस पर विश्वास करेगावह लज्जित न होगा।; “क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे? (रोमियों 10:9-11; रोमियों 5:10)। 

नया नियमप्रभु यीशु मसीह के जीवन के बारे में लिखे गए लेखों के बाद फिर आगेप्रभु यीशु के कुछ अनुयायियों द्वारा लिखे गए अन्य लेखों के माध्यम से प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों – जो कि सामूहिक रूप में प्रभु का चर्च, उसके बुलाए हुए कहलाते हैं, की आरंभिक गतिविधियों के इतिहास, घटनाओंवृद्धिकार्यों, और दायित्वों का वर्णन प्रदान करता है। और अंत में बाइबल तथा नए नियम का समापन होता है प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के साथ – जो संसार के अंत समय की भविष्यवाणियों का लेख हैउन अंत के दिनों का जिन में आज हम जी रहे हैंजैसा कि हमारी आँखों के सामने पूरी हो रही विभिन्न अंत-समय की भविष्यवाणियों से प्रगट है (इनका एक विवरण मत्ती के 24 अध्याय में पढ़िए)। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में विस्तृत वर्णन है सारे संसार और उसमें जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य के होने वाले अवश्यंभावी न्याय काऔर उसके बाद के अनन्त जीवन का  वह चाहे स्वर्ग में परमेश्वर के साथ होया बिना परमेश्वर के नरक में हो – यह प्रत्येक मनुष्य द्वारा इस पृथ्वी पर अपने लिए किए गए उस चुनाव के अनुसार होगाजो निर्णय उन्होंने प्रभु यीशु मसीह और उसके द्वारा प्रदान किए जा रहे उद्धार की जानकारी मिलने पर लिया था, और जिसके साथ उन्होंने पृथ्वी का अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत किया था, अपने इस निर्णय को सुधारने के सभी अवसरों के प्रदान किए जाने के बावजूद: “फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उसको जो उस पर बैठा हुआ हैदेखाजिस के साम्हने से पृथ्वी और आकाश भाग गएऔर उन के लिये जगह न मिली। फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखाऔर पुस्‍तकें खोली गईऔर फिर एक और पुस्‍तक खोली गईऔर फिर एक और पुस्‍तक खोली गईअर्थात जीवन की पुस्‍तकऔर जैसे उन पुस्‍तकों में लिखा हुआ थाउन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया। और समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उस में थे दे दियाऔर मृत्यु और अधोलोक ने उन मरे हुओं को जो उन में थे दे दियाऔर उन में से हर एक के कामों के अनुसार उन का न्याय किया गया। और मृत्यु और अधोलोक भी आग की झील में डाले गएयह आग की झील तो दूसरी मृत्यु है। और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्‍तक में लिखा हुआ न मिलावह आग की झील में डाला गया (प्रकाशितवाक्य 20:11-15).

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।
- क्रमशः
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The Bible, in Comparison to the Religious Writings of Other Ancient Civilizations & Cultures - Part - 2

The theme and content of the Bible, from the beginning to the end is the Lord Jesus Christ, and the deliverance from sins and the salvation that only He provides, “Nor is there salvation in any other, for there is no other name under heaven given among men by which we must be saved” (Acts 4:12). This theme, i.e. the Lord Jesus, His life, His character and characteristics, His works and ministry, His salvation etc. are all indicated, taught, and exemplified through the various teachings, laws, events, happenings, lives and writings of certain historical people, God’s dealings with men in various circumstances, etc.  and have been recorded centuries before the birth of the Lord Jesus on earth in the Old Testament section of the Bible. The Lord Jesus Himself and other writers of The Bible testified of this repeatedly, as is apparent from some related references from the Bible, given below:
John 5:39 You search the Scriptures, for in them you think you have eternal life; and these are they which testify of Me.
John 5:46 For if you believed Moses, you would believe Me; for he wrote about Me.
John 12:41 These things Isaiah said when he saw His glory and spoke of Him.
Luke 24:27 And beginning at Moses and all the Prophets, He expounded to them in all the Scriptures the things concerning Himself.
1 Corinthians 15:1-4 Moreover, brethren, I declare to you the gospel which I preached to you, which also you received and in which you stand, by which also you are saved, if you hold fast that word which I preached to you--unless you believed in vain. For I delivered to you first of all that which I also received: that Christ died for our sins according to the Scriptures, and that He was buried, and that He rose again the third day according to the Scriptures.
Hebrews 10:7 Then I said, 'Behold, I have come-- In the volume of the book it is written of Me-- To do Your will, O God.'

The New Testament section of the Bible begins with four accounts of the earthly life of the Lord Jesus, and how He prepared and provided the way of salvation for the entire mankind, for the whole world. This salvation that He has made freely available is to be accepted voluntarily and made applicable in their lives personally by everyone, free of any cost, without any works or rituals: “And you He made alive, who were dead in trespasses and sins, in which you once walked according to the course of this world, according to the prince of the power of the air, the spirit who now works in the sons of disobedience, among whom also we all once conducted ourselves in the lusts of our flesh, fulfilling the desires of the flesh and of the mind, and were by nature children of wrath, just as the others. But God, who is rich in mercy, because of His great love with which He loved us, even when we were dead in trespasses, made us alive together with Christ (by grace you have been saved), and raised us up together, and made us sit together in the heavenly places in Christ Jesus, that in the ages to come He might show the exceeding riches of His grace in His kindness toward us in Christ Jesus. For by grace you have been saved through faith, and that not of yourselves; it is the gift of God, not of works, lest anyone should boast (Ephesians 2:1-9), and thereby the person is reconciled with God through the forgiveness of sins made available by the Lord Jesus: “that if you confess with your mouth the Lord Jesus and believe in your heart that God has raised Him from the dead, you will be saved. For with the heart one believes unto righteousness, and with the mouth confession is made unto salvation. For the Scripture says, "Whoever believes on Him will not be put to shame." ; “For if when we were enemies we were reconciled to God through the death of His Son, much more, having been reconciled, we shall be saved by His life. (Romans 10:9-11; Romans 5:10). 

The New Testament, after the biographical records of the Lord Jesus then goes on to provide the history, events, growth, practices and responsibilities of the disciples of the Lord Jesus, that collectively form His Church – the group of the called out ones, through the writings of some of the disciples of the Lord Jesus. And finally the Bible and New Testament culminate with the Book of Revelation – which is a prophetically given record, of the end of the world, of the end times – the times we are presently living in, as is evident from the various end-times prophecies being fulfilled before our eyes (Read an account in Matthew chpt. 24). The book of Revelation details the coming inevitable judgment of the whole world and of every person ever to inhabit it, and the eternal life to follow – with God in heaven, or without God in hell – as per the choice every person made while living on the earth, the decision they made when brought to the knowledge of the Lord Jesus and the salvation He freely offers to all, and lived with for their entire life on earth, despite all opportunities provided to them to correct their decision: “Then I saw a great white throne and Him who sat on it, from whose face the earth and the heaven fled away. And there was found no place for them. And I saw the dead, small and great, standing before God, and books were opened. And another book was opened, which is the Book of Life. And the dead were judged according to their works, by the things which were written in the books. The sea gave up the dead who were in it, and Death and Hades delivered up the dead who were in them. And they were judged, each one according to his works. Then Death and Hades were cast into the lake of fire. This is the second death. And anyone not found written in the Book of Life was cast into the lake of fire (Revelation 20:11-15).

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.
- To Be Continued
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