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बुधवार, 29 मार्च 2023

आराधना (25) / Understanding Worship (25)

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आराधना के लिए परिवर्तित (2) 


हमने पिछले लेख में देखा था कि यद्यपि जैसी परमेश्वर चाहता है - आत्मा और सच्चाई से, मसीही विश्वासी द्वारा वैसी आराधना करना एक बहुत धन्य तथा फलदायी गतिविधि है, फिर भी, कलीसियाओं या मण्डलियों में इस महत्वपूर्ण विषय के बारे में शायद ही कभी कोई शिक्षा दी जाती है। इसलिए इसमें कोई अचंभे की बात नहीं है कि लोग विभिन्न मन-गढ़ंत तरीकों से परमेश्वर की ‘आराधना’ करते हैं, इस भ्रम के साथ कि उचित कर रहे हैं, लेकिन उन्हें उनकी आराधना से वह लाभ नहीं मिलने पाता है, जैसा मिलना चाहिए। जैसा कि हमारे जीवनों की अन्य बातों के साथ है, इसके बारे में भी परमेश्वर ने हमें असहाय और स्वयं की युक्तियों के अनुसार करने के लिए नहीं छोड़ रखा है। उसने अपने वचन बाइबल में सच्ची आराधना के कई उदाहरण दिए हैं, उसके प्रति समर्पित एवं प्रतिबद्ध लोगों के जीवनों और व्यवहार के द्वारा। हमने सीखना आरंभ किया है कि परमेश्वर किस प्रकार से अपने सच्चे, समर्पित, प्रतिबद्ध विश्वासी को अपना वैसा आराधक होने के लिए परिवर्तित करता है, जैसा उसे होना चाहिए। इस परिवर्तन की प्रक्रिया के अध्ययन के लिए हमने 2 इतिहास 29 अध्याय में राजा हिजकिय्याह के जीवन को लिया है। पिछले लेख में हमने देखा था कि यह प्रक्रिया चार क़दमों से होकर पूरी होती है; और इनमें से पहला कदम है विश्वासी का परमेश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित एवं प्रतिबद्ध हो जाना। हमने यह भी देखा था कि उद्धार के समय लोग प्रभु यीशु के अनुयायी बनने का निर्णय तो लेते हैं, किन्तु इस निर्णय का उस गंभीरता के साथ पालन करना, जैसा वास्तव में करना चाहिए, एक भिन्न बात है। आज हम इस प्रक्रिया के दूसरे कदम के बारे में देखेंगे।


2. 2 इतिहास 29:3 - अपने हृदय को, जो पवित्र आत्मा का मंदिर है, उस के लिए खोल दें - हिजकिय्याह ने 2 इतिहास 29:2 में, पूरे समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलने का निर्णय लिया, फिर उसके बाद जो अगला कदम उठाया वह था परमेश्वर के घर के द्वार को खोलना और उसकी मरम्मत करवाना। हमने पिछले लेख में देखा था कि हिजकिय्याह ने राज्य को अपने पिता आहाज से पाया था, जो मूर्तिपूजा और अन्य-जातियों के समान उपासना में लीन था, और आहाज ने यहूदा को भी इसी में डाल दिया था। इसलिए इसमें अचरज की कोई बात नहीं है कि मंदिर का द्वार बन्द पड़ा था, खराब भी हो गया था, और उसे खोलने के बाद उसकी मरम्मत की आवश्यकता भी थी। हिजकिय्याह ने न केवल द्वार को खुलवाया, बल्कि उसकी मरम्मत भी करवाई, अर्थात वह मंदिर के रख-रखाव में संलग्न भी हो गया।


प्रभु परमेश्वर का वास्तव में समर्पित अनुयायी, परमेश्वर के घर तथा अन्य विश्वासियों से अलग होकर नहीं रह सकता है। हम इस बात को प्रभु यीशु  के जीवन में तथा उनके शिष्यों के जीवन में नियमित घटित होता हुआ देखते हैं। प्रभु नियमित रीति से मंदिर या आराधनालय जाया करता था, और वहाँ प्रचार भी किया करता था, यद्यपि धार्मिक अगुवे वहाँ उसे परेशान करते रहते थे। लेकिन यह प्रभु को परमेश्वर के घर से अलग नहीं रख सका; हमारा प्रभु हर प्रकार का विरोध और परेशानी सहने को तैयार था, किन्तु परमेश्वर के घर जाने से रुकने को तैयार नहीं था। इसी प्रकार से, हम प्रेरितों के काम में देखते हैं कि यद्यपि धार्मिक अगुवे प्रभु यीशु के शिष्यों का विरोध करते थे, उन्हें सताते थे, लेकिन वे फिर भी नियमित मंदिर अथवा आराधनालय में जाया करते थे। पौलुस, अपनी सुसमाचार प्रचार की सेवकाई की यात्राओं में हमेशा पहले स्थानीय यहूदी आराधनालय में जाया करता था और वहीं से उद्धार के सुसमाचार के प्रचार को आरंभ करता था। केवल जब स्थानीय यहूदी उसे प्रचार करने से रोकते थे, तब ही वह प्रचार करने के लिए किसी अन्य स्थान को खोजता था। इस की तुलना में, वर्तमान में, अधिकांश लोगों को कलीसिया या मण्डली में जाने से पीछे हटने में कोई समस्या नहीं होती है। वे अन्य लोगों के साथ किसी भी मतभेद, या स्थानीय पास्टर अथवा अगुवों के साथ कोई अनबन होने या असहमति होने पर, या अन्य किसी भी मामूली सी बात को लेकर कलीसिया से अलग होकर रहने में वे कोई परेशानी अनुभव नहीं करते हैं। किसी भी कीमत पर परमेश्वर के घर के प्रति प्रेम और लगाव रखना, तथा परमेश्वर की अन्य संतानों के साथ संगति रखने की हमारी लालसा, परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम और समर्पण का उसकी आज्ञाकारिता में होकर चलने के निर्णय का निर्वाह करने की हमारी प्रतिबद्धता का एक सूचक है।


यदि इस पद को आलंकारिक रूप में लिया जाए, तो इसके साथ संबंधित एक आत्मिक पक्ष भी है। बाइबल, विशेषकर नया नियम, हमें सिखाते हैं कि नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी की देह परमेश्वर पवित्र आत्मा का मंदिर है (1 कुरिन्थियों 3:16-17; 6:19)। हमारे आस-पास के संसार के साथ हमारे संपर्क और पारस्परिक व्यवहार के तरीके, अर्थात, हम जो देखते, सुनते, अनुभव करते हैं, जिनके बारे में विचार करते हैं, आदि बातें, वे द्वार हैं जिनमें होकर विभिन्न बातें, वे चाहे परमेश्वर से संबंधित हों अथवा शैतान से, हमारे अंदर - पवित्र आत्मा के मंदिर में प्रवेश करती हैं। हमारे उद्धार से पहले, यह ‘मंदिर’ बन्द पड़ा था, परमेश्वर का पवित्र आत्मा अन्दर विद्यमान नहीं था; उसके द्वार यानि कि अन्दर आने को नियंत्रित करने वाले निष्क्रिय थे, संसार की कोई भी और कैसी भी बात हमारे अन्दर प्रवेश कर सकती थी, हमें प्रभावित कर सकती थी, और हमें किसी भी दिशा में ले जा सकती थी; हमारी देह में परमेश्वर के लिए कोई पवित्रता नहीं थी। उद्धार पाए हुए पापी को, जिसने यह दृढ़ निश्चय किया है कि वह परमेश्वर और उसके वचन के प्रति प्रतिबद्ध रहेगा, उसे अपने हृदय, अर्थात, पवित्र आत्मा के मंदिर के द्वार को परमेश्वर और उसके वचन के लिए खोल देना है, और उनकी मरम्मत भी करनी है। समर्पित और प्रतिबद्ध विश्वासी को अपने हृदय को संसार की उस मलिनता से साफ़ करना है जो उसके अन्दर जमा हो रखी है, और फिर उस स्वच्छता को बनाए भी रखना है, हमारे हृदय के द्वार से क्या आता-जाता है, उस पर कड़ी नज़र और नियंत्रण बनाए रखने के द्वारा। केवल तब ही उसे आज्ञाकारिता में जीवन जीने के लिए पवित्र आत्मा से निर्देश प्राप्त हो सकते हैं। जब हम आत्मा के अनुसार जीवन जीना आरंभ कर देंगे, तो हमारे जीवनों में आत्मा के फल भी दिखने लग जाएँगे (गलातियों 5:16, 22-25), हमारे अन्दर परमेश्वर के प्रति, उसने जो किया है, उसके लिए श्रद्धा और कृतज्ञता विकसित होने लगेगी, और यह हमें आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर की सच्ची आराधना करने की ओर ले जाएगा।


तो, सच्चा आराधक बनने के लिए दूसरा कदम है कि न केवल अपने हृदय के द्वार को परमेश्वर और उसके वचन को ग्रहण करने के लिए खोलना, परन्तु हृदय के द्वार की मरम्मत भी करना, जिससे हमारे अन्दर प्रवेश करने वाली बातों पर भी नज़र रखी जा सके, उन्हें नियंत्रण में रखा जा सके। हमें किसी भी सांसारिक या शैतानी बात को अपने अन्दर आने से रोक के रखना है, जिससे उसके कारण हम संसार के साथ किसी प्रकार के समझौते में पड़कर अपने अन्दर निवास करने वाले परमेश्वर पवित्र आत्मा को शोकित न करें (इफिसियों 4:30)। अगले लेख में हम परमेश्वर के मंदिर को स्वच्छ करने के बारे देखेंगे।

 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • न्यायियों 7-8           

  • लूका 5:1-16      


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English Translation


Being Transformed To Worship (2)


We had seen in the last article that although worshipping God the way He wants it done - in spirit and in truth, is such a blessed, and fruitful activity in the life of a Born-Again Christian Believer, yet there is hardly any teaching given on this important subject in the Churches or Assemblies. Therefore, it is no surprise that people ‘worship’ God in various contrived ways, thinking it to be appropriate, but they do not gain from their worship as they should have gained. As with all other things for our lives, God has not left us helpless and to our devices about this also. In His Word, the Bible, God has given to us many examples of true worship through the lives and behavior of those who lived a life committed to Him. We have started to learn how God transforms His truly committed Believer into becoming a worshipper that He wants him to be. We have taken the example of King Hezekiah, as given in 2 Chronicles 29, for our study of this transformation. In the last article we have seen that this transformation takes place through four steps; and the first step is the Believer deciding to become a true and committed follower of God. We had also seen that at salvation people decide to bcome followers of the Lord Jesus, but actually implementing it with the seriousness and commitment it ought to be done, is much different from taking that initial decision. Today we will consider the second step in this process.


2. 2 Chronicles 29:3 – Open your hearts, the Temple of the Holy Spirit, for Him - After making a personal commitment and firmly resolving to follow and obey God in 2 Chronicles 29:2, we see that the next step Hezekiah took was that he opened the doors of the house of Lord and got them repaired. We had seen in the last article that Hezekiah had inherited the kingdom from his father Ahaz, who was given to idolatry and paganism, and had led Judah into the same as well. So, no wonder that the doors of the Temple had been closed, had fallen into a state of disrepair, and on opening them, they had to be repaired. Hezekiah not only had the doors opened, but got them repaired too; i.e., got involved in the upkeep of the House of God.

 

A truly committed follower of the Lord God, cannot stay away from the house of God and other Believers. We see this exemplified in the life of the Lord Jesus, and also His disciples. The Lord regularly went to the Temple and Synagogues, and even preached in the Synagogues, even though the religious leaders kept troubling Him when He went there. But this did not keep Him away from the House of God; our Lord was willing to face opposition, but was not ready to stop going to the House of God. Similarly, in the Book of Acts we see that although the religious leaders opposed and persecuted the Lord’s disciples, but they regularly went to the Temple and synagogues. Paul, in his missionary journeys, made it a point to go the local synagogue and start preaching the gospel from there. Only if the local Jews prevented him, did he try to find some other place to preach from. In contrast, today, most people feel no problem in staying away from attending Church for some inter-personal relationship problem with someone in the congregation, some disagreement with the Pastor or Church Elders, or because of any other trivial reasons. Our love for the House of God, our involvement in its state, and our desire of fellowshipping with the other children of God, is an indicator of our love for God and commitment to follow Him, no matter what the cost.

 

Taking the verse metaphorically, there is another spiritual aspect to it also. The Bible, especially the New Testament teaches that the body of a Born-Again Christian Believer is the Temple of the Holy Spirit of God (1 Corinthians 3:16-17; 6:19). Our means of interacting with the world around us, i.e., what we see, hear, feel, think about, etc., are the portals through which various things, godly or satanic, gain entry into our body - the Temple of the Holy Spirit. Before our salvation, this ‘temple’ was closed, God’s Holy Spirit was not present; its doors, or portals of entry were non-functional, anything and everything of the world could move in or out of us, and lead us in any direction; there was no holiness for God in our body. The redeemed sinner, having made a firm resolve, a commitment to live in obedience to God and His Word, has to open the doors of his heart, i.e., the Temple of the Holy Spirit, for God and His Word, and repair them too. The committed Believer is to cleanse his heart from the filth of the world that had accumulated within, and also to keep the heart clean, by carefully regulating what passes in through the ‘doors’ or portals of our heart. Only then can he receive the instructions of the Holy Spirit to obey and live by. When we start living by the Spirit, the fruits of the Holy Spirit also start appearing in our lives (Galatians 5:16, 22-25) we develop a reverence and gratitude for God for what He has done, and leads us to truly worshipping God, in spirit and in truth.

 

So, the second step to becoming a worshipper is to not only open the doors of the heart to receive Him and His instructions, but to also repair the doors, so that what enters into us can be regulated, and we do not allow any satanic or worldly things within us, that can make us compromise with the world and grieve the Holy Spirit of God within us (Ephesians 4:30). In the next article we will see the third step, the cleansing of the Temple of God.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.  


Through the Bible in a Year: 

  • Judges 7-8

  • Luke 5:1-16


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