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शनिवार, 10 जून 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 31 - Eternal Security / अनन्त सुरक्षा


क्या अनन्त सुरक्षा, या, उद्धार कभी खोया नहीं जा सकता है बाइबल के अनुसार वैध सिद्धांत है?

            हमें यह समझने की आवश्यकता है कि अनन्त सुरक्षा, या, उद्धार कभी न खोए जाने का सिद्धांत, जैसा आम तौर से उसे देखा और समझा जाता है, उसका तात्पर्य निकाला जाता है, उसके विपरीत, किसी को भी निश्चिन्त होकर पाप करने की स्वतंत्रता नहीं देता है, इस धारणा से कि उद्धार पा लेने के बाद अब उन किए गए पापों के कोई घातक परिणाम नहीं होंगे, कोई जवाबदेही नहीं होगी।

            परमेश्वर मूर्ख नहीं है, और न ही कभी कोई उसका मूर्ख बना सकता है। बाइबल के अनुसार अनन्त सुरक्षा का सिद्धान्त केवल यह आश्वासन देता है कि हमारे पापों की सज़ा – मृत्यु, अर्थात परमेश्वर से अनन्तकाल के लिए अलग हो जाना, हमें कभी नहीं सहना पड़ेगा, क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने कलवरी के क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा, हमारे स्थान पर उस दण्ड को सह लिया है। लेकिन प्रभु यीशु मसीह ने हमारे पापों के दुष्प्रभावों और प्रतिफलों को हमारे स्थान पर वहन नहीं किया है। हमें हमारे पापों के दुष्प्रभावों और प्रतिफलों को इस संसार में भी और स्वर्ग में भी भोगना होगा। प्रेरित पौलुस ने पवित्र आत्मा के द्वारा कुरिन्थुस के मसीही  विश्वासियों को लिखा, “क्योंकि अवश्य है, कि हम सब का हाल मसीह के न्याय आसन के सामने खुल जाए, कि हर एक व्यक्ति अपने अपने भले बुरे कामों का बदला जो उसने देह के द्वारा किए हों पाए” (2 कुरिन्थियों 5:10)। अर्थात प्रत्येक मसीही विश्वासी को मसीह यीशु के न्याय सिंहासन के सामने खड़े होना पड़ेगा और उन्होंने जो कुछ भी पृथ्वी पर किया है उसके परिणाम और प्रतिफल लेने होंगे। ध्यान कीजिए, यहाँ पर पौलुस अपने संबोधन में “तुम” का नहीं वरन “हम” का प्रयोग कर रहा है, अर्थात यह बात उसके लिए भी उतनी ही  लागू थी।

            उद्धार पाने के पश्चात हमारे कर्मों की जवाबदेही से हम किसी भी रीति से बच नहीं सकते हैं। पतरस लिखता है कि परमेश्वर का न्याय तो हम मसीही विश्वासियों से ही आरंभ होगा, जिससे शेष लोग परमेश्वर की खराई और निष्पक्षता को देख और समझ सकें, “क्योंकि वह समय आ पहुंचा है, कि पहिले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए, और जब कि न्याय का आरम्भ हम ही से होगा तो उन का क्या अन्त होगा जो परमेश्वर के सुसमाचार को नहीं मानते?” (1 पतरस 4:17)। पौलुस इसे कुछ और विस्तार से बताता है, तो हर एक का काम प्रगट हो जाएगा; क्योंकि वह दिन उसे बताएगा; इसलिये कि आग के साथ प्रगट होगा: और वह आग हर एक का काम परखेगी कि कैसा है। जिस का काम उस पर बना हुआ स्थिर रहेगा, वह मजदूरी पाएगा। और यदि किसी का काम जल जाएगा, तो हानि उठाएगा; पर वह आप बच जाएगा परन्तु जलते जलते” (1 कुरिन्थियों 3:13-15)। अर्थात, हर एक का प्रत्येक काम बहुत बारीकी से, मानो आग से, जाँचा जाएगा, केवल योग्य ही बचेगा, सारा योग्य भस्म हो जाएगा; तब कई होंगे जो बच तो जाएंगे परन्तु जलते जलते, किन्तु वे खाली हाथ होंगे, उनके पास अनन्त काल के लिए स्वर्ग में कोई प्रतिफल नहीं होंगे।

            न केवल स्वर्ग में, वरन पृथ्वी पर भी ढीठ और ज़िद्दी विश्वासी जो पाप करने से नहीं रुकते हैं, उन्हें परमेश्वर की ताड़ना का सामना करना पड़ता है, जिस से कि वे अपने मार्गों को सुधार लें (इब्रानियों 12:5-11; 1 पतरस 4:1-2)। इसका एक उदाहरण 1 कुरिन्थियों 5:1-5 में दिया गया है – यहाँ पर पद 5 पर विशेष ध्यान दीजिए – उस पाप करते रहने वाले व्यक्ति के लिए कहा गया है कि उसकी देह को ताड़ना के लिए शैतान को सौंपा जाए, जिससे उसकी आत्मा उद्धार पाए। अर्थात वह अपने उद्धार को तो नहीं खोएगा, लेकिन अपने पाप के लिए दण्ड पाए बिना भी नहीं रहेगा।

            इसलिए, सीमित बुद्धि और समझ वाले किसी भी नाशमान मनुष्य की मनगढ़ंत धारणा और व्याख्या पर विश्वास करके, असीम बुद्धि और समझ वाले अविनाशी परमेश्वर और उसके वचन पर इलज़ाम लगाने, उसका निरादर करने, उसे बदनाम करने से पहले आवश्यक है कि बाइबल की बातों को बाइबल से ही जाँच परख कर देखा जाए, और तब ही किसी बात को स्वीकार किया जाए।

            यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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We need to understand that the doctrine of “eternal Security”, contrary to its commonly held misinterpretation, its being misunderstood, and wrongly stated to mean, actually speaking, is not a license to sin with impunity under the assurance that there will be no consequences or accountability for them, since their salvation is eternal, will never be lost.

God is not naïve, and no one can ever make a fool out of Him. God’s “eternal security” only means that the death penalty of our sin, i.e., our eternal separation from God, has been borne for us by the Lord Jesus on the Cross of Calvary, and we will never have to suffer it now. But the Lord Jesus has not taken upon Himself the bad consequences or deleterious effects of our sins. We will be accountable and will suffer the consequences of our sins, in this world, as well as in heaven. Paul, through the Holy Spirit, writing to the Christian Believers in Corinth says “For we must all appear before the judgment seat of Christ, that each one may receive the things done in the body, according to what he has done, whether good or bad” (2 Corinthians 5:10). That is to say that everyone, i.e., every Christian has to appear before the judgment seat of Christ to receive the consequences or results and rewards of what they have done on earth. Notice Paul uses “we” and not “you”, implying that this holds true for him as well.

There is no escaping the accountability of our deeds, even after we are saved. Peter tells us that God’s judgment will begin with the judgement of Christian Believers, so that the rest of the people can see for themselves the integrity and unbiased judgement of God “For the time has come for judgment to begin at the house of God; and if it begins with us first, what will be the end of those who do not obey the gospel of God?” (1 Peter 4:17). Paul states some more details in 1 Corinthians 3:13-15 about this judgment “each one's work will become clear; for the Day will declare it, because it will be revealed by fire; and the fire will test each one's work, of what sort it is. If anyone's work which he has built on it endures, he will receive a reward. If anyone's work is burned, he will suffer loss; but he himself will be saved, yet so as through fire” - it will be a very minute scrutiny of each Christian Believer’s each and every work, as if by fire, and only the worthwhile will remain all the rest will perish; and though many will remain saved, as through fire, but they will suffer loss and have no rewards to live with in their eternity in heaven.

Not only in heaven, but the recalcitrant sinning Believers are also chastised by God here on earth, to make them mend their ways (Hebrews 12:5-11; 1 Peter 4:1-2); an example of this is 1 Corinthians 5:1-5 - take particular note of verse 5 here - this sinning person was to be handed over to Satan to be tormented here on earth, so that his spirit is saved - he will not lose his salvation, but he will not be allowed to go unpunished for his sin even here on earth.

Therefore, one needs to be clear and correct about the Biblical doctrine of “eternal security”, as the Bible states it, before aspersions are cast on it by accepting some fanciful interpretation of fallible and perishable person having a very limited understanding of the infallible, eternal and omniscient God and His Word but. Rather than maligning the infallible Word of God because of erroneous understanding and interpretation by fallible humans, one should study and verify Biblical things from the Bible itself.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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