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शनिवार, 9 अप्रैल 2022

“बपतिस्मे” की समझ / Understanding "Baptism" - 5



पिछले लेखों में बपतिस्मे से संबंधित कुछ आधारभूत बातों को देखने के बाद, आज से हम बपतिस्मे से संबंधित कुछ विवादास्पद बातों को देखना और समझना आरंभ करेंगे। इनमें से पहली बात है एक बहुत आम धारणा कि उद्धार के लिए बपतिस्मा आवश्यक भी है, उद्धार बपतिस्मे के बिना नहीं है। इन बातों को समझने के लिए बाइबल की बातों की की सही व्याख्या करने से संबंधित कुछ मुख्य मूल सिद्धांतों, हर बात को उसके संदर्भ में लेना, उस बात से संबंधित अन्य पदों के साथ लेना, उसे बाइबल की अन्य संबंधित शिक्षाओं के साथ लेना, और उसके उस अर्थ के साथ समझना जो उसके मूल या प्रथम श्रोताओं ने उस बात के कहे या लिखे जाने के समय समझा था और पालन किया था, अनिवार्य है। साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सामान्य वार्तालाप और भाषा के प्रयोग के समान, बाइबल में भी आलंकारिक भाषा का प्रयोग किया गया है; हर बात केवल उसके शब्दार्थ में ही नहीं, संदर्भ के अनुसार उसके अर्थ या भावार्थ में समझनी भी आवश्यक होती है। यदि इन मूल सिद्धांतों का ध्यान न रखा जाए, तो गलत व्याख्या और अनुचित अर्थ निकालना बहुत सरल हो जाता है; और इसी गलती के कारण ये गलत व्याख्याएं और गलत शिक्षाएं बनाई और सिखाई जाती हैं। 

क्या उद्धार के लिए बपतिस्मा आवश्यक है? (1)

बाइबल की यह एक भली-भांति स्थापित और अनेकों स्थानों पर दी गई शिक्षा है कि उद्धार किसी भी प्रकार के कर्म से नहीं है (इफिसियों 2:5, 8-9), बपतिस्मे से भी नहीं, क्योंकि वह भी एक एक प्रकार का कर्म है। बाइबल की जो भी व्याख्या, केवल और केवल अनुग्रह और विश्वास के द्वारा पापों की क्षमा और उद्धार के सिद्धांत का खण्डन करती है, उसके विरुद्ध जाती है, वह गलत है, अस्वीकार्य है; वह चाहे कितनी भी तर्कपूर्ण या भली प्रतीत क्यों न हो। 


क्रूस पर पश्चाताप करने वाले डाकू ने कौन सा बपतिस्मा लिया, किन्तु वह स्वर्ग गया। अनेकों लोग जीवन के अंतिम पलों में उद्धार पाते हैं, या विश्वास करने के बाद बपतिस्मा नहीं लेने पाते हैं, क्या वे इसलिए नाश हो जाएंगे क्योंकि पश्चाताप और विश्वास तो किया, पूरी खराई से प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता भी ग्रहण किया, किन्तु बपतिस्मे की रस्म पूरी नहीं करने पाए? हम प्रभु की महान आज्ञा से यह देख चुके हैं कि उद्धार बपतिस्मे से नहीं है; वरन उद्धार पाए हुओं के लिए बपतिस्मा है; मत्ती 28:19-20 - पहले शिष्य बनाओ; जो शिष्य बने उसे बपतिस्मा दो और उसे प्रभु की बातें सिखाओ - यही प्रभु द्वारा दिया गया क्रम है। इससे यह भी स्पष्ट है कि बपतिस्मा बच्चों या शिशुओं के लिए नहीं है, केवल उनके लिए है जिन्होंने प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता स्वीकार किया और उसके शिष्य हो गए हैं। यदि किसी भी पद की कोई भी व्याख्या उद्धार से संबंधित इस मूल सिद्धांत को काटती है, तो वह गलत है; उसे फिर से समझना और सही स्वरूप में लेकर देखना अनिवार्य है। बाइबल में कोई विरोधाभास नहीं है।  


उद्धार के लिए बपतिस्मे को अनिवार्य दिखाने के लिए अकसर प्रेरितों 2:38 का गलत प्रयोग यह कहकर किया जाता है कि इस पद में लिखा है “तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले।” इस से यह तर्क दिया जाता है कि, प्रकट है कि पापों की क्षमा बपतिस्मे के द्वारा है। किन्तु यह इस वाक्य की गलत समझ है; यहाँ यह अर्थ नहीं है कि पापों की क्षमा प्राप्त करने के लिए बपतिस्मा ले - अन्यथा क्रूस पर पश्चाताप करने वाले डाकू को पापों की क्षमा नहीं मिली। वरन प्रेरितों 2:38 के इस वाक्य का सही अर्थ है कि “अपने पापों की क्षमा प्राप्त कर लेने की गवाही बपतिस्मा लेने के द्वारा दो”। 


इस वाक्य में लिखे गए शब्दों के क्रम के कारण इसका अर्थ भिन्न प्रतीत होता है, किन्तु है नहीं; इसे एक बहुत सामान्य और अकसर होने वाली बात के उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए किसी लोकप्रिय खेल के एक मैच में देश की बहुत रोमांचकारी जीत हुई। अगले दिन इस जीत के विषय अखबारों में लिखा हुआ आया “देश की शानदार जीत के लिए लोगों ने जश्न मनाया, मिठाई बांटी।” तो क्या अखबारों में यह वाक्य पढ़ने वाले यही समझेंगे कि लोगों के जश्न मनाने और मिठाई बांटने से देश जीत गया? और यदि कोई यह कहना भी चाहेगा तो उसके प्रति लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी? क्या वे उसे बुद्धिमान समझेंगे, या मूर्ख? ठीक इसी प्रकार से पतरस भी उन उद्धार पाए हुए लोगों को कह रहा था कि अब अपने उद्धार के लिए वे मसीह यीशु के नाम से बपतिस्मा लें; अर्थात उद्धार पा लेने के लिए नहीं, वरन उद्धार पाया हुआ होने के कारण। 


उस गलत शिक्षा और धारणा से बाहर निकल कर जब व्यावहारिक जीवन की सामान्य सोच एवं अर्थ के साथ उस वाक्य को देखते हैं तो उसका वह अर्थ प्रकट हो जाता है जो लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व पतरस द्वारा इस वाक्य को कहे जाने पर लोगों ने समझा था। उद्धार बपतिस्मे से नहीं है; उद्धार पाए हुओं के लिए बपतिस्मा है। 


इसी प्रकार से बपतिस्मे के द्वारा पापों के धोए जाने का तर्क देने के लिए पौलुस के उदाहरण के साथ प्रेरितों 22:16 “अब क्यों देर करता है? उठ, बपतिस्मा ले, और उसका नाम ले कर अपने पापों को धो डाल” का भी ऐसी ही अनुचित समझ के साथ प्रयोग किया जाता है। इस गलतफहमी का कारण है केवल एक पद या वाक्यांश को उसके संदर्भ से बाहर, और बिना अन्य संबंधित बातों या पदों का ध्यान किए हुए लेना, और उसी पर धारणा बना लेना। प्रेरितों 22:16 में पौलुस प्रेरितों 9:16-18 की घटना को यहूदियों और उनके धर्म-गुरुओं के सामने दोहरा रहा है। 


पौलुस का प्रभु यीशु से पहला साक्षात्कार दमिश्क के रास्ते पर हुआ था, और पौलुस ने उसी साक्षात्कार में यीशु को अपना प्रभु ग्रहण कर लिया था (प्रेरितों 9:4-5)। यहाँ पर गलातियों 1:11-12 “हे भाइयो, मैं तुम्हें जताए देता हूं, कि जो सुसमाचार मैं ने सुनाया है, वह मनुष्य का सा नहीं। क्योंकि वह मुझे मनुष्य की ओर से नहीं पहुंचा, और न मुझे सिखाया गया, पर यीशु मसीह के प्रकाश से मिला” में पौलुस द्वारा उसे सुसमाचार सुनाए जाने की बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है। गलातियों के इन पदों में पौलुस इस बात के लिए स्पष्ट है कि उसे सुसमाचार “यीशु मसीह के प्रकाश से मिला” था। अर्थात दमिश्क के रास्ते पर प्रभु यीशु से हुए उसके साक्षात्कार के समय, प्रभु के साथ जो उसकी बातचीत हुई, उसमें ही उसे सुसमाचार दिया गया, और उसने उस सुसमाचार पर विश्वास किया, तभी तो उसने वहाँ पर ही यीशु को प्रभु कहकर संबोधित किया (प्रेरितों 22:7, 10)। अर्थात, हनन्याह के उसके पास आने से पहले पौलुस प्रभु पर विश्वास लाने के द्वारा उद्धार पा चुका था। अब, इस संदर्भ में पौलुस द्वारा प्रेरितों 22:16 में कही गई बात पर ध्यान दीजिए; वह यह नहीं कह रहा है कि हनन्याह ने उससे कहा कि वह बपतिस्मे द्वारा अपने पापों को धो डाले, वरन “उसका” यानि कि यीशु का नाम लेकर अपने पापों को धो डाल। इसे 1 कुरिन्थियों 6:11 “और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे” के साथ देखने से इस धोए जाने की बात का अभिप्राय और भी स्पष्ट हो जाता है कि यह बपतिस्मे के जल के द्वारा पापों के धोए जाने की बात ही नहीं है। इसलिए पौलुस द्वारा बपतिस्मा लेने का अर्थ बपतिस्मे के जल से पापों को धो डालना कहना प्रेरितों 22:16 का सही अर्थ और व्याख्या नहीं है। 


यदि आप मसीही हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप मनुष्यों की बनाई हुई रीतियों और प्रथाओं का नहीं, परमेश्वर के वचन का पालन करने वाले हों। क्योंकि अन्ततः आपका न्याय, मनुष्यों के द्वारा बनाई और धर्म-उपदेश करके सिखाई गई, मनुष्यों की बातों के आधार पर नहीं होगा। क्योंकि मनुष्यों द्वारा बनाए गए धर्मोपदेश न केवल व्यर्थ हैं (मत्ती 15:9) किन्तु हटा भी दिए जाएंगे (मत्ती 15:13)। सभी का न्याय प्रभु यीशु के द्वारा (प्रेरितों 17:30-31), उसके वचन की अटल और अपरिवर्तनीय बातों के आधार पर होगा (यूहन्ना 12:48)। इसलिए आपके लिए मनुष्यों को नहीं परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला बनना अनिवार्य है, नहीं तो अनन्त जीवन में अनंतकाल की हानि उठानी पड़ेगी। अपने जीवन में गंभीरता से झांक कर देख लें, और जिन भी बातों को सही करना है, उन्हें अभी समय और अवसर रहते हुए सही कर लें; कहीं कल या “बाद में” पर टाल देने से बहुत विलंब और हानि न हो जाए।  


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • 1 शमूएल 13-14    

  • लूका 10:1-24     


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 After looking at some of the basics about baptism in the previous articles, today we'll begin to look at and understand some of the controversial things about baptism. The first of these is a very common belief that baptism is also necessary for salvation, that salvation is not without baptism. To understand these things, it is necessary to keep in mind the main basic principles for the correct interpretation of the Bible: to consider everything in its context, to consider it with other verses related to that matter, to consider it along with other related teachings of the Bible, and to consider it with the meaning that its original or first audience understood and followed when it was first said. Adhering to these principles of Bible interpretation is mandatory to avoid wrong interpretations and conclusions. At the same time, we should also note that the Bible too uses figurative language, similar to normal conversation and use of language. Therefore, it is necessary to understand everything not only in its literal meaning, but, according to the context, also in its implied meaning or connotation. If these basic principles are not taken care of, it becomes very easy to misinterpret and misunderstand many things. And because of these mistakes, the misinterpretations and wrong teachings come about and are taught.



Is Baptism necessary for Salvation? (1)


It is a well-established and often stated teaching of the Bible that salvation is not by any kind of works (Ephesians 2:5, 8-9); not even by baptism, because that too is a form of work. Any interpretation of the Bible that contradicts or goes against the doctrine of the forgiveness of sins and salvation by grace and faith alone, is wrong and absolutely unacceptable; No matter how logical or pleasing it may seem to be.


What baptism did the robber who repented on the cross take; But he went to heaven. Many are saved in the last moments of life, or for some other valid reason are unable to take baptism after believing. Will they perish because although they have truly repented and believed, have wholeheartedly accepted the Lord Jesus as Savior, but for some compelling reason, couldn't fulfill the baptismal rituals? We have seen in the Great Commission given by the Lord that baptism is to be administered only to those who are saved; and not that baptism will give salvation to anyone; Matthew 28:19-20 - Make disciples first; Baptize whoever becomes a disciple and teach him the words of the Lord - this is the order given by the Lord in this Great Commission. It is also clear from this that baptism is not for children or infants, but only for those who have accepted the Lord Jesus as Savior and have become His disciples. If any interpretation of any verse contradicts this basic principle of salvation, then that interpretation is wrong; It is essential to reinterpret it correctly. There are no contradictions in the Bible.


Acts 2:38 is often used to impress that baptism is necessary for salvation by arguing that the verse reads "Then Peter said to them, "Repent, and let every one of you be baptized in the name of Jesus Christ for the remission of sins; and you shall receive the gift of the Holy Spirit." From this it is argued that, it is apparent that the forgiveness of sins is through baptism. But this is a wrong understanding of this sentence. Here, Peter is not asking people to be baptized to receive the forgiveness of sins - otherwise the robber who repented on the cross would not have received the forgiveness of sins. Rather, the correct meaning of this sentence of Acts 2:38 is, "By being baptized you testify that you have received the forgiveness of your sins".

Due to the order of the words written in this sentence, its meaning seems to be different from what it actually is; Let us understand this with the help of an example of a very common and frequently occurring activity. Suppose the country achieves a very thrilling victory in a match of a popular sport. The next day the headline in the newspapers about this victory is, "The people celebrate, distribute sweets for the glorious victory of the country." So, will those who read this sentence in the newspapers think that the country has won the victory because of the people celebrating and distributing sweets? And if someone even wants to say this, then what will be the reaction of the people towards him? Will they consider him wise, or foolish? In the same way, Peter was telling those saved, that they get baptized for their salvation in the name of Christ Jesus; i.e., not to be saved, but because of being saved.


After stepping out of the wrong teaching and understanding, when we look at that sentence with the practical, normal sense and application, then its actual meaning becomes apparent. The meaning which those people understood when Peter said this sentence about two thousand years ago. Salvation is not by baptism; but Baptism is for the saved.


Similarly, to argue for the washing away of sins by baptism, Paul's example of, Acts 22:16 "And now why are you waiting? Arise and be baptized, and wash away your sins, calling on the name of the Lord” is also used with a similar misinterpretation and misunderstanding. The reason for this misunderstanding is simply to take a verse or phrase out of its context, and without taking into consideration the other related things or verses, make assumptions about it. In Acts 22:16, Paul is repeating the incidence of Acts 9:16-18 to the Jews and their religious leaders. 

Paul's first encounter with the Lord Jesus was on the way to Damascus, and Paul accepted Jesus as Lord in that encounter itself (Acts 9:4–5). It is also important to note here Paul's statement regarding his receiving of the Gospel, as stated in Galatians 1:11-12 “But I make known to you, brethren, that the gospel which was preached by me is not according to man. For I neither received it from man, nor was I taught it, but it came through the revelation of Jesus Christ.” In these verses from Galatians, Paul is clear that he received the gospel "by the revelation of Jesus Christ." That is, at the time of his encounter with the Lord Jesus on the way to Damascus, the gospel was given to him during his conversation with the Lord, and he believed in that gospel; that is why he addressed Jesus as Lord there (Acts 22:7, 10). That is, Paul had been saved by faith in the Lord before Ananias came to him. Now, consider what Paul said in Acts 22:16 in this context; He is not saying that Ananias asked him to wash away his sins by baptism, but that he should wash away his sins by “calling on the name of the Lord" i.e., Jesus. On considering this with 1 Corinthians 6:11 "And such were some of you. But you were washed, but you were sanctified, but you were justified in the name of the Lord Jesus and by the Spirit of our God" the meaning becomes even more clear that Paul is not talking about washing away sins by the water of baptism. So, claiming that here Paul is saying that being baptized means the washing away of sins with the water of baptism is not the correct meaning and interpretation of Acts 22:16.


If you are a Christian, it is essential for you to follow the Word of God, not the customs and traditions created by men. Because in the end, you will neither be judged by any man, nor on the basis of any man-made doctrines and teachings, all of which not only are vain (Matthew 15:9) but will also be taken away (Matthew 15:13). But everyone will be judged by the Lord Jesus (Acts 17:30-31), and only on the basis of His unalterable and firmly established Word (John 12:48). Therefore, it is necessary for you to be pleasing to God, instead of striving to please men; else you will have to suffer the loss of eternal life and eternity. Take a serious account of your life, and whatever things you need to rectify, do it right now, while you have the time and opportunity; procrastinating and postponing it for tomorrow or "later" may be very harmful.

 

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

Read the Bible in a Year:

  • 1 Samuel 13-14

  • Luke 10:1-24