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बुधवार, 6 मार्च 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 1

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आरम्भिक विचार – 1


    आशीषित और सफल जीवन जीने पर पिछली श्रृंखला के लेखों में, प्रत्येक मसीही विश्वासी के परमेश्वर की कलीसिया और उसके अन्य सन्तानों के साथ सहभागिता के भण्डारी होने से संबंधित बातों पर विचार करते हुए, हमने उन बातों के बारे में सीखा था जो कलीसिया की तथा मसीही विश्वासियों की बढ़ोतरी में बाधा डालती हैं। उन में से एक मुख्य बात, जिस पर हमने संक्षेप में विचार किया था वह थी कलीसिया एवं विश्वासियों के मध्य परमेश्वर के वचन की सेवकाई की भूमिका।

    हम कलीसिया के इतिहास से जानते हैं कि प्रथम शताब्दी में कलीसिया का सबसे अधिक तेजी से और सारे सँसार में प्रसार हुआ और उन्नति भी हुई। और यह तब, जब उनके पास लिखित रूप में परमेश्वर का वचन, विशेषकर नया नियम – जो उस समय लिखा जा रहा था, था ही नहीं। शिक्षाएँ मुख्यतः प्रेरितों के द्वारा मौखिक दी जाती थीं, या कुछ पत्रियों के द्वारा, जो किसी व्यक्ति अथवा कलीसिया को लिखी जाती थीं और आस-पास की कलीसियाओं में घुमा कर वहाँ भी पढ़ी-सुनाई जाती थीं। किन्तु प्रेरितों के द्वारा प्रचार किए जा रहे इस परमेश्वर के वचन में एक बात थी – वह परिशुद्ध था, उसमें मनुष्यों की समझ और विचारों की कोई मिलावट नहीं की जाती थी; अर्थात, जैसा उन्हें प्रभु या पवित्र आत्मा से मिला था (1 कुरिन्थियों 11:23; 15:3; गलतियों 1:11-12; 1 थिस्सलुनीकियों 4:2; 1 यूहन्ना 1:5), उसे वैसा ही, बिना उसमें उनकी अपनी बुद्धि के विचार और बातों को मिलाए (2 कुरिन्थियों 4:1-2, 5), बाँट दिया जाता था, और इसीलिए वह इतना प्रभावी था। यदि वही वचन जिसने उस समय कलीसिया की इतनी बढ़ोतरी और उन्नति की थी, उसी तरह से, जैसा परमेश्वर ने दिया है उसे शुद्धता में, आज दिया जाए, तो निश्चय ही उसका वही प्रभाव होगा जो उस समय हुआ था।

    यह तर्क कोई मन-गढ़न्त बात नहीं है। हम परमेश्वर के वचन से देखते हैं कि यह परमेश्वर के वचन के प्रचार के द्वारा ही था कि कलीसियाएं दृढ़ हुईं और बढ़ीं (प्रेरितों 4:4; 6:7; 16:4-5; 12:24; 19:20)। कलीसियाओं की बढ़ोतरी के इस आरंभिक चरण में, वचन के मुख्य शिक्षक और प्रचारक प्रेरित तथा प्रभु यीशु के अन्य शिष्य थे। वे प्रभु के प्रति पूर्णतः और खराई से समर्पित थे और अपनी सेवकाई पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में करते थे। वह वचन जो पवित्र आत्मा से उन प्रेरितों तथा अगुवों में होकर आता था, उसके द्वारा यह बढ़ोतरी और उन्नति होती थी (प्रेरितों 16:4-5)। उस समय शैतान यूँ ही निष्क्रिय होकर बैठा हुआ नहीं था, तब भी ऐसे लोग थे जो अपने ही विचारों, व्याख्याओं, और धारणाओं को परमेश्वर का वचन कहकर प्रचार करते थे (मत्ती 15:8-9; 2 कुरिन्थियों 2:17; 11:13-15), किन्तु उस से कभी भी कलीसिया या विश्वासियों की बढ़ोतरी अथवा उन्नति में कोई योगदान नहीं मिला, और बाइबल में उसकी भर्त्सना की गई है।

    अगले लेख में हम कुछ अन्य आरंभिक बातों को देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


Preliminary Considerations – 1

 

    In the previous series on leading a Blessed and Successful Life, while considering the Christian Believers being stewards of God’s Church and of Fellowship with other children of God, we had learnt about the factors affecting the growth of the Church and of the Christian Believers. One of the main factors that we had briefly considered was the role of God’s Word in this growth of the Church and the Christian Believers.

    We know from Church history that in the first century, the Church grew very rapidly all over the world; although they did not have the written Word of God, particularly the New Testament – which was still being written. Primarily, the teachings were done by the Apostles orally, and through some letters written to individuals or some of the Churches, and circulated around to be read and heard there. But there was one thing about this Word of God being preached and taught by the Apostles – it was pure and unadulterated by human thoughts and wisdom; i.e., as they had received I from the Lord or from the Holy Spirit (1 Corinthians 11:23; 15:3; Galatians 1:11-12; 1 Thessalonians 4:2; 1 John 1:5), and was delivered unadulterated by their own thoughts and wisdom (2 Corinthians 4:1-2, 5), and therefore it was so effective. If the same Word that caused the Church to grow and improve at that time, is ministered in the same manner, in its purity as given by God, as it was done at that time, it surely will have the same effect as it had in the first Church.

    This is argument not mere conjecture. We see from God's Word that it was through the preaching of the Word of God, that the Churches were strengthened and grew (Acts 4:4; 6:7; 16:4-5; 12:24; 19:20). In this initial phase of Church growth, the main teachers and preachers of the Word were the Apostles and other disciples of Christ. They were sincerely committed to be obedient to the Lord and carrying on their ministry under the guidance of the Holy Spirit. It was this Word that came through the Apostles and Elders under the guidance of the Holy Spirit that caused this growth (Acts 16:4-5). Even at that time, Satan was not sitting by idly; there were people who preached their own thoughts, interpretations, and ideas as God's Word (Matthew 15:8-9; 2 Corinthians 2:17; 11:13-15), but it never contributed in any way to the spiritual growth and development of the Believers or of the Churches, and has been denounced in the Bible.

    In the next article we will look at some more preliminary considerations.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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