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शुक्रवार, 24 मार्च 2023

आराधना (20) /Understanding Worship (20)

Click Here for the English Translation

आराधना में बाधाएँ (3) - परमेश्वर के स्थान पर स्वयं को महत्व देना


पिछले लेखों में हमने दो प्रमुख बाधाओं को देखा था जो मसीही विश्वासी द्वारा परमेश्वर की सच्ची आराधना, जिसे प्रभु परमेश्वर ढूँढ़ता है, “आत्मा और सच्चाई” में की गई आराधना, करने से बाधित करते हैं। इन दोनों में से पहली बाधा है वास्तविक आराधना क्या है, यह नहीं जानना, और उसके स्थान पर प्रार्थना करना तथा रीतियों का निर्वाह करना, सामान्यतः केवल कलीसिया की सभा के लोगों के साथ गीत गाकर ही निर्वाह कर लेना, परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत संगति और आराधना का समय न रखना। दूसरी बाधा, जिसे हमने पिछले लेख में देखा है, वह है विश्वासी का यह एहसास न रखना कि परमेश्वर ने प्रत्येक वास्तविक नया-जन्म पाए हुए विश्वासी को कैसा उच्च स्थान प्रदान किया है, और आराधना के लिए अपने लिए अनादर पूर्ण अभिव्यक्तियों और शब्दों का प्रयोग करना, और ऐसा करने को ही ‘आराधना’ करना समझा लेना। आज हम सच्ची आराधना में एक और बाधा के बारे में देखेंगे, जो पिछले लेख वाली बाधा से संबंधित है।


आराधना में आने वाली तीसरी आम रीति से देखी जाने वाली बाधा है, मसीही विश्वासी का परमेश्वर के स्थान पर अपने बारे में अधिक बात करना। आराधना के लिए अकसर लोग अपना ही वर्णन करना आरंभ कर देते हैं, अपने पुराने तथा वर्तमान जीवनों का। और अकसर उनका यह स्वयं की बात करना अपनी भर्त्सना करना, अपने आप को बुरा दिखाना अधिक होता है, न कि परमेश्वर की स्तुति और आराधना करना। वे अपनी गलतियों, कमियों, और बुराइयों का ही वर्णन करते रहते हैं, बजाए उनके जीवन में परमेश्वर द्वारा लाए गए बदलाव, उन्हें भला बना देने और आत्मिक उन्नति की सकारात्मक बातों का ब्यान करने के। यद्यपि, परमेश्वर अपने वचन में विश्वासियों को आश्वस्त करता है कि उसने उनके पापों को अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया है, काली घटा के समान मिटा दिया है, और उन्हें याद नहीं करेगा (यशायाह 38:17; 43:25; 44:22), लेकिन फिर भी विश्वासी आराधना के नाम में, हमेशा ही उन बातों को जिन्हें परमेश्वर याद नहीं करना चाहता है, दोहराता रहता है, और परमेश्वर को याद दिलाता रहता है।


उनका उद्देश्य परमेश्वर को ऊँचा दिखाने का तो होता है, किन्तु अपने जीवन और गवाही के द्वारा उसका गुणानुवाद और स्तुति करने के द्वारा नहीं, बल्कि अपने आप को निकृष्ट और अयोग्य दिखाने के द्वारा। वे परमेश्वर की आराधना से संबंधित मूल बात की अनदेखी करते हैं कि आराधना अपना नहीं परन्तु परमेश्वर का बखान करना है। और यदि उन्हें अपने बारे में कुछ कहना भी है तो जैसा ऊपर कहा गया है, वे परमेश्वर द्वारा उनके जीवनों में लाई गई सकारात्मक बातों और आत्मिक उन्नति के अनुभवों के बारे में कह सकते हैं; उनके अपने तथा उनके पारिवारिक जीवनों में जो शान्ति आई है, परमेश्वर ने कैसे उनके लिए मार्ग खोले हैं, उनके लिए कार्य करता है, दैनिक जीवन में जो मार्गदर्शन उन्हें देता है, आदि के बारे में, क्योंकि वे परमेश्वर और उसके वचन का अनुसरण करते हैं। जैसा कि पिछले लेख में कहा गया है, अपने आप को नीचा और योग्य दिखाना, उस उच्च स्तर को, जो परमेश्वर ने प्रदान किया है, अस्वीकार करना, उस पर भरोसा न करना है; और यह एक प्रकार से परमेश्वर में अविश्वास करना है, अप्रत्यक्ष रीति से उसे झूठा कहना है।


परमेश्वर ने हमसे तब भी प्रेम किया है जब हम पापी ही थे, और हमारे उद्धार के लिए मसीह को मरने के लिए भेजने के द्वारा उसे प्रमाणित किया है (रोमियों 5:6-8)। परमेश्वर यह बहुत अच्छे से जानता है कि हम क्या थे और अब क्या हैं; उसने स्वयं ही जगत के तुच्‍छों और मूर्खों को चुना है (1 कुरिन्थियों 1:26-29)। अब भी परमेश्वर हमारे बारे में सब कुछ भली-भांति जानता है, उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है; वह न केवल हमारे विचारों को भी जानता हैं, बल्कि उन विचारों के पीछे की भावनाओं को भी अच्छे से जानता है (1 इतिहास 28:9)। इसलिए अपना वर्णन करने के द्वारा हम किसी भी रीति से परमेश्वर जो पहले से ही जानता है, उसमें कुछ और नहीं बढ़ाते हैं। साथ ही हमें इस बात का भी एहसास करना चाहिए कि अपनी गलतियों, कमियों, और बुराइयों का वर्णन करने के द्वारा हम अपने आप को परमेश्वर का और अधिक प्रिय भी नहीं बनाते हैं।


अगले लेख में हम एक और संबंधित पक्ष को देखेंगे जो  मसीही विश्वासी  के जीवन में उसकी आराधना को व्यर्थ बनाती है - आराधना के उद्देश्य और अभिव्यक्तियों को न जानना।

 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहोशू 16-18           

  • लूका 2:1-24      


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English Translation


Obstacles to Worship (3) - Placing Self Before God


In the previous articles, we have seen two major obstacles that prevent a Christian Believer from truly worshipping God “in spirit and in truth”, as the Lord God desires. The first of these two is not knowing what worship actually is, and substituting it with prayers and with ritualistic methods, quite commonly as congregational singing; and leaving it at that, without having any time of personal fellowship and worship with God. The second, which we saw in the last article is a Believer’s not realizing the high position God has already granted to every truly Born-Again Christian Believer, and continuing to belittle himself through the use of self-demeaning terms and expressions, and expecting it to be counted as worship. Today, we will consider another obstacle to true worship, that is related to the one we have considered in the previous article.


A third commonly seen obstacle for true worship is the tendency of the Believers to talk more about self than about God. In worship, they often start describing themselves, their past as well as present condition, instead of praising or exalting God. Moreover, their self-description is more as self-deprecation, speaking or describing their faults and wrong-doings etc., than speaking of the positive changes and spiritual edification that God has brought in their lives, and made them better. Whereas God assures in His Word that He has cast the Believers sins behind His back, as a dark cloud has blotted them, and will not remember them anymore (Isaiah 38:17; 43:25; 44:22), yet the Believer, in the name of worship, insists on always recalling them before God and keeps reminding Him of what God wants not to remember.

 

They desire to exalt God not by praising and lifting Him up on high through their lives and by witnessing about Him, but by showing themselves lowly and unworthy. They forget the basic thing about worshipping God - speaking about or describing God, not self. Even if they have to speak about themselves, as stated above, they can always speak about the positive changes that have come into their lives, the spiritual edification they have experienced, the peace that has come into their own lives and their families, the way they have experienced God working for them, opening ways for them, His guidance in their every-day life, etc.; all because of their following God and His Word. As pointed out in the previous article, such self-demeaning is not accepting or trusting in the status God has granted to the Believers, and in a way, is disbelieving God and therefore, is also indirectly calling Him a liar.


God has loved us even while we were sinners and proved it by sending Christ to die for us (Romans 5:6-8). God very well knows who we were and who we are; for He Himself has chosen the weak and foolish of the world (1 Corinthians 1:26-29). Even now, God well knows everything about us, there is nothing hidden from Him; He not only knows our thoughts within us but also the intent of those thoughts (1 Chronicles 28:9). So, by describing ourselves, we do not in any way add anything to what God already knows; and we should also realize that neither does our recalling and repeating our faults, shortcomings, and wrong-doings endear us all the more to God.


In the next article, we will look at another related aspect of a Christian Believer’s life that renders worship vain - being unaware of the purpose and proper expressions of worship.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.  


Through the Bible in a Year: 

  • Joshua 16-18

  • Luke 2:1-24



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