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सोमवार, 20 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 86 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 15


पवित्र आत्मा – सत्य का आत्मा – 4

 

    हम मसीही विश्वासियों के परमेश्वर पवित्र आत्मा, जो परमेश्वर के द्वारा उन्हें उसी पल दे दिया जाता है जब वे पापों से पश्चाताप करते हैं, प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं, और अपना जीवन उसे समर्पित कर देते हैं, का भण्डारी होने के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। अभी हम यूहन्ना 14:17 में, पवित्र आत्मा के ‘सत्य का आत्मा’ कहे जाने और इस बात के तात्पर्यों को देख रहे हैं। हम देख चुके हैं कि सत्य का आत्मा होने के नाते, वह कभी किसी भी ऐसी बात के साथ जो किसी भी रीति से, चाहे तात्पर्य में ही हो, गलत या झूठ है, कभी सम्मिलित नहीं होगा। पिछले लेख में हमने देखा और समझा था कि बाइबल के अनुसार उस ‘सत्य’ का क्या अर्थ है जिसके साथ पवित्र आत्मा सम्मिलित होगा, और जिसके आगे वह कभी नहीं जाएगा – वह है परमेश्वर का वचन। हमने पिछले लेख में 2 पतरस 1:3 से यह भी देखा था कि जीवन और भक्ति से सम्बन्धित प्रत्येक बात जो मसीही विश्वासी के लिए आवश्यक है, उसे पहले ही परमेश्वर के वचन में प्रभु यीशु की पहचान के द्वारा दे दी गई है। जो परमेश्वर के वचन में दे दिया गया है, मसीही विश्वासी को उस से अधिक न तो किसी बात की आवश्यकता है, और न ही उसे परमेश्वर की ओर से दिया जाएगा। इसलिए विश्वासी के जीवन और भक्ति से संबंधित ऐसी कोई भी बात जो पहले से ही वचन में लिखी हुई नहीं है, वह सत्य नहीं है, परमेश्वर से नहीं है। आज हम इसी तथ्य के अभिप्राय और व्यवहारिक उपयोग के बारे में और आगे देखेंगे।


    परमेश्वर पवित्र आत्मा कभी भी किसी भी असत्य – अर्थात वह जो परमेश्वर के वचन बाइबल में पहले से ही दिया नहीं गया है, के साथ कभी भी सम्मिलित नहीं होगा – न तो उसे दिए जाने में, न ही उसे सिखाए जाने में, और न ही उसका किसी भी रीति से किसी के जीवन या सेवकाई में उपयोग किए जाने में। पवित्र आत्मा ही, अपनी प्रेरणा और मार्गदर्शन देने के द्वारा, परमेश्वर के वचन का मूल लेखक है। बाइबल की पुस्तक लिखने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने यह कार्य उसे उपलब्ध करवाई गई परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा ही किया है (2 तीमुथियुस 3:16)। इसीलिए वह जो सत्य नहीं है, अर्थात बाइबल का तथ्य नहीं है, उसके साथ पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और मार्गदर्शन कभी भी सम्मिलित नहीं हो सकता है, चाहे उसे प्रस्तुत करने वाला उस बात को जाने अथवा अनजाने में बाइबल की ही बात क्यों न कहे।


    इसका यह अर्थ हुआ कि वह पवित्र आत्मा था जिसने मानवीय लेखकों से सुसमाचारों में तथा बाइबल की अन्य पुस्तकों में वह लिखवाया जो हमारे हाथों में उपलब्ध है। सुसमाचारों के सन्दर्भ में, उसी ने, इन मानवीय लेखकों के द्वारा प्रभु यीशु मसीह की पृथ्वी की सेवकाई के समय उसने जो कहा और सिखाया उन शब्दों में से लेकर लिखवा दिए, कि हमारे लिए परमेश्वर के वचन में ‘प्रभु यीशु द्वारा कहे गए शब्द’ के रूप में उपलब्ध हों। पवित्र आत्मा का एक गुण और कार्य है कि यद्यपि वह विश्वासियों को आने वाली बातों के बारे में बताता है, लेकिन जो उसने पहले ही बाइबल की पुस्तकों में लिखवा दिया है उसमें वह अपनी ओर से कुछ अतिरिक्त कभी नहीं जोड़ता है। इसी प्रकार से, यद्यपि वह मसीही विश्वासियों को वह स्मरण करवाता है जो प्रभु यीशु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई के दौरान कहा और सिखाया है, जिसे उसने वचन में लिखवा दिया है, लेकिन यह करते हुए वह कभी भी प्रभु की पहले से लिखित बातों में कुछ नहीं जोड़ता है (यूहन्ना 16:13-15)। इस तथ्य को हमेशा ही ध्यान में बनाए रखना, किसी भी गलत शिक्षा या झूठी बात को पहचानने और समझने के लिए, जिसे परमेश्वर से मिले प्रकाशन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, अत्यंत अनिवार्य है; चाहे यह दावा करने वाला विश्वासी हो या कोई अन्य।


    इसीलिए हमारे पास प्रेरितों 17:11 और 1 थिस्सलुनीकियों 5:21 के निर्देश हैं, जो हम से आग्रह करते हैं – कभी किसी बात को यूं ही नहीं मान लो; कभी भी प्रचारक या शिक्षक के भक्त चरित्र, नाम, प्रसिद्धि, लोकप्रियता आदि से प्रभावित होकर उसकी हर बात को यूं ही स्वीकार मत करो। मसीही विश्वासियों को हमेशा ही परमेश्वर के वचन का उपयोग करना है प्रत्येक बात को जाँचने, परखने, और यदि उस बात की पुष्टि हो जाए, वह खरी हो तभी उसे स्वीकार करने के लिए। यह कथन आवश्यकता से अधिक प्रतीत हो सकता है, लेकिन हमें यह याद रखने की आवश्यकता है कि शैतान ‘ज्योतिर्मय स्वर्गदूत’ के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करता है, और उसके सेवक झूठे प्रेरित, छल के काम करने वाले, मसीह के प्रेरितों का रूप धरने वाले, और धर्म के सेवक बनकर आते हैं कि मसीही विश्वासियों को बहका और भरमा सकें (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15)।


    परमेश्वर का वचन हमें दिखाता और सिखाता है कि परमेश्वर के जाने-पहचाने लोगों ने भी ऐसी बातें कहीं और की हैं जो गलत थीं, झूठी थीं, तथा उन बातों से औरों को भी अपनी गलतियों में फँसा लिया है। इस के कुछ उदाहरण हम अगले लेख में देखेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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Holy Spirit – The Spirit of Truth – 4

 

    We are studying Christian Believer’s being stewards of God the Holy Spirit, given to them by God at the moment of their repenting of their sins, accepting the Lord Jesus as their savior, and surrendering their lives to Him. We are presently considering God the Holy Spirit being called the ‘Spirit of Truth’ in John 14:17, and its implications. We have seen that as the Spirit of Truth, He will never, in any manner, even in implications, be associated with anything that is false or wrong. In the last article we have seen and understood from the Bible what Biblically is the ‘Truth’ that with which the Holy Spirit will be associated with, and will never go beyond that – the Word of God. In the last article, on the basis of 2 Peter 1:3, we have seen that everything that pertains to life and godliness has already been given to the Christian Believers in God’s Word through the knowledge of Christ Jesus. There is nothing more that is required or will be given to him from God, over and beyond what has already been given in God’s Word. Therefore, anything pertaining to the Believer’s life and godliness, that is not already mentioned in God’s Word, is not true, is not from God. Today we will consider further the implications and practical applications of this fact.


    God the Holy Spirit will never be associated in any way with the untruth, i.e., that which has not already been given in God’s Word the Bible - neither in giving it, nor in teaching it, nor in putting it to use in any manner in anyone’s life and ministry. The Holy Spirit, through His inspiration and guidance, is the actual author of God’s Word. Every person who wrote the books of the Bible, did so through the power of the Holy Spirit of God made available to him for writing it down (2 Timothy 3:16). That is why we cannot have the guidance and power of the Holy Spirit, in anything that is not the truth, i.e., is not a Biblical fact, though it may be presented as a Biblical fact, knowingly or unknowingly.


    This means that it was the Holy Spirit who had the human authors of the Gospels record all that is recorded for us in the Gospels and all the other books of the Bible. In context of the Gospels, it was He, who had these human authors write down from the words that the Lord Jesus spoke during His ministry on earth, to be made available to us as ‘words spoken by the Lord Jesus’ in the Word of God. One of the functions and characteristics of the Holy Spirit is that though He does tell the Believers about the things to come, but He never adds anything extra from His own side to what He has already got recorded in the books of the Bible. Similarly, though He reminds the Christian Believers of what the Lord Jesus has taught and said during His earthly ministry, as He got it written in the Word, but in doing so He does not ever add to the already written words of the Lord (John 16:13-15). Always bearing this fact in mind is of paramount importance to be able to recognize and discern the various wrong teachings and false statements claimed to be received as revelations from God by anyone, Believers or, otherwise.


    That is why we have the instructions of Acts 17:11 and 1 Thessalonians 5:21, exhorting us - do not ever assume anything; never ever get carried away by the godly character, name, fame, popularity of the preacher or the teacher. The Christian Believers are to always use the Word of God to first check and confirm each and everything being preached and taught to them; and only accept and believe if it could be verified from God’s Word. While this may seem to be an excessive statement, but we need to remember that Satan transforms himself into an ‘angel of light’, and his angels masquerade as false apostles, deceitful workers, apostles of Christ, and ministers of righteousness, to deceive and mislead the Christian Believers (2 Corinthians 11:3, 13-15).


    God’s Word shows and teaches us that even the known people of God, knowingly or unknowingly said and did things that were wrong, were false, and misled others into following their error. We will consider some examples of this in the next article.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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