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बुधवार, 15 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 81 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 10

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पवित्र आत्मा – हमेशा हमारे साथ - 2

 

    हम मसीही विश्वासी के परमेश्वर द्वारा उसे सौंपे गए संसाधनों का भण्डारी होने के बारे में अध्ययन करते आ रहे हैं। इस में परमेश्वर पवित्र आत्मा भी सम्मिलित है, जो मसीही विश्वासी के प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करते ही उसी पल से उस में आ कर निवास करने लगता है। हमने यूहन्ना 14:16 से देखा है कि पवित्र आत्मा को परमेश्वर द्वारा मसीही विश्वासी को दिया गया है, कि उनका सहायक, उनका साथी हो, उनकी सेवकाई में उनका मार्गदर्शन करे, उन्हें सिखाए, और हमेशा उनके साथ बना रहे। विश्वासी का सहायक और साथी होने की पवित्र आत्मा की भूमिका को देखने के बाद, पिछले लेख से हमने परमेश्वर पवित्र आत्मा का उनमें निवास करने, विश्वासी का उनका मन्दिर होने के बारे में 1 कुरिन्थियों 3:16; 6:19-20 से देखना आरम्भ किया है। इन पदों से एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य, उसके दो परिणाम, और विश्वासी की ज़िम्मेदारी के बारे में पता चलता है। तथ्य, जिसे हम पिछले लेख में देख चुके हैं, है कि परमेश्वर ही प्रत्येक विश्वासी को पवित्र आत्मा प्रदान करता है, उसके आत्मिक स्तर और परिपक्वता, आत्मिक आयु, शारीरिक आयु, और उसके सेवकाई चाहे कुछ भी हो। आज हम दो परिणामों को देखेंगे।


    हम 1 कुरिन्थियों 6:19-20 से देखते हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के उन में निवास करने के दो परिणाम हैं; पहला है कि वे पवित्र आत्मा का मन्दिर है, और दूसरा है कि अब वे अपने नहीं है बल्कि परमेश्वर की संपत्ति हैं, क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हैं – प्रभु यीशु के लहू और जीवन के द्वारा।


    मसीही विश्वासी का पवित्र आत्मा का मन्दिर होने के उद्देश्य को हम कैसे समझ सकते हैं? प्रभु यीशु ने परमेश्वर के मन्दिर के उद्देश्य को यूहन्ना 2:14-17 में और फिर मत्ती 21:13 बताया है। हम यूहन्ना 2:14-17 से सीखते हैं कि मन्दिर व्यापार का स्थान होने के लिए नहीं था, अर्थात ऐसा स्थान जहाँ से लोगों का कोई शोषण किया जाए, और परमेश्वर के नाम में साँसारिक सम्पत्ति कमाई जाए। और मत्ती 21:13 से हम सीखते हैं कि मंदिर को प्रार्थना का स्थान होना था, वह स्थान जहाँ व्यक्ति परमेश्वर के साथ संपर्क कर सके, उस से वार्तालाप कर सके। प्रभु के इन कथनों से हम समझ सकते हैं कि एक विश्वासी को, परमेश्वर का मन्दिर होने के नाते, संसार के समक्ष कैसा होना चाहिए। विश्वासी को परमेश्वर द्वारा उसे दी गई सेवकाई और प्रभु के नाम का उपयोग साँसारिक सम्पत्ति कमाने के लिए नहीं करना चाहिए। वरन, उसे लोगों को परमेश्वर की ओर मार्गदर्शन करने वाला, उस से संपर्क में लाने वाला – लोगों तक सुसमाचार को पहुँचाने वाला; उन्हें साँसारिक नहीं बल्कि अनन्तकालीन स्वर्गीय आशीषों की ओर ध्यान करवाने वाला होना चाहिए।


    विश्वासी के अब अपना नहीं रहने, वरन परमेश्वर की सम्पत्ति हो जाने, क्योंकि उसे प्रभु यीशु के जीवन की कीमत पर लिया गया है (1 थिस्सलुनीकियों  5:10; तीतुस  2:14), को समझने के लिए, दो पदों पर विचार कीजिए: “तुम दाम देकर मोल लिये गए हो, मनुष्यों के दास न बनो” (1 कुरिन्थियों 7:23), और “और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15)। हम 1 कुरिन्थियों 7:23 से सीखते हैं कि क्योंकि विश्वासी प्रभु का है, उसकी संपत्ति है, इसलिए उसे अपने आप को किसी मनुष्य की अधीनता में नहीं देना है; प्रभु की सेवकाई में होने के नाते, उसे मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला नहीं बनना है (गलातियों 1:10)। हम 2 कुरिन्थियों 5:15 से सीखते हैं कि विश्वासी को अपने लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए जीना है, अर्थात प्रभु की इच्छा को जान कर (इफिसियों 5:17), केवल उसी को पूरा करने के लिए जीना है, न कि लोगों के अनुसार और उन्हें प्रसन्न करने के लिए।


    शैतान विभिन्न युक्तियों और प्रलोभनों, और अन्य बातों के द्वारा विश्वासी को परमेश्वर की संपत्ति और पवित्र आत्मा का मन्दिर होने के उद्देश्य को पूरा करने से बाधित करता है। अगले लेख में हम विश्वासी के लिए 1 कुरिन्थियों 6:20 में कही गयी ज़िम्मेदारी, शरीर और आत्मा द्वारा परमेश्वर की महिमा करने के बारे में देखेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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Holy Spirit – Always With Us – 2

 

    We have been studying the Christian Believer’s stewardship of the provisions God has given him, including stewardship of the Holy Spirit, who comes to reside in every Believer from the moment he accepts the Lord Jesus as his savior. We have seen from John 14:16 that the Holy Spirit has been given to the Christian Believers by God to be their Helper and Companion, to teach and guide them in their ministry; and to always be with them. Having seen about His role as the Believer’s Helper and Companion, since the last article we have begun to see about the Holy Spirit being with the Believers; the Believers being His Temple, and God the Holy Spirit residing in them from 1 Corinthians 3:16; 6:19-20. These verses imply one very important fact, its two consequences, and responsibilities of the Believer. The fact, that we have considered in the previous article, is that it is God who gives the Holy Spirit to every Believer irrespective of their spiritual status, physical or spiritual age, maturity, and the ministry God has given to them. Today we will consider the consequences, as stated in these verses.


    From 1 Corinthians 6:19-20, for every Believer, the two consequences of having God the Holy Spirit residing in them are, firstly they are Temple of the Holy Spirit, and secondly, they are no longer his own, they now belong to God, having been bought with a price – the blood and life of Lord Jesus.


    How do we understand the Believer’s being the Temple of God the Holy Spirit? The Lord Jesus stated the purpose of the Temple of God in John 2:14-17 and Matthew 21:13. From John 2:14-17 we learn that it was not meant to be a place of merchandise, i.e., of exploiting people and earning temporal riches in the name of God; and from Matthew 21:13 we learn that it was meant to be a house of prayer, a place where one can commune with God. From the Lord’s statements we can understand what the Believer should be before the world, as the Temple of the Holy Spirit. The Believer should not use his God given ministry and the Lord’s name to earn worldly wealth, but should be one who helps and guides the people of the world to come in touch with and commune with God – to be the bearer of the Gospel for the people of the world, and pointing them towards eternal heavenly riches, instead of earthly possessions.


    To understand the Believer no longer being his own, but being a possession of God, since he has been bought at the cost of the life of the Lord Jesus (1 Thessalonians 5:10; Titus 2:14), the consider two verses: “You were bought at a price; do not become slaves of men” (1 Corinthians 7:23), and “and He died for all, that those who live should live no longer for themselves, but for Him who died for them and rose again” (2 Corinthians 5:15). From 1 Corinthians 7:23 we understand that since the Believer belongs to the Lord, therefore, he is not to put himself into the subjugation of any man; being in the service of the Lord he is not to be a ‘man-pleaser’ (Galatians 1:10). From 2 Corinthians 5:15 we learn that the Believer is to live not for himself, but for the Lord, i.e., to know the will of the Lord (Ephesians 5:17), and live to do only that which pleases the Lord, instead of living according to men and trying to please the people.


    Satan, in various ways, tries various ploys, temptations and other things, to make the Believers not fulfil these functions of being the Temple of the Holy Spirit and the possession of God. In the next article we will see about the responsibility of a Believer mentioned in 1 Corinthians 6:20 – glorify God in body and spirit.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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