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शुक्रवार, 12 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 10 - David's Census / दाऊद द्वारा जन-गणना

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दाऊद द्वारा जनगणना - परमेश्वर की ओर से अथवा शैतान की ओर से?


    प्रश्न: दाऊद द्वारा जनगणना के लिए कौन ज़िम्मेदार – परमेश्वर (2 शमूएल 24:1) या शैतान (1 इतिहास 21:1)?

 

उत्तर:

 2 शमूएल 24:1 “और यहोवा का कोप इस्राएलियों पर फिर भड़काऔर उसने दाऊद को इनकी हानि के लिये यह कहकर उभाराकि इस्राएल और यहूदा की गिनती ले।

1 इतिहास 21:1 “और शैतान ने इस्राएल के विरुद्ध उठ करदाऊद को उकसाया कि इस्राएलियों की गिनती ले।

    यह दोनों खण्ड परस्पर विरोधाभास प्रतीत में होते हैं, क्योंकि पढ़ते ही लगता है कि 2 शमूएल 24:1 में यह कार्य यहोवा ने करवाया, और 1 इतिहास 21:1 से लगता है कि वही कार्य शैतान ने करवाया – इसलिए असमंजस होता है।


    बात को समझने से पहले यह ध्यान रखना आवश्यक है कि परमेश्वर शैतान को भी अपनी योजनाओं की पूर्ति में प्रयोग कर सकता है, किन्तु साथ ही वह पहले से ही शैतान द्वारा अपने लोगों के विरुद्ध कुछ कर पाने की सीमाएं भी निर्धारित और स्थापित कर देता है, जैसा कि हम अय्यूब के जीवन से तथा प्रभु यीशु के द्वारा शिष्यों से अपने पकड़वाए जाने से पहले के वार्तालाप में देखते हैं (अय्यूब 1:12; 2:6; लूका 22:31-32)। साथ ही परमेश्वर पहले ही इस्राएलियों को यह चेतावनी दे चुका था कि यदि उसके लोग, उसके साथ बाँधी गई वाचा को तोड़ेंगे, तो वह भी उनसे अपना मुँह छुपा लेगा (व्यवस्थाविवरण 31:16-17), यदि वे उसे अपनी मूर्खता या व्यर्थ बातों से रिस दिलाएंगे, तो वह भी उन्हें मूर्खता के लिए रिस दिलाएगा (व्यवस्थाविवरण 32:21)। एक अन्य तथ्य जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है, वह है कि जनगणना के दोनों ही वृतांतों से यह प्रकट है कि प्राथमिक दोष इस्राएली प्रजा का था, और दाऊद फिर इसमें खिंच गया, तथा मूर्खता करने के लिए उकसाया गया।


    अब हम 2 शमूएल 24:1 पर आते हैं – हम इसके सन्दर्भ, इससे पिछले अध्याय, अध्याय 23, से समझने पाते हैं कि यह घटना दाऊद के राज्य के बाद के समय के उन वर्षों की है, जब वह उस पूरे क्षेत्र में, अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भी, और अपनी प्रजा में भी, एक महान, प्रबल, और शक्तिशाली राजा स्थापित हो चुका था। अध्याय 23 उसके शूरवीर सेनापतियों और सैनिकों, सेना-नायकों और उनके पराक्रम के कार्यों आदि का भी वर्णन करता है। इस पृष्ठभूमि के साथ हम आगे देखते हैं कि इस अध्याय (2 शमूएल 24) का आरंभ “और यहोवा का कोप इस्राएलियों पर फिर भड़का” शब्दों के साथ होता है। अर्थात इस्राएल तथा दाऊद के जीवनों में कुछ ऐसा आ गया था जिस से परमेश्वर उनसे क्रुद्ध हुआ, और उसे इस्राएल तथा उसके राजा को कुछ पाठ सिखाने की आवश्यकता हुई। इन तथ्यों के आधार पर जो विचार सामने आता है वह यह है कि यद्यपि समस्त इस्राएल में सुरक्षा, निश्चिंतता, और समृद्धि का माहौल था, किन्तु अब उन्हें अपनी इस सुरक्षा, निश्चिंतता, और समृद्धि का कारण उनपर बनी रहने वाली परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह नहीं, वरन उनके महान राजा तथा उसके शूरवीर, पराक्रमी सेनापतियों और विशाल सेना के कार्य और प्रताप दिखने लग गए थे। संभवतः यही भावना, अर्थातप्रजा के लोगों और सेना की संख्या एवं सामर्थ्य में घमण्डया तो राजा दाऊद में भी आ गई थीअन्यथा आने लगी थी। तभी, एक तो, उसके सेनापति योआब ने उसे समझाने और जनगणना न करने की सलाह दी परंतु दाऊद नहीं मानाऔर योआब को जनगणना के लिए जाना पड़ा (2 शमूएल 24:2-4; 1 इतिहास 21:2-4); और दूसरेयह जनगणना करवाने के लिए दाऊद बाद में अपने आप को दोषी बता कर पश्चाताप भी करता है (2 शमूएल 24:10; 1 इतिहास 21:8)।


    इस्राएलियों के द्वारा परमेश्वर के स्थान पर पराक्रमी दाऊद और उसकी शूरवीर सेना को अपनी सुरक्षा, निश्चिंतता, और समृद्धि का आधार समझ लेना, और दाऊद का भी, जो परमेश्वर को इतनी निकटता से जानता था, शैतान की बात पर ध्यान लगाना, चिताए जाने पर भी नहीं सुधारना, शैतान के बहकावे में आ जाना और इस संबंध में परमेश्वर की इच्छा आ पता न करनापरमेश्वर को बुरा लगा (1 इतिहास 21:7)। दाऊद जब तक शाऊल से जान बचा कर भाग रहा था, वह अपनी हर बात के लिए परमेश्वर से पूछा करता था। जब राजा बनकर सुरक्षित तथा आदरणीय हो गया तो निश्चिन्त होकर अपने आप पर भरोसा करने लग गया – वाचा के संदूक को यरूशलेम लाने का निर्णय लेना (2 शमूएल 6:1-8), मंदिर बनवाने का निर्णय लेना (1 इतिहास 17:1-4)इस जनगणना का आदेश देना, बतशेबा के साथ व्यभिचार और उसके पति ऊरिय्याह की हत्या करवाना (2 शमूएल 23:7-10), आदि उसकी इस प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। परमेश्वर को हलके में लेने और उसके आदर तथा महिमा को चुराने के दोषी दाऊद और उसकी प्रजा दोनों ही थे, और परमेश्वर अपने आदर और महिमा के विषय बहुत विशिष्ट रहता है तथा जलन रखता है (यशायाह 42:8; 48:11; भजन 50:21-22)इसलिए परमेश्वर को दाऊद और उसकी प्रजा के लोगों, दोनों ही को यह पाठ पढ़ाना पड़ा (मलाकी 2:2)। शैतान हमेशा अवसर की तलाश में रहता है कि परमेश्वर के लोगों में कोई अनुचित अभिलाषा उत्पन्न हो, और वह उनकी उस अनुचित अभिलाषा की चिंगारी को भड़का कर उन्हें ही भस्म कर देने वाली आग बना दे (याकूब 1:12-15)। दाऊद और उसकी प्रजा ने परमेश्वर के बाड़े की मर्यादा को तोड़ा, उसकी सुरक्षा के बाहर आए, और सर्प ने उन्हें डस लिया (सभोपदेशक 10:8)। 


    दाऊद और उसकी प्रजा के लोगों को यह पाठ पढ़ाने के लिए परमेश्वर ने शैतान को दाऊद को उकसा लेने दिया कि वह दाऊद से जनगणना करवाए (इतिहास 21:1) – जनगणना करवाने के पश्चात दाऊद को अपनी गलती का एहसास हुआ, और उसे बहुत पछतावा भी हुआकिन्तु उसे तथा प्रजा को ताड़ना भी सहनी पड़ी। उस जनगणना के परिणामों के द्वारा परमेश्वर इस्राएलियों और दाऊद को यह दृढ़ता से सिखाने पाया कि उनकी सुरक्षा उनके सैनिकों की संख्या और पराक्रम, राजा के महान होने में नहीं हैवरन परमेश्वर स्वयं उनकी सुरक्षा और सहायता, उनकी निश्चिंतता का आधार हैउसके अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति या बात में इस सुरक्षा का भरोसा रखना न केवल खतरनाक हैवरन हानिकारक भी है – और यही शिक्षा आज हमारे लिए भी है।


 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


David’s Census - From God or From Satan?


Question: Who is responsible for the census ordered by David – God (2 Samuel 24:1), or Satan ( 1 Chronicles 21:1)?

 Answer:

2 Samuel 24:1 Again the anger of the Lord was aroused against Israel, and He moved David against them to say, "Go, number Israel and Judah."

1 Chronicles 21:1 Now Satan stood up against Israel, and moved David to number Israel.

 These verses appear to be contradictory, because on reading them the first thought that comes to mind is that in 2 Samuel 24:1, apparently it was God who got this thing done; whereas in 1 Chronicles 21:1 is seems that it was Satan who got this done – creating a confusion.

Before analyzing the situation to come to is understanding, it is necessary that we keep in mind the fact that God can use Satan too to accomplish His purposes, but He also sets and establishes the limits for Satan before he does anything against God’s people, as we see from the life of Job and the Lord Jesus’ conversation with His disciples before His being caught (Job 1:12; 2:6; Luke 22:31-32). Moreover, God had already warned His people, the Israelites, that if they break their covenant with Him, then He will hide His face from them (Deuteronomy 31:16-17), and if they provoke Him by their foolishness and vain works, He too would provoke them by foolish things (Deuteronomy 32:21). Another fact to be kept in mind is that from both accounts of the census, it is apparent that primarily the people of Israel were at fault, and David got involved secondarily, he was provoked into doing something  foolish.

Now let us come to 2 Samuel 24:1 – from its context, i.e., the previous chapter, chapter 23, we are able to understand that this incidence occurred at the latter time of David’s reign, during the years when he had become a great, powerful and dominant king of that region, not just within his own kingdom and people, but also amongst the surrounding kingdoms as well. Chapter 23 also tells us about his valiant military leaders and Generals, and their valiant deeds as well. With this background, we see that this chapter (2 Samuel 24) begins with the words “Again the anger of the Lord was aroused against Israel.” So, we can surmise that something had come into the lives of the Israelites and David, that angered God, and it became necessary for Him to teach Israel and David a lesson. From these aforementioned facts, the situation that comes to mind is that although throughout Israel there was an atmosphere of security, contentment, and prosperity, but now they thought of this security, contentment, and prosperity as not a result of God’s benevolence and grace upon them, but because of their great King and his mighty, valiant army and military leaders. Quite likely this feeling, of security because of the large count of his people, his huge army, and the valor of his army and its leaders had brought, or was bringing pride in David as well. That is why, firstly his General Joab tries to reason with him against doing this census, but is unsuccessful and has to go for it (2 Samuel 24:2-4; 1 Chronicles 21:2-4); and, secondly, after the census David holds himself guilty and repents of doing this (2 Samuel 24:10; 1 Chronicles 21:8).

Because of the Israelite’s shifting their confidence regarding their security, contentment, and prosperity to their great and powerful King and his valiant army, and David, who knew God so well and closely, too paying attention to the thoughts being given by Satan, his not paying heed to the warnings against doing so, not first asking God about doing it, and his succumbing to the provocation of Satan, displeased God (1 Chronicles 21:7). As long as David was running for his life from Saul, he consulted God about all his decisions. But now that he had become honorable, the King over all Israel, he became complacent and started to take decisions on his own – his deciding to carry the Ark of the Covenant to Jerusalem (2 Samuel 6:1-8), the ordering of this census, his act of adultery with Bathsheba and murdering her husband Uriah (2 Samuel 23:7-10), etc. are all examples of this complacency that had crept into him. David and Israel were guilty of taking God for granted and lightly, and denying God His glory and honor. God is very particular and jealous of His glory and honor and does not take its being disregarded lightly (Isaiah 42:8; 48:11; Psalms 50:21-22). Therefore, God had to teach the lesson, to both, Israel and David (Malachi 2:2). 

Satan is always on the lookout; the moment some inappropriate or wrong desire crops up in the hearts of God’s people, he immediately steps in to stir it up into a flame that will severely harm the Believer (James 1:12-15). Israel and David broke the sanctity of God’s wall and stepped out of it, and immediately the serpent bit them (Ecclesiastes 10:8). To teach this lesson to David’s people and to David, God allowed Satan to provoke him (1 Chronicles 21:1). After the census, David realized his grave error and was very penitent for it too, but he and his people had to go through the chastening. 

Through the consequences of that census God had to firmly teach Israel and David that their security, contentment, prosperity, and help was neither in the number of the people, nor in the strength and valor of their army and the greatness of their King. But it is God and God alone who is their security, the cause of their contentment and prosperity. For God’s people to trust in anyone or anything else is not only dangerous, but is also very harmful – and this is a lesson for us today as well.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

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