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मंगलवार, 15 नवंबर 2022

पवित्र आत्मा प्राप्त करने के विषय भ्रामक शिक्षाएँ (ज़ारी) / Wrong Teachings Regarding Receiving the Holy Spirit (Contd.)


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अन्य-भाषाएं - परमेश्वर से बातें करना नहीं है (1)


हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 


पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखने के बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखना आरंभ किया है। हम देख चुके हैं कि प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के नया जन्म या उद्धार पाते ही, तुरंत उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी संपूर्णता में आकर उसके अंदर निवास करने लगता है, और उसी में बना रहता है, उसे कभी छोड़ कर नहीं जाता है; और इसी को पवित्र आत्मा से भरना या पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाना भी कहते हैं। वचन स्पष्ट है कि पवित्र आत्मा से भरना या उससे बपतिस्मा पाना कोई दूसरा या अतिरिक्त अनुभव नहीं है, वरन उद्धार के साथ ही सच्चे मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा का आकर निवास करना ही है। इन गलत शिक्षकों की एक और बहुत प्रचलित और बल पूर्वक कही जाने वाले बात है “अन्य-भाषाओं” में बोलना, और उन लोगों के द्वारा “अन्य-भाषाओं” को अलौकिक भाषाएं बताना, और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग के द्वारा इससे संबंधित कई और गलत शिक्षाओं को सिखाना। इसके बारे में भी हम देख चुके हैं कि यह भी एक ऐसी गलत शिक्षा है जिसका वचन से कोई समर्थन या आधार नहीं है। प्रेरितों 2 अध्याय में जो अन्य भाषाएं बोली गईं, वे पृथ्वी ही की भाषाएं और उनकी बोलियाँ थीं; कोई अलौकिक भाषा नहीं। हमने यह भी देखा था कि वचन में इस शिक्षा का भी कोई आधार या समर्थन नहीं है कि “अन्य-भाषाएं” प्रार्थना की भाषाएं हैं। इस गलत शिक्षा के साथ जुड़ी हुई इन लोगों की एक और गलत शिक्षा है कि “अन्य-भाषाएं” बोलना ही पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण है, जिसके भी झूठ होने और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग पर आधारित होने को हमने पिछले लेख में देखा है। पिछले लेख में हमने यह भी देखा था कि उन लोगों के सभी दावों के विपरीत, न तो प्रेरितों 2:3-11 का प्रभु के शिष्यों द्वारा अन्य-भाषाओं में बोलना कोई “सुनने” का आश्चर्यकर्म था; न ही अन्य भाषाएं प्रार्थना करने की गुप्त भाषाएँ हैं; और न ही ये पृथ्वी की ही अन्य स्थानों की भाषाएँ किसी को भी यूं ही दे दी जाती हैं, जब तक कि व्यक्ति की उस स्थान पर सेवकाई न हो, जहाँ की भाषा बोलने की सामर्थ्य उसे प्रदान की गई है। आज हम अन्य-भाषाएं बोलने से संबंधित कुछ अन्य गलत शिक्षाओं के बारे में देखेंगे। 

क्या अन्य-भाषा में बोलना परमेश्वर से सीधे बात करना है?

एक और दावा जो ये पवित्र आत्मा और अन्य-भाषाएँ बोलने से संबंधित गलत शिक्षाएं देने वाले करते हैं, है कि व्यक्ति अन्य-भाषा बोलने के द्वारा सीधे परमेश्वर से बात करता है। आज हम इसके बारे में देखेंगे। 


पवित्र आत्मा और अन्य-भाषा बोलने से संबंधित एक अन्य गलत और पूर्णतः निराधार एवं झूठी शिक्षा यह भी कही जाती है कि 1 कुरिन्थियों 14:2 के अनुसार, जो अन्य भाषा में बोलता है, वह मनुष्यों से नहीं, वरन सीधे परमेश्वर से बातें करता है। यह कहने के द्वारा वे न केवल यहाँ प्रयोग किए गए व्यंग्य या कटाक्ष की, ताना मारने की अनदेखी कर देते हैं, वरन वचन को उसके संदर्भ से बाहर लेकर गलत अर्थ देने के भी दोषी ठहरते हैं। हम पहले देख चुके हैं कि अन्य-भाषा बोलना भी परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा दिया जाने वाला एक आत्मिक वरदान है, जो अन्य आत्मिक वरदानों के समान हर किसी को नहीं दिया जाता है, वरन सभी को उनकी निर्धारित सेवकाई के अनुसार भिन्न-भिन्न वरदान दिए जाते हैं (1 कुरिन्थियों 12:7-11, 29-30)। क्योंकि कुरिन्थुस की मण्डली के कुछ लोग भी मुँह से विचित्र निरर्थक ध्वनियाँ निकालने के द्वारा मण्डली के अन्य लोगों को अलौकिक भाषा बोलने के दावे के द्वारा प्रभावित करने में लगे हुए थे, इसीलिए पवित्र आत्मा ने पौलुस द्वारा उनकी इस बात पर ताना मारते हुए यह बात कही, जिसका सामान्य शब्दों में अभिप्राय है, “उन लोगों की ये इस प्रकार की ‘अन्य-भाषाएँ’ किसी मनुष्य की समझ में तो आती नहीं हैं; किसी को पता ही नहीं चलने पाता है कि वे क्या भेद की बातें बोल रहे हैं। वे तो अपने आप को सामान्य लोगों से उच्च और भिन्न स्तर का दिखते हैं, इसलिए मनुष्य नहीं संभवतः परमेश्वर ही समझ पाएगा कि वे क्या कह रहे हैं।” उनकी यह बात, यह दावा, किसी आत्मिक वरदान का व्यक्तिगत रीति से उपयोग, बिना उसके द्वारा कलीसिया की उन्नति अथवा किसी एनी का लाभ हुए, आत्मिक वरदानों के औचित्य के बिलकुल विपरीत है (1 कुरिन्थियों 12:7; 14:5, 12); परमेश्वर के वचन के विरुद्ध है।


उन लोगों द्वारा अलौकिक भाषाएं बोलने के दावे के संदर्भ में भी पवित्र आत्मा ने पौलुस प्रेरित के द्वारा लिखवा दिया, “यदि मैं मनुष्यों, और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं, और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झनझनाती हुई झांझ हूं” (1 कुरिन्थियों 13:1)। अर्थात, परमेश्वर की दृष्टि में महत्व पृथ्वी की अथवा अलौकिक भाषा बोल पाने का नहीं है, महत्व प्रेम को दिखाने और मिल-जुल कर प्रेम से रहने का है; और इसके विषय वह 11 अध्याय में, प्रभु-भोज के दर्शन समझाते समय भी उन से कह चुका था, उनमें ऊँच-नीच और बड़े-छोटे होना दिखाने की प्रवृत्ति की भर्त्सना कर चुका था। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए, पौलुस इस पद में होकर इस बात पर बल दे रहा है कि महत्त्व साथ मिलकर प्रेम के साथ रहने का है, न कि “अन्य-भाषा” बोलने के द्वारा अपने आप को विशेष दिखाने और दूसरों पर अपने किसी रीति से बड़े होने को दिखाने का।

 

साथ ही इस बात पर भी ध्यान करें, कि 1 कुरिन्थियों 14:9 जो लिखा है, उसे ये गलत शिक्षाएं फैलाने वाले कभी सामने नहीं लाते हैं, कभी नहीं बताते हैं, क्योंकि यह पद उनके परमेश्वर से बातें करने के दावों की पोल खोल देता है। वहाँ लिखा है “ऐसे ही तुम भी यदि जीभ से साफ साफ बातें न कहो, तो जो कुछ कहा जाता है वह क्योंकर समझा जाएगा? तुम तो हवा से बातें करने वाले ठहरोगे” (1 कुरिन्थियों 14:9)। स्पष्ट है कि जो भी बोला जाए वह अस्पष्ट या समझा न जाने वाला नहीं होना चाहिए, वरन सुनने वालों (परमेश्वर नहीं, वरन सुनने वाले मनुष्यों) की समझ में आने वाली बात ही होनी चाहिए, जैसे प्रेरितों 2:3-11 में  थी - लोगों को समझ आ रहा था कि उनकी ही भाषाओं में कहा जा रहा है, परमेश्वर के बड़े-बड़े कामों की चर्चा की जा रही है। इस पद के अंत के वाक्य पर ध्यान कीजिए, “...तुम तो हवा से बातें करने वाले ठहरोगे।” यदि पद 2 में उन लोगों के द्वारा विचित्र और निरर्थक ध्वनियाँ निकालना परमेश्वर से बातें करना था, तो फिर यहाँ लिखी गई यह बात कैसे संभव है? पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस प्रेरित यह बात कैसे लिख सकता है, क्योंकि यह तो परमेश्वर से बातें करने की बात के विपरीत और उसका अपमान करना है? या तो पद 2 में परमेश्वर से बात करना सही है, या फिर पद 9 में हवा से बातें करना सही है। दोनों तो एक साथ सही तब ही होंगे जब पद 2 की बात एक ताना है, और पद 9 की बात वास्तविकता है। अर्थात, स्वयं परमेश्वर के वचन ने ही तुरंत ही अपनी सही बात को सामने रख दिया है। और ये गलत शिक्षाएं देने वाले इस पद की, तथा इस संदर्भ के परमेश्वर के वचन के अन्य हवालों की अनदेखी करके, केवल अपनी ही बात को सही दिखाने के मतलब से, परमेश्वर के वचन का दुरुपयोग करते हैं, परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं, परमेश्वर के नाम में झूठी शिक्षाएं और बातें सिखाते हैं।


अगले लेख से हम अन्य भाषाएं बोलने से संबंधित कुछ और बहुत महत्वपूर्ण बातों पर विचार करेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित इन गलत शिक्षाओं में न पड़ जाएं; न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाले ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर भी ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें। यदि आप इन गलत शिक्षाओं में पड़ चुके हैं, तो अभी वचन के अध्ययन और बात को जाँच-परख कर, सही शिक्षा को, उसी के पालन को अपना लें।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें: 

  • यहेजकेल 1-2 

  • इब्रानियों 11:1-19


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English Translation

Speaking in “Tongues” is NOT Directly Speaking with God (1)

    

    We have been seeing in the previous articles that one of the ways the childlike, immature Christian Believers can be identified is that they can very easily be deceived, beguiled and misled by wrong doctrines and false teachings. Satan and his followers bring in their wrong doctrines and misinterpretations of God’s Word through people who masquerade as apostles, ministers of righteousness, and angels of light (2 Corinthians 11:13-15). These deceptive people and their false messages, their teachings appear to be very attractive, interesting, knowledgeable, even very reverential and righteous; but there is always something or the other that is extra-Biblical or unBiblical mixed into them. These wrong teachings and false doctrines are mainly about three topics, as God the Holy Spirit got it written down through the Apostle Paul in 2 Corinthians 11:4 “For if he who comes preaches another Jesus whom we have not preached, or if you receive a different spirit which you have not received, or a different gospel which you have not accepted--you may well put up with it!” - the Lord Jesus Christ, the Holy Spirit, and the Gospel. In this verse a very important way to identify the false and the correct, discern between them, and escape from being beguiled by Satan is also given - that which is the truth about these three topics has already been given and written in God’s Word. Therefore, by cross-checking every teaching and doctrine from the Bible, the true and the false can be discerned; that which is not already present in God’s Word is false, and their preacher is a preacher of satanic deceptions.


In the previous articles, after seeing some commonly preached and taught false things about the Lord Jesus, we had started to look into the wrong things often taught and preached about the Holy Spirit. About the Holy Spirit, we have seen that every truly Born-Again Christian Believer automatically receives the Holy Spirit from God, at the very moment of his being saved. From that moment onwards, the Holy Spirit comes to reside in him in all His fullness, stays with him forever, never leaves him; and Biblically this is also known as being filled by the Holy Spirit or the baptism with the Holy Spirit. Another very popular and emphatically stated wrong teaching of these preachers and teachers of deceptions is about “speaking in tongues”, their claim that the “tongues’ are super-natural languages, and some other related wrong teachings. Regarding this we have seen that these are also wrong teachings which have no support or affirmation from the Bible. The speaking in “tongues” in Acts 2 were the known and understood languages of the earth and not any super-natural languages. We also saw that quite unlike their claims, “tongues” are not any “prayer language” - the Bible does not offer any support to this; and we also saw how their emphatic claim that speaking in tongues is proof of receiving the Holy Spirit is also patently false and unBiblical; it is their concocted doctrine through misuse and misinterpretation of Biblical facts.


Today we will look at another commonly preached false teaching, that “speaking in tongues” is having a direct conversation with God.


Is “speaking in tongues” speaking directly with God?

This is another false claim, that these people preaching and teaching the wrong doctrines and false teachings about the Holy Spirit claim. They make this claim based on 1 Corinthians 14:2, that a person speaking in tongues speaks not to men, but directly with God. By making this claim they not only overlook the sarcasm  used here by Paul to put them in their place, but by taking this verse out of its context and misinterpreting it, they also make themselves guilty of misusing God’s Word. We have seen before that speaking in “tongues”, i.e., known earthly languages, is one of the gifts of the Holy Spirit; and as with the other gifts, this gift too is not given to everyone, but everyone is given the gift necessary for their ministry (1 Corinthians 12:7-11, 29-30). Because some people in the Church at Corinth were making these unintelligible sounds from their mouths, and trying to impress people that they have been given the gift of speaking a super-natural language, therefore, through the Apostle Paul, God the Holy Spirit admonished them sarcastically, and had this written. The simple straightforward meaning of this sarcastic sentence, this figure of speech is “the gibberish they speak as “tongues” is not understood by any man; nobody can understand the mysterious things they are speaking. Since they claim to be speaking through the spirit, and no man can understand them, then maybe it is only God who can understand what they are saying.” This whole thing, the use of a spiritual gift personally, but not edifying the Church and not benefitting others, is so contrary to the purpose of all Spiritual gifts (1 Corinthians 12:7; 14:5, 12); it contradicts God’s Word.


With regard to their claim of speaking in extra-terrestrial languages, the Holy Spirit through Paul had already got it written, “Though I speak with the tongues of men and of angels, but have not love, I have become sounding brass or a clanging cymbal” (1 Corinthians 13:1). Thereby implying that in God’s eyes, what matters is His people exhibiting love and living together in fellowship with love; and their being able to speak in some earthly or extra-terrestrial language is unimportant. Recall that in 1 Corinthians chapter 11, while explaining to them about the Lord’s Supper or the Holy Communion, Paul through the Holy Spirit had spoken to them about the necessity of this love and fellowship and had severely admonished them for their tendency of trying to be superior and more important while showing others as inferior and of lesser importance. Continuing the same thought, in this verse too Paul emphasizes upon living together in love rather than trying to show-off through speaking in “tongues”, and falsely impress upon others their having a seemingly superior and more impressive gift.


Also take note of what is written in 1 Corinthians 14:9 - something that these preachers and teachers of wrong doctrines and false teachings never bring up or talk about, because this verse lays bare and exposes their false claims about their speaking with God, “So likewise you, unless you utter by the tongue words easy to understand, how will it be known what is spoken? For you will be speaking into the air” (1 Corinthians 14:9). This verse makes it very clear that whatever is spoken has to be in a manner that is easy to understand, so that the people (not God, but people) hearing will be able to know what is being talked about; as happened in Acts 2:3-11 - the people who were listening the disciple’s speaking in tongues understood in their languages that the disciples were talking about the wonderful works of God. Take note of the last phrase of this verse, “...For you will be speaking into the air.” Now, if 1 Corinthians 14:2 is about talking directly with God, then how can this be said? How could it even have been written, and that to through the Holy Spirit, for, writing this is insulting God, instead of affirming speaking directly with God? Because, through “speaking in tongues” either speaking to God directly of verse 2 is correct, or speaking into the air of verse 9 is correct; both cannot be correct, unless verse 2 is a sarcastic admonition and verse 9 is the reality. In other words, God Himself has put before us the truth, so that there is no confusion or misunderstanding. But these preachers and teachers of falsehood, deliberately ignore and overlook the context, the related verses, the other related passages from God’s Word, and misinterpret, misuse, misapply God’s Word, just to falsely preach and teach their wrong doctrines and contrived teachings. They corrupt God’s Word by mixing in things of their own thinking, and teach false things in the name of God.


In the next article we will look at some other important truths about speaking in “tongues” given in 1 Corinthians 13 and 14 chapters. If you are a Christian Believer, then it is very essential for you to know and learn that you do not get beguiled and misled into wrong teachings and doctrines about the Holy Spirit; neither should you get deceived, nor should anyone else be deceived through you. Take note of the things written in God’s Word, not on things spoken by the people; always cross-check and verify all messages and teachings from the Word of God. If you have already been entangled in wrong teachings, then by cross-checking and verifying them from the Word of God, hold to only that which is the truth, follow it, and reject the rest.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.



Through the Bible in a Year: 

  • Ezekiel 1-2 

  • Hebrews 11:1-19