ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

आराधना (27) / Understanding Worship (27)


Click Here for the English Translation

आराधना के लिए परिवर्तित (4) 

 

हम 2 इतिहास 29 अध्याय में दिए गए राजा हिजकिय्याह के जीवन तथा उदाहरण से उस प्रक्रिया को सीख रहे हैं, जिसके द्वारा विश्वासी वैसा आराधक बनता है जैसा परमेश्वर चाहता है कि वह हो, अर्थात आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर की आराधना करने वाला। हम देख चुके हैं कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार कदम हैं, जिनसे अन्ततः विश्वासी परमेश्वर को योग्य आराधना चढ़ाने वाला वाले जन में परिवर्तित हो जाता है। पहला कदम है कि विश्वासी को यह दृढ़ निर्णय लेना होता है कि वह परमेश्वर का सच्चा समर्पित और प्रतिबद्ध जन बनेगा और फिर उसे अपने इस निर्णय को अपने जीवन द्वारा जी कर भी दिखाना होता है; राजा हिजकिय्याह एक परमेश्वर का भक्त जन था, किन्तु उसे भी यह निर्णय लेना पड़ा और अपने जीवन में व्यवहारिक रीति से दिखाना पड़ा। दूसरा कदम है, अपने हृदय, अर्थात पवित्र आत्मा के मंदिर को परमेश्वर के लिए खोल देना, और हृदय में जो आता है, उससे जो बाहर जाता है, उन सभी पर नियंत्रण रखना; पवित्र आत्मा की अगुवाई और प्रेरणा के प्रति संवेदनशील एवं आज्ञाकारी बन जाना। तीसरे कदम का पहला भाग हमने पीछे लेख में 2 इतिहास 29:4-19 से देखा था - परमेश्वर के मंदिर की वस्तुओं को साफ और पवित्र कर के उन्हें परमेश्वर के मन्दिर में उनके उपयोग के लिए उनके सही स्थान पर बहाल कर देना। आज हम इस तीसरे कदम के सिद्धांत के विश्वासी के जीवन में व्यवहारिक निर्वाह को देखेंगे। क्योंकि, पहले दो क़दमों के द्वारा विश्वासी का हृदय, जो कि पवित्र आत्मा का मंदिर है, शुद्ध और पवित्र कर दिया गया है, उसके अन्दर पवित्र आत्मा के निवास करने के लिए तैयार कर दिया गया है, अब, विश्वासी के हृदय में और उसके द्वारा आराधना आरंभ करने के लिए जो करना शेष रह गया है, वह है मंदिर की वस्तुओं को शुद्ध और पवित्र कर के उन्हें उनके स्थान पर बहाल करना और उपयोगी बनाना, जैसा कि हम आज देखेंगे।


हम पद 4 और 5 से देखते हैं कि मंदिर के द्वार खोलने और उनकी मरम्मत करने के बाद, हिजकिय्याह जो अगला कार्य करता है, वह है याजकों और लेवियों को बुलाना और उन्हें एक स्थान पर एकत्रित करना, उन्हें अपने आप को पवित्र करने के लिए कहना; और फिर मंदिर में जाकर अपनी जिम्मेदारियों को संभाल लेना। यह कार्य अन्य किसी को नहीं, केवल उन्हें ही सौंपा गया, जिनकी यह परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार निर्धारित ज़िम्मेदारी थी। हमारे वर्तमान अनुग्रह के समय में, हम 1 पतरस 2:9 तथा प्रकाशितवाक्य 1:6 से देखते हैं कि परमेश्वर की नज़रों में प्रत्येक नया-जन्म पाया हुआ मसीही विश्वासी परमेश्वर के लिए याजक है, चाहे उसका आत्मिक स्तर और परमेश्वर के वचन की जानकारी का स्तर कुछ भी हो। अभिप्राय यह है कि मसीही विश्वासी को सच्चे आराधक में परिवर्तित होने के लिए, अपने आप को अपने पापमय रवैये एवं व्यवहार से साफ़ और शुद्ध, पवित्र करना होता है, और फिर परमेश्वर ने उसे जो जिम्मेदारियां दीं हैं उनके निर्वाह में जुट जाना होता है। परमेश्वर के याजक की जिम्मेदारियां, संक्षेप में, मलाकी 2:7 “क्योंकि याजक को चाहिये कि वह अपने ओठों से ज्ञान की रक्षा करे, और लोग उसके मुंह से व्यवस्था पूछें, क्योंकि वह सेनाओं के यहोवा का दूत है” में भली-भांति दी गई हैं। यहाँ पर दी गई तीन आधारभूत जिम्मेदारियां हैं, उसे परमेश्वर, उसके वचन, और उसके कार्यों का अच्छा ज्ञान एवं समझ-बूझ होनी चाहिए; उसे परमेश्वर के वचन को औरों को सिखाने वाला होना चाहिए; और उसे परमेश्वर का संदेशवाहक होने, अर्थात परमेश्वर के निर्देशों को लोगों तक पहुंचने वाला होना चाहिए। अर्थात, परमेश्वर की इच्छानुसार उसका सच्चा आराधक बनने की लालसा रखने वाले मसीही विश्वासी को परमेश्वर के वचन से भली-भांति अवगत हो जाना चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ समय बिताने, उस से सीखने, और परमेश्वर की शिक्षाओं को औरों को पहुंचाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब व्यक्ति परमेश्वर को और उसके वचन को अच्छे से जानता होगा, केवल तब ही वह परमेश्वर के गुणों, योग्यताओं, कार्यों आदि को समय तथा आवश्यकता के अनुसार याद करने और उनका बखान करने पाएगा।


इस प्रकार से पुनःस्थापित होने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका पापों के अंगीकार करने और उनके कारण हमारे प्रति परमेश्वर के उचित व्यवहार को स्वीकार करने की होती है, जैसे इस्राएलियों के लिए राजा हिजकिय्याह ने पद 6-9 में किया। आज हमारे लिए, यह हमारे मसीही विश्वासी होते हुए भी एक समझौते और अनाज्ञाकारिता का, तथा परमेश्वर के विमुख जीवन जीने को अंगीकार कर लेने, और उस अधर्मी व्यवहार के कारण हम पर आए परमेश्वर के दण्ड को मान लेने को दिखाता है। साथ ही यह एहसास भी करना कि इसके समाधान का, परमेश्वर के क्रोध को टाल देने का एकमात्र तरीका उसकी ओर पश्चाताप और पूर्ण समर्पण के साथ लौट आना ही है, जैसे हिजकिय्याह ने पद 10 में कहा।


इसके बाद ही इस तीसरे कदम, अर्थात परमेश्वर के याजक होने की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए शुद्ध और पवित्र होने, फिर और किसी के नहीं, केवल याजकों और लेवियों के द्वारा ही मंदिर की वस्तुओं को शुद्ध और पवित्र करके उन्हें उपयोगी बनाने तथा उनके स्थान पर बहाल करने, का वह अंतिम चरण आता है। इसी प्रकार से विश्वासी के आराधक में परिवर्तित होने और आराधना के लाभ प्राप्त करने के लिए, उसे अपने जीवन में आत्मिक बातों और जिम्मेदारियों को उनका उचित स्थान देने, उन्हें बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। विश्वासी को अपने जीवन में प्रार्थना करने, बाइबल का अध्ययन करने, परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत समय बिताने, अन्य विश्वासियों के साथ संगति और संबंधों को बनाए रखने तथा उनके निर्वाह करते रहने, आदि बातों को प्राथमिकता और उचित आदर का स्थान देना पड़ेगा; अर्थात उसे एक आदत के समान प्रेरितों 2:42 का ईमानदारी से पालन करने वाला बनना पड़ेगा।


एक बार शुद्ध और पवित्र करके मंदिर की वस्तुओं को उनके उपयोग के लिए ठीक से बहाल करने का कार्य हमारे जीवन में हो जाए, तो फिर इसके बाद सच्ची आराधना का आरंभ हो जाता है, जैसा हम अगले लेख में देखेंगे।

  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • न्यायियों 11-12           

  • लूका 6:1-26      


कृपया इस संदेश के लिंक को औरों को भी भेजें और साझा करें

**********************************************************************

English Translation


Being Transformed To Worship (4)

    Through the life and example of King Hezekiah, from 2 Chronicles chapter 29, we have been seeing the steps to become the kind of worshipper God wants His people to be, i.e., those who worship Him in spirit and in truth. We had seen that there are four steps of a person being transformed to worship God in a worthy manner. The first step was that the Believer has to take a firm decision to become a true and committed follower of God and practically demonstrate it in his life; King Hezekiah was a godly king, but he had to resolve, and then demonstrate his commitment through his actions. The second step was to open his heart, i.e., the temple of the Holy Spirit, to God; regulate what comes in and goes out of it, and become obedient and submissive to the promptings of the Holy Spirit. The first part of the third step we had seen from 2 Chronicles 29:4-19, in the previous article - cleanse and restore the things of God to their proper place in God’s Temple. Today we will look at the practical application of this principle in a Believer’s life. Since, through the first two steps, the Believer’s heart, which is the Temple of the Holy Spirit, has been cleansed, and made ready for the Holy Spirit to reside within and guide him, now the final preparatory step so that worship can begin in and through his life is to cleanse and restore the things of the Temple, in the Temple, as we will see that today.


We see from verses 4 and 5 that after opening the doors of the Temple and repairing them, the next thing that Hezekiah does is to gather the priests and Levites and ask them to first sanctify themselves; then they were to get back to their duties in the Temple. This was not entrusted to anyone other than whose duty it was as per God’s Law. In our present-day age of grace, we see from 1 Peter 2:9 and Revelation 1:6 that in God’s eyes, every Born-Again Christian Believer is a priest to God, whatever be his actual spiritual status and knowledge of God’s Word. The implication is that the Believer, in his being transformed to become a worshipper, has to first cleanse and sanctify himself from his sinful attitudes and behavior, and then get back to fulfilling the responsibilities the Lord has given him. The responsibilities of a priest of God are well summarized in Malachi 2:7, “For the lips of a priest should keep knowledge, And people should seek the law from his mouth; For he is the messenger of the Lord of hosts.” The three basic duties are, keep knowledge about God, His Word and the work God wants done; should be able to teach God’s Word to others; should function as God’s messenger, i.e., convey God’s messages to the people. To put it succinctly, the Christian Believer desiring to be a worshipper God wants him to be, should become well versed in God’s Word and be willing to spend time with God, learn from Him, and convey the teachings of God’s Word to others. Only when a person knows God and His Word, can he recall and speak the qualities, abilities, works, etc., of God, as per the time and the need of the hour.


An important role in this restoration to being a worshipper is the confession of sins and acknowledging God’s righteous dealings, as Hezekiah had confessed and acknowledged for the Israelites in verses 6-9. For us today it is our confessing living a compromising and disobedient life, living contrary to God, even though a Believer, and thereby we have invited His wrath, have suffered the consequences of this unrighteous behavior. And, also the realization that the only way to turn back the displeasure and wrath of God was by turning back to Him in penitence and complete submission, as Hezekiah stated in verse 10.


Then comes the final part of this third step of cleansing, after being restored to function as priests of God, the priests, not anyone else, then restored the things of the Temple to their functional state and use. Similarly, the Believer, in the process of becoming a worshipper and become the beneficiary of true worship, has to commit himself to restore in his life the things related to his spiritual life, e.g., the priority and time for prayer, Bible study, personal quiet time with God, joining in fellowship with other Believers etc.; in effect reverting back to sincerely and regularly living according to Acts 2:42. 


Once this third step of cleansing and restoration of the things of God to their proper place in our lives has been accomplished, then from here onwards the true worshipping can actually begin, as we will see in the next article.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.  


Through the Bible in a Year: 

  • Judges 11-12

  • Luke 6:1-26



Please Share The Link & Pass This Message To Others As Well