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गुरुवार, 14 मार्च 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 9

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सुसमाचार से संबंधित शिक्षाएँ – 6

 

    इस श्रृंखला के आरंभ में, आरंभिक विचारों के बाद, हमने देखा था कि तीन प्रकार की बाइबल की शिक्षाएँ हैं जो मसीही विश्वासी और कलीसिया की बढ़ोतरी के लिए अनिवार्य हैं; ये हैं सुसमाचार से संबंधित शिक्षाएँ, इब्रानियों 6:1-2 में दी गई छः आरम्भ की बातें, और मसीही जीवन तथा व्यवहार से संबंधित शिक्षाएँ। इन में से हमने सुसमाचार से संबंधित शिक्षाओं को बाइबल में से देखना आरम्भ किया है, और देखा है कि सुसमाचार परमेश्वर के राज्य के बारे में है न कि किसी प्रकार की साँसारिक उपलब्धि अथवा लाभ अर्जित करने के। साथ ही, सुसमाचार के प्रभावी होने के लिए पश्चाताप या मन -फिराव और सुसमाचार को स्वीकार करने वाले व्यक्ति के द्वारा उस में विश्वास करना आवश्यक है। इसीलिए, हमने यह सीखना आरम्भ किया है कि परमेश्वर का वचन सुसमाचार से संबंधित इन दोनों आवश्यकताओं, पश्चाताप और विश्वास करने, के बारे में क्या कहता है; और वर्तमान में हम पश्चाताप या मन-फिराव के बारे में सीख रहे हैं। पिछले दो लेखों में हमने राजा योशिय्याह और अन्य कुछ लोगों के उदाहरणों से देखा है कि वास्तविक पश्चाताप के साथ जीवन परिवर्तन होना, परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम विकसित होना, और दूसरों को भी सुसमाचार पर विश्वास करने के लिए कार्यकारी व्यावहारिक इच्छा का रखना भी सम्मिलित होते हैं। हमने पिछले लेख का समापन परमेश्वर की इस आज्ञा के साथ किया था कि पश्चाताप समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की आज्ञा है, जिसमें किसी के भी लिए, चाहे उसका धर्म, मत या विश्वास, या धार्मिकता का ओहदा कुछ भी क्यों न हो, कोई भी अपवाद या छूट नहीं है। आज हम उस आधार को, उस कार्यकारी कारण देखेंगे जो इस प्रकार का पश्चाताप और उस से संबंधित परिवर्तनों को लेकर आता है; और फिर उसके बाद देखेंगे कि परमेश्वर का वचन उन परिवर्तनों के बारे में क्या कहता है।

    पवित्र आत्मा की प्रेरणा से पौलुस ने लिखा, “क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिस का परिणाम उद्धार है और फिर उस से पछताना नहीं पड़ता: परन्तु संसारी शोक मृत्यु उत्पन्न करता है” (2 कुरिन्थियों 7:10)। इस तरह, हम यहाँ से देखते हैं कि सँसार में दो प्रकार के पश्चाताप देखे जाते हैं; एक वह जो ‘परमेश्वर-भक्ति का शोक’ के कारण होता है और दूसरा जो ‘संसारी शोक’ के कारण होता है। इन दोनों प्रकार के शोक, या उनके द्वारा उत्पन्न हुए पश्चाताप के परिणाम बिल्कुल भिन्न हैं, वास्तव में एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। वह जो ‘परमेश्वर-भक्ति का शोक’ के कारण होता है, उससे उद्धार, अर्थात अनन्त जीवन और उस से सम्बन्धित लाभ प्राप्त होते हैं; जबकि वह जो ‘संसारी शोक’ के कारण होता है उससे मृत्यु आती है। पिछले लेखों में हमने जो उदाहरण देखे हैं, अर्थात, राजा योशिय्याह, अय्यूब, पौलुस, भक्त यहूदी, आदि, हमने देखा है कि उनके जीवन में ‘परमेश्वर-भक्ति का शोक’ के कारण होने वाले पश्चाताप ने किस प्रकार से कार्य किया। वे सभी लोग बहुत धार्मिक थे, परमेश्वर के लिए बहुत उत्साही थे, धार्मिकता के कार्यों को करने और परमेश्वर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का निर्वाह करने और परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने में बहुत निष्ठावान थे; परन्तु जब वे कायल हुए, चाहे परमेश्वर के वचन के द्वारा, या परमेश्वर से अथवा प्रभु यीशु से सामना होने के द्वारा, तो उन्हें तुरन्त ही इस बात का एहसास हो गया कि उनकी सच्ची धार्मिकता और धार्मिक कार्यों के प्रति सत्यनिष्ठ समर्पण के बावजूद, उनका वास्तविक आत्मिक स्तर परमेश्वर की उपस्थिति में खड़े होने या उसके राज्य में प्रवेश कर पाने के योग्य नहीं है।

    यह एहसास होते ही, उन्होंने तुरन्त ही एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया, ऐसा निर्णय जिस से परिणाम उनके पक्ष में बदल गया – उन्होंने अपने आप को, वे जैसे भी थे वैसा ही, परमेश्वर के चरणों में डाल दिया, यह भरोसा करते हुए कि परमेश्वर दयालु, धैर्य रखने, और क्षमा करने वाला है, वह अपने इन गुणों के अनुसार ही व्यवहार करेगा। यही ‘परमेश्वर-भक्ति का शोक’ करने का अर्थ होता है – परमेश्वर के दृष्टिकोण से अपनी आत्मिक दशा का बोध होते ही, बजाए अपने को सही ठहराने, या और अधिक परिश्रम के साथ धर्मी बनने का प्रयास करने, धार्मिकता के और भी अधिक कार्यों को करने वाले बनने के, बस अपने आप को पूर्णतः परमेश्वर के हाथों में सौंप देना, और अगला कदम उठाने के लिए उसकी इच्छा के खोजी हो जाना, न कि और भी ‘बेहतर’ बनने या किसी प्रकार के कार्यों अथवा स्वयं गढ़े गए किसी माध्यम के द्वारा परमेश्वर को स्वीकार्य होने का प्रयास करना। यदि वे लोग कुछ ऐसा प्रण करते कि वे और अधिक धर्मी बनेंगे, और अधिक धार्मिकता के काम करेंगे जिससे कि परमेश्वर को स्वीकार्य बन सकें, तो यह उनका एक अनकहा दावा होता कि वे अपने कर्मों और योग्यताओं से स्वर्ग में प्रवेश कर पाने योग्य धर्मी और भले बनने की क्षमता रखते हैं। यह कभी संभव नहीं होने पाता, न वे कभी ऐसा कुछ करने पाते, क्योंकि यह कहना तुरन्त ही परमेश्वर के वचन में विरोधाभास ले आता है – यह यशायाह 64:6 “…हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं…” के विरुद्ध जाता, और साथ ही प्रभु यीशु द्वारा निकुदेमुस से बल देकर कही गई बात, कि बिना नया-जन्म पाए वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता था, जिसमें निहित तात्पर्य था कि और कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता है; और इसी के जैसे परमेश्वर के वचन के अन्य हवालों के विपरीत जाता। साथ ही, यदि अय्यूब, राजा योशिय्याह, पौलुस, निकुदेमुस, भक्त यहूदियों, आदि के द्वारा जिया गया धार्मिकता का जीवन और किये गए कार्य उन्हें उद्धार देने के लिए व्यर्थ थे, तो उन से बढ़कर कोई व्यक्ति और ऐसा क्या कर सकता है, जो वे नहीं करने पाए? और तब भी, यह सब कुछ करने के बाद भी उन्हें स्वयं ही यह एहसास हो गया कि वे परमेश्वर की पवित्रता से अभी भी कितने कम हैं।

    दूसरी ओर, ‘संसारी शोक’ एक झूठा, दिखावटी शोक है, जो सँसार को दिखाने के लिए अधिक होता है न कि वास्तव में अपनी गलतियों के लिए दुःख और हृदय परिवर्तन के कारण। यह कुछ ऐसा है जैसा जब कोई जेब-कतरा या चोर रंगे हाथों पकड़ा जाता है तो वह तुरन्त ही माफी मांगने लगता है, दया की याचना करता है, फिर कभी न करने की बात कहता है, मजबूरी की कहानियाँ सुनाता है, आदि; किन्तु जब उसे छोड़ दिया जात है तो वह फिर उसी काम में लग जाता है। उसकी सारी क्षमा याचना, दया की गुहार, वायदे, कहानियाँ, आदि, एक झाँसा थे, औरों को धोखा देने के तरीके थे; उसके अन्दर अपने किये के लिए कोई वास्तविक दुःख अथवा पश्चाताप नहीं था। इसी प्रकार से परमेश्वर के सम्मुख किसी पापी के द्वारा किया गया पश्चाताप का नाटक, कुछ लोगों को धोखा दे सकता है, स्वयं उस पापी को धोखा दे सकता है कि वह मान बैठे कि उसने पश्चाताप कर लिया है, किन्तु कभी भी परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता है, क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों को जानता है (2 तीमुथियुस 2:19); और जैसा हम देख चुके हैं, वास्तविक पश्चाताप बदले हुए जीवन और अधर्म से बचे रहने के द्वारा प्रमाणित होता है। इस प्रकार का ‘संसारी शोक’ यही दिखाता है कि वह व्यक्ति अभी भी अपने पापों में बना हुआ ही है, और उसने सच में अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित नहीं किया है। और क्योंकि उसने प्रभु यीशु से अनन्त जीवन के उपहार को नहीं लिया है, इसलिए उसे पाप की मज़दूरी, अर्थात मृत्यु, लेनी पड़ेगी (रोमियों 6:23)।

    अगले लेख में हम वास्तविक पश्चाताप के द्वारा व्यक्ति के जीवन में आने वाले परिवर्तन के बारे में देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


Teachings Related to the Gospel – 6

 

    At the beginning of this series, after the preliminary considerations, we had seen that there are three categories of Biblical teachings that are essential for the growth of every Christian Believer and of the Church; these are teachings related to the gospel, the six basic teachings in Hebrews 6:1-2, and teachings related to Christian living and behavior. Of these, we have started considering the teachings related to the gospel from the Bible, and saw that the gospel is about the Kingdom of God, and not about any worldly prosperity or gains. Moreover, the gospel to be effective requires repentance and believing in it, on part of the person accepting the gospel. Therefore, we have started to learn about what God’s Word the Bible says about these two essentials, repentance and believing, related to the gospel; and are presently studying about repentance. In the last two articles, through the example of King Josiah, and then through some other examples we saw that true repentance is evidenced by a changed life, by developing a love of God’s Word, and a practical desire to have others also believe in the gospel. We concluded the last article by seeing that repentance is God’s commandment for all of mankind, with no exceptions for any one, irrespective of their religion or belief or religious status. Today we will see about the basis, or the effective reason that brings about this kind a repentance and its consequent changes; and, then will see something about what God’s Word says about the changes.

    Paul, under the inspiration of the Holy Spirit wrote, “For godly sorrow produces repentance leading to salvation, not to be regretted; but the sorrow of the world produces death” (2 Corinthians 7:10). So, we see from here that that there are two kinds of repentance that are displayed by the world; one is that which comes through a ‘godly sorrow’ and the other that which is through ‘the sorrow of the world.’ The outcomes of these two kinds of sorrow or the repentance because of them, are entirely different, in fact diametrically opposite. The one because of a ‘godly sorrow’ leads to salvation, i.e., eternal life and its related benefits; whereas the one which is through ‘the sorrow of the world’ leads to death. In the examples we have seen in preceding articles, i.e., of King Josiah, Job, Paul, devout Jews etc., we saw how this ‘godly sorrow’ worked in their lives.  All of them were very religious, and zealous for God, and were very active in their religious works and commitments, in fulfilling God’s Law; but when they were convicted, either by God’s Word or by being confronted by God, or by the Lord Jesus, they immediately realized that despite all their very sincere religiosity and a diligent commitment to religious works, their actual spiritual state was one of being unworthy of coming in the presence of God or of entering His kingdom.

    With this realization, they took a very crucial decision, a decision which made all the difference in the outcome, in their favor – they simply threw themselves down at God’s feet, just as they were, trusting Him to be merciful, longsuffering and forgiving, and one who would act according to these characteristics. This is what ‘godly sorrow’ means – realizing our actual spiritual state from God’s perspective, and then, instead of trying to justify ourselves, or promising to be more religious, more committed to religious works, just surrendering ourselves totally into God’s hands, and seeking His will for the next step to be taken, instead of trying to be ‘better’ or worthy of being accepted by some more works, some other contrived devices. Had they resorted to pledging to work more or better to become acceptable to God, that would have been a tacit assertion that they can be good or righteous enough to enter heaven by their own means and methods, by their own works. This would never be possible, nor would ever be feasible, because it immediately brings in contradictions in God’s Word – it would go contrary to Isaiah 64:6 “…we are all like an unclean thing, And all our righteousnesses are like filthy rags…” and would also negate the Lord’s exhortation to Nicodemus, that without being Born-Again he can never enter the Kingdom of God, and by implication no one else either, besides the other similar references from God’s Word. Moreover, if the righteousness by works as evidenced by Job, King Josiah, Paul, Nicodemus, the devout Jews etc. was inconsequential for salvation, then what more can any other person do, that they had not already done, and still realized how woefully short they were of the holiness of God?

    On the other hand, ‘the sorrow of the world’ is a false, a make-believe kind of sorrow, an outward dramatic demonstration of sorrow, more for showing to the world, than because of a sincere change of heart or remorse for the wrongs they have done. It is something like when a pick-pocket or thief is caught in the act, he immediately starts begging for mercy, apologizing, telling stories to justify his committing the wrong, making promises of never doing it again, etc. But once he is set free, he returns to doing the same things again. All his apologies, begging for mercy, stories, etc. were just an eyewash meant to fool others; there was no real remorse or sorrow in him for what he had done. A similar make-believe show of repentance before God by a sinner, may fool some people, and even fool the sinner himself making him believe that he has repented, but can never fool God, for God knows those who are His (2 Timothy 2:19); and as we have seen, genuine repentance is evidenced by a changed life of departing from iniquity. This kind of ‘the sorrow of the world’ only means that the person still remains in his sin, has not actually surrendered his life to the Lord. Therefore, since he has not received the gift of eternal life from the Lord Jesus, he will have to receive the wages of sin, i.e., death (Romans 6:23).

    In the next article we will consider the change that true repentance brings in a person’s life.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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