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शुक्रवार, 5 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 4 - Sin Without Death / बिना मृत्यु का पाप

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प्रश्न:  बाईबल में यूहन्ना 5 :16-17 में वह कौन सा पाप है जिसका फल मृत्यु नहीं है ?

उत्तर:
           इन पदों ने बहुतेरों को असमंजस में रखा हुआ है, और इनकी अनेकों व्याख्याएं की गई हैं। इसलिए कोई पूर्णतः स्पष्ट और सभी को स्वीकार्य उत्तर शायद संभव न हो। सामान्यतः 1 यूहन्ना 5:16-17 को समझने का प्रयास करते समय या व्याख्या करते समय, बाइबल में पाप और उसके दुष्परिणाम से संबंधित पदों, जैसे कि रोमियों 3:23 और रोमियों 6:23, तथा ऐसे ही अन्य पदों का ध्यान करते हुए व्याख्या दी जाती है या समझने का प्रयास किया जाता है।

           परन्तु हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यूहन्ना ने जब यह पत्री लिखी थी तो अन्य पत्रियों और लेखों को संकलित करके तैयार हुआ नया नियम तब उसके पाठकों को उपलब्ध नहीं था, जैसा कि अब हमारे हाथों में है। इसलिए जिन लोगों को यह पत्री लिखी गई थी, उनके पास वे सब पद और शिक्षाएँ नहीं थे जो अब नए नियम में संकलित होकर हमारे पास हैं, और जिनके आधार पर अब हम इन पदों को समझने के प्रयास करते हैं। इसलिए वे लोग तब यूहन्ना द्वारा लिखी इस बात को उस प्रकार से नहीं देख और समझ सकते थे जैसा कि हम आज बहुधा देखते और समझते हैं; और न ही तब वे लोग इनमें कोई ऐसे अर्थ डाल सकते थे जो नए नियम में अन्य स्थानों पर लिखी बातों के आधार पर हैं, जिस प्रकार के अर्थों को इनमें डालकर इन्हें समझने के प्रयास आज हम करते हैं। इसलिए इन पदों का अर्थ उसी संदर्भ में देखा तथा समझा जाना चाहिए, जिस संदर्भ में उन लोगों ने तब पढ़ा और समझा होगा जब यूहन्ना ने यह पत्री उन्हें लिखी थी; क्योंकि वही अर्थ इन पदों का मूल या प्राथमिक अर्थ है, शेष सभी अर्थ और अभिप्राय उस मूल अर्थ के सहायक हैं, उनसे वह मूल अर्थ बदल नहीं सकता है।

           यूहन्ना की इस पत्री के आरंभिक अध्यायों को पढ़ने से प्रतीत होता है कि यूहन्ना ने यह पत्री ऐसे लोगों की मण्डली को लिखी थी जिनमें से कुछ तो मसीही विश्वास में ‘बालक’ थे, किन्तु अधिकांश मसीही विश्वास में दृढ़ और स्थापित थे, परिपक्व थे, और धार्मिकता से संबंधित बातों को जानते थे (1 यूहन्ना 2:7, 13, 14, 20, 21, 24, 27)। इसलिए बहुत संभव है कि वे पुराने नियम और मूसा में होकर इस्राएलियों को मिली व्यवस्था का कुछ ज्ञान और समझ रखते थे। परमेश्वर यहोवा को मानने वालों के लिए क्या पाप है और क्या नहीं है, इसकी समझ परमेश्वर के उस वचन के आधार पर थी जिसे हम आज पुराना नियम कहते हैं; और उसमें भी मुख्यतः “व्यवस्था” के आधार पर। जब हम पुराने नियम की धार्मिकता और व्यवस्था के आधार पर देखते हैं, तो व्यवस्था में कुछ पाप ऐसे थे जिनका कोई प्रायश्चित नहीं था, उनके लिए मृत्यु-दण्ड की आज्ञा थी; उदाहरण के लिए देखिए: निर्गमन 28:43; लैव्यवस्था 22:9; गिनती 1:51; गिनती 3:10; गिनती 3:38; गिनती 18:7; गिनती 18:22; गिनती 18:32; आदि। लैव्यवस्था 10:1-2 में हम देखते हैं कि नादाब और अबीहू को पश्चाताप करने का, या उनके लिए किसी को कोई विनती अथवा प्रायश्चित अर्पित करने का अवसर ही नहीं दिया गया, वे तुरंत ही मर गए। जो लोग पुराने नियम की धार्मिकता और परमेश्वर की व्यवस्था से अवगत थे, वे समझते थे कि व्यवस्था में ऐसे पाप उल्लेखित हैं जिनका परिणाम मृत्यु है, उनके लिए कोई प्रायश्चित या क्षमा का प्रावधान किया ही नहीं गया है, इसलिए उनकी क्षमा की कोई गुंजाइश ही नहीं है, उनके लिए क्षमा मिल ही नहीं सकती है।

           दूसरी बात, 1 यूहन्ना 5:16 में दो बार “विनती” शब्द का प्रयोग किया गया है। “विनती” के लिए जिन शब्दों का मूल यूनानी भाषा में प्रयोग किया गया है वे दोनों स्थानों पर अलग-अलग शब्द हैं। पहली बार प्रयुक्त शब्द है ‘aiteo’ जिसका अर्थ होता है ‘to ask (पूछना)’, या, ‘to request (निवेदन करना)’; और दूसरी बार प्रयुक्त शब्द है ‘erotao’ जिसका अर्थ होता है ‘to interrogate (पूछताछ करना, या जानकारी लेना)’। बाइबिल के अंग्रेज़ी के भिन्न अनुवादों में देखने से भी यही बात सामने आती है कि सभी अनुवादक इन्हें “प्रार्थना” का अर्थ रखने वाली “विनती” नहीं लिखते हैं। इन मूल शब्दों के अर्थों के आधार पर 1 यूहन्ना 5:16 को इस अभिप्राय से देख सकते हैं, “यदि कोई अपने भाई को ऐसा पाप करते देखेजिस का फल मृत्यु न होतो विनती (‘aiteo’ - निवेदन) करेऔर परमेश्वरउसेउन के लियेजिन्हों ने ऐसा पाप किया है जिस का फल मृत्यु न होजीवन देगा। पाप ऐसा भी होता है जिसका फल मृत्यु है: इस के विषय में मैं विनती (‘erotao’ - पूछताछ करने या जानकारी एकत्रित करने) के लिये नहीं कहता।” यहाँ दूसरी बार प्रयुक्त “विनती” शब्द का अभिप्राय उस प्रकार से “प्रार्थना” करना नहीं है, जैसा कि हम सामान्यतः समझते हैं और जिसके अन्तर्गत परमेश्वर से कुछ माँगते हैं।

           यहाँ दो बहुत महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना अत्यावश्यक है, जिनका इस पद की व्याख्या एवँ समझ पर सीधा-सीधा प्रभाव पड़ता है। पहली, जैसा कि इस पद के आरंभ में आया है, यूहन्ना द्वारा यह बात “अपने भाई” अर्थात किसी मसीही विश्वासी जन के लिए कही जा रही है; अर्थात ऐसे व्यक्ति के लिए जिसके मसीह यीशु में विश्वास लाने के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह से पाप क्षमा हो गए हैं और वह प्रभु की सन्तान बनकर अनन्त जीवन में प्रवेश कर चुका है (यूहन्ना 1:12-13)। मसीही विश्वासी होने के नाते, वह अब व्यवस्था की बातों और अनिवार्यताओं से बाहर है, व्यवस्था की आवश्यकताओं की उस पर कोई पकड़ शेष नहीं है (रोमियों 7:6; कुलुस्सियों 2:14); अब न तो व्यवस्था के आधार पर उसका आँकलन किया जा सकता है, और न ही वह व्यवस्था के अनुसार दोषी ठहराया जा सकता है या उसे कोई दण्ड दिया जा सकता है।

           दूसरी यह, कि इस पद के अन्त में लिखा है “...पाप ऐसा भी होता है जिसका फल मृत्यु हैइस के विषय में मैं बिनती करने के लिये नहीं कहता” और इसी वाक्य को लेकर सारा असमंजस, अनिश्चितता, दुविधा होती है। ध्यान देने तथा समझने योग्य बात यह है कि यहाँ पर यूहन्ना ने यह नहीं कहा है कि “क्योंकि उस व्यक्ति के वे पाप क्षमा ही नहीं किए जाएँगे, इसलिए मैं उनके लिए प्रार्थना करने के लिए नहीं कह रहा हूँ” – किन्तु सामान्यतः हम इस पद को पढ़ते समय यही अर्थ निकालते तथा मानते हैं, जबकि ऐसा लिखा ही नहीं गया है। किन्तु यदि हम यहाँ “विनती” के स्थान पर मूल यूनानी भाषा में प्रयुक्त शब्द ‘erotao’ के शब्दार्थ ‘to interrogate’ (पूछताछ करना, या जानकारी लेना) का उपयोग करें, तो फिर वाक्य बन जाता है “...पाप ऐसा भी होता है जिसका फल मृत्यु हैइस के विषय में मैं ‘पूछताछ’ करने के लिये नहीं कहता।” अब यूहन्ना के कहे इस वाक्य का अभिप्राय हो जाता है, “...पाप ऐसा भी होता है जिसका व्यवस्था के अनुसार फल मृत्यु है: परन्तु तुम्हें इसके विषय कोई पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं है।” अब जब इसे ऊपर कही गई पहली “भाई” वाली बात के साथ जोड़ कर देखा जाए तो यहाँ यूहन्ना द्वारा कही गई बात हो जाती है, “...व्यवस्था के अनुसार ऐसा पाप तो है जिसके लिए मृत्यु हैपरन्तु इसके लिए तुम्हें जानकारी लेने या पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं है।” तात्पर्य यह कि, जब प्रभु ही ने उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया है जो व्यवस्था के अनुसार क्षमा नहीं किया जा सकता था, उसे अपने मण्डली का सदस्य और अपनी सन्तान बनाकर अपने परिवार में सम्मिलित कर लिया है, तो फिर अब तुम्हें उसके पापों का लेखा-जोखा लेने, उसके विषय पूछताछ करने या जानकारी एकत्रित करने की क्या आवश्यकता है? उससे चाहे ऐसा भी पाप हो जाए जो व्यवस्था के अनुसार क्षमा योग्य नहीं है, परन्तु तुम्हारा उसके पाप के क्षमा-योग्य होने या न होने की बात से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए तुम उसकी पूछताछ मत करो।

           यदि इस पद, 1 यूहन्ना 5:16, को उससे पहले के पदों के संदर्भ में देखें, तो भी उन पदों में व्यक्त बात के साथ यह अभिप्राय सही बैठता है। 1 यूहन्ना 5:13-15 में यूहन्ना अपने पाठकों को समझा रहा है कि प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करने से जो अनन्त जीवन मिला है, उसके कारण हमें यह हियाव भी दिया गया है कि हम परमेश्वर से माँग सकें, और हमें यह आश्वासन है कि परमेश्वर हमारे निवेदन सुनकर, यदि वे उसकी इच्छा के अनुसार हैं, तो उन्हें पूरा करेगा। क्योंकि यूहन्ना 3:16 के अनुसार परमेश्वर की इच्छा मसीह यीशु पर विश्वास करने वालों को जीवन प्रदान करने की है, और अब प्रभु यीशु मसीह में होकर व्यवस्था की बातें और दण्ड हम पर लागू नहीं हैं, इसलिए हम निःसंकोच परमेश्वर से उन लोगों को जीवन दान देने के लिए प्रार्थना कर सकते हैं, जो व्यवस्था के अनुसार इस जीवन दान के योग्य नहीं थे, और परमेश्वर उन लोगों को भी जीवन दान देगा।

           संभव है कि व्यवस्था के आधार पर कुछ लोगों को यह संकोच रहा हो कि जिस पाप के लिए परमेश्वर ने पहले ही किसी क्षमा का प्रावधान नहीं किया है और अपनी दी हुई व्यवस्था में मृत्यु निर्धारित कर दी है, उसी के लिए अब हम परमेश्वर से अपनी बात से पलटने और बदलने के लिए कैसे निवेदन कर सकते हैं? यूहन्ना यहाँ उन्हें हिम्मत दे रहा है कि यदि कोई ऐसा पाप कर भी दे, जिसका दण्ड व्यवस्था के अनुसार मृत्यु है, तो भी अब प्रभु यीशु मसीह में होकर उसकी क्षमा और जीवन दान के लिए अवसर उपलब्ध है, मार्ग खुला है।

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Question: In the Bible, in 1 John 5:16-17 what is the sin mentioned that does not result in death?

Answer:
           These verses have intrigued many people, and many explanations have been given by various Commentators. Therefore it may not be possible to have a clear explanation acceptable to everyone. When interpreting or understanding 1 John 5:16-17, it is quite common to start thinking in context of verses related to sin and it's damning effects, e.g. Romans 3:23 and Romans 6:23, and other Bible verses with a similar application.

           But we need to keep in mind and consider the fact that at the time when John wrote this epistle, the New Testament had neither been compiled from the many writings available at that time, nor was it available to the people in the form we have it now. Therefore the people to whom John wrote this letter did not have those verses and the related teachings which we now have with us, on the basis of which we now try to interpret and understand these verses. Hence those people then could not see and understand what John had written to them, in a manner similar to how we commonly see and understand them today; nor could they apply any meanings from other New Testament teachings into these verses, as we presently do. Therefore to understand these verses, they should be seen and understood in the same context and manner as those initial audience did, when John had written to them. That is the primary and basic meaning of these verses/statements; any other meanings and interpretations that are ascribed can be supplementary or complimentary to this primary meaning; but the other meanings cannot ever replace this primary meaning.

           On reading the initial chapters of John's letter it seems that amongst the audience to whom this letter was addressed, though some were 'children' in the Christian Faith, but most of them were of a good standing and maturity, and knew the facts related to righteousness and their faith (1 John 2:7, 13, 14, 20, 21, 24, 27). Therefore it is quite likely that they had some knowledge and understanding about the Law given to the Israelites through Moses in the Old Testament. For those who believed in God Jehovah, their understanding of what sin is and what it is not was according to that part of the Scripture which we know as the Old Testament today; and from it mainly according to the Law. When we see on the basis of the Old Testament righteousness and Law, we see in the Law there are some sins mentioned for which there was no repentance and atonement provided, only the death penalty had been decreed for them; for example see: Exodus 28:43; Leviticus 22:9; Numbers 1:51; 3:10; 3:38; 18:7; 18:22; 18:32; etc. In Leviticus 10:1, 2 we see that Nadab and Abihu were given no time or opportunity to repent, nor was anyone given any opportunity to intercede and pray, or offer any atonement for them, they died immediately. The people who were aware of the righteousness of the Old Testament, they knew that in the Law some sins are mentioned that have the death penalty prescribed for them, with no provision of repentance, atonement, and forgiveness having been made for them; therefore, even if forgiveness were to be asked for them, there is no possibility of any forgiveness being granted for them.

           Secondly, in 1 John 5:16 twice a sense of "petitioning or praying" has been used; once as "ask" and second time as "pray". For these two instances, two separate words have been used in the original Greek language.  The word used for the first instance is ‘aiteo’ which means ‘to ask’, or, ‘to request’; whereas the word used in the second instance is ‘erotao’ which means ‘to interrogate.’ When we see the various English Versions of the Bible, then too the same thing becomes apparent that not all translators render these words as "pray" in the sense of putting forth a petition or making a request. Therefore, we can paraphrase 1 John 5:16 as follows “If anyone sees his brother sinning a sin which does not lead to death, he can ask [aiteo’ - request God], and He will give him life for those who commit a sin not leading to death. There also is a sin leading to death. I do not say that he should pray [erotao’ – interrogate, or be inquisitive] about that.” Here the "pray" used in the latter part of the verse is not in the same sense, as we commonly understand it to mean as asking or petitioning God for something to seek His favor or benevolence.

           Here a note needs to be made of two very significant things in the verse that have a direct bearing on its interpretation and on understanding its meaning. The first is, as stated at the beginning of the verse, John is saying this about "his brother" i.e. another Christian Believer; or about a person who, by coming into faith in the Lord Jesus and having received forgiveness from sins by the grace of God, has entered into eternal life (John 1:12-13). Being a Christian Believer, he is now outside the purview and requirements of the Law and its compulsions; the requirements of the Law have no hold upon him (Romans 7:6; Colossians 2:14), and he can neither be evaluated under the provisions of the Law, nor held guilty and penalized under the Law.

           The second is, that the verse ends by saying “...There is sin leading to death. I do not say that he should pray about that” and this is the sentence that has caused the uncertainty and confusion related to this verse. The important thing to be noted here and to be understood is that John has not said “since those sins of that person will not be forgiven so I am not asking you to pray for them” – but generally that is the understanding and meaning that is assumed and accepted while reading this verse; whereas that is not what is written here. Instead of "pray" if we use the literal meaning of the original Greek word ‘erotao’ i.e. ‘to interrogate’, then the sentence becomes “...There is sin leading to death. I do not say that he should 'be interrogatedabout that, or, “...there is sin which leads to death as per the Law: but there is no need for anyone to interrogate or be inquisitive about it.” Reading this with the first factor - "brother" in mind, now the meaning of what John is saying becomes, that, when the Lord has forgiven that person who could not have been forgiven through the Law, and has included him in His Church and made him a member of His family as a child of God, then why should some person be interrogating about his sins; what need does anyone have of inquiring about his sins? He may have committed a sin which is unforgivable according to the Law, but you have nothing to do with the person's sins being forgivable or not, therefore there is no need for you to interrogate or inquire about them.

           If we see this verse, 1 John 5:16, in context of its preceding verses, then too this interpretation fits in with what is being said in those verses. In 1 John 5:13-15 John is explaining to his readers that through faith in the Lord Jesus they have not only received eternal life, but they also been given the confidence to ask of God, and that if their petitions are in accordance with the will of God then having heard their petitions, He will also fulfill them. Since, as per John 3:16 it is God's will to provide eternal life to those who believe on the Lord Jesus, and now since the Law and it's penalties are no longer applicable upon us because of our being in Christ Jesus, therefore they can unhesitatingly ask for pardon and for eternal life being granted to even those, who were not worthy of this on the basis of the Law, and the Lord will grant eternal life even to them.

           It may be possible that on the basis of the Law, some people may have been hesitant and may have doubted that when God has already decreed the death penalty for some sins in the Law, then how can we ask God to go back on His word and change His Law? Here John is encouraging them, that even if someone has committed a sin, which according to the Law is to be punished by death, even then the way has been opened for him, and through the Lord Jesus he has the opportunity to receive forgiveness and eternal life.

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