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Wednesday, July 29, 2020

आशा


    मैं जब उन्नीस वर्ष की थी तो मेरी एक प्रिय सहेली का एक कार दुर्घटना में देहांत हो गया। इसके बाद के कई सप्ताहों और महीनों तक मैं प्रतिदिन गहरे दुःख में होकर चलती रही। इतनी कम आयु के अच्छे मित्र को खो देने के दुःख ने मेरी दृष्टि को धूमिल कर दिया था, और कभी-कभी तो मुझे अपने आस-पास जो हो रहा होता था, उसका पता भी नहीं होता था। मैं दुःख और पीड़ा से इतनी अंधी हो चुकी थी कि मैं परमेश्वर को भी नहीं देख पा रही थी।

    परमेश्वर के वचन बाइबल में लूका 24 अध्याय में, प्रभु यीशु के दो शिष्य प्रभु यीशु की मृत्यु के पश्चात इतने दुःख और दुविधा में थे कि वे यह भी नहीं पहचान सके कि उनका पुनरुत्थान हुआ गुरु उनके साथ चल रहा है और उनसे बातें कर रहा है, उन्हें अपने बारे में पवित्र शास्त्र में से समझा रहा है कि उसे क्यों मरना और फिर मृतकों में से जी उठना अनिवार्य था। जब प्रभु ने रोटी लेकर उनके साथ उसे तोड़ा, तब ही वे उसे पहचान सके (पद 30-31)।

    यद्यपि प्रभु यीशु के शिष्यों ने प्रभु की मृत्यु के समय मृत्यु के वीभत्स स्वरूप का सामना किया था, परन्तु प्रभु के पुनरुत्थान के द्वारा परमेश्वर ने उन्हें दिखाया था कि उनके लिए एक नई आशा भी रखी हुई है। उन शिष्यों के समान हम भी अपने दुखों और दुविधाओं में बोझ तले दबा हुआ अनुभव कर सकते हैं। परन्तु हम इस तथ्य से आशा प्राप्त कर सकते हैं कि प्रभु यीशु जीवित हैं और संसार में, हम में होकर कार्य कर रहे हैं।

    चाहे हमें व्यथा और दुःख का सामना करना पड़े, परन्तु उस समय में भी हमारा प्रभु हमारे साथ-साथ चलता है। वह जगत की ज्योति है (यूहन्ना 8:12), और उसकी ज्योति हमारे जीवनों को आशा की किरणों से भर देती है। - ऐमी बाउचर पाई

 

चाहे हमें दुःख हों, प्रभु यीशु में हमें आशा का भरोसा है।


तब यीशु ने फिर लोगों से कहा, जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा। - यूहन्ना 8:12

बाइबल पाठ: लूका 24:13-32

लू्का 24:13 देखो, उसी दिन उन में से दो जन इम्माऊस नाम एक गांव को जा रहे थे, जो यरूशलेम से कोई सात मील की दूरी पर था।

लू्का 24:14 और वे इन सब बातों पर जो हुईं थीं, आपस में बातचीत करते जा रहे थे।

लू्का 24:15 और जब वे आपस में बातचीत और पूछताछ कर रहे थे, तो यीशु आप पास आकर उन के साथ हो लिया।

लू्का 24:16 परन्तु उन की आंखें ऐसी बन्द कर दी गईं थी, कि उसे पहचान न सके।

लू्का 24:17 उसने उन से पूछा; ये क्या बातें हैं, जो तुम चलते चलते आपस में करते हो? वे उदास से खड़े रह गए।

लू्का 24:18 यह सुनकर, उनमें से क्लियुपास नाम एक व्यक्ति ने कहा; क्या तू यरूशलेम में अकेला परदेशी है; जो नहीं जानता, कि इन दिनों में उस में क्या क्या हुआ है?

लू्का 24:19 उसने उन से पूछा; कौन सी बातें? उन्होंने उस से कहा; यीशु नासरी के विषय में जो परमेश्वर और सब लोगों के निकट काम और वचन में सामर्थी भविष्यद्वक्ता था।

लू्का 24:20 और महायाजकों और हमारे सरदारों ने उसे पकड़वा दिया, कि उस पर मृत्यु की आज्ञा दी जाए; और उसे क्रूस पर चढ़वाया।

लू्का 24:21 परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्राएल को छुटकारा देगा, और इन सब बातों के सिवाय इस घटना को हुए तीसरा दिन है।

लू्का 24:22 और हम में से कई स्त्रियों ने भी हमें आश्चर्य में डाल दिया है, जो भोर को कब्र पर गई थीं।

लू्का 24:23 और जब उस की लोथ न पाई, तो यह कहती हुई आईं, कि हम ने स्वर्गदूतों का दर्शन पाया, जिन्होंने कहा कि वह जीवित है।

लू्का 24:24 तब हमारे साथियों में से कई एक कब्र पर गए, और जैसा स्त्रियों ने कहा था, वैसा ही पाया; परन्तु उसको न देखा।

लू्का 24:25 तब उसने उन से कहा; हे निर्बुद्धियों, और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करने में मन्दमतियों!

लू्का 24:26 क्या अवश्य न था, कि मसीह ये दुख उठा कर अपनी महिमा में प्रवेश करे?

लू्का 24:27 तब उसने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ कर के सारे पवित्र शास्त्रों में से, अपने विषय में की बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।

लू्का 24:28 इतने में वे उस गांव के पास पहुंचे, जहां वे जा रहे थे, और उसके ढंग से ऐसा जान पड़ा, कि वह आगे बढ़ना चाहता है।

लू्का 24:29 परन्तु उन्होंने यह कहकर उसे रोका, कि हमारे साथ रह; क्योंकि संध्या हो चली है और दिन अब बहुत ढल गया है। तब वह उन के साथ रहने के लिये भीतर गया।

लू्का 24:30 जब वह उन के साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी ले कर धन्यवाद किया, और उसे तोड़कर उन को देने लगा।

लू्का 24:31 तब उन की आंखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उन की आंखों से छिप गया।

लू्का 24:32 उन्होंने आपस में कहा; जब वह मार्ग में हम से बातें करता था, और पवित्र शास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 49-50
  • रोमियों 1


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