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सोमवार, 13 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 19


पाप का समाधान - उद्धार - 15

हम देख चुके हैं कि अदन की वाटिका में हुए पहले पाप के कारण उत्पन्न स्थिति के समाधान और निवारण के लिए जिस सिद्ध, पवित्र, निष्पाप, निष्कलंक मनुष्य की आवश्यकता थी, उसका पृथ्वी पर जन्म और जीवन स्वाभाविक मानवीय प्रणाली से संभव नहीं था, क्योंकि पृथ्वी पर जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य पाप के दोष एवं प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है, और पाप करता है। इसलिए वह केवल अपना दण्ड सहन कर सकता है, किसी अन्य के दण्ड को नहीं वहन कर सकता है। प्रभु यीशु का पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म परमेश्वर द्वारा किया गया आश्चर्यकर्म था; प्रभु ने अन्य सभी मनुष्यों के समान स्त्री से पृथ्वी पर जन्म भी लिया, उत्पत्ति 3:15 की भविष्यवाणी और बात को पूरा भी किया, किन्तु उनकी देह में मनुष्य के पाप का दोष और प्रवृत्ति नहीं थी।

साथ ही, हमने यह भी देखा था कि यद्यपि प्रभु यीशु जन्म से ही निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध थे; किन्तु शैतान ने उन्हें मार डालने या पाप में गिराने के प्रयासों में कोई कसर रख नहीं छोड़ी थी। किन्तु प्रभु ने उसकी कोई चाल को सफल नहीं होने दिया, और अपने पर पाप का कोई अभियोग नहीं आने दिया। प्रभु यीशु हर परिस्थिति, हर बात के लिए पिता परमेश्वर के आज्ञाकारी बने रहे; दुख उठा कर भी। उन्होंने यह दिखा दिया कि परमेश्वर की सहायता से मानवीय शरीर में होकर भी शैतान की युक्तियों को विफल किया जा सकता है, पापा करते रहने से बचा जा सकता है। 

क्योंकि पाप के मानवीय जीवन में प्रवेश का द्वार मनुष्य द्वारा उसके लिए परमेश्वर की योजनाओं और आज्ञाओं के प्रति संदेह के कारण खुला था; इसलिए पाप के समाधान और निवारण के लिए बलिदान होने वाले सिद्ध मनुष्य को परमेश्वर पर बिना कोई संदेह किए पूर्ण विश्वास करने वाला भी होना आवश्यक था। प्रभु यीशु ने यह भी अपने जीवन से कर के दिखाया, वरन पृथ्वी पर आने से भी पहले कर के दिखाया। प्रभु यीशु मसीह में पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार की एक विशेषता यह भी है कि प्रभु के पृथ्वी पर आने से पहले ही उसके बारे में पवित्र शास्त्र में लिख दिया गया था। पौलुस प्रेरित ने कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों की मंडली को लिखा,  “हे भाइयों, मैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूं जो पहिले सुना चुका हूं, जिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिस में तुम स्थिर भी हो। उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया। और गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा” (1 कुरिन्थियों 15:1-4)। प्रभु यीशु परमेश्वर की बातों के प्रति पूर्णतः आज्ञाकारी रहा, उसने परमेश्वर के लिखे हुए को पूरा किया; परमेश्वर पिता की किसी बात के लिए कोई आनाकानी अथवा संदेह नहीं किया: 

  • पृथ्वी पर आते समय प्रभु ने कहा, “तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूं, (पवित्र शास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूं” (इब्रानियों 10:7)। परमेश्वर पिता के प्रति उसकी आज्ञाकारिता उसके पृथ्वी पर आने से पहले आरंभ हो चुकी थी। 
  • जब वह पृथ्वी पर आया, तो अपने ईश्वरत्व को छोड़कर, दीन, नम्र, और आज्ञाकारी दास का स्वरूप धारण करके आया, “जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:6)
  • प्रभु काभोजनअर्थात उसकी सामर्थ्य, परमेश्वर पिता की आज्ञाकारिता थी, “यीशु ने उन से कहा, मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजने वाले की इच्छा के अनुसार चलूं और उसका काम पूरा करूं” (यूहन्ना 4:34)
  • प्रभु ने अपने शिष्यों में से अपने सबसे निकट के शिष्य भी अपनी इच्छा के अनुसार नहीं, वरन पिता परमेश्वर से सारी रात प्रार्थना करने के बाद चुने, “और उन दिनों में वह पहाड़ पर प्रार्थना करने को निकला, और परमेश्वर से प्रार्थना करने में सारी रात बिताई। जब दिन हुआ, तो उसने अपने चेलों को बुलाकर उन में से बारह चुन लिये, और उन को प्रेरित कहा” (लूका 6:12-13) 
  • प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई और कार्यों के लिए कहा, “इस पर यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है” (यूहन्ना 5:19); औरमैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूं, वैसा न्याय करता हूं, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूं” (यूहन्ना 5:30)
  • प्रभु द्वारा अपने प्राणों का बलिदान देना और उसका पुनरुत्थान भी परमेश्वर पिता की इच्छा के अनुसार थापिता इसलिये मुझ से प्रेम रखता है, कि मैं अपना प्राण देता हूं, कि उसे फिर ले लूं। कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन मैं उसे आप ही देता हूं: मुझे उसके देने का अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है” (यूहन्ना 10:17-18) 
  • निष्पाप, निष्कलंक, और पवित्र प्रभु के लिए, जिसके चरित्र, स्वभाव, और विचार में भी पाप नहीं था, सारे संसार के सभी लोगों के पापों को अपने ऊपर ले लेना अत्यंत विचलित कर देने वाला कार्य था; किन्तु फिर भी उसने पिता परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति के लिए उसे किया, “हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” “और वह अत्यन्त संकट में व्याकुल हो कर और भी हृदय वेदना से प्रार्थना करने लगा; और उसका पसीना मानो लहू की बड़ी बड़ी बून्‍दों के समान भूमि पर गिर रहा था” (लूका 22:42, 44) 
  • क्रूस पर जाने से पहले प्रभु ने अपनी प्रार्थना में पिता परमेश्वर से कहा, “जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा कर के मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है” (यूहन्ना 17:4); और क्रूस पर से, अपने प्राण छोड़ने से पहले प्रभु ने सुनिश्चित किया कि परमेश्वर के वचन में उनके लिए लिखी सभी बातें पूरी हो गई हैं, और, “इस के बाद यीशु ने यह जानकर कि अब सब कुछ हो चुका; इसलिये कि पवित्र शास्त्र की बात पूरी हो कहा, मैं प्यासा हूं। वहां एक सिरके से भरा हुआ बर्तन धरा था, सो उन्होंने सिरके में भिगोए हुए इस्‍पंज को जूफे पर रखकर उसके मुंह से लगाया। जब यीशु ने वह सिरका लिया, तो कहा पूरा हुआ और सिर झुका कर प्राण त्याग दिए” (यूहन्ना 19:28-30) 
  • अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु ने अपने शिष्यों को समझाया कि किस प्रकार पवित्र शास्त्र में उस के लिए लिखी हुई बातों का पूरा होना अवश्य था, “फिर उसने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों। तब उसने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी। और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा” (लूका 24:44-46)

 

प्रभु के पृथ्वी पर आने से पहले से लेकर, उनके जीवन, शिक्षाओं, क्रूस पर बलिदान देने, मृतकों में से जी उठने - सभी के विषय परमेश्वर ने अपने वचन में सब कुछ पहले से लिखवा दिया था। प्रभु यीशु ने उन सभी बातों का पूर्णतः निर्वाह किया, कभी परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी नहीं रहा, कभी उसकी किसी बात, किसी योजना पर संदेह नहीं किया, परमेश्वर की आज्ञाकारिता करने में कभी कुड़कुड़ाया नहीं, हर बात में परमेश्वर की इच्छा जानकार उसी के अनुसार कार्य किया। इसी प्रभु ने अपनी सेवकाई के आरंभ से ही कहा, “यूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मरकुस 1:14-15) 

क्या आप परमेश्वर की इस चेतावनी के प्रति सचेत और तैयार हैं? संसार के हालात स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि अब किसी भी क्षण प्रभु को दोबारा आगमन हो जाएगा, और जिन्होंने उद्धार नहीं पाया है, वे अनन्त विनाश में, तथा पापों से पश्चाताप करके उनके लिए प्रभु यीशु से क्षमा मांग लेने वाले अनन्त आशीष के स्थान - स्वर्ग में चले जाएंगे। क्या आप उस घड़ी के इस अपरिवर्तनीय निर्णय का सामना करने के लिए तैयार हैंयदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

 

बाइबल पाठ: प्रेरितों 17:24-31 

प्रेरितों 17:24 जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी हो कर हाथ के बनाए हुए मन्‍दिरों में नहीं रहता।

प्रेरितों 17:25 न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और श्वास और सब कुछ देता है।

प्रेरितों 17:26 उसने एक ही मूल से मनुष्यों की सब जातियां सारी पृथ्वी पर रहने के लिये बनाईं हैं; और उन के ठहराए हुए समय, और निवास के सिवानों को इसलिये बान्धा है।

प्रेरितों 17:27 कि वे परमेश्वर को ढूंढ़ें, कदाचित उसे टटोल कर पा जाएं तौभी वह हम में से किसी से दूर नहीं!

प्रेरितों 17:28 क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; जैसे तुम्हारे कितने कवियों ने भी कहा है, कि हम तो उसी के वंश भी हैं।

प्रेरितों 17:29 सो परमेश्वर का वंश हो कर हमें यह समझना उचित नहीं, कि ईश्वरत्व, सोने या रूपे या पत्थर के समान है, जो मनुष्य की कारीगरी और कल्पना से गढ़े गए हों।

प्रेरितों 17:30 इसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है।

प्रेरितों 17:31 क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है। 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 16-18

·      2 कुरिन्थियों 6

रविवार, 12 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 18

 

पाप का समाधान - उद्धार - 14

       मनुष्य की अनाज्ञाकारिता के कारण पाप के संसार में प्रवेश के समाधान के बारे में देखते हुए, अभी तक हम देख चुके हैं कि: 

  • क्योंकि पाप का प्रवेश मनुष्य के द्वारा हुआ, उसका समाधान भी मनुष्य में होकर ही होना था। 
  • पाप के कारण मृत्यु जगत में आई; पाप के समाधान के द्वारा मृत्यु का यह प्रभाव मिटाया जाकर मनुष्य को वापस उस स्थिति में लाया जाना था जो अदन की वाटिका में पाप से पहले उसकी थी। 
  • इसके लिए यह आवश्यक था कि कोई ऐसा निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, सिद्ध मनुष्य हो जो पाप के कारण आई मृत्यु को स्वयं सह ले, और मनुष्यों पर से मृत्यु की पकड़ को मिटा दे। यदि मृत्यु को सहने वाले मनुष्य में अपना कोई पाप, या पाप का कोई दोष अथवा अंश होता, तो फिर वह उस मृत्यु को केवल अपने ही लिए सह सकता था, दूसरों को उसके लाभ प्रदान नहीं कर सकता था। 
  • इस कारण पृथ्वी पर जन्म लेने वाले मनुष्यों की सामान्य प्रणाली के अनुसार जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य इसके अयोग्य ठहरता, क्योंकि सभी पाप-दोष के साथ जन्म लेते हैं। इस संदर्भ में हमने पिछले दो लेखों में देखा कि कैसे प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्यों के जन्म की सामान्य प्रणाली के द्वारा नहीं, वरन एक विशेष रीति से मनुष्य की देह में जन्म लिया और कोख में आने से लेकर क्रूस पर उनकी मृत्यु के समय तक एक पूर्णतः निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध जीवन बिताया। न उनके जीवन काल में, और न तब से लेकर अब दो हज़ार वर्षों से भी अधिक के अंतराल में, कोई उनके जीवन में कोई भी पाप नहीं दिखा सका, उनमें पाप का दोष होने को प्रमाणित नहीं कर सका। 
  • अदन की वाटिका में पाप और मृत्यु ने मनुष्य की अनाज्ञाकारिता के द्वारा प्रवेश किया; और इस अनाज्ञाकारिता का कारण था मनुष्य का परमेश्वर की उनके लिए भली मनसा और योजनाओं पर संदेह करना था। मनुष्य के जीवन से पाप और मृत्यु का मिटाया जाना इस अनाज्ञाकारिता की प्रक्रिया को उलट देने से होना था। साथ ही इस आज्ञाकारिता के लिए मनुष्य को अपने जीवन पर्यंत, बिना परमेश्वर की किसी भी बात के लिए उस पर संदेह अथवा अविश्वास किए, स्वेच्छा से तथा भली मनसा के साथ परमेश्वर की पूर्ण आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करना था। 

       आज से हम प्रभु यीशु मसीह द्वारा इस पूर्ण आज्ञाकारिता की शर्त को पूरा करने के बारे में देखेंगे। ऐसा नहीं है कि क्योंकि प्रभु यीशु परमेश्वर के पुत्र थे, क्योंकि वे पूर्णतः परमेश्वर और पूर्णतः मनुष्य थे, इसलिए उनके लिए यह आज्ञाकारिता सहज एवं सरल थी। प्रभु यीशु को भी अपने मनुष्य रूप में आज्ञाकारिता के लिए बहुत दुख और कष्ट सहने पड़े, परीक्षाओं और कठिनाइयों से होकर निकलना पड़ा। प्रभु यीशु की इस आज्ञाकारिता के विषय परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखा गया है, “उसने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उसको मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई। और पुत्र होने पर भी, उसने दुख उठा उठा कर आज्ञा माननी सीखी। और सिद्ध बन कर, अपने सब आज्ञा मानने वालों के लिये सदा काल के उद्धार का कारण हो गया” (इब्रानियों 5:7-9); और “...वरन वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला” (इब्रानियों 4:15) 

शैतान ने उनके जन्म से पहले से लेकर, उनकी मृत्यु के समय तक उनके द्वारा यह कार्य संपन्न होने से रोकने का प्रयास करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी:

  • इसे समझने के लिए मत्ती 1:18-21 देखिए। जब प्रभु के सांसारिक पिता कहलाए जाने वाले व्यक्ति यूसुफ को पता चला कि उसकी मंगेतर मरियम, जिसमें होकर प्रभु यीशु ने जन्म लेना था, गर्भवती है, तो उसने उसे चुपके से छोड़ देने की योजना बनाई। उन दिनों में, मूसा द्वारा मिली व्यवस्था के अनुसार, व्यभिचार के दोषी को पत्थरवाह करके मार डाला जाता था (यूहन्ना 8:4, 5)। यदि यूसुफ मरियम को छोड़ देता, तो या तो उसके विवाह से पहले गर्भवती होने की बात खुल जाने पर मरियम को पत्थरवाह करके मार डाला जाता; या फिर मरियम त्यागी हुई स्त्री के समान अकेले ही समाज से तिरस्कृत जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाती, और प्रभु भी जन्म के समय से ही तिरस्कृत और अपमानित, तथा समाज में अस्वीकार्य रहता; इस बात के लिए प्रभु को बाद में भी लोगों के ताने सुनने पड़े (यूहन्ना 8:41)। दोनों में से जो भी परिस्थिति कार्यान्वित होती, प्रभु का उद्धार का कार्य, आरंभ होने से पहले ही समाप्त हो जाता। किन्तु क्योंकि परमेश्वर के संदेश को सुन और मानकर यूसुफ ने मरियम को अपना लिया, शिशु यीशु को अपना नाम और परिवार दिया, इसलिए शैतान की यह योजना विफल हो गई। 
  • प्रभु के जन्म के बाद, हेरोदेस राज्य ने दो वर्ष की आयु से कम के बच्चों को मरवाने की आज्ञा देकर प्रभु को शिशु-अवस्था में ही मरवा डालने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा (मत्ती 2:13-16) 
  • प्रभु यीशु के वयस्क हो जाने और सेवकाई के आरंभ करने के समय वह लगातार चालीस दिन तक शैतान द्वारा परखा गया (लूका 4:1)। जब शैतान उसे पाप में नहीं गिरा सका, तोकुछ समय के लिए” (लूका 4:13) उसके पास से चला गया, किन्तु उसकी सारी सेवकाई भर लोगों, विशेषकर धर्म के अगुवों और धर्म-गुरुओं को उसके विरुद्ध भड़काता रहा, उसकी सेवकाई में बाधाएं डालता रहा।
  • धर्म-गुरुओं के षड्यंत्र के अंतर्गत (यूहन्ना 11:47-50), अन्ततः यीशु को पकड़ कर, रोमी गवर्नर पिलातुस को बाध्य कर के, प्रभु यीशु को क्रूस पर मार डाला गया।
  • क्रूस की अवर्णनीय पीड़ा सहते हुए भी, वहाँ पर भी उसका ठट्ठा उड़ाया जाना ज़ारी रहा (मत्ती 27:41; लूका 23:36); किन्तु प्रभु ने कोई अपशब्द नहीं कहा, या दुर्भावना नहीं रखी, वरन अपने सताने वालों की क्षमा की प्रार्थना ही की; कोई पाप नहीं किया (लूका 23:34) 
  • उसे क्रूस पर से उतर आने का प्रलोभन दिया गया, इस आश्वासन के साथ कि यदि वह ऐसा करेगा, तो वे लोग उस पर विश्वास कर लेंगे (मत्ती 27:40, 42)। यदि उनकी बात मानकर प्रभु क्रूस पर से उतर आता, तो बलिदान का कार्य अधूरा रह जाता, और असफल हो जाता। 
  • शैतान ने सोचा होगा कि अब यह प्रभु का अंत है; अब शैतान को रोकने वाला कोई नहीं रहा। किन्तु तीसरे दिन प्रभु यीशु के पुनरुत्थान ने उसकी सारी संतुष्टि और योजनाओं पर पानी फेर दिया। तब प्रभु के पुनरुत्थान के बाद भी शैतान ने प्रभु के पुनरुत्थान को ही झूठा ठहराने का षड्यंत्र कार्यान्वित कर दिया (मत्ती 28:13-15) 

किन्तु शैतान की हर चाल को प्रभु ने विफल किया, और दिखा दिया कि मानव-देह में शैतान की युक्तियों, प्रलोभनों, और परीक्षाओं का सामना करने, और उसे पराजित करने की क्षमता है। शैतान के इन सभी प्रयासों ने परमेश्वर के कार्य को बाधित करने के स्थान पर और अधिक प्रबल कर दिया। शैतान के ये प्रयास परमेश्वर के वचन में दी गई प्रभु यीशु से संबंधित भविष्यवाणियों को पूरा और प्रमाणित करने वाले तथ्य बन गए; प्रभु परमेश्वर की महिमा के, उसके सत्य के सदा जयवन्त रहने के उदाहरण बन गए। हम प्रभु द्वारा परमेश्वर की आज्ञाकारिता के विषय आगे अगले लेख में देखेंगे।

जिस प्रभु ने मानव देह में होकर यह दिखा दिया कि मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाकारिता में रहते हुए, परमेश्वर की सहायता से शैतान का सामना कर सकता है, उसे पराजित कर सकता है, वही प्रभु परमेश्वर अपने शिष्यों को अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से भर देता है, परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रभु यीशु के शिष्यों में उसी पल से आकर बस जाता है जब वे पापों से पश्चाताप करते हैं और अपने जीवन प्रभु को समर्पित कर देते हैं (इफिसियों 1:13-14)। प्रभु के साथ तथा पवित्र आत्मा की सहायता एवं मार्गदर्शन से हम मनुष्य भी शैतान पर जयवंत हो सकते हैं। क्या आपने प्रभु के इस अद्भुत उपहार को पा लिया हैयदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

 

बाइबल पाठ: यूहन्ना:1-14

यूहन्ना 1:1 आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

यूहन्ना 1:2 यही आदि में परमेश्वर के साथ था।

यूहन्ना 1:3 सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

यूहन्ना 1:4 उस में जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी।

यूहन्ना 1:5 और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।

यूहन्ना 1:6 एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिस का नाम यूहन्ना था।

यूहन्ना 1:7 यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाएं।

यूहन्ना 1:8 वह आप तो वह ज्योति न था, परन्तु उस ज्योति की गवाही देने के लिये आया था।

यूहन्ना 1:9 सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।

यूहन्ना 1:10 वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।

यूहन्ना 1:11 वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।

यूहन्ना 1:12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।

यूहन्ना 1:13 वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहन्ना 1:14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 13-15

·      2 कुरिन्थियों

शनिवार, 11 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 17

 

पाप का समाधान - उद्धार - 13

       हमने उद्धार से संबंधित तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” पर विचार करते हुए पिछले लेख में देखा है कि परमेश्वर द्वारा उपलब्ध करवाए गए समाधान के लिए जिस पवित्र और सिद्ध मनुष्य की आवश्यकता थी, वह मनुष्यों के जन्म और जीवन की प्रणाली के अनुसार पाया जाना असंभव था। उसका पृथ्वी पर आना और अस्तित्व अलौकिक विधि से ही संभव हो सकता था, और परमेश्वर ने ही यह प्रावधान करके दिया; उस प्रावधान के लिए आवश्यक सिद्ध मनुष्य के जन्म और जीवन से संबंधित सभी अनिवार्य गुण प्रभु यीशु मसीह में हैं। परमेश्वर का पुत्र, प्रभु यीशु मसीह, मनुष्यों के पापों के लिए बलिदान होने के लिए, अपने परमेश्वरत्व की सामर्थ्य, वैभव और महिमा को छोड़कर, एक साधारण और सामान्य मनुष्य बनकर इस संसार में आ गयाजैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:5-8)

       यद्यपि प्रभु यीशु मसीह त्रिएक परमेश्वर का दूसरा व्यक्तित्व, परमेश्वर पुत्र है, किन्तु, जैसा उपरोक्त बाइबल खंड से प्रकट है, पृथ्वी पर मनुष्य बनकर जन्म लेने में उन्होंने अपने आप को ईश्वरीय नहीं वरन मानवीय स्वरूप एवं व्यवहार के अंतर्गत कर लिया, और एक साधारण मनुष्य समान ही जीवन व्यतीत किया:

  • उन्होंने एक सामान्य शिशु के समान जन्म लिया, और अन्य बच्चों के समान ही उनका पालन पोषण हुआ, वे बड़े हुए (लूका 2:6-7) 
  • वे अपने सांसारिक माता-पिता की अधीनता में और उन के आज्ञाकारी रहे (लूका 2:51) 
  • उनके इलाके के लोग उन्हें एक सामान्य मनुष्य, अपने सांसारिक पिता के समान एक बढ़ई का काम करने वाले के रूप में जानते थे (मरकुस 6:3)
  • लोगों के अविश्वास से उन्हें अचंभा हुआ (मरकुस 6:6)
  • सभी मनुष्यों के समान, पैदल यात्रा से उन्हें भी थकान होती थी, भूख और प्यास लगती थी (यूहन्ना 4:6-8), वे भी भोजन करते थे (यूहन्ना 13:4; लूका 24:42-43) 
  • सभी मनुष्यों के समान उनमें भी भावनाएं थीं:
    • वे बच्चों से प्रेम करते थे (मत्ती 19:14)
    • दुखियों और समाज के तिरस्कृत लोगों पर उन्हें तरस आता था (लूका 7:12-13; मत्ती 20:34)
    • वे प्रिय जनों के देहांत और उनके परिवार के दुख से दुखी होकर स्वयं भी रोए (यूहन्ना 11:35-36)
    • वे धार्मिकता और परमेश्वर के वचन के प्रति दोगलेपन के व्यवहार को सहन नहीं कर सकते थे (मत्ती 15:1-9; 23 अध्याय)
    • धार्मिकता के प्रति अनुचित ढिठाई के व्यवहार से उन्हें क्रोध आया (मरकुस 3:5)
    • अधर्मियों और अविश्वासियों पर आने वाले प्रकोप और विनाश से भी वे दुखी हुए और रोए (लूका 19:41-44; मत्ती 23:37)
  • सभी मनुष्यों के समान उन्हें भी नींद की आवश्यकता होती थी (लूका 8:23)
  • उन्हें भी लोगों के विरोध, बैर, और मार डाले जाने की बातों का सामना करना पड़ा (यूहन्ना 5:18, 41; 8:40-41,50, 59)
  • यह जानते हुए भी कि उनका शिष्य यहूदा इस्करियोती उन्हें मार डाले जाने के लिए पकड़वाने वाला है, प्रभु ने यहूदा के विरुद्ध एक भी बात नहीं की, कोई कटाक्ष नहीं किया, उसे औरों के सामने उजागर और अपमानित नहीं किया, वरन उसके प्रभु को छोड़ कर चले जाने तक प्रभु उससे प्रेम का ही व्यवहार करता रहा (यूहन्ना 13:21-30) 
  • पकड़वाए जाने के समय भी प्रभु ने उन्हें पकड़ने आए हुए लोगों के विरुद्ध कुछ नहीं किया, जबकि उन्हें नाश कर देना उसकी सामर्थ्य में था; वरन वहाँ पर भी प्रभु ने अपना बुरा चाहने वाले को चंगाई दी (मत्ती 26:51-53; लूका 22:51) 
  • पकड़वाए जाने के बाद से लेकर क्रूस पर उनकी मृत्यु तक, प्रभु को लगातार उपहास, अपमान, लांछन, यातनाओं और मिथ्या आरोपों का सामना करना पड़ा; किन्तु वे चुपचाप सब सहते रहे, किसी के विरुद्ध कुछ नहीं कहा, किसी को कोई अपशब्द नहीं कहा, कोई श्राप नहीं दिया। वरन उन्हें क्रूस पर चढ़ाने वालों के लिए भी उन्होंने क्षमा की प्रार्थना की, और उनकी निन्दा करने वाले डाकू ने जब पश्चाताप किया, तो उसे भी उन्होंने तुरंत क्षमा कर दिया, स्वर्ग में होने का आश्वासन दे दिया।  

       इन सभी बातों में से होकर निकलने पर भी, जो एक सामान्य मनुष्य से यदि शब्दों और कार्यों में नहीं, तो कम से कम मन या विचारों में पाप करवा सकती हैं, प्रभु यीशु ने कभी कोई पाप नहीं किया। इसीलिए इब्रानियों की पत्री का लेखक उनके लिए लिखता है, “सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से हो कर गया है, अर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशु; तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहे। क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला” (इब्रानियों 4:14-15)। उनके शिष्य यूहन्ना ने, जो लगभग साढ़े तीन वर्ष उनके साथ रहा था, जिसने उन्हें और उनके कार्यों को निकटता से देखा था, उनकी बातों और शिक्षाओं को सुना था, और जो प्रभु से बहुत घनिष्ठ था (यूहन्ना 13:23;21:7) अपनी पत्री में उनके लिए लिखा, “और तुम जानते हो, कि वह इसलिये प्रगट हुआ, कि पापों को हर ले जाए; और उसके स्वभाव में पाप नहीं” (1 यूहन्ना 3:5) 

       प्रभु यीशु मसीह, हर बात में, हर रीति से पूर्णतः मनुष्य थे; साथ ही वे पूर्णतः परमेश्वर भी थे, जिन्होंने अपने परमेश्वरत्व को, अपनी सामर्थ्य को, पृथ्वी की उनकी सेवकाई के दिनों में केवल औरों की भलाई के लिए ही प्रयोग किया, कभी अपने लिए नहीं (प्रेरितों 10:38; मत्ती 4:1-11)। केवल वो ही वह एकमात्र ऐसे उपयुक्त व्यक्ति थे जो औरों के पापों को अपने ऊपर लेकर उनके लिए दण्ड सह सकते थे, क्योंकि उनमें कभी किसी प्रकार का कोई पाप नहीं था इसलिए उन्हें अपने पाप के विषय कुछ नहीं करना था, जो भी करना था औरों के पापों के लिए ही करना था। इस प्रेमी, अनुग्रहकारी, धीरजवंत प्रभु ने मेरे और आपके पापों के निवारण और पाप की समस्या का समाधान तैयार कर के सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है। क्या आप उसके इस समाधान को स्वीकार नहीं करेंगे? आपके प्रति उसके प्रेम और कृपया में ऐसी क्या कमी, क्या बात है जो आपको उसके प्रेम भरे आमंत्रण को स्वीकार करने से रोकती है? उसके निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए आपको सच्चे और समर्पित मन से एक प्रार्थना ही तो करनी है, जो आपके मन और जीवन को बदल कर नया कर दे, परमेश्वर के साथ आपका मेल-मिलाप करवा दे।  

यदि आप ने अभी भी नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपको जगत के न्याय से बचाकर स्वर्ग की आशीषों का वारिस बना देगा। क्या आप आज, अभी यह निर्णय लेंगे

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 2:1-11 

फिलिप्पियों 2:1 सो यदि मसीह में कुछ शान्ति और प्रेम से ढाढ़स और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है।

फिलिप्पियों 2:2 तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।

फिलिप्पियों 2:3 विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।

फिलिप्पियों 2:4 हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे।

फिलिप्पियों 2:5 जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।

फिलिप्पियों 2:6 जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।

फिलिप्पियों 2:7 वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।

फिलिप्पियों 2:8 और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।

फिलिप्पियों 2:9 इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

फिलिप्पियों 2:10 कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें।

फिलिप्पियों 2:11 और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 10-12

·      2 कुरिन्थियों 4

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 16

 

पाप का समाधान - उद्धार - 12

       हमने उद्धार से संबंधित तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” पर विचार आरंभ किया है। आदम और हव्वा के पापा के कारण उत्पन्न हुई इस विडंबना के लिए कि पाप को दण्डित भी किया जाए, किन्तु मनुष्य मृत्यु में, अर्थात, परमेश्वर की संगति से अनन्तकाल के लिए अलग भी न हो, परमेश्वर ने जो समाधान दिया, उसके लिए सभी मनुष्यों के लिए उनके पापों को अपने ऊपर उठा लेने और उन पापों के दण्ड को उनके स्थान पर सहन कर लेने वाले ऐसे मनुष्य की आवश्यकता थी, जो पृथ्वी पर ही जन्मा हो, जिसने अपने गर्भ में आने से लेकर अपनी मृत्यु तक अन्य मनुष्यों के समान ही हर परिस्थिति को सहन किया हो, और फिर भी उसने कभी कोई पाप नहीं किया हो। साथ ही इस मनुष्य में कुछ और विशेष गुण भी होने चाहिए थे; परमेश्वर को कोई ऐसा मनुष्य चाहिए था जिसका जीवन माता के गर्भ में आने के समय से ही पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो, इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके, और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। केवल ऐसा मनुष्य ही पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था। अन्यथा, यदि उस मनुष्य में अपना स्वयं का कोई भी पाप होता, तो फिर वह जो भी बलिदान देता, जो भी कार्य करता, वह उसके अपने पाप के लिए ही होता; वह औरों के पाप के लिए अपना बलिदान नहीं दे सकता था। 

       किन्तु ऐसा पूर्णतः सिद्ध मनुष्य, पाप में पतित मनुष्यों में से आ पाना संभव नहीं था, क्योंकि आदम और हव्वा के पाप के बाद से प्रत्येक मनुष्य पाप के स्वभाव के साथ ही अपनी माता के गर्भ में आता है और शिशु अवस्था से ही पाप की प्रवृत्ति को प्रकट करता रहता है। इसलिए मनुष्यों की प्रणाली के अनुसार माता के गर्भ में पड़ने और जन्म लेने वाला कोई भी मनुष्य पूर्णतः निष्पाप, पवित्र, और निष्कलंक, इस बलिदान के लिए सिद्ध नहीं ठहर सकता। इसीलिए, उत्पत्ति 3:15 में परमेश्वर ने जब इस उद्धारकर्ता की भविष्यवाणी की, तो उसेस्त्री के वंशका बताया; अर्थात, वह मनुष्यों के प्रणाली के अनुसार, किसी पुरुष के कारण माता के गर्भ में नहीं आएगा, वरन केवल स्त्री से ही होगा। इसी लिए यह करने के लिए परमेश्वर ने एक कुँवारी, मरियम को चुना, और उसे बताया गया कि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा परमेश्वर उसकी कोख में एक आश्चर्यकर्म करेगा; उसमें से सारे जगत का उद्धारकर्ता जन्म लेगा, और मरियम ने अपने आप को प्रभु परमेश्वर के कार्य के लिए समर्पित कर दिया (लूका 1:26-38)। मरियम की स्वीकृति के बाद, परमेश्वर ने इस महान कार्य के लिए तैयार की गई एक विशेष देह (इब्रानियों 10:5) को मरियम की कोख में डाला। वहाँ से मरियम की कोख में किसी भी अन्य मनुष्य के समान विकसित होकर, समय के अनुसार प्रभु यीशु मसीह ने एक शिशु के रूप में जन्म लिया। उनके गर्भ में आने के समय से लेकर के उनके पृथ्वी के जीवन पर्यंत वे निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध रहे; उनकी देह में मनुष्य के किए गए पाप का प्रभाव नहीं था। 

       न केवल प्रभु यीशु के मनुष्य बनने की प्रक्रिया पाप के प्रभाव से अछूती थी, वरन उनका जीवन भी पूर्णतः पाप से अछूता थाऔर तुम जानते हो, कि वह इसलिये प्रगट हुआ, कि पापों को हर ले जाए; और उसके स्वभाव में पाप नहीं” (1 यूहन्ना 3:5); “न तो उसने पाप किया, और न उसके मुंह से छल की कोई बात निकली” (1 पतरस 2:22)। प्रभु यीशु ने अपनी आलोचना करने वालों को खुली चुनौती दी, “तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है? और यदि मैं सच बोलता हूं, तो तुम मेरी प्रतीति क्यों नहीं करते?” (यूहन्ना 8:46)। वह हमेशा, सभी का भला करता और परमेश्वर के राज्य की शिक्षा देता हुआ स्थान-स्थान पर जाता रहा, लोगों से मिलता रहा, “कि परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से अभिषेक किया: वह भलाई करता, और सब को जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था” (प्रेरितों 10:38)

       उस समय के धर्म के अगुवे – फरीसी, शास्त्री, सदूकी, व्यवस्थापक, आदि, उसे पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वह सत्यवादी एवं स्पष्टवादी था, और उनके दोगलेपन को तथा परमेश्वर के वचन के अपने स्वार्थ के लिए दुरुपयोग को खुलकर प्रकट कर देता था। किन्तु फिर भी वे उसके विषय जानते और समझते थे कि परमेश्वर उसके साथ है, और वह परमेश्वर की ओर से बोलता तथा कार्य करता है, और उसकी इस बात को स्वीकार करते थे:फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उसने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता” (यूहन्ना 3:1-2); “सो उन्होंने अपने चेलों को हेरोदियों के साथ उसके पास यह कहने को भेजा, कि हे गुरु; हम जानते हैं, कि तू सच्चा है; और परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है; और किसी की परवाह नहीं करता, क्योंकि तू मनुष्यों का मुंह देखकर बातें नहीं करता” (मत्ती 22:16)। किन्तु साथ ही, प्रभु यीशु के विषय यह जानते-मानते हुए भी वे उससे शत्रुता रखते थे, उसे पत्थरवाह करना चाहते थेयहूदियों ने उसको उत्तर दिया, कि भले काम के लिये हम तुझे पत्थरवाह नहीं करते, परन्तु परमेश्वर की निन्दा के कारण और इसलिये कि तू मनुष्य हो कर अपने आप को परमेश्वर बनाता है” (यूहन्ना 10:33) 

उसकी सच्चाई को जानते हुए भी उन्होंने उसे मार डालने का षड्यंत्र बनाया, क्योंकि उसकी ख्याति के कारण उन्हें अपनी कुर्सी हिलती हुए दिखने लगी थीइस पर महायाजकों और फरीसियों ने मुख्य सभा के लोगों को इकट्ठा कर के कहा, हम करते क्या हैं? यह मनुष्य तो बहुत चिन्ह दिखाता है। यदि हम उसे यों ही छोड़ दे, तो सब उस पर विश्वास ले आएंगे और रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे। तब उन में से काइफा नाम एक व्यक्ति ने जो उस वर्ष का महायाजक था, उन से कहा, तुम कुछ नहीं जानते। और न यह सोचते हो, कि तुम्हारे लिये यह भला है, कि हमारे लोगों के लिये एक मनुष्य मरे, और न यह, कि सारी जाति नाश हो” (यूहन्ना 11:47-50) 

प्रभु यीशु का जन्म और जीवन, निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध था; और वह अपने अनुयायियों को भी अपने इसी स्वरूप में ढालता चला जाता है “...तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18); परमेश्वर पिता प्रभु यीशु के सभी शिष्यों, मसीही विश्वासियों को, अपने पुत्र, प्रभु यीशु के स्वरूप में देखना चाहता है, “क्योंकि जिन्हें उसने पहिले से जान लिया है उन्हें पहिले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरे” (रोमियों 8:29)। प्रभु यीशु न तो कोई धर्म देने आया, न अपने शिष्यों से चाहा कि वे उसके नाम में कोई धर्म आरंभ करें, या लोगों का धर्म परिवर्तन करें। वह पापी मनुष्यों के मन और जीवन को बदलने, उन्हें अपने स्वर्गीय स्वरूप और स्वभाव में ढालने, और परमेश्वर के साथ रहने वाले बनाने के लिए आया। और यह किसी धार्मिक प्रक्रिया अथवा कर्म-कांड के द्वारा नहीं, प्रभु यीशु में विश्वास, पापों के लिए पश्चाताप, और प्रभु के प्रति समर्पण करने के द्वारा संभव है।

यदि आप ने अभी भी नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपको जगत के न्याय से बचाकर स्वर्ग की आशीषों का वारिस बना देगा। क्या आप आज, अभी यह निर्णय लेंगे

बाइबल पाठ: यूहन्ना 10:9-18 

यूहन्ना 10:9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।

यूहन्ना 10:10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।

यूहन्ना 10:11 अच्छा चरवाहा मैं हूं; अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है।

यूहन्ना 10:12 मजदूर जो न चरवाहा है, और न भेड़ों का मालिक है, भेड़िए को आते हुए देख, भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है, और भेड़िया उन्हें पकड़ता और तित्तर-बित्तर कर देता है।

यूहन्ना 10:13 वह इसलिये भाग जाता है कि वह मजदूर है, और उसको भेड़ों की चिन्ता नहीं।

यूहन्ना 10:14 अच्छा चरवाहा मैं हूं; जिस तरह पिता मुझे जानता है, और मैं पिता को जानता हूं।

यूहन्ना 10:15 इसी तरह मैं अपनी भेड़ों को जानता हूं, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं, और मैं भेड़ों के लिये अपना प्राण देता हूं।

यूहन्ना 10:16 और मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं; मुझे उन का भी लाना अवश्य है, वे मेरा शब्द सुनेंगी; तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा।

यूहन्ना 10:17 पिता इसलिये मुझ से प्रेम रखता है, कि मैं अपना प्राण देता हूं, कि उसे फिर ले लूं।

यूहन्ना 10:18 कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन मैं उसे आप ही देता हूं: मुझे उसके देने का अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 8-9

·      2 कुरिन्थियों