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शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 16


मसीही विश्वास या ईसाई धर्म?

       पिछले लेखों में हमने देखा है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, प्रभु यीशु का अनुयायी होना किसी धर्म का पालन करना नहीं है, वरन स्वेच्छा और सच्चे एवं पूर्णतः समर्पित मन से प्रभु यीशु मसीह का आज्ञाकारी शिष्य बनना स्वीकार करना है, और फिर उन का अनुसरण करते हुए जैसा वे कहें और सिखाएं, वैसा जीवन जीना है। हमने प्रेरितों 9:2; 19:9, 23; 22:4, 24:14, 22 से देखा था कि प्रभु यीशु मसीह के आरंभिक अनुयायी किसी विशेष नाम से नहीं जाने जाते थे, वरन लोगों द्वारा उन्हेंपंथयामतके लोग कहा जाता था, न कि किसी धर्म के मानने वाले। फिर प्रेरितों 11:26 से हमने देखा था कि प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों को पहली बार अंताकिया मेंमसीहीकहा गया; और वहाँ से यह नाम उनके साथ जुड़ गया। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार मसीही विश्वासी होना प्रभु यीशु मसीह का शिष्य होना है, और एक विशिष्ट जीवन शैली के अनुसार जीना है; न कि किसी धर्म और उसके रीति रिवाजों और नियमों का पालन करना। साथ ही इस तथ्य में यह भी निहित है कि कोई भी किसी का शिष्य बनकर कभी जन्म नहीं लेता है; हर कोई स्वेच्छा से, अपनी समझ-बूझ के अनुसार अपना व्यक्तिगत निर्णय लेने से ही किसी का शिष्य बनता है। इसी प्रकार, संसार की सामान्य धारणा के विपरीत, किसी भी परिवार विशेष में जन्म ले लेने से कोई मसीही नहीं हो जाता है। वरन हर किसी को अपने पापों से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु द्वारा कलवरी के क्रूस पर समस्त संसार के सभी लोगों के पापों के लिए दिए गए बलिदान, और उनके मृतकों में से पुनरुत्थान को स्वीकार करते हुए, प्रभु यीशु से अपने पापों की क्षमा माँगकर, उसे अपना उद्धारकर्ता और प्रभु स्वीकार करना होता है, अपना जीवन स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से उसे समर्पित करना होता है। इसे ही उद्धार या नया जन्म पाना कहते हैं - नश्वर सांसारिक जीवन से अविनाशी आत्मिक जीवन में परमेश्वर की संतान बनकर जन्म लेना (यूहन्ना 1:12-13); और इसके बिना कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना तो दूर, उसे देख भी नहीं सकता है (यूहन्ना 3:3, 5, 7)। मसीही विश्वासी होना कोई धर्म परिवर्तन करना नहीं है, वरन यह व्यक्ति के मन का परमेश्वर की ओर परिवर्तन है।

प्रेरितों 2 अध्याय में प्रभु यीशु के शिष्य, पतरस के द्वारा परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और अगुवाई में यरूशलेम में परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार पर्व और बलिदानों के निर्वाह के लिए संसार भर से एकत्रित हुएभक्त यहूदियों” (प्रेरितों 2:5) के मध्य किया गया वह प्रचार दर्ज है जिसके फल स्वरूप प्रभु यीशु के अनुयायियों की पहली मण्डली ने जन्म लिया। इस पूरे प्रचार में हम कहीं भी किसी धर्म परिवर्तन की बात नहीं देखते हैं - किसी से नहीं कहा गया कि वह अपना यहूदी या कोई अन्य धर्म छोड़कर ईसाई धर्म में आ जाए। वरन सभी से मन फिराव अर्थात पापों से पश्चाताप करने के लिए कहा गया। पतरस ने उन्हें परमेश्वर को स्वीकार्य होने, उसकी दृष्टि मेंधर्मीठहरने के लिए अपने जीवनों सात व्यावहारिक बातों का समावेश करने के लिए कहा। प्रेरितों 2:38-42 में जिस क्रम में ये बातें दी गईं, उसी क्रम का पालन करते हुए, ये सात बातें हैं: (i) मन-फिराव अर्थात पापों से पश्चाताप करना, (ii) प्रभु यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लेना, (पद 38); (iii) अपने आप कोटेढ़ी जातिअर्थात भ्रष्ट और पतित संसार से पृथक रखना, (पद 40); (iv) प्रेरितों से शिक्षा पाना, अर्थात परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना, (v) अन्य मसीही विश्वासियों के साथ संगति रखना, (vi) रोटी तोड़ना अर्थात प्रभु भोज में सम्मिलित होना, (viii) प्रार्थना करते रहना (पद 42)। पद 42 यह भी बताता है कि उस आरंभिक मण्डली के लोग, इन अंतिम चार बातों मेंलौलीनरहते थे। दुर्भाग्यवश, मसीही विश्वास के इस मूल और वास्तविक स्वरूप को बिगाड़ कर, उसे मसीही या ईसाई धर्म बना देने वालों ने, और इस ईसाई धर्म का पालन करने वालों ने इन सात बातों को एक रस्म पूर्ति की बात, एक औपचारिकता बना दिया है। और आरंभिक मसीही विश्वासियों की मण्डली के ये गुण अब लोगों के लिए धर्म-कर्म-रस्म के औपचारिक निर्वाह के बातें बन कर रह गए हैं।

शैतान की इस चाल ने मसीही विश्वास के नाम पर लोगों को इस औपचारिकता में फंसा कर परमेश्वर के वचन की वास्तविकता से दूर करके, उन्हें मसीही विश्वासी के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का - जिसका उल्लेख भी बाइबल में नहीं ही, मानने वाला कर दिया है। उनकी अपनी ही गढ़ी हुई धार्मिकता तथा उनके द्वारा अन्यजाति रीति-रिवाज़ों, त्यौहारों आदि का मसीह के नाम से मानना, मनाना, और सिखाना चाहे कितने ही लगन और उत्साह के साथ क्यों न हो, व्यर्थ है (मत्ती 15:9; यशायाह 1:14; गलातीयों 4:10-11)। ऐसे लोग परमेश्वर के नाम से और अपनी समझ के अनुसार परमेश्वर के लिए कुछ भी करें, वह सब निरर्थक एवं अनुपयोगी है, प्रभु परमेश्वर को पूर्णतः अस्वीकार्य है (मत्ती 7:21-23)। मसीही विश्वास का ईसाई धर्म बना देने की शैतान चाल का एक और व्यापक और दूरगामी दुष्प्रभाव है। अनुपात में, ईसाई धर्म के विभिन्न रूपों को मानने और मनाने वालों की तुलना में, सच्चे मसीही विश्वासियों की संख्या बहुत कम है; इसलिए संसार के सामने मसीह यीशु के अनुयायियों के रूप में अधिकांशतः वे ही लोग आते हैं जिनके जीवनों में न सच्चा पश्चाताप है और न वास्तविक परिवर्तन। वे अपने आप को मसीही तो कहते हैं, किन्तु उनके जीवन में मसीह की सच्ची शिष्यता के स्थान पर सांसारिकता और संसार की बातें ही दिखाई देती हैं। उनका यह पाखण्ड फिर संसार के लोगों के लिए ठोकर का कारण बनता है (रोमियों 2:21-24); इसलिए संसार के लोगों के मध्य मसीही विश्वास के प्रति एक अनुचित और बहुत गलत गवाही प्रसारित होती रहती है। जिसके कारण संसार के लोग सुसमाचार के सच्चे प्रचार, महत्व, और पालन पर भी संदेह करते हैं, उसे अस्वीकार करते हैं, और मसीह यीशु पर विश्वास करने, उद्धार पाने, तथा शैतान के जंजाल से निकल पाने से वंचित रह जाते हैं।

इसलिए परमेश्वर के वचन बाइबल की शिक्षाओं के आधार पर भली-भांति जाँच-परख कर, प्रभु यीशु द्वारा सिखाए गए सच्चे मसीही विश्वास और मनुष्यों द्वारा गढ़े गए ईसाई धर्म के मध्य भिन्नता की पहचान करना बहुत आवश्यक है, ताकि सच्चाई का पालन किया जाए न कि शैतान द्वारा मसीह यीशु के नाम से बनाए और फैले गए भ्रम का। और समय तथा अवसर के रहते आज ही, अभी ही, धर्म-कर्म-रस्म की व्यर्थ धारणा एवं मान्यता से निकलकर प्रभु यीशु मसीह की वास्तविक शिष्यता में आना और उसे निभाना अनिवार्य है। कहीं ऐसा न हो कि जब परलोक में आँख खुले तब पता लगे कि जिस धर्म का सारे जीवन बड़ी निष्ठा से निर्वाह करते रहे उससे कोई लाभ नहीं हुआ, और अब उस गलती को सुधारने का कोई अवसर पास नहीं है; अब तो केवल अनन्तकाल का दण्ड ही मिलेगा। यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 47-49     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 4 

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 15


मसीही विश्वासी के गुण - अलगाव (2)

       पिछले लेखों में हम पिन्तेकुस्त के दिन, पवित्र आत्मा से भर जाने के बाद पतरस द्वारा यरूशलेम में एकत्रित हुएभक्त यहूदियोंको किए गए सुसमाचार प्रचार के प्रभावों को देखते आ रहे हैं। मसीह यीशु पर लाए गए विश्वास से प्राप्त होने वाली पापों की क्षमा, उद्धार, और मसीही शिष्यता से संबंधित सात व्यावहारिक बातों को पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस ने उनके सामने रखा, जिन्हें हम प्रेरितों 2:37-42 में से देख रहे हैं। पिछले लेख में हमने इन सात में से अंतिम, और लिखे गए क्रम के अनुसार तीसरी बात - मसीही विश्वासी के संसार और सांसारिकता की बातों से अपने आप को अलग करने के बारे में देखना आरंभ किया था। हमने देखा था कि ऐसा करना कितना महत्वपूर्ण है, और प्रत्येक मसीही विश्वासी में आकर निवास करने वाला पवित्र आत्मा ऐसा करने में उसकी सहायता करता है। किन्तु मसीही विश्वास को मसीही या ईसाई धर्म बनाकर धर्म-कर्म-रस्म के पालन करने की धारणा रखने वाले, पतरस द्वारा कही गई क्रम की पहली बात - मन फिराओ अर्थात पश्चाताप करो, और क्रम की यह तीसरी बात - अपने आप को संसार और सांसारिकता के व्यवहार से पृथक करो पर न तो कोई विशेष ध्यान देते हैं और न ही मसीही शिष्यता के जीवन में इनके महत्व एवं अनिवार्यता को लोगों को सिखाते हैं। 

मसीही विश्वास के प्रचार और प्रसार के आरंभिक समय में, प्रेरित पौलुस ने कुरिन्थुस में स्थित मसीही मण्डली को लिखाअविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो, क्योंकि धामिर्कता और अधर्म का क्या मेल जोल? या ज्योति और अन्धकार की क्या संगति? और मसीह का बलियाल के साथ क्या लगाव? या विश्वासी के साथ अविश्वासी का क्या नाता? और मूरतों के साथ परमेश्वर के मन्दिर का क्या सम्बन्ध? क्योंकि हम तो जीवते परमेश्वर का मन्दिर हैं; जैसा परमेश्वर ने कहा है कि मैं उन में बसूंगा और उन में चला फिरा करूंगा; और मैं उन का परमेश्वर हूंगा, और वे मेरे लोग होंगे। इसलिये प्रभु कहता है, कि उन के बीच में से निकलो और अलग रहो; और अशुद्ध वस्तु को मत छूओ, तो मैं तुम्हें ग्रहण करूंगा। और तुम्हारा पिता हूंगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियां होगे: यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर का वचन है” (2 कुरिन्थियों 6:14-18 )। यह दिखाता है कि संसार और सांसारिकता से पृथक रहना मसीही विश्वासी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, और अनिवार्य है। पतरस प्रेरित ने इसके विषय लिखाहे प्रियो मैं तुम से बिनती करता हूं, कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जान कर उस सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो” (1 पतरस 2:11) 

थिस्सलुनीकिया की मसीही मण्डली के मसीही विश्वास और व्यवहार की सराहना करते हुए पौलुस प्रेरित ने उनके जीवन में आए परिवर्तन और उनके द्वारा अपनी पुरानी बातों को छोड़कर सुसमाचार प्रचार करने तथा प्रभु की बातों पर मन लगाने के बारे में सराहना करते हुए लिखाऔर तुम बड़े क्लेश में पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन को मान कर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे। यहां तक कि मकिदुनिया और अखया के सब विश्वासियों के लिये तुम आदर्श बने। क्योंकि तुम्हारे यहां से न केवल मकिदुनिया और अखया में प्रभु का वचन सुनाया गया, पर तुम्हारे विश्वास की जो परमेश्वर पर है, हर जगह ऐसी चर्चा फैल गई है, कि हमें कहने की आवश्यकता ही नहीं। क्योंकि वे आप ही हमारे विषय में बताते हैं कि तुम्हारे पास हमारा आना कैसा हुआ; और तुम कैसे मूरतों से परमेश्वर की ओर फिरे ताकि जीवते और सच्चे परमेश्वर की सेवा करो। और उसके पुत्र के स्वर्ग पर से आने की बाट जोहते रहो जिसे उसने मरे हुओं में से जिलाया, अर्थात यीशु की, जो हमें आने वाले प्रकोप से बचाता है” (1 थिस्स्लुनीकियों 1:6-10) 

तो क्या इसका तात्पर्य है कि मसीही विश्वासी को संसार के साथ कोई संपर्क, कोई व्यवहार, कोई मेल-जोल या बातचीत नहीं रखनी है; वरन अपने आप को सभी से बिल्कुल अलग-थलग कर के एक सन्यासी के समान जीवन बिताना है? नहीं! परमेश्वर का वचन बाइबल यह भी नहीं कहता है; और ऐसी धारणा रखना भी बाइबल की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। प्रभु यीशु ने स्वयं अपने शिष्यों से कहा कि वे सारे जगत में जाकर मसीह यीशु में विश्वास द्वारा सेंत-मेंत उपलब्ध पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार के संदेश को बताएं। यदि प्रभु यीशु मसीह के शिष्य संसार के लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे नहीं, उनसे संपर्क नहीं रखेंगे, तो फिर प्रभु की यह आज्ञा कैसे पूरी करेंगे? पौलुस जब अथेने में अपने साथियों के आने की बाट जोह रहा था, तो यहूदियों और अन्यजाति लोगों से चर्चाएं किया करता था, उन्हें सुसमाचार सुनाया करता थाजब पौलुस अथेने में उन की बाट जोह रहा था, तो नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल गया। सो वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से और चौक में जो लोग मिलते थे, उन से हर दिन वाद-विवाद किया करता था। तब इपिकूरी और स्‍तोईकी पण्‍डितों में से कितने उस से तर्क करने लगे, और कितनों ने कहा, यह बकवादी क्या कहना चाहता है परन्तु औरों ने कहा; वह अन्य देवताओं का प्रचारक मालूम पड़ता है, क्योंकि वह यीशु का, और पुनरुत्थान का सुसमाचार सुनाता था” (प्रेरितों 17:16-18)। पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस प्रेरित ने कुरिन्थुस की मण्डली को लिखामैं ने अपनी पत्री में तुम्हें लिखा है, कि व्यभिचारियों की संगति न करना। यह नहीं, कि तुम बिलकुल इस जगत के व्यभिचारियों, या लोभियों, या अन्धेर करने वालों, या मूर्तिपूजकों की संगति न करो; क्योंकि इस दशा में तो तुम्हें जगत में से निकल जाना ही पड़ता” (1 कुरिन्थियों 5:9-10)

इन सभी बातों के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मसीही विश्वासी के लिए पृथक होकर रहने का अर्थ सन्यास ले लेना, अथवा सभी लोगों से हर प्रकार का संपर्क एवं व्यवहार समाप्त कर देना नहीं है। वरन, मसीही विश्वासी को संसार के लोगों के समान और सांसारिकता की मानसिकता नहीं रखनी है, उनके सदृश्य नहीं बनना है (रोमियों 12:2)। प्रभु यीशु मसीह ने अपने शिष्यों को संसार में रहते हुए किस प्रकार व्यवहार रखना है सिखाया, जो स्पष्ट करता है कि उन्हें संसार के लोगों के साथ संपर्क रखना था, उनके बीच में अपनी सच्चाई और खराई के कारण एक गवाह बन कर रहना था:तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इस के कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए। तुम जगत की ज्योति हो; जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता। और लोग दिया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुंचता है। उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें” (मत्ती 5:13-16)। इसका परिणाम होगाअन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; इसलिये कि जिन जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जान कर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देख कर; उन्‍हीं के कारण कृपा दृष्टि के दिन परमेश्वर की महिमा करें” (1 पतरस 2:12) 

मसीही विश्वास का जीवन एक व्यवहारिक जीवन है, निरंतर हर बात में प्रभु यीशु की आज्ञाकारिता में बने रहने, और अपनी हर बात के द्वारा परमेश्वर को महिमा देते रहने का जीवन हैसो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो” (1 कुरिन्थियों 10:31)। किन्तु यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 45-46     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 3

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 14

 

मसीही विश्वासी के गुण - अलगाव (1)

       हम देखते आ रहे हैं कि पतरस द्वारा पिन्तेकुस्त के दिन संसार भर से धार्मिक पर्व मनाने और व्यवस्था की विधि को पूरा करने के लिए आए हुएभक्त यहूदियों के हृदय छिद गए, और उन्हें इस बात का बोध हुआ कि उनकी यह धर्म-कर्म-रस्म की धार्मिकता उन्हें उद्धार या नया जन्म देने और परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। तब उन्होंने पतरस और अन्य प्रेरितों से इसके समाधान के विषय प्रश्न पूछा, और पतरस ने उद्धार या नया जन्म प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रभु यीशु की शिष्यता का मार्ग बताया, जिसमें सात व्यावहारिक बातें थीं। उनमें से पाँच बातों को तो, जिन्हें हम पहले देख चुके हैं, मसीही या ईसाई धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता रखने वालों ने एक औपचारिक रस्म बना दिया है, और उन औपचारिकताओं के निर्वाह के कारण वे अपने आप परमेश्वर को स्वीकार्य धर्मी समझते हैं। पतरस द्वारा उन भक्त यहूदियों को प्रेरितों 2:38 में दिए गए उत्तर का पहला कदम था अपने-अपने पापों से पश्चाताप करना और प्रभु का शिष्य हो जाने पर अपने पुराने जीवन की पापमय प्रवृत्तियों और व्यवहार से मन फिरा लेना, जिसे हम पिछले दो लेखों में दख चुके हैं। 

दूसरा कदम था अपने इस पश्चाताप और प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी हो जाने के निर्णय को बपतिस्मे के द्वारा सार्वजनिक रीति से प्रकट करना; प्रभु का शिष्य बन जाने की गवाही को लोगों के सामने रखना। इसका वास्तविक स्वरूप भी धर्म के निर्वाह के लिए बिगाड़ दिया गया है, और साथ ही इसे एक औपचारिकता बना दिया गया है। और अब धर्म-कर्म का निर्वाह करने में रुचि रखने वालों को उनके धर्म के अगुवों द्वारा, बाइबल के शिक्षाओं के विपरीत, यही जताया जाता है कि बपतिस्मा हो जाने से परमेश्वर भी उस व्यक्ति को स्वीकार करने के लिए बाध्य हो गया है।  

इसके बाद पद 40 में तीसरा कदम बताया गया हैउसने बहुत ओर बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ” (प्रेरितों 2:40)। मूल यूनानी भाषा के जिन शब्दों का हिन्दी अनुवादटेढ़ी जातिकिया गया है, उनका शब्दार्थ हैटेढ़ी/विकृत पीढ़ी। इसे अंग्रेजी अनुवादों में “perverse generation” या “corrupt  generation” लिखा गया है, जोटेढ़ी/विकृत पीढ़ीअनुवाद के अनुरूप है। कहने का अभिप्राय था, और है, कि जो व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बनकर उनके पीछे चलते रहने का निर्णय ले, वह साथ ही यह निर्णय भी ले कि अब वह अपने समकालीन संसार के भ्रष्ट और प्रभु के प्रतिकूल व्यवहार और जीवन से अपने आप को पृथक कर लेगा; संसार और उसकी बातों के प्रति उसका जीवन एक अलगाव का जीवन रहेगा। अर्थात, वह अपने आप को संसार और संसार की बातों से दूषित नहीं होने देगा, वरन प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता में उसी के लिए जीएगाऔर वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15)

पाप और उद्धार से संबंधित बातों की चर्चा के समय हम देख चुके हैं कि पापों की क्षमा और उद्धार प्राप्त करने के साथ ही, तुरंत ही उद्धार या नया जन्म पाए हुए व्यक्ति की देह परमेश्वर पवित्र आत्मा का मंदिर बन जाती है और पवित्र आत्मा उसी क्षण से, उसकी सहायता और मसीही विश्वास में उन्नति के लिए, उस नए जन्मे हुए जन में आकर निवास करने लगता हैऔर उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी” (इफिसियों 1:13)। परमेश्वर पवित्र आत्मा के इस मंदिर को स्वच्छ और पवित्र रखना उस उद्धार पाए हुए व्यक्ति की ज़िम्मेदारी हैक्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नाश करेगा तो परमेश्वर उसे नाश करेगा; क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो” (1 कुरिन्थियों 3:16-17)। इस ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए पवित्र आत्मा स्वयं व्यक्ति की सहायता करता है कि वह शारीरिक और सांसारिक अभिलाषाओं से हटकर, एक पवित्र और परमेश्वर को महिमा देने वाला जीवन जीएंपर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे। क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ” (गलातियों 5:16-17); “और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उस की लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है। यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी” (गलातियों 5:24-25)  

पौलुस प्रेरित ने पवित्र आत्मा की अगुवाई में रोम के मसीही विश्वासियों को लिखाइसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान कर के चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो” (रोमियों 12:1-2)। यहाँ तीन मुख्य बातें हमारे ध्यान देने के लिए हैं: (i) प्रत्येक मसीही विश्वासी की आत्मिक सेवा, उसके द्वारा अपने आप को परमेश्वर सम्मुख बलिदान करके चढ़ाना है। जो बलिदान में परमेश्वर को चढ़ा दिया गया, वह फिर और किसी सांसारिक काम में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। (ii) मसीही विश्वासी को संसार के सदृश्य नहीं बनना है; अर्थात सांसारिकता की बातों से और संसार के लोगों के अनुरूप व्यवहार से बच कर रहना है। उद्धार पा लेने के बाद हुए मन परिवर्तन का प्रमाण चाल-चलन में दिखने वाला परिवर्तन है। (iii) जो अपने आप को परमेश्वर को समर्पित कर के, अपने उस समर्पण एवं मन परिवर्तन को अपने बदले हुए चाल-चलन से संसार के समक्ष दिखाएंगे, वे फिर परमेश्वर की इच्छा को व्यक्तिगत अनुभवों से जानने वाले हो जाएंगे; अर्थात परमेश्वर की इच्छा उन पर प्रकट रहेगी। 

तो क्या इस अलगाव, इस पृथक रहने का अर्थ है कि मसीही विश्वासी संसार के साथ कोई व्यवहार, कोई संपर्क नहीं रख सकता है? इस प्रश्न का उत्तर हम कल देखेंगे। किन्तु यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, तो फिर संसार के साथ और संसार के समान विनाश में भी जाना पड़ेगा, क्योंकि संसार का मित्र बनना परमेश्वर का बैर मोल लेना हैहे व्यभिचारिणियो, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है” (याकूब 4:4)। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 43-44     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 2

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 13

 

मसीही विश्वासी के गुण - पश्चाताप (2)

 

पिछले लेख में हमने देखा था कि पतरस द्वारा पिन्तेकुस्त के दिन संसार भर से धार्मिक पर्व मनाने और व्यवस्था की विधि को पूरा करने के लिए आए हुएभक्त यहूदियों के हृदय छिद गए, और उन्हें इस बात का बोध हुआ कि उनकी यह धर्म-कर्म-रस्म की धार्मिकता उन्हें उद्धार या नया जन्म देने और परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। तब उन्होंने पतरस और अन्य प्रेरितों से इसके समाधान के विषय प्रश्न पूछा, और पतरस ने उद्धार या नया जन्म प्राप्त करने के लिए उन्हें जो प्रभु यीशु के शिष्यता का मार्ग बताया, उसका पहला कदम था अपने-अपने पापों से पश्चाताप करना और प्रभु का शिष्य हो जाने पर अपने पुराने जीवन की पापमय प्रवृत्तियों और व्यवहार से मन फिरा लेना। मन फिराव की इस बात के महत्व को हम और अधिक स्पष्टता से परमेश्वर के वचन में से इससे संबंधित पदों के उदाहरणों से समझ सकते हैं, जो मुख्यतः बाइबल के नए नियम में खण्ड में दिए गए हैं। बाइबल में दिए गए निम्न-लिखित कुछ उदाहरणों से हम देखते हैं कि उद्धार पाने और प्रभु यीशु का शिष्य या अनुयायी होने के लिए पापों से पश्चाताप और मन फिराव करने का विषय:

  • यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के प्रचार का आरंभ थाउन दिनों में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला आकर यहूदिया के जंगल में यह प्रचार करने लगा कि मन फिराओ; क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है” (मत्ती 3:1-2) 
  • प्रभु यीशु मसीह द्वारा पृथ्वी पर अपनी सेवकाई के आरंभ का प्रचार थायूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मरकुस 1:14-15) 
  • प्रभु यीशु मसीह द्वारा अपने शिष्यों को पहले प्रचार पर भेजे जाने के समय उनके प्रचार का विषय थाऔर उन्होंने जा कर प्रचार किया, कि मन फिराओ”(मरकुस 6:12).
  • प्रभु यीशु द्वारा स्वर्गारोहण से ठीक पहले शिष्यों को संसार भर में प्रचार करने के लिए दिया गया विषयऔर यरूशलेम से ले कर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा” (लूका 24:47) 
  • पवित्र आत्मा प्राप्त करने के बाद शिष्यों द्वारा संसार भर से यरूशलेम आए भक्त यहूदियों के समक्ष किए गए पहले सुसमाचार प्रचार का विषयपतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरितों 2:38)
  • पतरस द्वारा यरूशलेम के इस्राएलियों के सामने किए गए प्रचार का विषयइसलिये, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं, जिस से प्रभु के सम्मुख से विश्रान्ति के दिन आएं” (प्रेरितों 3:19) 
  • परमेश्वर द्वारा सारे संसार के सभी लोगों के लिए दी गई आज्ञा का विषयइसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30) 
  • पौलुस द्वारा यहूदियों और अन्य जातियों में किए जाने वाले प्रचार एवं सेवकाई का विषयवरन यहूदियों और यूनानियों के सामने गवाही देता रहा, कि परमेश्वर की ओर मन फिराना, और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करना चाहिए” (प्रेरितों 20:21); “परन्तु पहिले दमिश्क के, फिर यरूशलेम के रहने वालों को, तब यहूदिया के सारे देश में और अन्यजातियों को समझाता रहा, कि मन फिराओ और परमेश्वर की ओर फिर कर मन फिराव के योग्य काम करो” (प्रेरितों 26:20)
  • प्रकाशितवाक्य पुस्तक के 2 और 3 अध्याय में संबोधित कलीसियाओं को दिए गए चेतावनी के संदेशों का विषय (प्रकाशितवाक्य 2:5, 16, 21, 22; 3:3, 19) 
  • प्रकाशितवाक्य पुस्तक में परमेश्वर के प्रकोप और दंड को सहने का कारण - पश्चाताप न करना (प्रकाशितवाक्य 9:20, 21; 16:9, 11)
  • पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं एवं परमेश्वर के सेवकों के प्रचार का विषय भी पश्चाताप या मन फिराव ही था, “और यद्यपि यहोवा तुम्हारे पास अपने सारे दासों अथवा भविष्यद्वक्ताओं को भी यह कहने के लिये बड़े यत्न से भेजता आया है कि अपनी अपनी बुरी चाल और अपने अपने बुरे कामों से फिरो: तब जो देश यहोवा ने प्राचीनकाल में तुम्हारे पित्रों को और तुम को भी सदा के लिये दिया है उस पर बसे रहने पाओगे; परन्तु तुम ने न तो सुना और न कान लगाया है” (यिर्मयाह 25:4-5) 

 

       प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी होने का अर्थ है पुरानी बातों, विचारधाराओं, धारणाओं, व्यवहार आदि को छोड़कर, प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में एक पूर्णतः बदला हुआ नया जीवन जीनासो यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17); ऐसा जीवन जो किसी धर्म-कर्म-रस्म पर आधारित नहीं है, वरन परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता पर आधारित है, जैसा कि प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से, उन्हें उलाहना देते हुए, स्वयं कहाजब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो क्यों मुझे हे प्रभु, हे प्रभु, कहते हो?” (लूका 6:46)। प्रभु की शिष्यता और आज्ञाकारिता के इस जीवन में उठाया गया पहल कदम स्वेच्छा एवं सच्चे मन से पश्चाताप करना है, पुराने सांसारिक जीवन से नए आत्मिक जीवन की ओर मुड़ जाना है। बिना सच्चे पश्चाताप के प्रभु का शिष्य न तो बना जा सकता है, और न उस शिष्यता को निभाया जा सकता है। मसीही विश्वासी या प्रभु यीशु के अनुयायी होने के लिए किसी धर्म परिवर्तन की नहीं, वरन पापमय प्रवृत्तियों से मन परिवर्तन की, और परिवर्तित जीवन का निर्वाह करने की आवश्यकता है। इसलिए यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने एक परिवार विशेष में जन्म अथवा उस परिवार और अपने जन्म से संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई (प्रेरितों 17:30) को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। 

आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 41-42     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 1

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 12

 

मसीही विश्वासी के गुण - पश्चाताप (1)

       पिछले लेखों में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल की प्रेरितों के काम पुस्तक, जो प्रथम चर्च या मण्डली के आरंभ तथा गतिविधियों का संक्षिप्त इतिहास है, में से उस मण्डली के लोगों, अर्थात मसीही  विश्वासियों से संबंधित सात बातों को देखा, जिनमें से चार में वेलौलीनरहते थे, और पाँचवीं, बपतिस्मा लेना, प्रत्येक मसीही विश्वासी की ज़िम्मेदारी थी। साथ ही हमने यह भी देखा कि जो मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली बातें है, उन्हें तथा बपतिस्मा लेने को मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वालों ने एक रीति या रस्म बना लिया है, और उन्हें उस गणित के समीकरण के समान देखते, सिखाते, और निभाते हैं, कि मसीही विश्वासी इन बातों का पालन करते हैं इसलिए इन बातों का पालन करने वाले भी स्वतः ही मसीही विश्वासी होंगे। इन धर्म-कर्म-रस्म का पालन करने में भरोसा रखने वालों ने उन बातों के निर्वाह के संबंध में अपने ही नियम और विधियाँ, जिनका बाइबल में कोई उल्लेख नहीं है, स्थापित कर के, इन बातों के निर्वाह करने को धर्म के निर्वाह के लिए एक अपेक्षित तथा वांछनीय औपचारिकता बना दिया है। किन्तु जैसे प्रभु यीशु मसीह ने अपने समय के धर्म के अगुवों से, उनके द्वारा मनुष्यों की बनाई हुई विधियों को परमेश्वर की बातें कहकर सिखाने को व्यर्थ उपासना करना कहा था, और चिताया था कि सब व्यर्थ बातें हटा दी जाएँगी (मत्ती 15:9, 13-14), वैसे ही आज भी प्रभु की यही बात वर्तमान में भी मनुष्यों के गढ़े हुए विधि-विधानों पर उतनी ही लागू है, उनके विषय उतनी ही सत्य है जितनी तब थी।

       हमने यह भी देखा था कि सच्चे मसीही विश्वासियों के इन सात गुणों के बारे में लोगों को बताए जाने का आरंभ, यरूशलेम में धार्मिक पर्व मनाने के लिए एकत्रित हुए भक्त यहूदियों के मध्य में प्रभु यीशु के शिष्यों द्वारा किए गए सुसमाचार प्रचार के बाद, उन भक्त यहूदियों द्वारा उठाए गए एक प्रश्न से हुआ था, “तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों 2:37)। उनके इस प्रश्न के उत्तर में पतरस द्वारा दिए गए उत्तर में हम इन सात बातों को देखते हैं। हम सात में से उन पाँच बातों को देख चुके हैं, जिन्हें मसीही विश्वास के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वाले औपचारिकता के रूप में निभाते रहते हैं, और समझते हैं कि ऐसा करने से वे भी मसीही विश्वासियों के समान उद्धार या नया जन्म पाए हुए हो गए हैं; जो परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार एक बिल्कुल गलत धारणा है। आज हम शेष दो बातों, पश्चाताप करना और सांसारिकता से पृथक होने में से पहली बात, पश्चाताप करना, के बारे में कुछ विस्तार से देखेंगे। 

मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अंग्रेजी अनुवाद ‘Repent’ और हिन्दी अनुवादमन फिराओकिया गया है, उसका शब्दार्थ हैबिलकुल भिन्न सोच या विचारधारा रखना। अर्थात किसी बात के लिए पश्चाताप करने का अर्थ है, उस बात के लिए अपनी सोच या विचारधारा को पूर्णतः बदल देना, और उसे परमेश्वर की सोच और विचारधारा के अनुरूप ले आना, जिससे वह परमेश्वर की सोच और विचारधारा से संगत हो जाए, परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाए। पश्चाताप करना कोई औपचारिकता पूरी करना अथवा किसी धार्मिक रीति का निर्वाह करना नहीं है; यह पूरे मन से उस बात के प्रति अपनी समझ और व्यवहार को पूर्णतः परिवर्तित कर लेना है, अपनी भूतपूर्व सोच और विचारधारा से बिलकुल बदल कर, एक नई सोच और विचारधारा को स्वीकार करना और पालन करना है। संसार भर से आए हुए ये भक्त यहूदी यरूशलेम में इसलिए एकत्रित थे कि वे अपने धर्म और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्वाह के द्वारा परमेश्वर की दृष्टि में भी धर्मी ठहरें और परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाएं। किन्तु पवित्र शास्त्र में दी गई जिस व्यवस्था और बातों के आधार पर वे ऐसी धारणा रखे हुए थे, जब उसी पवित्र शास्त्र में से पतरस ने परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य से उनके मध्य में परमेश्वर को स्वीकार्य होने की वास्तविकता को रखा, तो उनकी आँखें खुल गईं। पतरस की बात सुनकर उनके हृदय छिद गए, उन्हें बोध हुआ कि उनकी यह धर्म-कर्म-रस्म की धार्मिकता उनके किसी काम की नहीं है, उसे निभाने के बाद भी वे परमेश्वर को वैसे ही अस्वीकार्य हैं, जैसे पहले थे। और तब, जब उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी एवं स्वीकार्य होने के लिए और कुछ नहीं सूझ पड़ा, तो उन्होंने पतरस तथा शेष प्रेरितों से ही पूछाहे भाइयों हम क्या करें?”

पतरस के उत्तर की सर्वप्रथम बात थी, ‘मन फिराओ’; अर्थात धार्मिकता के प्रति अपनी वर्तमान विचारधारा और व्यवहार से निकाल कर, अपने-अपने पापों की क्षमा, उद्धार, तथा परमेश्वर को स्वीकार्य धार्मिकता की समझ एवं निर्वाह के लिए प्रभु यीशु मसीह द्वारा किए गए कार्य को स्वीकार करो; अपने जीवन में उसका पालन करो। पतरस द्वारा दिए गए इस उत्तर में निहित है कि मसीही विश्वास और परमेश्वर को स्वीकार्य धार्मिकता के जीवन का आरंभ प्रत्येक व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रीति से अपने जीवन में विद्यमान पापों का अंगीकार करने, फिर उनके लिए प्रभु यीशु मसीह से क्षमा माँगने के द्वारा होता है। यह करने के पश्चात, जिन बातों से उसके जीवन में पाप को प्रवेश और पैठ मिलती है उनसे संबंधित अपने विचारों और व्यवहारों के मार्ग को दृढ़ निश्चय के साथ पूर्णतः छोड़ देना है। साथ ही, प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चल निकलने तथा हर परिस्थिति का सामना करते हुए चलते ही रहने के लिए कटिबद्ध हो जाना है।  

आज के मसीही या ईसाई समाज में ऐसी कितनी ही बातों, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, आदि को मानने और मनाने पर ज़ोर दिया जाता है, जिनका उल्लेख भी बाइबल में नहीं है, और जिनके लिए प्रभु यीशु अथवा पवित्र आत्मा ने कभी कोई शिक्षा नहीं दी है। फिर भी उन्हें बहुत उत्साह और लग्न से माना और मनाया जाता है; यहाँ तक कि यदि कोई उन बातों को न माने या मनाए, अथवा उनके मानने और मनाने के बारे में कोई प्रश्न उठाए, तो उसे विधर्मी समझा जाता है, उसके मसीही होने पर संदेह किया जाता है। किन्तु पश्चाताप और मन फिराव जैसे महत्वपूर्ण विषय को, जो बाइबल के अनुसार मसीही विश्वास में प्रवेश का, उद्धार एवं पापों की क्षमा प्राप्त करने के लिए व्यक्ति द्वारा उठाया जाने वाला पहला कदम है, उसके बारे में न बताया या सिखाया जाता है, और न ही इसके महत्व के बारे में शिक्षा दी जाती है। अगले लेख में हम इस बात के परम-महत्व को समझने के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल में से पश्चाताप या मन फिराव से संबंधित कुछ पदों को देखेंगे।

यदि आप ने अभी तक अपने पापों से पश्चाताप नहीं किया है, अपना जीवन स्वेच्छा और सच्चे मन प्रभु यीशु को समर्पित नहीं किया है, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 39-40     
  • कुलुस्सियों

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 11


मसीही विश्वासी के गुण

       पिछले लेखों में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल की प्रेरितों के काम पुस्तक, जो प्रथम चर्च या मण्डली के आरंभ तथा गतिविधियों का संक्षिप्त इतिहास है, में से उस मण्डली के लोगों से संबंधित पाँच बातों को देखा, जिनमें वेलौलीनरहते थे। साथ ही हमने यह भी देखा कि जो मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली बातें है, उन्हीं को मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वालों ने एक रीति या रस्म बना लिया है, और उन्हें उस गणित के समीकरण के समान देखते, सिखाते, और निभाते हैं, कि मसीही विश्वासी इन बातों का पालन करते हैं इसलिए इन बातों का पालन करने वाले भी स्वतः ही मसीही विश्वासी होंगे। इन धर्म-कर्म-रस्म का पालन करने में भरोसा रखने वालों ने उन बातों के निर्वाह के संबंध में अपने ही नियम और विधियाँ, जिनका बाइबल में कोई उल्लेख नहीं है, स्थापित कर के, इन बातों के निर्वाह करने को धर्म के निर्वाह के लिए एक अपेक्षित तथा वांछनीय औपचारिकता बना दिया है। किन्तु जैसे प्रभु यीशु मसीह ने अपने समय के धर्म के अगुवों से, उनके द्वारा मनुष्यों की बनाई हुई विधियों को परमेश्वर की बातें कहकर सिखाने को व्यर्थ उपासना करना कहा था, “और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश कर के सिखाते हैं” (मत्ती 15:9), वैसे ही आज भी प्रभु की यही बात वर्तमान में भी मनुष्यों के गढ़े हुए विधि-विधानों पर उतनी ही लागू है, उनके विषय उतनी ही सत्य है जितनी तब थी। प्रभु ने उन बातों और उनके औपचारिक निर्वाह की शिक्षा देने वालों के लिए एक और बात भी कही थी, और वो भी आज के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, “उसने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा। उन को जाने दो; वे अन्धे मार्ग दिखाने वाले हैं: और अन्‍धा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड़हे में गिर पड़ेंगे” (मत्ती 15:13-14)

       प्रेरितों 2 अध्याय में, परमेश्वर पवित्र आत्मा के सामर्थ्य प्राप्त करने के तुरंत बाद यरूशलेम में संसार के विभिन्न भागों से पर्व मनाने के लिए एकत्रितभक्त यहूदियोंको प्रेरित पतरस द्वारा किया गया प्रथम सुसमाचार प्रचार दर्ज है। पतरस द्वारा किए गए इस सुसमाचार प्रचार की प्रतिक्रिया में, लिखा है, “तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों 2:37)। उनके इस प्रश्न का पतरस द्वारा दिया गया उत्तर थापतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे। क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम, और तुम्हारी सन्तानों, और उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा। उसने बहुत और बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ” (प्रेरितों 2:38-40)। यहाँ हम पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस द्वारा उन मसीही विश्वासियों के करने के लिए कही गई तीन बातों को देखते हैं:मन फिराओ”, “बपतिस्मा लो”, औरअपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ। दिए गए क्रम के अनुसार, मसीही विश्वासी, या प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी हो जाने के लिए उठाया जाने वाला पहला कदम है व्यक्ति के द्वारा मन-फिराव, अर्थात पापों से पश्चाताप करके, पापी जीवन से मुँह मोड़ लेना, और उन बातों को छोड़ देना। फिर दूसरा कदम है अपने मन-फिराव के निर्णय को लोगों पर बपतिस्मा लेने के द्वारा प्रकट करना, और तब तीसरा कदम है अपने इस बदले हुए मन और जीवन के अनुसार अपनी संगति को सुधारना और उन लोगों से पृथक हो जाना जो वापस उन्हीं बुराइयों और सांसारिकता की बातों में ले जा सकते हैं - अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ 

       जो मसीही विश्वासी बन जाते हैं, फिर वे प्रेरितों 2:42 की चारों बातों में, जिन्हें हम देख चुके हैं, लौलीन रहते हैं। अर्थात, हमें यहाँ पर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पतरस के द्वारा मसीही विश्वासी हो जाने के सात चिह्न प्रदान किए हैं:

  1. स्वेच्छा से मन-फिराव का निर्णय ले लेना 
  2. अपने बदले हुए जीवन की गवाही के लिए बपतिस्मा लेना 
  3. बदले हुए जीवन की सुरक्षा और अपनी आत्मिक उन्नति के लिए बुरी संगति और बातों से अपने आप को पृथक कर लेना 

प्रभु परमेश्वर और व्यावहारिक मसीही जीवन को जानने, उसमें बढ़ने, और उसे जीने के लिए:

    4.        बाइबल की शिक्षा लेते रहना 

    5.        अन्य मसीही विश्वासियों की संगति में बने रहना 

    6.        प्रभु-भोज में नियमित भाग लेते रहना 

    7.        प्रार्थना में लगे रहना 

        उपरोक्त सभी बातों से स्पष्ट है कि बाइबल के अनुसार मसीही विश्वास का जीवन किसी धर्म के निर्वाह का जीवन नहीं है, वरन प्रभु यीशु की शिष्यता और आज्ञाकारिता का जीवन है। साथ ही मसीही विश्वासी या प्रभु यीशु के अनुयायी होने के लिए किसी धर्म परिवर्तन की नहीं, वरन मन परिवर्तन की, और परिवर्तित जीवन का निर्वाह करने की आवश्यकता है। इसलिए यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने एक परिवार विशेष में जन्म अथवा उस परिवार और अपने जन्म से संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। 

आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 37-38     
  • कुलुस्सियों

रविवार, 10 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 10


बपतिस्मा - गणित का समीकरण? (6)   

पिछले लेखों में हमने देखा कि मसीही विश्वास के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का निर्वाह करने वाले प्रेरितों 2:42 में दी गई मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली चार बातों (वचन की शिक्षा पाना, संगति रखना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना, प्रार्थना करना) को उद्धार या नया जन्म प्राप्त कर लेने के लिए गणित के एक समीकरण के समान, एक रस्म के समान मान तथा मना लेते हैं। वे इन चारों बातों के वास्तविक महत्व को समझने और उसके आधार पर प्रभु की आज्ञाकारिता में उनका निर्वाह करने की बजाए एक रीति के समान इनकी औपचारिकता को पूरा करने के द्वारा समझते हैं कि वे भी नया जन्म या उद्धार पाए हुए हैं। किन्तु बाइबल की शिक्षाओं के अनुसार उनका यह मान्यता रखना एक सर्वथा गलत धारणा ही है, तथा धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह द्वारा प्रभु परमेश्वर की दृष्टि में स्वीकार्य होने के लिए उनका एक व्यर्थ एवं निष्फल प्रयास हैं। पिछले लेखों में हम प्रेरितों 2:42 की चारों बातों के औपचारिक निर्वाह के बारे में देख चुके हैं। आज हम प्रेरितों 2 अध्याय में स्थापित हुई पहली मण्डली के लोगों के साथ तब जुड़ी, और आज मसीही विश्वासियों तथा ईसाई धर्म-समाज के साथ भी घनिष्ठता से जुड़ी एक और बात के बारे में कुछ और विस्तार से देखेंगे, जिसे भी गणित के समीकरण के समान लेकर, उसके विषय भी गलत धारणा बना ली गई है, और उसे मनुष्यों द्वारा दिए गए भिन्न स्वरूपों में बड़ी निष्ठा से निभाया भी जाता है, बिना यह देखे और विचारे कि बाइबल में उसके बारे में क्या कुछ लिखा और सिखाया गया है। यह पाँचवीं बात है बपतिस्मा।  

5. बपतिस्मा: प्रभु यीशु मसीह और बाइबल की शिक्षा है कि जो प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बने उसे ही बपतिस्मा दिया जाएइसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो” (मत्ती 28:19)। अर्थात बपतिस्मा उनके लिए है जो प्रभु यीशु का शिष्य बनना स्वीकार करता है, जो अपने इस मसीही विश्वास के द्वारा प्रभु का जन बन जाता है। जब हम यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के द्वारा पहले दिए जा रहे बपतिस्मे के बारे में देखते हैं, और फिर बाद में प्रभु यीशु की उपरोक्त आज्ञाकारिता में उनके शिष्यों के द्वारा दिए जाने वाले बपतिस्मे के बारे में देखते हैं, तो यह प्रकट है कि बाइबल में तो बपतिस्मा केवल उन्हें ही दिया गया जो पापों के लिए पश्चाताप और प्रभु के प्रति सच्चे समर्पण के साथ बपतिस्मा लेने के उद्देश्य से स्वेच्छा से आए। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने अपनी सेवकाई का आरंभ मन फिराव के आह्वान के साथ किया (मत्ती 3:2); और यही प्रभु यीशु ने भी किया (मरकुस 1:15)। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के प्रचार को मानकर जो लोग अपने पापों का अंगीकार करते थे, उन्हें वह बपतिस्मा देता था (मत्ती 3:5, 6) - यूहन्ना उन्हें बपतिस्मा देने के लिए नहीं जाता था, लोग स्वतः बपतिस्मा लेने के लिए यूहन्ना के पास आते थे। किन्तु जब कपटी फरीसी और सदूकी, पाखण्ड में होकर उससे बपतिस्मा लेने के लिए आए, तो उसने उनकी भर्त्सना की और पहले मन फिराने के लिए कहा (मत्ती 3:7-8)। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने स्पष्ट कहा कि वहमन फिराव का बपतिस्मादेता था (मत्ती 3:11)। प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने शिष्यों से उन्हें ही बपतिस्मा देने के लिए कहा जो पहले स्वेच्छा से उसके शिष्य बनना स्वीकार कर चुके थे (मत्ती 28:19-20), और हम पहले देख चुके हैं कि प्रभु यीशु का शिष्य बनने के लिए व्यक्ति को पहले अपने पापों से पश्चाताप करना अनिवार्य है। अर्थात प्रभु यीशु द्वारा दिए गए बपतिस्मा देने और लेने के निर्देश में पहले व्यक्ति द्वारा पश्चाताप करना अनिवार्यतः निहित है। यही बात, अपने आप में, शिशुओं या बच्चों के, तथा चर्च की रीति पूरी करने के लिए बपतिस्मा देने या लेने को निषेध कर देती है। 

संपूर्ण बाइबल में कहीं भी किसी शिशु अथवा बच्चे को बपतिस्मा देने का कोई उदाहरण नहीं है; जिनका भी बपतिस्मा होने के उदाहरण हैं वे सभी वयस्क थे और उन्होंने स्वेच्छा से पापों से पश्चाताप करने के पश्चात ही बपतिस्मा लिया। साथ ही जहां कहीं भी बपतिस्मा दिए जाने का उल्लेख है, वहाँ यह भी स्पष्ट संकेत है कि वह पानी के छिड़काव या माथे पर पानी से चिह्न बना देने के द्वारा नहीं, वरन किसी नदी या बहुत जल के स्थान पर पानी के अंदर उतर कर, फिर पानी में से बाहर आने, अर्थात डुबकी के द्वारा दिया गया बपतिस्मा था (मत्ती 3:16; यूहन्ना 1:28; 3:23; प्रेरितों 8:36-39)। और न ही बाइबल में किसी दृढ़ीकरण या confirmation की कोई बात, आवश्यकता, अथवा विधि दी गई है। 

किन्तु इससमीकरणवाली धारणा के अधीन, लोग सामान्यतः यही मान लेते हैं कि किसी भी आयु में, किसी भी प्रकार काबपतिस्मालेने से वे मसीह के जन, उसके शिष्य, और उद्धार या नया जन्म पाए हुए व्यक्ति बन जाते हैं; जो कदापि सत्य नहीं है, बाइबल और प्रभु यीशु की शिक्षा नहीं है। बपतिस्मा न तो नया जन्म देता है, न उद्धार और पापों की क्षमा देता है, और न ही प्रभु यीशु का शिष्य बनाता है। प्रत्येक चर्च अथवा मण्डली में ऐसे कितने ही लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने एक रस्म या रीति के तौर पर बपतिस्मा तो लिया और उससे संबंधित विधि-विधान तो पूरे किए, किन्तु सच्चे मन से पापों से पश्चाताप नहीं किया, न ही प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण किया। उनके जीवन, आदतें, बोल-चाल, व्यवहार, यदि सभी कुछ दिखा देते हैं कि वे वास्तव में उद्धार पाए हुए नहीं हैं। उनके बपतिस्मे ने उनका जीवन नहीं बदला; वे अभी भी अपने पापों ही में जी रहे हैं। उद्धार या नया जन्म पाए हुए व्यक्ति के लिए बपतिस्मा प्रभु का निर्देश है; किन्तु हर बपतिस्मा पाया हुआ व्यक्ति उद्धार पाया हुआ और प्रभु का जन नहीं होता है - मनुष्यों द्वारा गढ़ी और लागू की गई इस गलत धारणा की बाइबल में कहीं कोई समर्थन अथवा पुष्टि नहीं है।

आज मसीही विश्वास के स्थान पर ईसाई धर्म को मानने और मनाने वाले लोग बड़ी निष्ठा और लगन से किन्तु गलत धारणा और विचारधारा के साथ प्रभु भोज और बपतिस्मे में सम्मिलित तो होते हैं, किन्तु यह नहीं जानते और समझते हैं कि यदि उन्होंने पापों से पश्चाताप नहीं किया है, प्रभु यीशु को स्वेच्छा से अपना उद्धारकर्ता ग्रहण नहीं किया है, सच्चे मन से उसके शिष्य नहीं बने हैं, तो यह सब उनके लिए व्यर्थ और निष्फल है; वे अभी भी अपने पापों में पड़े हुए हैं और अनन्त विनाश के मार्ग पर ही अग्रसर हैं। इसलिए यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने एक परिवार विशेष में जन्म अथवा उस परिवार और अपने जन्म से संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। 

आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 34-36     
  • कुलुस्सियों 2