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बुधवार, 15 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 21

 

पाप का समाधान - उद्धार - 17

       हम उन गुणों को, और उनके कारणों को देखते आ रहे हैं, जो उस सिद्ध मनुष्य में होने चाहिएं जो मनुष्यों के पाप का समाधान और निवारण करने के लिए अपना बलिदान दे। हमने देखा कि ऐसा मनुष्य स्वाभाविक प्रणाली से मानव जन्म लेने वाला नहीं हो सकता है; किन्तु प्रभु यीशु के मानव स्वरूप में अवतरित होकर पृथ्वी पर आने के लिए परमेश्वर ने एक विशेष प्रयोजन किया, और उन्होंने मनुष्य के रूप जन्म तो लिया, किन्तु अन्य सभी मनुष्यों के समान उनके मानव शरीर में पाप का दोष और स्वभाव में पाप करने की प्रवृत्ति नहीं थी। वे पूर्णतः परमेश्वर थे, यद्यपि मनुष्य रूप में अवतरित होते समय उन्होंने अपने आप को अपने परमेश्वरत्व से शून्य कर लिया था; और पूर्णतः मनुष्य भी। उन्होंने सामान्य, साधारण मनुष्यों के समान ही सब कुछ सहते हुए, सभी अनुभवों में से होकर निकलते हुए जीवन बिताया, किन्तु निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, और सिद्ध बने रहे। पिछले लेख में हमने देखा था कि उन्होंने स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के बदले उनके पापों के दण्ड को सहने, यातनाएं सहने और अपने आप को बलिदान करने को स्वीकार किया, और इसके लिए अपने आप को पकड़ लिए जाने दिया। आज हम उनकी मृत्यु के बारे में देखेंगे। 

       बहुत से लोगों, और कुछ धर्मों तथा मतों का यह मानना है, कि प्रभु यीशु क्रूस पर नहीं मारे गए, वरन उनके स्थान पर उनके समान दिखने वाला कोई और व्यक्ति क्रूस पर चढ़ा दिया गया, और लोगों ने समझ लिया कि प्रभु यीशु को क्रूस पर मार डाला गया है। यह शैतान द्वारा फैलाए गए उस भ्रम का एक भाग है, जिसके द्वारा उसने प्रभु द्वारा उपलब्ध करवाए गए पापों की क्षमा और उद्धार के मार्ग को व्यर्थ और निष्क्रिय दिखाने का प्रयास किया है।

       प्रभु के पकड़वाए जाने के समय से लेकर, उनके क्रूस पर चढ़ाए जाने तक वे निरंतर पहरे में तथा विभिन्न लोगों की उपस्थिति में रहे; एक से दूसरे स्थान पर ले जाए गए, विभिन्न अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किए गए, और अन्ततः रोमी गवर्नर पिलातुस के सामने लाए गए, जहाँ से फिर उन्हें क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए ले जाया गया। दिन के उजाले में वे धार्मिक अगुवों के सामने भी प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने उन्हें पहचाना, और उनके मसीह और परमेश्वर का पुत्र होने के बारे में उनसे पूछा (लूका 22:66-71)। इस दौरान उन्हें भयानक यातनाओं, कोड़े खाने, उपहास आदि के अनुभव से भी निकलना पड़ा, जिसे वे चुपचाप बिना कोई प्रतिक्रिया दिए, या कोई अपशब्द कहे सहते रहे। इस पूरी प्रक्रिया में वे कभी अपने विरोधियों और बैरियों की दृष्टि से ओझल नहीं हुए, तो फिर उनके स्थान पर कोई दूसरा कब और कैसे आता; और क्यों? जिन यातनाओं से होकर प्रभु को निकलना पड़ा, उनमें कोई भी अन्य मनुष्य कुछ भी भला-बुरा कह सकता था, कोई पापमय प्रतिक्रिया दे सकता था, जो नहीं हुआ। यदि वह प्रभु यीशु नहीं था तो फिर इन बातों को सहन करने वाला अपनी वास्तविक पहचान बता कर अपने आप को इस हृदय विदारक वेदना से बचा सकता, जो नहीं हुआ।

यदि यह कहें कि पकड़ने के समय ही कोई गलती हुई, रात के अंधेरे में लोगों ने किसी गलत व्यक्ति को पकड़ लिया, तो इसका भी कोई आधार अथवा प्रमाण नहीं है। उन्हें यहूदा इस्करियोती द्वारा पहचाने जाने के बाद पकड़वाया गया था, और उस समय उनके और यहूदा के मध्य वार्तालाप भी हुआ था (मत्ती 26:47-50); इसलिए किसी गलत व्यक्ति के पकड़े जाने की कोई संभावना नहीं थी। उनके पकड़े जाने के समय दो आश्चर्यकर्म भी हुए; एक तो जब पकड़ने आए लोगों ने प्रभु से उनकी पहचान के लिए पूछा, और प्रभु ने कहा किमैं ही हूँतब उन्हें पकड़ने आए हुए सभी लोग तुरंत स्वतः ही पीछे की ओर गिर पड़ेतब यीशु उन सब बातों को जो उस पर आनेवाली थीं, जानकर निकला, और उन से कहने लगा, किसे ढूंढ़ते हो? उन्होंने उसको उत्तर दिया, यीशु नासरी को: यीशु ने उन से कहा, मैं ही हूं: और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उन के साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, कि मैं हूं, वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े” (यूहन्ना 18:4-6) - जो किसी साधारण मनुष्य के पकड़े जाने पर नहीं हो सकता था। दूसरा, प्रभु के शिष्य, पतरस ने तलवार चलाकर उन लोगों में से एक का कान काट दिया, जिसे प्रभु ने तुरंत चंगा भी कर दियाऔर उन में से एक ने महायाजक के दास पर चला कर उसका दाहिना कान उड़ा दिया। इस पर यीशु ने कहा; अब बस करो: और उसका कान छूकर उसे अच्छा किया” (लूका 22:50-51) - यह भी कोई सामान्य जन नहीं कर सकता था।

इसके अतिरिक्त, दिन के समय में उन्हें क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद वहाँ खड़े लोगों और धर्म-गुरुओं ने पहचाना कि वे प्रभु यीशु मसीह ही हैं, और उनका उपहास कियालोग खड़े खड़े देख रहे थे, और सरदार भी ठट्ठा कर कर के कहते थे, कि इस ने औरों को बचाया, यदि यह परमेश्वर का मसीह है, और उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचा ले। सिपाही भी पास आकर और सिरका देकर उसका ठट्ठा कर के कहते थे। यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने आप को बचा” (लूका 23:35-37)। फिर, क्रूस पर से प्रभु यीशु ने अपनी माता मरियम की देखभाल की ज़िम्मेदारी अपने शिष्य को दीपरन्तु यीशु के क्रूस के पास उस की माता और उस की माता की बहिन मरियम, क्‍लोपास की पत्नी और मरियम मगदलीनी खड़ी थी। यीशु ने अपनी माता और उस चेले को जिस से वह प्रेम रखता था, पास खड़े देखकर अपनी माता से कहा; हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है। तब उस चेले से कहा, यह तेरी माता है, और उसी समय से वह चेला, उसे अपने घर ले गया” (यूहन्ना 19:25-27); जो कोई दूसरा जन नहीं कर सकता था। 

       इसलिए किसी अन्य जन को उनके स्थान पर पकड़े जाने और क्रूस पर चढ़ाए जाने का कोई आधार अथवा प्रमाण नहीं है। शैतान द्वारा एक अन्य धारणा प्रचलित की गई है कि प्रभु यीशु क्रूस पर मरे नहीं, बस बेहोश हुए, और बाद में कब्र के ठन्डे वातावरण में होश में आकर, वे कब्र से बाहर आ गए। इसके बार में हम कल देखेंगे, कि यह बात भी परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु के विवरण से बिल्कुल मेल नहीं खाती है। किन्तु अभी के लिए, हमारे विचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है - यदि वह निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, और सिद्ध प्रभु मेरे और आपके पापों के लिए घोर यातनाएं सहने और क्रूस की अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु सहने के लिए तैयार हो गया, तो क्या हम उससे आशीष और अनत जीवन पाने, नरक की अनन्त पीड़ा से बचने के लिए तैयार नहीं होंगे? वह तो केवल हमारा भला ही चाहता है, जिसके लिए उसने हमारा सारा दुख सह लिया; तो फिर हम क्यों उसके इस आमंत्रण को अस्वीकार करें? शैतान की किसी बात में न आएं, किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा। 

बाइबल पाठ: लूका 23:32-43 

लूका 23:32 वे और दो मनुष्यों को भी जो कुकर्मी थे उसके साथ घात करने को ले चले।

लूका 23:33 जब वे उस जगह जिसे खोपड़ी कहते हैं पहुंचे, तो उन्होंने वहां उसे और उन कुकर्मियों को भी एक को दाहिनी ओर और दूसरे को बाईं और क्रूसों पर चढ़ाया।

लूका 23:34 तब यीशु ने कहा; हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं और उन्होंने चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।

लूका 23:35 लोग खड़े खड़े देख रहे थे, और सरदार भी ठट्ठा कर कर के कहते थे, कि इस ने औरों को बचाया, यदि यह परमेश्वर का मसीह है, और उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचा ले।

लूका 23:36 सिपाही भी पास आकर और सिरका देकर उसका ठट्ठा कर के कहते थे।

लूका 23:37 यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने आप को बचा।

लूका 23:38 और उसके ऊपर एक पत्र भी लगा था, कि यह यहूदियों का राजा है।

लूका 23:39 जो कुकर्मी लटकाए गए थे, उन में से एक ने उस की निन्दा कर के कहा; क्या तू मसीह नहीं तो फिर अपने आप को और हमें बचा।

लूका 23:40 इस पर दूसरे ने उसे डांटकर कहा, क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता? तू भी तो वही दण्ड पा रहा है।

लूका 23:41 और हम तो न्यायानुसार दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं; पर इस ने कोई अनुचित काम नहीं किया।

लूका 23:42 तब उसने कहा; हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।

लूका 23:43 उसने उस से कहा, मैं तुझ से सच कहता हूं; कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 22-24

·      2 कुरिन्थियों

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 20

 

पाप का समाधान - उद्धार - 16

हम देखते आ रहे हैं कि मनुष्य के पाप में पड़ने के कारण उत्पन्न हुई बातों के समाधान के लिए जिस मनुष्य की आवश्यकता थी, उस में निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य था:

  • वह एक पाप के दोष और पाप करने के प्रवृत्ति से रहित मनुष्य हो
  • वह अपना जीवन और सभी कार्य परमेश्वर की इच्छा और आज्ञाकारिता में होकर, उसे समर्पित रहकर करे। वह सदा ही परमेश्वर पर अपना पूरा भरोसा बनाए रखे, उस की किसी भी बात पर कोई संदेह न करे, उसकी आज्ञाकारिता के लिए कोई आनाकानी न करे;  
  • वह पृथ्वी के किसी भी अन्य साधारण और सामान्य मनुष्य के समान सभी परिस्थितियों और बातों के अनुभव में से होकर निकले, किन्तु फिर भी वह अपने जीवन भर, अपने  मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में पूर्णतः निष्पाप, निष्कलंक, और पवित्र रहा हो;
  • वह स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के पापों को अपने ऊपर लेने और उनके दण्ड - मृत्यु को सहने के लिए तैयार हो 
  • वह मृत्यु से वापस लौटने की सामर्थ्य रखता हो; मृत्यु उस पर जयवंत नहीं होने पाए
  • वह अपने इस महान बलिदान के प्रतिफलों को सभी मनुष्यों को सेंत-मेंत देने के लिए तैयार हो 

       हमने देखा कि प्रभु यीशु मसीह के जीवन में इस सूची की पहली तीन बातें सटीक पूरी होती हैं। आज हम चौथी बात, उसके स्वेच्छा से अपना बलिदान देने के बारे में देखते हैं। 

        उत्पत्ति 3 अध्याय में दिए गए प्रथम पाप के संसार में प्रवेश और कार्यान्वित होने के समय के विवरण में हम आदम द्वारा परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करके, उस वर्जित फल को खा लेने और पाप करने के बारे में लिखा पाता हैं:सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया” (उत्पत्ति 3:6)। दिए गए क्रम के अनुसार, शैतान की बातों के प्रभाव में आकर, उस फल से आकर्षित होकर, पहले स्त्री ने अनाज्ञाकारिता की - फल को तोड़कर खाया, और फिर अपने पति, आदम, को भी दिया। उत्पत्ति 3:6 के इस वर्णन में निहित है कि शैतान ने आदम को प्रभावित नहीं किया था; केवल स्त्री को ही किया था। अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार, पाप करने का निर्णय स्त्री ने लिया था, और फिर अपने उस निर्णय को कार्यान्वित भी किया। पहले स्वयं पाप कर लेने के बाद, उसने आदम को भी यही करने के लिए कहा। पौलुस इस बात का हवाला तिमुथियुस और कुरिन्थियों को लिखी अपनी पत्रियों में देता है (1 तिमुथियुस 2:14; 2 कुरिन्थियों 11:3)

आदम के पास यह अवसर था कि वह परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बना रहता, स्त्री के समान फल को न खाता, उसके निर्णय से अपने आप को अलग रखता। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। आदम बहकाया नहीं गया था; किन्तु उसने भी अपनी स्वेच्छा के अंतर्गत, स्त्री के समान परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करने, और पाप करने का निर्णय लिया, और उसे कार्यान्वित कर लिया। अब पाप के परिणामों के समाधान को उपलब्ध करवाने वाले के लिए भी यही बात आवश्यक थी - वह पाप के निवारण से संबंधित सभी बातों, इस प्रक्रिया में निहित परेशानियों, अपमान, तिरस्कार, कष्टों और यातनाओं, और अन्ततः एक भयानक मृत्यु को भली-भांति जानते-बूझते हुए भी, स्वेच्छा से उन सभी को सहने के लिए, उनमें होकर निकालने में भी अपने पवित्र, सिद्ध, निष्पाप, निष्कलंक अस्तित्व को बनाए रखने वाला हो।

हम पिछले लेख में देख चुके हैं कि इब्रानियों 10:7 और फिलिप्पियों 2:6 में प्रभु यीशु के संसार में आते समय किए गए निर्णय के बारे में लिखा है, कि वह स्वेच्छा से परमेश्वर द्वारा पहले से लिख दी गई बातों की पूर्ति के लिए इस संसार में मानव-देहधारी होकर आ गया। आते समय उसने अपने ईश्वरत्व को छोड़ कर मानव रूप में अपने आप को ईश्वरत्व की सभी महिमा और आदर से शून्य कर लिया। वह एक पूर्णतः आज्ञाकारी दीन और नम्र दास का स्वरूप धरण कर के पृथ्वी पर आया, और प्रभु पृथ्वी पर इसी स्वरूप में रहा और कार्य किया।

जब उसने अपने शिष्यों से अपने आने वाले बलिदान और कष्ट के बारे में बात की, तो उसके शिष्य पतरस ने, प्रभु के प्रति अपने प्रेम के अंतर्गत, प्रभु को ऐसा करने से रोकना चाहा, किन्तु प्रभु ने उसे तुरंत ही झिड़क दिया:उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगा, कि मुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊं, और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूं। इस पर पतरस उसे अलग ले जा कर झिड़कने लगा कि हे प्रभु, परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा। उसने फिरकर पतरस से कहा, हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो: तू मेरे लिये ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्वर की बातें नहीं, पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है” (मत्ती 16:21-23)  यहाँ 21 पद में प्रभु की कही बात पर ध्यान कीजिएमुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊं, और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूंउसका यह सब बातों को सहने के लिए यरूशलेम को जाना, उसका अपना निर्णय था; वह स्वयं, या पतरस के कहने पर, इस निर्णय से हट सकता था, किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वरन, उसे इस निर्णय से हटाने का प्रयास करने वाले पतरस को हीशैतानकहकर झिड़क दिया, और उसे परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बाधा होने की उलाहना दी। 

यही एकमात्र समय नहीं था, जब प्रभु यीशु ने अपने यरूशलेम जाने, और वहाँ पर यातनाएं देने तथा मारे जाने के लिए पकड़वाए जाने की बात अपने शिष्यों से कही। उसने अन्य अनेकों अवसरों पर भी उनके सामने इसी बात को रखा (मत्ती 17:21-22; 20:17-19; मरकुस 9:30-32; लूका 9:22, 44; 18:31-33; आदि)। अर्थात प्रभु के लिए यरूशलेम जाकर अपने आप को मारे जाने के लिए पकड़वाया जाना, कोई अनपेक्षित या अनायास घटने वाली बात नहीं थी। वह इससे भली-भांति परिचित था, फिर भी उन्होंने यह किया, स्वेच्छा से किया, परमेश्वर की इच्छानुसार ऐसा किया।  

जब समय आया, और यहूदा इस्करियोती प्रभु को पकड़वाने के लिए जाने के लिए फसह के भोज से जाने को तैयार हो रहा था, तब भी प्रभु ने उसे रोका नहीं, वरन उसे जा लेने दियाऔर टुकड़ा लेते ही शैतान उस में समा गया: तब यीशु ने उस से कहा, जो तू करता है, तुरन्त कर” (यूहन्ना 13:27)

जब उसे पकड़ने और यातनाएं देने के बाद, क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए ले जाया जा रहा था, तब उसके हाल देखकर कुछ स्त्रियाँ विलाप करने लगीं, तो प्रभु ने उन्हें उसके लिए विलाप करने से मना कियाऔर लोगों की बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली: और बहुत सी स्त्रियां भी, जो उसके लिये छाती-पीटती और विलाप करती थीं। यीशु ने उन की ओर फिरकर कहा; हे यरूशलेम की पुत्रियों, मेरे लिये मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिये रोओ” (लूका 23:27-28)। प्रभु को अपने नहीं, उन पर शीघ्र ही आने वाले दुख की चिंता थी। 

कुल मिलाकर, परमेश्वर का वचन बाइबल यह स्पष्ट दिखाती है कि प्रभु यीशु ने स्वेच्छा से अपने आप को मारे जाने के लिए दे दिया। वह पापी मनुष्यों के बदले में उनके मृत्यु दण्ड को सहने के लिए तैयार था। उसने यह इसलिए स्वीकार किया ताकि मुझे और आपको अनन्त जीवन की आशीष दे सके - यदि मैं और आप उसके इस बलिदान पर विश्वास लाएं, उसे अपना प्रभु स्वीकार करें, और स्वेच्छा तथा सच्चे मन से अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं।

 यदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

 

बाइबल पाठ: यूहन्ना 5:39-47 

यूहन्ना 5:39 तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है।

यूहन्ना 5:40 फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।

यूहन्ना 5:41 मैं मनुष्यों से आदर नहीं चाहता।

यूहन्ना 5:42 परन्तु मैं तुम्हें जानता हूं, कि तुम में परमेश्वर का प्रेम नहीं।

यूहन्ना 5:43 मैं अपने पिता के नाम से आया हूं, और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते; यदि कोई और अपने ही नाम से आए, तो उसे ग्रहण कर लोगे।

यूहन्ना 5:44 तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो और वह आदर जो अद्वैत परमेश्वर की ओर से है, नहीं चाहते, किस प्रकार विश्वास कर सकते हो?

यूहन्ना 5:45 यह न समझो, कि मैं पिता के सामने तुम पर दोष लगाऊंगा: तुम पर दोष लगाने वाला तो है, अर्थात मूसा जिस पर तुम ने भरोसा रखा है।

यूहन्ना 5:46 क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करते, तो मेरी भी प्रतीति करते, इसलिये कि उसने मेरे विषय में लिखा है।

यूहन्ना 5:47 परन्तु यदि तुम उस की लिखी हुई बातों की प्रतीति नहीं करते, तो मेरी बातों की क्योंकर प्रतीति करोगे।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 19-21

·      2 कुरिन्थियों 7

सोमवार, 13 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 19


पाप का समाधान - उद्धार - 15

हम देख चुके हैं कि अदन की वाटिका में हुए पहले पाप के कारण उत्पन्न स्थिति के समाधान और निवारण के लिए जिस सिद्ध, पवित्र, निष्पाप, निष्कलंक मनुष्य की आवश्यकता थी, उसका पृथ्वी पर जन्म और जीवन स्वाभाविक मानवीय प्रणाली से संभव नहीं था, क्योंकि पृथ्वी पर जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य पाप के दोष एवं प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है, और पाप करता है। इसलिए वह केवल अपना दण्ड सहन कर सकता है, किसी अन्य के दण्ड को नहीं वहन कर सकता है। प्रभु यीशु का पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म परमेश्वर द्वारा किया गया आश्चर्यकर्म था; प्रभु ने अन्य सभी मनुष्यों के समान स्त्री से पृथ्वी पर जन्म भी लिया, उत्पत्ति 3:15 की भविष्यवाणी और बात को पूरा भी किया, किन्तु उनकी देह में मनुष्य के पाप का दोष और प्रवृत्ति नहीं थी।

साथ ही, हमने यह भी देखा था कि यद्यपि प्रभु यीशु जन्म से ही निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध थे; किन्तु शैतान ने उन्हें मार डालने या पाप में गिराने के प्रयासों में कोई कसर रख नहीं छोड़ी थी। किन्तु प्रभु ने उसकी कोई चाल को सफल नहीं होने दिया, और अपने पर पाप का कोई अभियोग नहीं आने दिया। प्रभु यीशु हर परिस्थिति, हर बात के लिए पिता परमेश्वर के आज्ञाकारी बने रहे; दुख उठा कर भी। उन्होंने यह दिखा दिया कि परमेश्वर की सहायता से मानवीय शरीर में होकर भी शैतान की युक्तियों को विफल किया जा सकता है, पापा करते रहने से बचा जा सकता है। 

क्योंकि पाप के मानवीय जीवन में प्रवेश का द्वार मनुष्य द्वारा उसके लिए परमेश्वर की योजनाओं और आज्ञाओं के प्रति संदेह के कारण खुला था; इसलिए पाप के समाधान और निवारण के लिए बलिदान होने वाले सिद्ध मनुष्य को परमेश्वर पर बिना कोई संदेह किए पूर्ण विश्वास करने वाला भी होना आवश्यक था। प्रभु यीशु ने यह भी अपने जीवन से कर के दिखाया, वरन पृथ्वी पर आने से भी पहले कर के दिखाया। प्रभु यीशु मसीह में पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार की एक विशेषता यह भी है कि प्रभु के पृथ्वी पर आने से पहले ही उसके बारे में पवित्र शास्त्र में लिख दिया गया था। पौलुस प्रेरित ने कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों की मंडली को लिखा,  “हे भाइयों, मैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूं जो पहिले सुना चुका हूं, जिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिस में तुम स्थिर भी हो। उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया। और गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा” (1 कुरिन्थियों 15:1-4)। प्रभु यीशु परमेश्वर की बातों के प्रति पूर्णतः आज्ञाकारी रहा, उसने परमेश्वर के लिखे हुए को पूरा किया; परमेश्वर पिता की किसी बात के लिए कोई आनाकानी अथवा संदेह नहीं किया: 

  • पृथ्वी पर आते समय प्रभु ने कहा, “तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूं, (पवित्र शास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूं” (इब्रानियों 10:7)। परमेश्वर पिता के प्रति उसकी आज्ञाकारिता उसके पृथ्वी पर आने से पहले आरंभ हो चुकी थी। 
  • जब वह पृथ्वी पर आया, तो अपने ईश्वरत्व को छोड़कर, दीन, नम्र, और आज्ञाकारी दास का स्वरूप धारण करके आया, “जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:6)
  • प्रभु काभोजनअर्थात उसकी सामर्थ्य, परमेश्वर पिता की आज्ञाकारिता थी, “यीशु ने उन से कहा, मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजने वाले की इच्छा के अनुसार चलूं और उसका काम पूरा करूं” (यूहन्ना 4:34)
  • प्रभु ने अपने शिष्यों में से अपने सबसे निकट के शिष्य भी अपनी इच्छा के अनुसार नहीं, वरन पिता परमेश्वर से सारी रात प्रार्थना करने के बाद चुने, “और उन दिनों में वह पहाड़ पर प्रार्थना करने को निकला, और परमेश्वर से प्रार्थना करने में सारी रात बिताई। जब दिन हुआ, तो उसने अपने चेलों को बुलाकर उन में से बारह चुन लिये, और उन को प्रेरित कहा” (लूका 6:12-13) 
  • प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई और कार्यों के लिए कहा, “इस पर यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है” (यूहन्ना 5:19); औरमैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूं, वैसा न्याय करता हूं, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूं” (यूहन्ना 5:30)
  • प्रभु द्वारा अपने प्राणों का बलिदान देना और उसका पुनरुत्थान भी परमेश्वर पिता की इच्छा के अनुसार थापिता इसलिये मुझ से प्रेम रखता है, कि मैं अपना प्राण देता हूं, कि उसे फिर ले लूं। कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन मैं उसे आप ही देता हूं: मुझे उसके देने का अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है” (यूहन्ना 10:17-18) 
  • निष्पाप, निष्कलंक, और पवित्र प्रभु के लिए, जिसके चरित्र, स्वभाव, और विचार में भी पाप नहीं था, सारे संसार के सभी लोगों के पापों को अपने ऊपर ले लेना अत्यंत विचलित कर देने वाला कार्य था; किन्तु फिर भी उसने पिता परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति के लिए उसे किया, “हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” “और वह अत्यन्त संकट में व्याकुल हो कर और भी हृदय वेदना से प्रार्थना करने लगा; और उसका पसीना मानो लहू की बड़ी बड़ी बून्‍दों के समान भूमि पर गिर रहा था” (लूका 22:42, 44) 
  • क्रूस पर जाने से पहले प्रभु ने अपनी प्रार्थना में पिता परमेश्वर से कहा, “जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा कर के मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है” (यूहन्ना 17:4); और क्रूस पर से, अपने प्राण छोड़ने से पहले प्रभु ने सुनिश्चित किया कि परमेश्वर के वचन में उनके लिए लिखी सभी बातें पूरी हो गई हैं, और, “इस के बाद यीशु ने यह जानकर कि अब सब कुछ हो चुका; इसलिये कि पवित्र शास्त्र की बात पूरी हो कहा, मैं प्यासा हूं। वहां एक सिरके से भरा हुआ बर्तन धरा था, सो उन्होंने सिरके में भिगोए हुए इस्‍पंज को जूफे पर रखकर उसके मुंह से लगाया। जब यीशु ने वह सिरका लिया, तो कहा पूरा हुआ और सिर झुका कर प्राण त्याग दिए” (यूहन्ना 19:28-30) 
  • अपने पुनरुत्थान के बाद प्रभु ने अपने शिष्यों को समझाया कि किस प्रकार पवित्र शास्त्र में उस के लिए लिखी हुई बातों का पूरा होना अवश्य था, “फिर उसने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों। तब उसने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी। और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा” (लूका 24:44-46)

 

प्रभु के पृथ्वी पर आने से पहले से लेकर, उनके जीवन, शिक्षाओं, क्रूस पर बलिदान देने, मृतकों में से जी उठने - सभी के विषय परमेश्वर ने अपने वचन में सब कुछ पहले से लिखवा दिया था। प्रभु यीशु ने उन सभी बातों का पूर्णतः निर्वाह किया, कभी परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी नहीं रहा, कभी उसकी किसी बात, किसी योजना पर संदेह नहीं किया, परमेश्वर की आज्ञाकारिता करने में कभी कुड़कुड़ाया नहीं, हर बात में परमेश्वर की इच्छा जानकार उसी के अनुसार कार्य किया। इसी प्रभु ने अपनी सेवकाई के आरंभ से ही कहा, “यूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मरकुस 1:14-15) 

क्या आप परमेश्वर की इस चेतावनी के प्रति सचेत और तैयार हैं? संसार के हालात स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि अब किसी भी क्षण प्रभु को दोबारा आगमन हो जाएगा, और जिन्होंने उद्धार नहीं पाया है, वे अनन्त विनाश में, तथा पापों से पश्चाताप करके उनके लिए प्रभु यीशु से क्षमा मांग लेने वाले अनन्त आशीष के स्थान - स्वर्ग में चले जाएंगे। क्या आप उस घड़ी के इस अपरिवर्तनीय निर्णय का सामना करने के लिए तैयार हैंयदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

 

बाइबल पाठ: प्रेरितों 17:24-31 

प्रेरितों 17:24 जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी हो कर हाथ के बनाए हुए मन्‍दिरों में नहीं रहता।

प्रेरितों 17:25 न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और श्वास और सब कुछ देता है।

प्रेरितों 17:26 उसने एक ही मूल से मनुष्यों की सब जातियां सारी पृथ्वी पर रहने के लिये बनाईं हैं; और उन के ठहराए हुए समय, और निवास के सिवानों को इसलिये बान्धा है।

प्रेरितों 17:27 कि वे परमेश्वर को ढूंढ़ें, कदाचित उसे टटोल कर पा जाएं तौभी वह हम में से किसी से दूर नहीं!

प्रेरितों 17:28 क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; जैसे तुम्हारे कितने कवियों ने भी कहा है, कि हम तो उसी के वंश भी हैं।

प्रेरितों 17:29 सो परमेश्वर का वंश हो कर हमें यह समझना उचित नहीं, कि ईश्वरत्व, सोने या रूपे या पत्थर के समान है, जो मनुष्य की कारीगरी और कल्पना से गढ़े गए हों।

प्रेरितों 17:30 इसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है।

प्रेरितों 17:31 क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है। 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 16-18

·      2 कुरिन्थियों 6

रविवार, 12 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 18

 

पाप का समाधान - उद्धार - 14

       मनुष्य की अनाज्ञाकारिता के कारण पाप के संसार में प्रवेश के समाधान के बारे में देखते हुए, अभी तक हम देख चुके हैं कि: 

  • क्योंकि पाप का प्रवेश मनुष्य के द्वारा हुआ, उसका समाधान भी मनुष्य में होकर ही होना था। 
  • पाप के कारण मृत्यु जगत में आई; पाप के समाधान के द्वारा मृत्यु का यह प्रभाव मिटाया जाकर मनुष्य को वापस उस स्थिति में लाया जाना था जो अदन की वाटिका में पाप से पहले उसकी थी। 
  • इसके लिए यह आवश्यक था कि कोई ऐसा निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, सिद्ध मनुष्य हो जो पाप के कारण आई मृत्यु को स्वयं सह ले, और मनुष्यों पर से मृत्यु की पकड़ को मिटा दे। यदि मृत्यु को सहने वाले मनुष्य में अपना कोई पाप, या पाप का कोई दोष अथवा अंश होता, तो फिर वह उस मृत्यु को केवल अपने ही लिए सह सकता था, दूसरों को उसके लाभ प्रदान नहीं कर सकता था। 
  • इस कारण पृथ्वी पर जन्म लेने वाले मनुष्यों की सामान्य प्रणाली के अनुसार जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य इसके अयोग्य ठहरता, क्योंकि सभी पाप-दोष के साथ जन्म लेते हैं। इस संदर्भ में हमने पिछले दो लेखों में देखा कि कैसे प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्यों के जन्म की सामान्य प्रणाली के द्वारा नहीं, वरन एक विशेष रीति से मनुष्य की देह में जन्म लिया और कोख में आने से लेकर क्रूस पर उनकी मृत्यु के समय तक एक पूर्णतः निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध जीवन बिताया। न उनके जीवन काल में, और न तब से लेकर अब दो हज़ार वर्षों से भी अधिक के अंतराल में, कोई उनके जीवन में कोई भी पाप नहीं दिखा सका, उनमें पाप का दोष होने को प्रमाणित नहीं कर सका। 
  • अदन की वाटिका में पाप और मृत्यु ने मनुष्य की अनाज्ञाकारिता के द्वारा प्रवेश किया; और इस अनाज्ञाकारिता का कारण था मनुष्य का परमेश्वर की उनके लिए भली मनसा और योजनाओं पर संदेह करना था। मनुष्य के जीवन से पाप और मृत्यु का मिटाया जाना इस अनाज्ञाकारिता की प्रक्रिया को उलट देने से होना था। साथ ही इस आज्ञाकारिता के लिए मनुष्य को अपने जीवन पर्यंत, बिना परमेश्वर की किसी भी बात के लिए उस पर संदेह अथवा अविश्वास किए, स्वेच्छा से तथा भली मनसा के साथ परमेश्वर की पूर्ण आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करना था। 

       आज से हम प्रभु यीशु मसीह द्वारा इस पूर्ण आज्ञाकारिता की शर्त को पूरा करने के बारे में देखेंगे। ऐसा नहीं है कि क्योंकि प्रभु यीशु परमेश्वर के पुत्र थे, क्योंकि वे पूर्णतः परमेश्वर और पूर्णतः मनुष्य थे, इसलिए उनके लिए यह आज्ञाकारिता सहज एवं सरल थी। प्रभु यीशु को भी अपने मनुष्य रूप में आज्ञाकारिता के लिए बहुत दुख और कष्ट सहने पड़े, परीक्षाओं और कठिनाइयों से होकर निकलना पड़ा। प्रभु यीशु की इस आज्ञाकारिता के विषय परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखा गया है, “उसने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उसको मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई। और पुत्र होने पर भी, उसने दुख उठा उठा कर आज्ञा माननी सीखी। और सिद्ध बन कर, अपने सब आज्ञा मानने वालों के लिये सदा काल के उद्धार का कारण हो गया” (इब्रानियों 5:7-9); और “...वरन वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला” (इब्रानियों 4:15) 

शैतान ने उनके जन्म से पहले से लेकर, उनकी मृत्यु के समय तक उनके द्वारा यह कार्य संपन्न होने से रोकने का प्रयास करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी:

  • इसे समझने के लिए मत्ती 1:18-21 देखिए। जब प्रभु के सांसारिक पिता कहलाए जाने वाले व्यक्ति यूसुफ को पता चला कि उसकी मंगेतर मरियम, जिसमें होकर प्रभु यीशु ने जन्म लेना था, गर्भवती है, तो उसने उसे चुपके से छोड़ देने की योजना बनाई। उन दिनों में, मूसा द्वारा मिली व्यवस्था के अनुसार, व्यभिचार के दोषी को पत्थरवाह करके मार डाला जाता था (यूहन्ना 8:4, 5)। यदि यूसुफ मरियम को छोड़ देता, तो या तो उसके विवाह से पहले गर्भवती होने की बात खुल जाने पर मरियम को पत्थरवाह करके मार डाला जाता; या फिर मरियम त्यागी हुई स्त्री के समान अकेले ही समाज से तिरस्कृत जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाती, और प्रभु भी जन्म के समय से ही तिरस्कृत और अपमानित, तथा समाज में अस्वीकार्य रहता; इस बात के लिए प्रभु को बाद में भी लोगों के ताने सुनने पड़े (यूहन्ना 8:41)। दोनों में से जो भी परिस्थिति कार्यान्वित होती, प्रभु का उद्धार का कार्य, आरंभ होने से पहले ही समाप्त हो जाता। किन्तु क्योंकि परमेश्वर के संदेश को सुन और मानकर यूसुफ ने मरियम को अपना लिया, शिशु यीशु को अपना नाम और परिवार दिया, इसलिए शैतान की यह योजना विफल हो गई। 
  • प्रभु के जन्म के बाद, हेरोदेस राज्य ने दो वर्ष की आयु से कम के बच्चों को मरवाने की आज्ञा देकर प्रभु को शिशु-अवस्था में ही मरवा डालने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा (मत्ती 2:13-16) 
  • प्रभु यीशु के वयस्क हो जाने और सेवकाई के आरंभ करने के समय वह लगातार चालीस दिन तक शैतान द्वारा परखा गया (लूका 4:1)। जब शैतान उसे पाप में नहीं गिरा सका, तोकुछ समय के लिए” (लूका 4:13) उसके पास से चला गया, किन्तु उसकी सारी सेवकाई भर लोगों, विशेषकर धर्म के अगुवों और धर्म-गुरुओं को उसके विरुद्ध भड़काता रहा, उसकी सेवकाई में बाधाएं डालता रहा।
  • धर्म-गुरुओं के षड्यंत्र के अंतर्गत (यूहन्ना 11:47-50), अन्ततः यीशु को पकड़ कर, रोमी गवर्नर पिलातुस को बाध्य कर के, प्रभु यीशु को क्रूस पर मार डाला गया।
  • क्रूस की अवर्णनीय पीड़ा सहते हुए भी, वहाँ पर भी उसका ठट्ठा उड़ाया जाना ज़ारी रहा (मत्ती 27:41; लूका 23:36); किन्तु प्रभु ने कोई अपशब्द नहीं कहा, या दुर्भावना नहीं रखी, वरन अपने सताने वालों की क्षमा की प्रार्थना ही की; कोई पाप नहीं किया (लूका 23:34) 
  • उसे क्रूस पर से उतर आने का प्रलोभन दिया गया, इस आश्वासन के साथ कि यदि वह ऐसा करेगा, तो वे लोग उस पर विश्वास कर लेंगे (मत्ती 27:40, 42)। यदि उनकी बात मानकर प्रभु क्रूस पर से उतर आता, तो बलिदान का कार्य अधूरा रह जाता, और असफल हो जाता। 
  • शैतान ने सोचा होगा कि अब यह प्रभु का अंत है; अब शैतान को रोकने वाला कोई नहीं रहा। किन्तु तीसरे दिन प्रभु यीशु के पुनरुत्थान ने उसकी सारी संतुष्टि और योजनाओं पर पानी फेर दिया। तब प्रभु के पुनरुत्थान के बाद भी शैतान ने प्रभु के पुनरुत्थान को ही झूठा ठहराने का षड्यंत्र कार्यान्वित कर दिया (मत्ती 28:13-15) 

किन्तु शैतान की हर चाल को प्रभु ने विफल किया, और दिखा दिया कि मानव-देह में शैतान की युक्तियों, प्रलोभनों, और परीक्षाओं का सामना करने, और उसे पराजित करने की क्षमता है। शैतान के इन सभी प्रयासों ने परमेश्वर के कार्य को बाधित करने के स्थान पर और अधिक प्रबल कर दिया। शैतान के ये प्रयास परमेश्वर के वचन में दी गई प्रभु यीशु से संबंधित भविष्यवाणियों को पूरा और प्रमाणित करने वाले तथ्य बन गए; प्रभु परमेश्वर की महिमा के, उसके सत्य के सदा जयवन्त रहने के उदाहरण बन गए। हम प्रभु द्वारा परमेश्वर की आज्ञाकारिता के विषय आगे अगले लेख में देखेंगे।

जिस प्रभु ने मानव देह में होकर यह दिखा दिया कि मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाकारिता में रहते हुए, परमेश्वर की सहायता से शैतान का सामना कर सकता है, उसे पराजित कर सकता है, वही प्रभु परमेश्वर अपने शिष्यों को अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से भर देता है, परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रभु यीशु के शिष्यों में उसी पल से आकर बस जाता है जब वे पापों से पश्चाताप करते हैं और अपने जीवन प्रभु को समर्पित कर देते हैं (इफिसियों 1:13-14)। प्रभु के साथ तथा पवित्र आत्मा की सहायता एवं मार्गदर्शन से हम मनुष्य भी शैतान पर जयवंत हो सकते हैं। क्या आपने प्रभु के इस अद्भुत उपहार को पा लिया हैयदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

 

बाइबल पाठ: यूहन्ना:1-14

यूहन्ना 1:1 आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

यूहन्ना 1:2 यही आदि में परमेश्वर के साथ था।

यूहन्ना 1:3 सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

यूहन्ना 1:4 उस में जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी।

यूहन्ना 1:5 और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।

यूहन्ना 1:6 एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिस का नाम यूहन्ना था।

यूहन्ना 1:7 यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाएं।

यूहन्ना 1:8 वह आप तो वह ज्योति न था, परन्तु उस ज्योति की गवाही देने के लिये आया था।

यूहन्ना 1:9 सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।

यूहन्ना 1:10 वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।

यूहन्ना 1:11 वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।

यूहन्ना 1:12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।

यूहन्ना 1:13 वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहन्ना 1:14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 13-15

·      2 कुरिन्थियों