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बुधवार, 8 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 6


पुनःअवलोकन, निष्कर्ष, परमेश्वर की कार्य-विधि, और शैतान की भ्रामक युक्तियाँ  

पुनःअवलोकन:

मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा मसीही विश्वासियों को दिए गए वरदानों की इस अध्ययन शृंखला में हम अभी तक उन आधारभूत बातों को देखते आए हैं, जिनकी समझ और विचार रखना, पवित्र आत्मा के वरदानों के उपयोग के बारे में समझने के लिए अनिवार्य है। यदि परमेश्वर के वचन की इन मौलिक शिक्षाओं को ध्यान में रखे बिना हम पवित्र आत्मा के वरदानों और उपयोग को समझने के प्रयास करेंगे, तो बहुत सी गलतियों में पड़ सकते हैं, जो हमें सत्य से भटका देंगी। इस संदर्भ में हम अभी तक देख चुके हैं कि:

  • परमेश्वर स्वयं कार्यशील है और अपने लोगों को भी कार्यशील देखना चाहता है। 
  • परमेश्वर ने लोगों को मसीही विश्वास में निठल्ले होने तथा निष्क्रिय एवं निष्फल रहते हुए परमेश्वर की आशीषों को उपयोग करते रहने के लिए नहीं लिया है। 
  • परमेश्वर ने प्रत्येक मसीही विश्वासी द्वारा परमेश्वर के लिए करने के लिए कुछ न कुछ कार्य निर्धारित किए हैं। 
  • परमेश्वर द्वारा निर्धारित किए गए इन कार्यों को सुचारु रीति से करने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा स्वतः ही प्रत्येक मसीही विश्वासी को उस कार्य के लिए उपयुक्त कोई न कोई वरदान अवश्य देता है। 

साथ ही हमने मसीही विश्वासी के जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका के संदर्भ में यह भी देखा है कि मसीही विश्वास में आते ही तुरंत ही उसी पल से हर विश्वासी के अन्दर पवित्र आत्मा आकर निवास करने लगता है; इसके किसी को लिए कोई अलग से प्रार्थना या प्रयास नहीं करना पड़ता है। यह मसीही विश्वास में आने के साथ ही, परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई और स्वतः ही होने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। इससे संबंधित जो दूसरी महत्वपूर्ण बात हमने देखी थी वह थी कि व्यक्ति में पवित्र आत्मा की उपस्थिति उस व्यक्ति के बदले हुए जीवन और उसमें दिखने वाले आत्मा के फलों (गलातीयों 5:22-23) के द्वारा प्रमाणित होती है, न कि बाइबल के बाहर की विचित्र हरकतों, उछल-कूद, शोर-शराबे आदि के व्यवहार से, अथवा चिह्न-चमत्कार आदि करने के द्वारा।

निष्कर्ष:

शैतान का उद्देश्य सदा ही परमेश्वर के कार्य में बाधाएं डालना और उसकी योजनाओं को असफल करने के प्रयास करना रहता है। क्योंकि परमेश्वर मसीही विश्वासियों में होकर संसार में और संसार के लोगों के समक्ष अपने कार्य करता है, इसलिए परमेश्वर के कार्यों को बाधित करने के लिए शैतान मसीही विश्वासियों को व्यर्थ की बातों में उलझा कर रखता है जिससे वे अपने निर्धारित कार्य न कर सकें, और उसके द्वारा फैलाई जाने वाली भक्तिपूर्ण प्रतीत होने वाली किन्तु वास्तविकता में भरमाने वाली युक्तियों में उलझे रह कर समय बर्बाद करते रहें। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह मसीही विश्वासियों को जाने-अनजाने में परमेश्वर का अनाज्ञाकारी भी बना कर रखता है। यह समझते हुए कि वे परमेश्वर के लिए, या परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हैं, वे अपनी ही धारणाओं, इच्छाओं, और मनुष्यों की मन-गढ़न्त बातों तथा गलत शिक्षाओं के अनुसार कार्य करते रहते हैं, और अन्ततः उनके सभी कार्य और प्रयास व्यर्थ एवं निष्फल होते हैं। शैतान की एक और कार्य-विधि है मसीही विश्वासी को उसके वरदानों और उनकी उपयोगिता के बारे में अनभिज्ञ रखना, या उन्हें ठीक से उपयोग नहीं करने देना, उनके बारे में उसे गलत शिक्षाओं में फंसा देना। 

परमेश्वर की कार्य-विधि:

परमेश्वर ने सदा ही समस्त मानवजाति की भलाई के लिए ही कार्य किया है। जब पृथ्वी पर पाप  बहुत बढ़ गया, और परमेश्वर ने जल-प्रलय के द्वारा पापी मनुष्यों के नाश की ठान ली, तब भी उसने उनके लिए जो पापों से पश्चाताप कर लें, उसकी चेतावनियों को मान लें, अपनी बुराई से पलट जाएं, उनके बचाए जाने के लिए नूह के द्वारा एक जहाज़ बनवाया; किन्तु नूह और उसके परिवार को छोड़ और किसी ने परमेश्वर की नहीं सुनी, संसार के लोगों ने परमेश्वर की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, और जल-प्रलय में नाश हो गए। जब परमेश्वर अब्राहम को मूर्तिपूजकों में से निकालकर कनान में लेकर आया, तो अब्राहम को दी गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में भी समस्त पृथ्वी की भलाई की योजना थी। उस समय, “यहोवा ने अब्राम से कहा, अपने देश, और अपनी जन्मभूमि, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा। और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा। और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूंगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूंगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे” (उत्पत्ति 12:1-3)। जब परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों, इस्राएलियों को अपने लोग होने के लिए चुना, तो उनमें होकर सच्चे परमेश्वर के विमुख एवं अनाज्ञाकारी हो चुके संसार के लोगों के सामने अपनी भलाई, अपने लोगों की देखभाल, और उनमें होकर अपनी सामर्थ्य तथा सार्वभौमिकता को दिखाया। किन्तु उसके सभी प्रमाणों के बावजूद संसार ने इस्राएल के परमेश्वर को नहीं अपनाया, वरन उलटे इस्राएल ने ही संसार की बातों को अपना लिया और परमेश्वर से दूर चला गया। उसका हर रीति से तिरस्कार किए जाने के बावजूद, फिर भी परमेश्वर सभी की देखभाल करता रहता है, सभी मनुष्यों को उसकी सृष्टि का उपयोग करने देता है, सभी की आवश्यकताओं को पूरा करता रहता हैजिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है” (मत्ती 5:45)। प्रभु यीशु मसीह में होकर भी परमेश्वर ने किसी जाति-विशेष, अथवा कुछ विशेष लोगों के लिए नहीं, परंतु समस्त मानवजाति के पापों की क्षमा, उद्धार, और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कर लेने और अनन्तकाल के लिए परमेश्वर के साथ स्वर्ग के निवासी होने के लिए मार्ग बनाकर दिया। 

परमेश्वर के कार्यों और वरदानों के संबंध में यह एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, कि परमेश्वर का हर कार्य, हर आशीष, हर योजना, उसके द्वारा प्रदान की जाने वाली हर सामर्थ्य, कभी भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए ही नहीं होती है, वरन उस व्यक्ति में होकर सभी की भलाई और उन्नति के लिए, संसार के लोगों को परमेश्वर के बारे में बताने, उसकी ओर आकर्षित करने, और उसकी निकटता में लाने के लिए होती है। परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली बातों और सामर्थ्य से संबंधित इस मौलिक सिद्धांत की कभी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, अन्यथा बहुत सी गलतियों में पड़ जाएंगे। और पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों को लेकर शैतान ने बहुत से लोगों को, विशेषकर उनको जो पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाओं को सिखाते और फैलाते हैं, इसी गलती में फंसा रखा है।

शैतान की भ्रामक युक्तियाँ:

यदि आप थोड़ा सा भी विचार करें तो यह तुरंत ही प्रकट हो जाता है कि ये गलत शिक्षाएं फैलाने वाले लोग जिन पवित्र आत्मा के वरदानों और सामर्थ्य की बातें करते हैं, जिन्हें मांगने और पाने के लिए सिखाते हैं, वे सभी व्यक्ति द्वारा अपने उपयोग के लिए या व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सामाजिक अथवा मण्डली में स्तर को बढ़ाने, लोगों से प्रशंसा पाने, व्यक्ति के अहम को बढ़ाने वाले होते हैं। दुख की बात यह है कि इन सभी वरदानों को भी परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मण्डली तथा लोगों की भलाई के लिए दिया है, किन्तु जिस प्रकार से और जिस स्वरूप में ये लोग उन वरदानों को प्रस्तुत करते हैं, उससे उनकी वास्तविक उपयोगिता एवं दिए जाने का उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है। यह भक्ति और आत्मिकता के भेष में ढाँप कर, शैतान की कुटिलता और झूठ को लोगों में बैठा देने और फैला देने का तरीका है। शैतान के इस चंगुल में फँस कर वे लोग अपने इन वरदानों को व्यर्थ कर देते हैं, और जिनकी सेवकाई के लिए ये वरदान थे, वे लोग निष्क्रिय तथा निष्फल हो जाते हैं, अपनी आशीषों को गँवा देते हैं। उनके लिए वह दिन और समय कितना भयानक और हृदय-विदारक होगा, जब मत्ती 7:23 के अनुरूप, प्रभु यीशु मसीह उनसे कहेगा, “मैं ने तुम को कभी
नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ यदि उन्होंने परमेश्वर के वचन को गंभीरता से लिया होता, मनुष्यों की धारणाओं और मन-गढ़न्त बातों के अनुसार नहीं वरन बाइबल की बातों के अनुसार सीखा होता, स्वीकार करने से पहले सभी शिक्षाओं को बारीकी से जाँचा-परख होता, तो वे कभी शैतान की इन चालों में नहीं फँसते, परमेश्वर पवित्र आत्मा उन्हें वचन की सच्चाइयों को दिखाता, बताता, और समझाता। किन्तु उन्होंने परमेश्वर के वचन के स्थान पर मनुष्यों की बातों को अधिक महत्व दिया, और अपनी सेवकाई व्यर्थ कर ली, अपनी अनन्तकालीन आशीषें गँवा दीं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो पवित्र आत्मा के वरदानों से संबंधित अपने विचारों, मान्यताओं, और धारणाओं को परमेश्वर के वचन से जाँच-परख लें, और सुनिश्चित कर लें कि आप किसी गलत शिक्षा अथवा मनुष्य की गढ़ी हुई बातों में नहीं फंसे हुए हैं, वरन वचन की खराई और सही शिक्षा में ही स्थापित हैं। समय रहते सुधार न करने के परिणाम, वर्तमान में तथा अनन्तकाल के लिए, बहुत हानिकारक हो सकते हैं। प्रभु द्वारा मत्ती 7:23 में तथा उन पाँच मूर्ख कुँवारियों से कही गई बात को स्मरण कीजिए - बाद में सुधार का प्रयास करने से उन्हें कुछ लाभ नहीं हुआ, वे प्रभु से दूर ही रहे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 8-10    
  • 3 यूहन्ना 1

मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 5

 

आत्मिकता का प्रमाण - आज्ञाकारिता या चिन्ह और चमत्कार?

  पिछले लेख में हमने देखा है कि मनुष्य द्वारा परमेश्वर को प्रसन्न करने और उसके कार्य करने के लिए परमेश्वर की दृष्टि में परमेश्वर की आज्ञाकारिता का ही सर्वोपरि स्थान है। हम यह भी देख चुके हैं कि परमेश्वर अपने सभी अनुयायियों से कुछ न कुछ कार्य चाहता है, और उसने वे कार्य पहले से ही निर्धारित भी किए हुए हैं, तथा उस सेवकाई के लिए उपयुक्त सामर्थ्य एवं योग्यता प्रदान करने के लिए मसीही विश्वासी में सर्वदा निवास करने वाला परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी को आवश्यक वरदान भी देता है। यह बाइबल का स्थापित तथ्य है कि उद्धार पाते ही, वास्तविकता में मसीही विश्वासी बनते ही, उसी पल से परमेश्वर पवित्र आत्मा उद्धार पाए हुए व्यक्ति में आकर निवास करने लग जाता है; और व्यक्ति में उनकी उपस्थिति उस व्यक्ति के बदल हुए जीवन तथा पवित्र आत्मा के फलों के दिखने लग जाने के द्वारा प्रमाणित हो जाती है (मत्ती 7:15-20)। ये सभी परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित और उसकी योजना के अनुसार दी जाने वाली बातें हैं, जिनके लिए किसी भी उद्धार पाए हुए जन को अलग से कोई प्रयास अथवा प्रार्थनाएं करने की आवश्यकता नहीं है। 

किन्तु फिर भी पवित्र आत्मा के नाम से अनेकों प्रकार की गलत शिक्षाएं और अनुचित धारणाएं बताने-सिखाने वाले लोग, मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा के होने को लेकर लोगों में भ्रम और संदेह उत्पन्न करते रहते हैं, और पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्रमाणित करने के लिए व्यक्ति में विभिन्न बातों के होने की अनिवार्यता को सिखाते हैं, नाहक उन पर बल देते रहते हैं। इन गलत शिक्षाओं को सिखाने वाले लोगों द्वारा कही जाने वाली बातों में से एक है पवित्र आत्मा पाए हुए व्यक्ति में अद्भुत चिह्न और चमत्कार करने की सामर्थ्य होना। निःसंदेह चिह्न और चमत्कार करने की सामर्थ्य देना परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों में से एक है; किन्तु बाइबल में ऐसी कोई शिक्षा नहीं है कि यह वरदान प्रत्येक मसीही विश्वासी को दिया जाएगा, या, किसी व्यक्ति में इस गुण की उपस्थिति उसमें पवित्र आत्मा होने का प्रमाण है। वरन, इसके ठीक विपरीत, परमेश्वर ने पुराने और नए नियम, दोनों में अपने लोगों को सचेत किया है कि वे चिह्न और चमत्कारों के द्वारा लोगों को भरमाने और परमेश्वर से दूर कर देने वालों से सावधान रहें, उनके छल में फंस न जाएं, और परमेश्वर के वचन को ही वास्तविकता को जाँचने की खरी कसौटी के समान प्रयोग करें।

यह न केवल बाइबल का, वरन सामान्य जीवन का भी एक व्यावहारिक सत्य है कि शैतान और उसके दूत भी अद्भुत कार्य, चिह्न और चमत्कार, जादू-टोना, भावी कहना, आदि करने की सामर्थ्य रखते हैं और इनके द्वारा लोगों को प्रभावित करते हैं, अपने वश में लाते हैं, और परमेश्वर के वचन की सच्चाई एवं वास्तविकता से बहका देते हैं, गलत मार्गों पर भटका देते हैं। कुछ लोगों में ऐसा करने की योग्यता और इसके द्वारा समाज पर उनका प्रभाव होना यह प्रमाणित करता है कि उनमें कुछ ऐसी शक्तियां थीं जिनके द्वारा वे ये सब किया करते थे। अन्यथा, यदि उनमें ये सब करने की शक्ति नहीं होती तो लोग क्यों उन्हें मानते और उनके अधीनता में आते? और साथ ही जब परमेश्वर ने उनके साथ न जाने, उनसे दूर रहने के लिए निर्देश दिए, तो यह प्रकट है कि उन लोगों की शक्ति परमेश्वर की ओर से नहीं थी, वरन परमेश्वर के बैरी और विरोधी शैतान की ओर से थी।  

 इस संदर्भ में बाइबल से ही कुछ उदाहरणों को देखते हैं:

  • मूसा तथा हारून ने परमेश्वर की आज्ञाकारिता और सामर्थ्य से जो चिह्न फिरौन के सामने दिखाए, फिरौन केपंडितों और टोन्हाकरने वालों ने भी वही करके दिखा दिया (निर्गमन 7:8-12, 19-22; 8:5-7) 
  • परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में भावी कहने वालों, शुभ-अशुभ मुहूर्तों को मानने वालों, टोन्हा करने वालों, और तांत्रिकों, आदि से दूर रहने को कहा (व्यवस्थाविवरण 8:9-14)
  • राजा नबूकदनेस्सर ने अपने दरबार में ज्योतिषी, तन्त्री, टोन्हे, आदि रखे हुए थे; किन्तु अब वे परमेश्वर द्वारा दिखाए गए स्वप्न को नहीं बूझ सके (दानिय्येल 2:2-7; 4:4-7) 
  • शमौन टोन्हा करने वाला लोगों को अपनी विद्या और कार्यों से चकित करता था, और लोग इतने प्रभावित थे कि उसमें ईश्वरीय शक्ति होने की बात करते थे (प्रेरितों 8:9-11) 
  • पौलुस ने एक दासी में से भावी कहने वाली आत्मा को निकाला, जो भावी कहा करती थी (प्रेरितों 16:16-18) 
  • मसीही विश्वास में आने से पहले जादू करने वालों ने मसीही विश्वास में आने के बाद अपनी पुस्तकें लाकर जलाईं (प्रेरितों 19:18-19); अर्थात उनकी विद्या मानी, सीखी, और सिखाई जाती थी। अन्यथा उस समय में जब सभी पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं, तो ऐसी बातों के लिए जो मिथ्या और प्रमाण-रहित थीं, पुस्तकें क्यों लिखी जातीं? उन पुस्तकों की बातों में चाहे सब कुछ न सही, किन्तु कुछ तो यथार्थ होगा, जिसके द्वारा जन-साधारण को प्रभावित एवं वशीभूत किया जाता था।
  • परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस द्वारा थिस्सलुनीकियों को लिखवाई पत्री में मसीही विश्वासियों को सचेत किया कि वे चिह्न-चमत्कारों के पीछे न जाएं, क्योंकि अंत के दिनों में शैतान ऐसे कार्यों के द्वारा लोगों को भटका देगा और विनाश में ले जाएगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने के स्थान पर अलौकिक बातों पर विश्वास किया और झूठ में फंस गए (2 थिस्सलुनीकियों 2:9-12);
  • प्रभु यीशु ने, और पुराने नियम के नबियों तथा नए नियम के प्रेरितों ने तो मुर्दों में प्राण डाले थे; किन्तु अंत के समय में तो यहाँ तक होगा कि शैतान मूरत में भी प्राण डालेगा और उससे बुलवाएगा (प्रकाशितवाक्य 13:14-15)

 

परमेश्वर का वचन इस बात के लिए बहुत स्पष्ट है परमेश्वर की दृष्टि में प्राथमिकता और महत्व परमेश्वर के वचन और उसकी आज्ञाकारिता का है। प्रभु यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश में, एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा दी है, “जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:21-23)। यहाँ प्रभु द्वारा कही गई बातों पर ध्यान दीजिए:

  • जिनके लिए प्रभु ने यह बात कही है, वे प्रभु को संबोधित कर रहे थे, किसी अन्य देवी-देवता या अलौकिक शक्ति को नहीं;
  • वे संख्या मेंबहुतेरेहोंगे, थोड़े से नहीं
  • उन्होंने जो कुछ भी किया, वह प्रभु यीशु के नाम से किया, अपने नाम से या किसी अन्य देवी-देवता के नाम से नहीं;
  • उन्होंने जो कुछ किया, वह वही सब था जो आज पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं सिखाने और फैलाने वाले करने पर ज़ोर देते हैं - भविष्यवाणियाँ करना, दुष्टात्माओं को निकालना, अचंभे के कार्य करना;
  • उन्होंने यह सब थोड़ा सा या कभी-कभार नहीं वरन बहुतायत से किया;
  • उन्होंने यह नहीं कहा किहमने करने के प्रयास किए”, याहमने यह सब करने की लालसा रखी”; वरन यह कि हमने किया! अर्थात ये सभी कार्य उनके द्वारा हुए, उनके ये कार्य लोगों के सामने प्रत्यक्ष थे। 
  • प्रभु यीशु ने उन से यह नहीं कहा कितुमने यह सब करने का प्रयास तो किया किन्तु तुम से हो नहीं सका”; वरन उनके इन दावों को झूठ या गलत न बताने के द्वारा प्रभु ने अप्रत्यक्ष रीति से उनके द्वारा यह सब किए जाने की पुष्टि भी की;
  • किन्तु फिर भी प्रभु ने उन्हें कहामैंने तुम्हें कभी नहीं जानाऔर उन्हें पूर्णतः अस्वीकार कर दिया;
  • प्रभु ने उनके कार्यों को झुठलाया नहीं, वरन उन कार्यों कोकुकर्मकहा।

प्रभु द्वारा उनके लिए कही गई इस अनपेक्षित और कठोर बात का आधार पद 21 के अंत में प्रभु यीशु द्वारा कहा गया वाक्य हैवही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है”; अर्थात इन लोगों में परमेश्वर तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता का स्थान नहीं था। चाहे वे संख्या में बहुत थे, और वे प्रभु के नाम से और बहुतायत से ये सभी भविष्यवाणियाँ, चिह्न और चमत्कार करते थे किन्तु वे परमेश्वर की इच्छा पर नहीं चलते थे, उनकी अपनी ही धारणाएं, अपने ही विश्वास, अपनी ही बातें और शिक्षाएं थीं, जिन्हें वे मानते, मनाते, और मनवाते थे - और अपनी यह मन-गढ़न्त बातें, अपनी मन-मर्ज़ी वे प्रभु परमेश्वर के नाम से बताते, चलाते, सिखाते और दिखाते थे। किन्तु उनके द्वारा अपनी बातों को प्रभु के नाम से बताने, सिखाने, और दिखाने के द्वारा, उनकी बातें प्रभु परमेश्वर की बातें नहीं बन गईं। वे मनुष्यों की बातें और शिक्षाएं थीं, और मनुष्यों ही की रहीं; प्रभु परमेश्वर ने उन्हें कोई महत्व अथवा स्वीकृति नहीं दी, बल्कि न केवल उन्हें पूर्णतः तिरस्कार कर दिया, वरन ऐसा करने वालों को अपने पास से निकाल बाहर भी कर दिया। 

हमारी आत्मिकता का प्रमाण हमारे द्वारा प्रभु परमेश्वर और उसके वचन को दी जाने वाली प्राथमिकता और आज्ञाकारिता है; हम में विद्यमान पवित्र आत्मा के फलों की हमारे जीवन और व्यवहार उपस्थिति है। जो प्रभु के वचन को आदर और महत्व देता है, प्रभु और परमेश्वर पिता उसे आदर और महत्व देते हैं, उसमें और उसके साथ आकर रहते हैं, और परमेश्वर के वचन के प्रति उस व्यक्ति का प्रेम ही परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम का सूचक एवं प्रमाण है (यूहन्ना 14:21, 23)। इसके अतिरिक्त और कोई प्रमाण परमेश्वर ने बाइबल में नहीं दिया है। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो अपने जीवन को जाँच-परख कर देख लीजिए कि परमेश्वर के वचन और आज्ञाकारिता के प्रति आपकी स्थिति, आपके जीवन में उनके लिए प्राथमिकता की दशा क्या है? क्या आप परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण, और उसकी आज्ञाकारिता में जीवन जीने के द्वारा अपनी आत्मिकता को प्रदर्शित एवं प्रमाणित करते हैं; या फिर उन झूठी शिक्षाएं देने वालों और चिह्न-चमत्कारों की बातों पर ज़ोर देने वालों की बातों में फंसे हुए हैं? सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है, बहुत सीधा और स्पष्ट है - जो बातें, कार्य, और व्यवहार लोग पवित्र आत्मा के नाम से करते हैं, क्या प्रभु यीशु मसीह और उनके शिष्यों की बातों, कार्यों, और व्यवहार में वे देखने को मिलती हैं? यदि नहीं, तो फिर क्यों केवल उनके कहने भर से, उनके द्वारा किए जाने वाले विचित्र व्यवहार, उछल-कूद, शोर-शराबे, और बाइबल से बाहर की बातों को पवित्र आत्मा की ओर से करवाया गया माना जाए? क्यों उनकी अपने मन से कही गई बातों को प्राथमिकता दी जाए, और परमेश्वर के अटल और सदा सच्चे वचन की बातों को अनदेखा किया जाए? वास्तविकता को पहचानिए और विनाश से बचने के लिए हर एक गलत शिक्षा से तथा गलत शिक्षा देने वाले की संगति से बाहर निकलकर परमेश्वर तथा उसके वचन के प्रति समर्पित और आज्ञाकारिता का जीवन व्यतीत कीजिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 5-7    
  • 2 यूहन्ना 1

सोमवार, 6 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान – 4

 

आज्ञाकारिता - परमेश्वर की, या मनुष्यों की?

 पिछले लेख में हम देख चुके हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में, उसके प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता ही सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य बात है। कोई मनुष्य अपनी स्वेच्छा से, या अपने बनाए विधि-विधानों, रीति-रिवाज़ों, और तौर-तरीकों से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है। यदि मनुष्य परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहता है, तो उसे वही और वैसा ही करना होगा, जैसा परमेश्वर ने करने को कहा है। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी, वह चाहे कितना भी उत्तम, भक्तिपूर्ण, और मानवीय बुद्धि एवं समझ के अनुसार भला और प्रशंसनीय क्यों न हो, परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है; और इस उद्देश्य के लिए व्यर्थ है। मसीही जीवन और मसीही सेवकाई में भी, तथा मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा द्वारा दिए गए वरदानों के उचित उपयोग में भी यह बात इतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए मसीही विश्वासियों और सेवकाई में लगे लोगों को यह जानना और समझना बहुत आवश्यक, अनिवार्य है कि वे मसीह के नाम में, अपनी इच्छा के अनुसार कुछ करके, परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं, चाहे उनके वे कार्य मनुष्यों की दृष्टि में कितने भी प्रशंसनीय, लोगों के लिए लाभकारी, और भक्तिपूर्ण क्यों न दिखाई दें। 

प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं अपने जीवन से इस आज्ञाकारिता के महत्व को दिखाया, और शिष्यों को सिखाया भी। प्रभु यीशु का समस्त मानवजाति के लिए पापों की क्षमा और उद्धार का मार्ग बनाकर देने के लिए पृथ्वी पर आगमन ही परमेश्वर की इच्छा में, परमेश्वर के वचन में पहले से प्रभु के विषय लिखी गई बातों की पूर्ति के लिए था (इब्रानियों 10:5-7; 1 कुरिन्थियों 15:1-4; लूका 24:44; यूहन्ना 5:39)। अपने पृथ्वी के जीवन के दौरान, प्रभु ने यह स्पष्ट किया कि वह अपनी इच्छा नहीं, वरन परमेश्वर पिता की इच्छा के अनुसार कार्य करता है, जैसा पिता परमेश्वर बताता है, वही कहता है और वैसे ही कार्य करता ही (यूहन्ना 4:34; 5:19, 30; 6:38; 8:28)। इसीलिए प्रभु यीशु को उदाहरण बनाकर मसीही सेवकों के लिए लिखा गया है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है” (फिलिप्पियों 2:5-9) 

प्रभु यीशु के पृथ्वी के समय पर जो लोग परमेश्वर के वचन के ज्ञाता, धर्म के अगुवे, और परमेश्वर के मंदिर के अधिकारी माने जाते थे, उन्होंने परमेश्वर के वचन में, अपनी समझ और इच्छा के अनुसार अपनी ही व्याख्या और अर्थ डाल देने के द्वारा, बहुत सेसंशोधनकर लिए थे, जिससे उनके लिए परमेश्वर के वचन का निर्वाह करना अधिक सुविधाजनक एवं लाभकारी हो जाए। वे लोग जन-सामान्य को अपनी यही व्याख्या और अर्थ सिखाया और समझाया करते थे; और लोगों को यही कहते थे कि जो वो कह रहे हैं, उन्हें वही मानना है और वैसा ही करना है। और आज भी मसीही या ईसाई धर्म के निर्वाह में यही स्थिति देखी जाती है। मत-समुदाय-डिनॉमिनेशंस के अगुवे और अधिकारी जो और जैसा बोल देते हैं, उस मण्डली के लोग वह और वैसा करते हैं। आज भी जन-साधारण के लोगों के लिए परमेश्वर के वचन को जानना और मानना उतना महत्व नहीं रखता है जितना अपने मत-समुदाय-डिनॉमिनेशंस के अगुवे और अधिकारियों की कही बातों और शिक्षाओं को जानना और मानना रखता है। ये लोग यह भूल जाते हैं कि अन्ततः उन्हें अपने न्याय के लिए, अपने जीवन का हिसाब देने के लिए प्रभु यीशु मसीह के सामने खड़े होना पड़ेगा, और उनके साथ ही उनके ये अगुवे और अधिकारी भी अपनी गलत शिक्षाओं एवं धारणाओं के लिए हिसाब देने के लिए प्रभु के सामने खड़े होंगे। क्योंकि हम सभी का न्याय तो परमेश्वर के वचन के अनुसार होगा (यूहन्ना 5:45-46;12:48), न कि किसी मत-समुदाय-डिनॉमिनेशंस के अगुवे और अधिकारियों की बातों और शिक्षाओं के अनुसार।

प्रभु यीशु ने अपने समय के इन धर्म-अधिकारियों की उनके इस व्यवहार के लिए भर्त्सना करते हुए उन्हें कपटी कहा और यशायाह नबी की कही बात स्मरण करवाई, “हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यवाणी ठीक की। कि ये लोग होंठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश कर के सिखाते हैं” (मत्ती 15:7-9)। जब प्रभु के शिष्यों ने प्रभु से कहा कि उन धर्म-अधिकारियों को प्रभु की कही बात रास नहीं आई थी, तो प्रभु ने भी अपने शिष्यों को बता दिया, कि उन धर्म-अधिकारियों की कोई बात बचेगी नहीं, सभी मिटा दी जाएंगीतब चेलों ने आकर उस से कहा, क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई? उसने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा” (मत्ती 15:12-13)। इसीलिए अपने पहाड़ी उपदेश (मत्ती 5-7 अध्याय) में प्रभु ने अपने अनुयायियों से बारंबार उस समय की प्रचलित गलत शिक्षाओं के विषय कहा, “तुम सुन चुके हो”, और फिर उन शिक्षाओं का सही स्वरूप बताते हुए कहापरंतु मैं तुम से कहता हूँ” - प्रभु उन्हें सिखा रहा था कि मनुष्यों द्वारा बताई और सिखाई जाने वाली बातों पर नहीं वरन परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को सीखो और उनका पालन करो। और आज हमें परमेश्वर के वचन को सिखाने और समझाने के लिए प्रभु ने अपना पवित्र आत्मा हम में सर्वदा रहने के लिए प्रदान किया है (यूहन्ना 14:16, 26; 16:13, 14)। यदि हम उसके द्वारा किए गए इस प्रावधान का सदुपयोग नहीं करेंगे, और स्वेच्छा से गलत शिक्षाओं एवं मनुष्यों द्वारा गढ़ी गई बातों के निर्वाह में ही लगे रहेंगे, तो अन्ततः होने वाली हमारी हानि के लिए हमारे अतिरिक्त और कौन ज़िम्मेदार होगा?

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने, अध्ययन करने और सीखने, तथा उसका पालन करने में समय बिताएं। तब ही आप अपनी मसीही सेवकाई का ठीक से निर्वाह करने पाएंगे, पवित्र आत्मा द्वारा आपको इस सेवकाई के लिए दिए गए वरदानों का सही उपयोग करने पाएंगे, और परमेश्वर को प्रसन्न करने वाले तथा उसके लिए उपयोगी ऐसे जन बनने पाएंगे, जिनके साथ प्रभु परमेश्वर रहता है (यूहन्ना 14:21, 23)गंभीरता से विचार कीजिए, यदि स्वयं प्रभु यीशु के लिए अपने समय के धर्म-अधिकारियों के बैर को आमंत्रित करते हुए भी, उनकी सभी गलत शिक्षाओं और मन-गढ़न्त धारणाओं और मनुष्यों की गढ़ी हुई बातों से हट कर, परमेश्वर की आज्ञाकारिता एवं उसके समर्पण का जीवन जीना अनिवार्य था, तो मैं और आप यह करने से कैसे बच सकते हैं? इसलिए, अपने आत्मिक वरदानों के उचित उपयोग के लिए मनुष्यों के नहीं, परमेश्वर के आज्ञाकारी बनिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 3-4    
  • 1 यूहन्ना 5 

रविवार, 5 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 3


परमेश्वर की आज्ञाकारिता याधर्मऔरभलाईके काम?

मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों के विषय अध्ययन करते हुए, हम पिछले दोनों लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर प्रत्येक मसीही विश्वासी को कार्यशील चाहता है, और उसने हर एक के लिए कोई न कोई कार्य पहले से निर्धारित कर रखा है। हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर ने जिसके लिए जो सेवकाई निर्धारित की है, उस सेवकाई को वही व्यक्ति ही ठीक से कर सकता है, चाहे उसे अपने ऊपर तथा अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं पर कितना भी अविश्वास क्यों हो। परमेश्वर द्वारा प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए निर्धारित कार्य को भली-भांति करने, और इस संसार में रहते हुए परमेश्वर के लिए उपयोगी होने, तथा संसार के लोगों के समक्ष मसीही जीवन की सही गवाही प्रदर्शित करने के उद्देश्य से परमेश्वर पिता ने अपने लोगों के लिए एक अद्भुत प्रयोजन किया है। मसीही विश्वासियों में सर्वदा निवास करने और उनका मार्गदर्शन तथा सहायता करने वाला परमेश्वर पवित्र आत्मा, प्रत्येक मसीही विश्वासी को उसकी निर्धारित सेवकाई के लिए कोई न कोई उपयुक्त एवं उपयोगी वरदान भी देता है। इस वरदान की सहायता तथा सही उपयोग के द्वारा मसीही विश्वासी एक सच्चा मसीही जीवन जी सकता है और अपनी निर्धारित सेवकाई को पूरा भी कर सकता है।

शैतान और उसके दूत सदा ही परमेश्वर के कार्यों में बाधा डालने, उन्हें बिगाड़ने, और परमेश्वर की योजनाओं के कार्यान्वित होने में किसी न किसी रीति से रुकावटें लाने के प्रयास में लगे रहते हैं। वे सदा ही संसार के लोगों के समक्ष मसीही विश्वास को व्यर्थ, मसीही जीवन को निरर्थक, तथा सुसमाचार को अप्रभावी एवं अनुपयोगी दिखाने के प्रयास में लगे रहते हैं। अपने इस शैतानी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे कई प्रकार के साधन अपनाते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि वे हर किसी को दुराचारी तथा समाज की दृष्टि में पतित व्यक्ति बनाएं, या बनाए रखें। वे अपने इस उद्देश्य को व्यक्ति कोधर्मी’, ‘धर्मके तथा ‘भलाई’ के कार्य करने वाला, और इन कार्यों के द्वारा लोगों में प्रतिष्ठित एवं उच्च स्थान और मान रखने वाला बना कर भी परमेश्वर का विरोध करने की अपनी युक्तियों और योजनाओं को कार्यान्वित कर सकते हैं - और बहुधा यही करते भी हैं। यह एक बार को बहुत अटपटा और अस्वीकार्य प्रतीत हो सकता है, किन्तु यदि बाइबल में दी गई बातों पर थोड़ी गंभीरता से तथा पिछले लेखों को स्मरण करते हुए विचार करें तो प्रकट हो जाएगा कि यह कहना गलत नहीं है। 

ध्यान कीजिए, सृष्टि के आरंभ में, जब पृथ्वी पर पाप नहीं था, शैतान और उसकी सेनाओं का कोई बोल-बाला नहीं था, आदम और हव्वा परमेश्वर के साथ संगति में तथा परमेश्वर द्वारा उनके लिए लगाई गई अदन की वाटिका में बड़े आनन्द और स्वच्छ मन से रहते थे, ऐसे में शैतान ने संसार में पाप को कैसे प्रवेश दिलाया? उसने हव्वा में वह करने की इच्छा जागृत की जो हव्वा की अपनी बुद्धि और समझ, तथा दृष्टि में अच्छा और लाभदायक था, यद्यपि हव्वा में जागृत हुई वह लालसा परमेश्वर की प्रकट एवं ज्ञात इच्छा के अनुसार नहीं थी। फिर भी हव्वा ने स्वयं भी वह अनुचित कार्य किया, और आदम से भी करवाया; ऐसा कार्य जो चाहे प्रतीत होने में अहानिकारक था, किन्तु वास्तविकता में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं था, और पाप को संसार में प्रवेश मिल गया, संसार पाप और शैतान के चंगुल में फंस गया। मनुष्यों द्वारा किया गया प्रथम पाप परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता था; इसके विपरीत, विचार कीजिए, परमेश्वर ने किस बात को मनुष्यों के द्वारा उसकी भक्ति और सेवा के लिए उसकी दृष्टि में सबसे उत्तम तथा सर्वोपरि कहा है? उत्तर कठिन नहीं है - परमेश्वर ने मनुष्यों से सदा केवल अपनी आज्ञाकारिता ही चाही है। इस संदर्भ में बाइबल से कुछ बातों को देखिए और विचार कीजिए:

  • परमेश्वर द्वारा कही गई बात, और दिए गए निर्देशों के निर्वाह को बाइबल में सभी बलिदानों और भेंटों से अधिक बढ़कर कहा गया है (1 शमूएल 15:22) 
  • परमेश्वर यहोवा ने यशायाह में होकर अपने लोगों इस्राएलियों पर यह स्पष्ट कर दिया कि उसे उनके पर्वों, भेंटों, बलिदानों से घृणा है, क्योंकि वे उसकी आज्ञाकारिता में नहीं चल रहे थे (यशायाह 1:11-19); यहाँ पद 19 में परमेश्वर स्पष्ट कहता है, “यदि तुम आज्ञाकारी हो कर मेरी मानो,... ”
  • पुराने नियम की अंतिम पुस्तक, मलाकी 1:10 में परमेश्वर ने इस्राएल की अनाज्ञाकारिता और मन-मर्ज़ी का जीवन जीने और कार्य करने के संदर्भ में उन से बहुत दुखी मन से कहा, “भला होता कि तुम में से कोई मन्दिर के किवाड़ों को बन्द करता कि तुम मेरी वेदी पर व्यर्थ आग जलाने न पाते! सेनाओं के यहोवा का यह वचन है, मैं तुम से कदापि प्रसन्न नहीं हूं, और न तुम्हारे हाथ से भेंट ग्रहण करूंगाऔर फिर मलाकी के समय से लेकर प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक 400 वर्ष का वह अंधकारमय समय है जब परमेश्वर ने इस्राएलियों से बात करना बंद कर दिया, उन्हें उनकी इच्छाओं पर छोड़ दिया। 
  • प्रभु यीशु मसीह का संसार में आने और समस्त मानवजाति के लिए पापों से मुक्ति तथा परमेश्वर के साथ संगति और सहभागिता पुनःस्थापित करने का मार्ग परमेश्वर की आज्ञाकारिता, तथा बाइबल में लिखी बातों के पूरा करने के द्वारा था (1 कुरिन्थियों 15:1-4; इब्रानियों 10:5-9)
  • प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को बल देकर प्रभु की बातें मानने के लिए कहा (लूका 6:46-49) 
  • जब शिष्यों ने प्रभु के लिए मंडप बनाकर प्रभु को आदर देना चाहा, तो परमेश्वर ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें प्रभु की बातें मानने के लिए कहा (लूका 9:33-35) 
  • प्रभु ने परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए क्रूस की मृत्यु को सहना भी स्वीकार कर लिया (मत्ती 26:38-44) 

      अब उपरोक्त प्रथम पाप के कारण को और परमेश्वर की मनुष्य के लिए इच्छा की बातों को साथ मिलाकर देखिए, तो बात स्पष्ट हो जाएगी। हर वह कार्य जो परमेश्वर की इच्छा से बाहर, मनुष्य की अपनी इच्छा और अपनी ही दृष्टि में भला, उपयोगी, तथा लाभप्रद होने के अंतर्गत किया गया हो, वह परमेश्वर को कदापि स्वीकार नहीं है - चाहे वह भक्ति, श्रद्धा, भलाई, आदि की भावनाओं के अंतर्गत किया गया और मनुष्यों में कितना भी आदरणीय क्यों न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि न केवल यह परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता है, वरन इसलिए भी क्योंकि ऐसे कार्यों में होकर शैतान मनुष्यों के अंदर उनकी स्व-धार्मिकता, उनके द्वारा स्वयं-निर्धारित भलाई के माप-दण्ड, और अन्य मनुष्यों के साथ अपनी तुलना करने औरबड़े-छोटेहोने का आँकलन करने आदि भावनाओं को जागृत करके, अहम तथा अपने कार्यों के लिए घमंड में डाल देता है - यह घमंड चाहे नम्रता और दीनता के आवरण में अप्रत्यक्ष और कितना भी छिपा हुआ क्यों न हो। और कैसा भी, कितना ही लेश-मात्र भी घमण्ड परमेश्वर स्वीकार नहीं करता है; जहाँ जरा सा भी घमण्ड है, वहाँ परमेश्वर का साथ और स्वीकृति कदापि नहीं हो सकते हैं। और इस प्रकार से शैतान लोगों को उनकी धार्मिकता, उनके भले कार्यों, उनके द्वारा मनुष्यों में मान-सम्मान अर्जित करने, मनुष्यों में प्रतिष्ठित होने आदि जैसी बातों की लालसा रखने तथा करते रहने में फंसा कर, परमेश्वर की इच्छा जानने, परमेश्वर का आज्ञाकारी होने, परमेश्वर द्वारा उनके लिए नियुक्त और निर्धारित कार्य को करने से, अर्थात उनकी आशीषों से उन्हें वंचित कर देता है। उस व्यक्ति के लिए परमेश्वर ने जो योजना बनाई और निर्धारित की, उसका पालन करने के स्थान पर, हव्वा के समान, वह शैतान के फुसलाए जाने में आकर अपनी ही दृष्टि में सही और लाभदायक करने के द्वारा, फिर वह आदम और हव्वा के समान ही परमेश्वर के विमुख हो जाता है और शैतान के हाथों की कठपुतली बन जाता है। परिणाम-स्वरूप उसके ये सभीधर्मअथवाभलाईके कार्य परमेश्वर की दृष्टि में अस्वीकार्य (यशायाह 64:6), और जो वरदान परमेश्वर ने उसके लिए रखे हैं, वे सभी व्यर्थ हो जाते हैं। अगले लेख में हम इसे मसीही जीवन के संदर्भ में और विस्तार से देखेंगे।

 यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो अपने जीवन, व्यवहार और कार्यों को जाँचिए कि आप परमेश्वर की इच्छा में होकर, उसकी आज्ञाकारिता में चल रहे हैं कि नहीं? या आप अपनेईसाई धर्मऔर मत-समुदाय-डिनोमिनेशंस के नियमों तथा उनके अगुवों की बातों का निर्वाह करने के आधार पर यह मानकर चल रहे हैं कि आप अपने लिए परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हैं। ध्यान कीजिए, राजा दाऊद ने भी परमेश्वर के नबी नातान की सहमति के साथ परमेश्वर के लिए भवन बनवाना चाहा था, किन्तु परमेश्वर ने इसे तुरंत ही अस्वीकार कर दिया था (1 इतिहास 17:1-4)। हर बात में, हर बात के लिए प्रार्थना में रहकर हर कार्य के विषय परमेश्वर से उसकी इच्छा जानने के बाद ही उस बात को करें। परम्पराएं और धार्मिक रीति-रिवाज़ निभाने के चक्करों में न रहें। आज के ईसाई धर्म और मसीही समाज की अधिकांश परम्पराएं और धार्मिक उत्सव तथा रीतियाँ परमेश्वर द्वारा दी हुई या बाइबल में पाई जाने वाली बातें नहीं, वरन अन्यजातियों के धर्मों में से ईसाई धर्म में अपनाई गई बातें हैं। इसलिए उनके निर्वाह को लेकर अपने आप को परमेश्वर को स्वीकार्य मत समझिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 1-2    
  • 1 यूहन्ना 4

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 2

     

पवित्र आत्मा के वरदानों का उद्देश्य एवं आज्ञाकारिता  

पिछले लेख से मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका के अंतर्गत हमने मसीही विश्वासियों को दिए जाने वाले पवित्र आत्मा के वरदानों के बारे में देखना आरंभ किया है। उन वरदानों को और उनकी आवश्यकता तथा उपयोगिता को समझने के लिए उन वरदानों के उद्देश्य को जानना और समझना आवश्यक है, तब ही सही परिप्रेक्ष्य में रखने के बाद उनकी आवश्यकता तथा उपयोगिता को समझा जा सकता है, और उनके विषय सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं से बचा जा सकता है। इस संदर्भ में हमने पिछले लेख में देखा था कि परमेश्वर सृष्टि के आरंभ से आज तक सृष्टि के निरीक्षण, प्रबंधन, और संचालन से संबंधित विभिन्न कार्यों में कार्यरत है, तथा उसने यह भी निर्धारित किया है कि उसके विश्वासी भी कार्यरत रहें, निठल्ले न रहें। हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर ने अपने प्रत्येक जन के करने के लिए कोई न कोई कार्य पहले से ठहराया है (इफिसियों 2:10); और यहाँ तक कहा है कि यदि कोई जन कार्य न करे तो वह खाने भी न पाए (2 थिस्स्लुनीकियों 3:10-12)

तात्पर्य यह कि मसीही विश्वास का जीवन, आराम से घर पर निष्क्रिय और निष्फल बैठे रहने का नहीं, वरन प्रभु परमेश्वर के लिए कार्य करने और फल लाने का जीवन है। पौलुस ने अपने विषय लिखा, “परन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था” (1 कुरिन्थियों 15:10); “(मैं पागल के समान कहता हूं) मैं उन से बढ़कर हूं! अधिक परिश्रम करने में; बार बार कैद होने में; कोड़े खाने में; बार बार मृत्यु के जोखिमों में” (2 कुरिन्थियों 11:23)। यद्यपि पौलुस, अन्य प्रेरितों की तुलना में प्रभु की सेवकाई के लिए बहुत बाद में आया था, किन्तु उसने अपने अथक परिश्रम के द्वारा अपना स्थान उनके अन्य प्रेरितों के समान बना लिया। और उसने यही करते रहने शिक्षा अपनी पत्रियों में भी दी (1 कुरिन्थियों 4:12; 1 थिस्सलुनीकियों 4:11), और तिमुथियुस को भी यही करने का निर्देश दिया (2 तिमुथियुस 2:1-6; 4:5)

प्रभु ने जो कार्य जिसके करने के लिए निर्धारित किया है, या जिसे जिस कार्य के लिए नियुक्त किया है, उसी कार्य को करने और जैसा प्रभु ने कहा है वैसा ही करने में उस व्यक्ति के लिए आशीष है। बहुत बार प्रभु द्वारा किया गया निर्धारण हमारे मानवीय बुद्धि के अनुसार नहीं होता है, और न ही समझ में आता है। उदाहरण के लिए, यहूदी धर्मशास्त्रों के उच्च शिक्षा प्राप्त किए हुए पौलुस को प्रभु ने अन्यजातियों में प्रचार करने के लिए भेजा (प्रेरितों 9:15; रोमियों 11:13; 15:16; गलातीयों 1:16), जो उन यहूदी शास्त्रों के बारे में कुछ नहीं जानते थे; और अनपढ़ तथा साधारण (प्रेरितों 4:13) मछुआरे, पतरस को यहूदियों में सेवकाई के लिए नियुक्त किया (गलातीयों 2:7-8)। सामान्य मानवीय बुद्धि के अनुसार यहूदियों के मध्य में यहूदियों के शास्त्रों का ज्ञानी और प्रशिक्षित व्यक्ति सबसे उपयुक्त होता, किन्तु परमेश्वर की सोच और योजनाएं मनुष्यों के समान नहीं हैं, वरन कहीं ऊंची हैं (यशायाह 55:8-9)। मनुष्य का कर्तव्य, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के प्रति समर्पण परमेश्वर की कही बात को जैसा वह कह रहा है, वैसा ही करने में है; अपनी इच्छा के अनुसार कुछ करके उसे परमेश्वर के नाम में किया गया कार्य बताने में नहीं है। जब शिष्यों ने प्रभु यीशु से कहा कि वे शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाएं, तो प्रभु ने अपने द्वारा सिखाई गई प्रार्थना में सबसे पहली बात जो उन्हें सिखाई वह थी, “सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो; “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 6:9-10)

यह केवल नए नियम का, या, नए नियम में दिया गया कोई नया सिद्धांत नहीं है, वरन पुराने नियम के समय से चला आ रहा, कभी न बदलने वाले प्रभु परमेश्वर (इब्रानियों 13:8) का स्थापित और अटल सिद्धांत है। यदि इस्राएलियों को मिस्र के दासत्व से मूसा ने छुड़ाना था, तो उसके हर एतराज़ के बावजूद, मूसा को ही उन्हें छुड़ाने के लिए जाना पड़ा (निर्गमन 4 अध्याय); यदि यिर्मयाह को इस्राएलियों के पास अंतिम चेतावनी देने के लिए खड़ा होना था, तो उसकी आयु आदि के बावजूद उसे ही यह सेवकाई करनी पड़ी (यिर्मयाह 1 अध्याय); यदि योना नबी को नीनवे में प्रचार करना था, तो अपने सभी प्रयासों के बावजूद अन्ततः उसे ही नीनवे जाना पड़ा (योना नबी की पुस्तक)। जब परमेश्वर ने नूह को जल-प्रलय से बचाव के लिए जहाज़ बनाने को कहा, तो उस जहाज़ का आकार, लकड़ी, नक्शा, आदि सभी कुछ परमेश्वर ने तय करके दीं, और नूह तथा उसके परिवार से ही उसे बनवा कर तैयार भी किया (उत्पत्ति 6:14-22), उन्हें परमेश्वर द्वारा दिए गए विवरण में कुछ भी परिवर्तन अथवासुधारकरने की कोई अनुमति नहीं थी। जब मूसा को जंगल की यात्रा के दौरान परमेश्वर ने मिलापवाले तंबू को बनाने का दायित्व सौंपा, तो न केवल उसे उसका नमूना दिखाया, वरन पूरे विवरण के साथ सभी वस्तुओं के लिए कौन से चीज़ प्रयोग करने है, किस चीज़ का क्या आकार होगा, उसमें क्या सामग्री लगेगी, आदि सभी कुछ दिखाया और बताया, और साथ ही उन कारीगरों को भी तैयार करके दिया जो इस कार्य में मूसा के निर्देशन में कार्य करेंगे (निर्गमन 35 अध्याय)। साथ ही परमेश्वर ने बारंबार मूसा को सचेत किया कि वह केवल उसे दिखाए और बताए गए नमूने के अनुसार कार्य करेगा, उससे हट कर कुछ नहीं करेगा (निर्गमन 40:16; निर्गमन 35 से 40 अध्याय में लगभग 40 बार परमेश्वर ने मूसा से कहा कि वह केवल उसे बताए और दिखाए गए के अनुसार ही करे, उससे अतिरिक्त कुछ न करे), उस मिलापवाले तंबू में वह अपने आप से कोई परिवर्तन यासुधारनहीं करेगा। 

मनुष्य परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए केवल परमेश्वर की योजना में परमेश्वर की आज्ञाकारिता में ही कार्य कर सकता है, अपनी योजनाओं और तरीकों को परमेश्वर पर थोप कर यह नहीं मान सकता है कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न करने योग्य कुछ कर लिया है (1 शमूएल 15:22)। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं और आपने अपना जीवन प्रभु को समर्पित किया है, तो यह आपके लिए अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के कहे के अनुसार चलें (2 कुरिन्थियों 5:15), न कि परमेश्वर को अपने कहे के अनुसार चलाने का प्रयास करें। आपकी आशीष उसी की आज्ञाकारिता में होकर की गई सेवकाई के निर्वाह से है, अन्य कुछ करने से नहीं। परमेश्वर ने आपके लिए जो कार्य और सेवकाई निर्धारित की है, उसी के निर्वाह और पूर्ति के लिए आपको सक्षम तथा योग्य करने के लिए, उसके लिए आप को उपयोग करने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा उपयुक्त वरदान भी देंगे। पवित्र आत्मा के द्वारा दिए गए वरदानों का उद्देश्य आप से परमेश्वर द्वारा आपके लिए निर्धारित सेवकाई को, उसके कहे के अनुसार, भली भाँति करवाना है, जिससे अन्ततः आप ही परमेश्वर की आशीषों और प्रतिफलों के भागी हो सकें।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 47-48   
  • 1 यूहन्ना 3