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शुक्रवार, 11 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (27)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (8) - सही सुसमाचार के 7 प्रभाव (2)  

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा; फिर हमने गलातीयों 1 अध्याय से वास्तविक सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखा है, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें; और उसके बाद गलातीयों 1 और 2 अध्याय से असली सुसमाचार के मानने से व्यक्ति के जीवन में होने वाले 7 प्रभावों को देखना आरंभ किया। पिछले लेख में हमने अध्याय 1 में से इनमें से पहले दो प्रभाव देखे हैं। शेष पाँच प्रभाव अध्याय 2 में हैं, जिन्हें हम आज के लेख में देखेंगे।

असली सुसमाचार के 7 प्रभाव:

पिछले लेख में हम गलातीयों 1 अध्याय से असली या सही सुसमाचार के द्वारा प्रभु यीशु के सच्चे विश्वासी जन और उसकी वास्तविक कलीसिया में आने वाले पहले दो प्रभावों को देख चुके हैं। इनमें से पहला प्रभाव है कि सही या वास्तविक सुसमाचार व्यक्ति को मनुष्यों के नहीं परमेश्वर के भय और आज्ञाकारिता में चलने, हर परिस्थिति और हर कीमत पर केवल परमेश्वर ही को प्रसन्न करने की मनसा में बने रहने की सामर्थ्य और मार्गदर्शन देता है, और मनुष्यों के एहसान, नियंत्रण, तथा अधीनता में रहने के स्वभाव से मुक्त करता है। और दूसरा प्रभाव है कि सही या असली सुसमाचार परमेश्वर के लोगों के मध्य परस्पर प्रेम, मेल-मिलाप, सहभागिता, सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, एक दूसरे के लिए परमेश्वर की महिमा करने को प्रेरित करता है, न कि विभाजन, बैर, अलगाव और विरोध तथा एक-दूसरे से ऊँचा-नीचा होने की भावनाओं को। आज हम यहाँ से आगे, सही या असली सुसमाचार के शेष पाँच प्रभाव, गलातीयों 2 अध्याय से देखेंगे:

3. गलातीयों 2:1-2 - सही सुसमाचार का तीसरा प्रभाव हम पौलुस की सेवकाई के उदाहरण में देखते हैं। पौलुस को परमेश्वर ने अन्य-जातियों में सुसमाचार सुनाने के लिए ठहराया था (प्रेरितों 9:15)। परमेश्वर की अगुवाई में चौदह वर्ष तक अन्य-जातियों में सेवकाई के बाद परमेश्वर ने उसे यरूशलेम जाने के लिए कहा, और वह बरनबास तथा तीतुस के साथ यरूशलेम को गया। तीसरा प्रभाव है कि सही सुसमाचार के पालन और सेवकाई से परमेश्वर की सहायता, उस का मार्गदर्शन मिलता है, और परमेश्वर का जन औरों के साथ मिलकर, औरों को भी आदर और अवसर देते हुए अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभाता है
 
4. चौथा प्रभाव भी हम गलातीयों 2:1-2 में ही देखते हैं। यहाँ दो पद बताता है कि ईश्वरीय प्रकाशन के अनुसार पौलुस यरूशलेम को गया, इस उद्देश्य से कि उन्हें अपनी सेवकाई और प्रचार के बारे में बताए - उन्हें सिखाने या उन्हें प्रभावित करने के लिए नहीं, वरन यरूशलेम में कलीसिया में बड़े समझे जाने वाले लोगों के द्वारा जाँचे जाने के लिए कि कहीं उसका परिश्रम व्यर्थ तो नहीं है (पद 2 का अंतिम वाक्य देखिए)। सही सुसमाचार का चौथा प्रभाव है कि उसके अनुसार चलने वाला व्यक्ति विनम्र और इस सेवकाई में लगे अन्य वरिष्ठ लोगों द्वारा जाँचे तथा सुधारे जाने के लिए तैयार रहता है; उसमें घमण्ड और अपनी सेवकाई में सिद्ध होने की भावना नहीं होती है
 
5. गलातीयों 2:3-5 - सही सुसमाचार के अनुसार चलने और कार्य करने के द्वारा प्रभु का जन और कलीसिया, “झूठे भाइयों”, मण्डली में गलत शिक्षाओं को लाने और फैलाने वाले लोगों पहचानने पाते हैं, और उनका सामना करने, उनके आगे न झुकने की समझ और सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। सही सुसमाचार का पाँचवां प्रभाव है सही और गलत का आँकलन करने और सही पर बने रहने तथा गलत का प्रतिरोध करने की सामर्थ्य प्राप्त करना 

6. गलातीयों 2:6-10 - हम यहाँ 6 पद के आरंभ से ही देखते हैं कि यरूशलेम में कलीसिया के अगुवों के द्वारा पौलुस को कोई भी नई बात सीखने को नहीं मिली; उसके सुसमाचार प्रचार और सेवकाई में कोई त्रुटि नहीं थी। लेकिन फिर भी प्रभु उसे यरूशलेम लेकर आया था, उसे अपनी सेवकाई को उन अगुवों के सामने रखने के लिए कहा था। लेकिन 9 पद में हम उसके आने से हुए लाभ को देखते हैं - जब यरूशलेम के अगुवों ने उसकी सेवकाई के बारे में जान और समझ लिया, तो उसे अपने साथ सम्मिलित भी कर लिया, प्रोत्साहित भी किया और अपना सहकर्मी भी स्वीकार कर लिया; और 10 पद में सेवकाई में ध्यान रखने वाली मूल बातों के विषय स्मरण करवाया। पौलुस का यरूशलेम आना हमारी शिक्षा के लिए भी था - कि हम उसके जीवन और व्यवहार से सेवकाई और सुसमाचार के प्रभावों को सीख सकें। सही सुसमाचार के पालन का छठवाँ प्रभाव है वह अन्य स्थानों तथा लोगों के मध्य लगे लोगों के प्रति भी सहभागिता और सहायता के लिए प्रोत्साहित करता है, उन्हें भी सेवकाई के लिए मार्गदर्शन करता है 

7. गलातीयों 2:11-14 - पौलुस के यरूशलेम से वापस लौट जाने के कुछ समय बाद अब पतरस उसके पास अन्‍ताकिया गया। किन्तु वहाँ पर पतरस के व्यवहार को लेकर एक परिस्थिति उत्पन्न हो गई और पतरस दोगलेपन में गिर गया। यह आज हमको सचेत करता है कि प्रभु के बड़े से बड़े सेवक भी गलती में पड़ सकते हैं, मनुष्यों को दिखाने के लिए अपना व्यवहार बदल सकते हैं, जो औरों के लिए ठोकर का कारण भी बन सकता है। इसलिए व्यक्ति की शारीरिक और आत्मिकआयुके अनुसार या कलीसिया में उसके ओहदे के अनुसार नहीं, वरन उसके व्यवहार के अनुसार, हर बात के लिए आँकलन करते रहना चाहिए। लेकिन पौलुस ने पतरस को इस दोगलेपन में बने नहीं रहने दिया, वरन तुरंत ही उसका सामना किया, और उसे सुधारा। पतरस ने भी इस बात का बुरा नहीं माना, इससे अपने अहं पर ठेस नहीं आने दी, और आगे चलकर अपनी पत्री में पौलुस को अपनाप्रिय भाईकहा और उसके दर्शन एवं सेवकाई के लिए उसकी प्रशंसा की (2 पतरस 3:15-16)। सही सुसमाचार के पालन ने पतरस को भी विनम्र और सुधार के लिए तत्पर बना दिया था। किन्तु पौलुस की प्रतिक्रिया पतरस के विनम्र होने पर आधारित नहीं थी; पौलुस की बात के लिए पतरस उसे जो भी प्रतिक्रिया देता, पौलुस उसे सुनने और सहने के लिए तैयार था; किन्तु मण्डली में किसी गलत व्यवहार और उदाहरण को सहन करने के लिए तैयार नहीं था। सही सुसमाचार का सातवाँ प्रभाव है कि वह व्यावहारिक मसीही जीवन में होने वाली गलतियों को पहचानने और उन्हें सुधारने के लिए औरों का सामना करने की हिम्मत और सामर्थ्य देता है; उनके ओहदे या स्तर के भय कारण गलतियों के प्रति आँख मूँद लेने, और प्रभु के जन को उन में बने ही रहने देने वाला नहीं होने देता है 

सही और असली सुसमाचार से संबंधित इन लेखों का सारांश यही है कि सही और सच्चा सुसमाचार परमेश्वर की ओर से, उसके अनुग्रह, उसकी शांति, और उसकी समझ और बुद्धि और ज्ञान और सामर्थ्य के साथ आता है। सही सुसमाचार पूर्णतः प्रभु यीशु मसीह द्वारा समस्त मानव जाति को उनके किन्हीं कर्मों के द्वारा नहीं परंतु अपनी क्षमा और अनुग्रह के द्वारा पापों से छुटकारा देने के लिए क्रूस पर दिए गए बलिदान के बारे में है; इसमें किसी भी मनुष्य के कैसे भी कोई भी योगदान या काम का कोई भी स्थान नहीं है - लेश-मात्र भी नहीं। सही सुसमाचार का निर्वाह संसार की बुराइयों से छुड़ाता है, मसीही विश्वासियों में प्रेम, एक-मनता, सहभागिता, संगति, एक-दूसरे को उभारने, उठाने और सुधारने को प्रोत्साहित करता है; विभाजन और अलगाव नहीं मेल-मिलाप लाता है। सही सुसमाचार के प्रचार और निर्वाह के द्वारा प्रभु परमेश्वर की महिमा होती है। जिस भी सुसमाचार में, सुसमाचार की सेवकाई और प्रचार में, ये स्वभाव और प्रभाव नहीं हैं, वहकोई अन्य ही सुसमाचारहै, गलत और झूठा है, उसका तिरस्कार करके सही को अपनाना अनिवार्य है। 

अभी तक हम इफिसियों 4:14 के अनुसार प्रभु की कलीसिया और उसके अपरिपक्व अनुयायियों के शैतान के द्वारा प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर पवित्र आत्मा, और सुसमाचार से संबंधित फैलाई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं और उन शिक्षाओं के कारण प्रभु के लोगों केमनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से उन के भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की, हर एक बयार से उछाले, और इधर-उधर घुमाएजाने, तथा उन्हें पहचानने और उससे बचने के वचन में दिए गए उपायों के बारे में देखते आ रहे थे। अगले लेख से हम इफिसियों 4:15-16 से कलीसिया और मसीही विश्वासी के परिपक्व होने, उस परिपक्वता में बढ़ने के बारे में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

   

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 14-16          
  • मरकुस 12:28-44  

गुरुवार, 10 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (26)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (7) - सही सुसमाचार के 7 प्रभाव (1)  

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा। पिछले लेख में हमने गलातीयों 1 अध्याय से वास्तविक सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखा है, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें; और आज हम गलातीयों 1 और 2 अध्याय से असली सुसमाचार के मानने से व्यक्ति के जीवन में होने वाले 7 प्रभावों को देखना आरंभ करेंगे। इनमें से पहले दो प्रभाव अध्याय 1 में हैं, जिन्हें हम आज देखेंगे, और शेष पाँच प्रभाव अध्याय 2 में हैं, जिन्हें हम इससे अगले लेख में देखेंगे। साथ ही आज हम सबसे पहले भ्रष्ट सुसमाचार के कारण होने वाले दुष्प्रभाव, और उसे अपने आप को जाँचने के लिए प्रयोग करने को भी देखेंगे। 

भ्रष्ट सुसमाचार का दुष्प्रभाव:

परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस प्रेरित ने गलातीयों 1:8-9 में लिखा कि प्रभु यीशु के मूल और वास्तविक सुसमाचार को यदि कोई भ्रष्ट करता है, या उसे बिगाड़ता है, तो वह श्रापित है - वह चाहे स्वर्गदूत हो या फिर चाहे स्वयं पौलुस ही क्यों न हो। सुसमाचार में किसी भी प्रकार की मिलावट करना, उसे बिगाड़ना, और भ्रष्ट करना है, और ऐसा करना परमेश्वर की आशीषों को हटा कर उनके स्थान पर परमेश्वर से श्राप ले आता है। इसलिए यदि किसी मसीही विश्वासी के जीवन में अथवा कलीसिया में आशीषों का आना रुक गया है, श्राप और आत्मिक पतन दिखाई देने लगा है, किन्तु ऐसा होने का कोई कारण प्रकट नहीं है, तो उस व्यक्ति अथवा कलीसिया को रुक कर अपने व्यावहारिक मसीही जीवन और कार्यों का पुनःअवलोकन कर लेना चाहिए कि उन्होंने कहीं किसी सिद्धांत (doctrine), विश्वास (belief), या व्यवहार (practice) में कुछ ऐसा तो नहीं किया है जिससे उनके द्वारा प्रचार किया जाने वाले और जिए जाने वाले सुसमाचार में कोई मिलावट या सांसारिकता की बात घुस आई है, किसी रीति से संसार के साथ कोई समझौता हो रहा है, और सुसमाचार अपने मूल स्वरूप से भ्रष्ट हो रहा हो, जिससे परमेश्वर की आशीष के स्थान पर उन्हें उसके श्राप का सामना करना पड़ रहा है। सुसमाचार को अप्रभावी करने वाली शैतान की आम तौर से प्रयोग की जाने वाली बातों को हम 8 मार्च के लेख में देख चुके हैं। यदि इन बातों में से कोई, या कोई और बात जिससे कहीं पर भी कोई भी मिलावट, समझौता, या किसी भी अन्य बात के द्वारा सुसमाचार में कोई भी बिगाड़ पता चलता है, तुरंत उस बात के लिए पश्चाताप और क्षमा माँगकर उसे ठीक कर लें (1 यूहन्ना 1:9), इससे पहले कि किसी भारी ताड़ना या हानि में पड़ जाएं।   

असली सुसमाचार के 7 प्रभाव:

  1. गलातीयों 1:10-19 : जैसा हमने पिछले लेख में इस अध्याय के पहले पद से देखा था, पौलुस इस बात में स्पष्ट और दृढ़ था कि उसकी मसीही सेवकाई, उसका प्रेरित होना प्रभु परमेश्वर की ओर से था, किसी मनुष्य की ओर से नहीं, जैसा वह यहाँ 13-15 पद में कहता है। और उसके द्वारा प्रचार किया जाने वाला सुसमाचार संदेश भी उसे परमेश्वर ही से मिला था न कि किसी मनुष्य से (पद 11-12)। इसलिए उसकी सेवकाई का उद्देश्य किसी मनुष्य को प्रसन्न करना नहीं, केवल और केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना था, चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े (पद 10)। एक बार जब वह प्रभु परमेश्वर की ओर से अपनी नियुक्ति के विषय स्पष्ट और स्थापित हो गया, और उसने प्रचार के लिए सुसमाचार संदेश परमेश्वर से प्राप्त कर लिया, फिर इसके लिए उसने किसी भी मनुष्य की, वह चाहे कोई भी हो, सलाह लेना और उसके अनुसार कार्य करना स्वीकार नहीं किया (पद 16-19)असली सुसमाचार का पहला प्रभाव है कि उसका पालन करने वाला, मनुष्यों को नहीं वरन हर कीमत पर परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला होता है; और मनुष्यों के नहीं वरन परमेश्वर के परामर्श और मार्गदर्शन के अनुसार परमेश्वर द्वारा सौंपी गई सेवकाई का निर्वाह करता है। 
  2. गलातीयों 1:20-24 : इन पदों में हम असली सुसमाचार का दूसरा प्रभाव देखते हैं। जैसा पौलुस ने अपने विषय यहाँ पद 13-14 में लिखा, प्रभु यीशु का अनुयायी बनने से पहले वह प्रभु की कलीसिया को सताने वाले के रूप में जाना जाता था, और उसकी यह ख्याति दूर-दूर तक पहुँच चुकी थी (पद 23)। किन्तु साथ ही अब उन्हीं स्थानों पर उसकी यह ख्याति भी पहुँच चुकी थी कि अब वह प्रभु के लोगों को सताने वाला नहीं वरन प्रभु के सुसमाचार का प्रचार करने वाला बन गया था। इन पदों में जिनका उल्लेख है, उन स्थानों के वे लोग उससे कभी मिले नहीं थे, उन्होंने बस उसके बारे में सुना ही थी - पिछला बुरा व्यवहार भी और अब परिवर्तन के बाद का भला व्यवहार भी। किन्तु उससे न मिलने के बावजूद, पद 24 में लिखा है कि वे कलीसियाएं अबमेरे विषय में परमेश्वर की महिमा करती थींयही असली सुसमाचार का दूसरा प्रभाव है - उसके पालन करने से विभाजन और बैर या दूरियाँ नहीं आतीं, किसी दूसरे की सेवकाई को लेकर ईर्ष्या या जलन उत्पन्न नहीं होती है; वरन आपस में प्रेम, मेल-मिलाप, और एक दूसरे के लिए आनन्दित होने तथा परमेश्वर की महिमा करने का भाव आता है। दूसरा प्रभाव है कि असली सुसमाचार विभिन्न कलीसियाओं या विभिन्न व्यक्तियों के मध्य में विभाजन की दीवारें खड़ी नहीं करता है, एक-दूसरे से पृथक रहने के बहाने नहीं प्रदान करता है, वरन दीवारों को गिरा देता है, एक-दूसरे के दिलों तक मार्ग बना देता है, मेल करवा देता है। 

अगले लेख में हम गलातीयों 2 अध्याय से असली सुसमाचार के शेष पाँच प्रभावों को देखेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 11-13          
  • मरकुस 12:1-27

बुधवार, 9 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (25)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (6)

सही सुसमाचार के 7 गुण 

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा। आज हम वास्तविक सुसमाचार के गुणों को देखेंगे, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें।

कलीसिया के आरंभ से ही शैतान ने गलत शिक्षाओं और झूठे प्रचारकों के द्वारा सुसमाचार को बिगाड़ना, उसे अप्रभावी बनाने वाली बातों के साथ मिलाकर लोगों में फैलाना आरंभ कर दिया था। उसका उद्देश्य यही था कि लोगों को भ्रामक बातों में फँसा कर, उन्हें धर्मी, वचन का पालन करने वाले, और प्रभु के खोजी होने के, आदि भ्रम में फँसाए रखे, और सच्चे सुसमाचार से दूर रखे। ऐसा होने से वे उद्धार से वंचित रह जाएंगे, यद्यपि उन्हें यही लगता रहेगा कि वे भी उद्धार पाए हुए हैं, स्वर्ग में जाने के योग्य हैं। किन्तु साथ ही परमेश्वर पवित्र आत्मा ने अपनी प्रेरणा से प्रभु के शिष्यों द्वारा उन बातों को भी लिखवा दिया तथा उपलब्ध करवा दिया, जो शैतान के इस झूठ को प्रकट करती हैं, और असली सुसमाचार की पहचान करवाती हैं, जिससे जो भी वचन को सच्चे समर्पित मन से, पवित्र आत्मा से सीखने का इच्छुक होगा, वह इस असली-नकली की पहचान को जान लेगा। पवित्र आत्मा की प्रेरणा से पौलुस प्रेरित ने गलातीयों की मण्डली को लिखी पत्री का आरंभ करते हुए कहा:मुझे आश्चर्य होता है, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उस से तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं: पर बात यह है, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं” (गलातियों 1:6-7)। गलातीयों की पत्री, इसी विषय, अर्थात सही सुसमाचार, गलत सुसमाचार, सुसमाचार से भटकना आदि बातों पर ही लिखी गई है, और इस पत्री के 1 और 2 अध्याय, वास्तविक सुसमाचार की पहचान करवाते हैं, प्रभु यीशु के असली सुसमाचार के गुण या स्वभाव, और प्रभावों का यहाँ पर वर्णन किया गया है।

हर नकली उत्पाद को बनाने वाले उस नकली को उसके असली मूल उत्पाद के समान ही दिखने वाला बनाते हैं, साथ ही उस नकली के असली के समान ही कार्य करने और प्रभावी होने के बात करते हैं। अर्थात उस के गुण यास्वभाव”, और उसकेप्रभावहमें असली और नकली की पहचान करवाते हैं। यही असली और नकली सुसमाचार के लिए भी सही है। आज हम असली सुसमाचार के गुणों, अर्थात उसके स्वभाव के बारे में देखेंगे। 

असली सुसमाचार के 7 गुण या स्वभाव:

  1. पौलुस इस पत्री का आरंभ अपनी सेवकाई और बुलाहट से आरंभ करता है। वह गलातीयों 1:1 में अपने पाठकों को यह स्पष्ट कर देता है कि उसकी नियुक्ति परमेश्वर के द्वारा है, न कि मनुष्यों की ओर से। क्योंकि यह उसके मसीही जीवन का दृढ़ सत्य था, इसीलिए उसकी वफादारी भी केवल और केवल प्रभु परमेश्वर के ही प्रति थी, अन्य किसी के प्रति नहीं। सच्चे सुसमाचार के प्रचारक का पहला गुण है कि वह न केवल परमेश्वर की ओर से अपनी सेवकाई के लिए नियुक्त होने का दावा भी करेगा, वरन उस दावे को जी कर के भी दिखाएगा। सही सुसमाचार का प्रचार करने वाले प्रचारक के व्यवहारिक जीवन में परमेश्वर के प्रति वफादारी और जवाबदेही, तथा सांसारिकता की बातों, संसार से प्रशंसा, बड़ाई, यश आदि से अलगाव भी दिखाई देगा।
  2. गलातियों 1:2 से प्रकट है कि सही सुसमाचार के प्रचारकों में बड़े-छोटे की भावना नहीं होगी; वह अपने सभी सहकर्मियों को, प्रभु की सेवकाई में लगे लोगों को समान आदर के साथ रखता है, सभी के साथ मेल-मिलाप रखते हुए, उन्हें भी अपनी सेवकाई का महत्वपूर्ण भाग बताता है, केवल अपने आप को ही बड़ा या मुख्य दिखाने के प्रयास नहीं करता है। 
  3. गलातियों 1:3 में पौलुस सही सुसमाचार का तीसरा गुण या स्वभाव लिखता है - वास्तविक सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह की शांति और अनुग्रह के साथ आता है। अर्थात उस संदेश और उसके पालन से अनबन, विभाजन, फूट, बैर, टकराव, आदि नहीं होते; वरन वह हमेशा प्रेम, मेल-मिलाप, क्षमा, एकता, दीनता, नम्रता आदि मसीही गुणों के साथ आता है, जबकि नकली इसके विपरीत बातों के साथ आता है।
  4. गलातीयों 1:4 में वास्तविक सुसमाचार का चौथा स्वभाव दिया गया है, वह हमारे पापों से छुटकारे के लिए प्रभु यीशु के द्वारा दिए गए बलिदान का प्रचार करता है न कि मनुष्यों के अपने किसी कार्य या कर्मों के अनुसार भला बनने और उद्धार पाने का। साथ ही वह सांसारिक बातों, धन-संपत्ति, भौतिक समृद्धि, शारीरिक चंगाइयों, आदि का नहीं, और मसीह यीशु में विश्वास के द्वारा पापों की क्षमा पर बल देता है, उसे ही मुख्य विषय बनाए रखता है। साथ ही वह प्रभु यीशु मसीह के जीवन से परमेश्वर के प्रति मृत्यु सहने तक आज्ञाकारी होने के लिए भी सिखाता है (इब्रानियों 12:1-4; प्रकाशितवाक्य 2:10) 
  5. गलातियों 1:5 में सही सुसमाचार के प्रचार और प्रचारक का पाँचवां गुण दिया गया है, उसके द्वारा सदा ही प्रभु यीशु मसीह की स्तुति और बड़ाई, उसी की प्रशंसा, महिमा और गुणगान का प्रचार होगा, किसी मनुष्य का नहीं।
  6. गलातियों 1:6 सचेत करता है कि कोई भी सच्चा मसीही विश्वासी अपने आप को आवश्यकता से अधिक सिद्ध या स्थिर न समझ ले, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 10:12 में भी लिखा गया है। यहाँ ध्यान कीजिए, कोई अविश्वासी नहीं अपितु, गलातिया की मसीही मण्डली के लोग, प्रभु के विश्वासी जन हीऔर ही सुसमाचारमें अर्थात गलत सुसमाचार में बहकाए और भरमाए गए थे। सही सुसमाचार का छठवाँ स्वभाव है कि वह सदा ही मनुष्य को उसकी दुर्बलता के बारे में, और प्रभु के सच्चे विश्वासी जन को सदा हर बात के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने, परमेश्वर के वचन से जाँचते रहने, और उसी के अनुसार चलने के लिए कहेगा। वह कभी किसी को भी अपने आप पर, अपनी बुद्धि और युक्ति पर भरोसा रखने और अपनी समझ या संसार की सलाह, संसार को सही लगने वाली बात के अनुसार करने को नहीं कहेगा।
  7. सही सुसमाचार का सातवाँ गुण है कि उससे लोगों में डर या घबराहट नहीं आती; ऐसा करना सुसमाचार को बिगाड़ने वालों का काम है। गलत सुसमाचार वाले लोग विभिन्न प्रकार के डर-भय दिखा कर लोगों को अपनी बातों का पालन करने के लिए बाध्य करते हैं। जब कि असली सुसमाचार लोगों को परमेश्वर की संतान होने के लिए प्रेरित करता है (यूहन्ना 1:12-13), पापों के दंड उठाने से मुक्ति पाने (रोमियों 8:1-2), और आशीषित अनन्त जीवन की बात करता है (मत्ती 19:19; 1 कुरिन्थियों 2:9), तो फिर उससे घबराहट या भय क्यों आएगा? नाहक ही भय और घबराहट उत्पन्न करना, लोगों को बाध्य करना, शिक्षाओं की जाँच-पड़ताल करने से रोकना शैतान और उसकी बातों का गुण है, प्रभु और उसके सुसमाचार का नहीं। 

सच्चे सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखने के बात, हम उसके प्रभाव को अगले लेख में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 8-10          
  • मरकुस 11:20-33 

मंगलवार, 8 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (24)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार के विषय गलत शिक्षाएं (5 ) - सुसमाचार को अप्रभावी - कैसे? (2)

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेख में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था। आज हम सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखेंगे।  

सुसमाचार को अप्रभावी करने के लिए शैतान की गलत शिक्षाएं और बातें

हमने पिछले लेख में देखा था कि सुसमाचार का सार 1 कुरिन्थियों 15:1-4 में दिया गया है। तात्पर्य यह, कि जिस भी सुसमाचार प्रचार में इन पदों की बातें नहीं हैं, या इन पदों की बातों के अतिरिक्त भी बातें डाली गई हैं, अर्थात, इन पदों में से कुछ घटाया या बढ़ाया गया है, वहसुसमाचारभ्रष्ट है, बिगाड़ा हुआ है, अस्वीकार्य है, क्योंकि वह अप्रभावी है! ये पद और उनके तथ्य हमारे लिए सुसमाचार संबंधित हर शिक्षा को जाँचने और परखने की कसौटी प्रदान करते हैं।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए, हम संक्षेप में देखेंगे कि शैतान किस प्रकार से अपनी युक्तियों में हमें फंसा कर, परमेश्वर की बात से हमारा ध्यान अपनी बात की ओर लाकर और उसे मनवाकर, हमारे लिए सुसमाचार को अप्रभावी कर देता है:

  • सुसमाचार केवल गैर-मसीहियों के लिए, जो ईसाई नहीं हैं, उन्हीं के लिए है: वास्तविकता में सुसमाचार संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिए है, चाहे उसका धर्म, धारणा, मान्यता कुछ भी हो; ईसाइयों या मसीहियों के लिए भी (प्रेरितों 17:30-31)। सभी को उसके लिए व्यक्तिगत रीति से निर्णय लेना है। 
  • ईसाई धर्म और उससे संबंधित रीतियों के निर्वाह से सुसमाचार का भी पालन हो जाता है: वास्तविकता में किसी भी प्रकार की कोई भी औपचारिकता के निर्वाह के द्वारा सुसमाचार का पालन नहीं होता है। सुसमाचार का व्यक्ति के जीवन में कार्यकारी होना उसके सच्चे समर्पित मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप और प्रभु यीशु से पापों के क्षमा माँगकर उसे समर्पित हो जाने से आरंभ होता है।
  • प्रभु यीशु मसीह से चंगाई प्राप्त करना भी सुसमाचार पर विश्वास करने और प्रभु का जन हो जाने का प्रमाण है: प्रभु यीशु ने जिसने चाही, उन सभी चंगाई दी, किसी से कोई भेदभाव नहीं किया (प्रेरितों 10:38)। किन्तु जिन्हें प्रभु ने चंगा किया था, पिलातुस एक सामने वे ही लोग बहुत ज़ोर देकर उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने की माँग करने लगे, और उसे क्रूस पर मरवा दिया। वे अपने स्वार्थ के लिए यीशु के जुड़े साथ हुए थे; सच्चे मन से प्रभु को समर्पण नहीं किया था; प्रभु के जन नहीं बने थे। 
  • प्रभु यीशु मसीह और उसके वचन के बारे में ज्ञान में बढ़ना, सुसमाचार का पालन करने के समान है: बाइबल और प्रभु परमेश्वर के बारे में सांसारिक ज्ञान की बहुत सी बातें और शिक्षाएं हैं उपलब्ध और प्रचलित, और यह ज्ञान लोगों को विश्वास में नहीं लाता है, परमेश्वर और उसके वचन पर संदेह उत्पन्न करके उन से दूर करता है। इसी प्रकार से बाइबल कॉलेज और सेमनरियों से शिक्षा पाने वाला हर जन प्रभु का सच्चा समर्पित विश्वासी नहीं होता है। बहुत से लोगों के लिए यह शिक्षा-दीक्षा केवल नौकरी करने और सांसारिक कमाई का एक साधन है। न वे स्वयं प्रभु को समर्पित होते हैं, न औरों को यह सिखाते हैं; वरन धर्म-कर्म-अनुष्ठानों की औपचारिकता के निर्वाह के द्वारा ही काम चलाते रहने की शिक्षाओं में उलझे और उलझाए रखते हैं। वे स्वयं भी नरक के भागी हैं, और जाने कितनों को नरक का भागी बना दे रहे हैं। 
  • चंगाइयों और आश्चर्यकर्मों को करना प्रभु की सामर्थ्य का और प्रभु के सुसमाचार के पालन करने का प्रमाण है: इस धारणा को मानने वालों को मत्ती 7:21-23 पर बहुत गंभीरता से ध्यान और मनन करना चाहिए। मत्ती में उल्लेखित उन लोगों ने प्रभु यीशु के नाम से बहुत कुछ किया, किन्तु प्रभु यीशु ने अंत में उन्हेंकुकर्म करने वालेकह दिया, और यह भी कह दिया कि प्रभु ने उन्हें कभी नहीं जाना था। यहूदा इस्करियोती भी अन्य शिष्यों के साथ प्रचार और चंगाई की सेवकाइयों में गया था, इन अभियानों में सम्मिलित होकर कार्य किया था, और किसी को भी उस पर कभी संदेह नहीं हुआ। किन्तु उसमें इस सामर्थ्य के होने और उसके द्वारा इसे उपयोग करने के बावजूद, न तो उसका जीवन बदला, और न ही वह वास्तव में कभी प्रभु का जन बना; अन्ततः उसे धोखा देकर पकड़वा दिया, मरवा दिया। ये बातें सुसमाचार को मानने का प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि शैतान भी ऐसी ही बातों के द्वारा लोगों को भरमाता है, तथा प्रभु भी इन बातों में रुचि और विश्वास रखने वालों को उन आत्माओं के वक्ष में कर देता है (2 थिस्सलुनीकियों 2:9-11) 
  • सुसमाचार प्रचार में मनुष्यों के ज्ञान और समझ को मिलाना भी सुसमाचार को व्यर्थ और अप्रभावी कर देता है: पिछले लेख में कही गई निर्गमन 20:24-25 की बात को ध्यान कीजिए - जहाँ मनुष्य परमेश्वर की बात को सुधारने और सँवारने का प्रयास करते हैं, उसे अशुद्ध और अनुपयोगी कर देते हैं। पौलुस ने अपनी सेवकाई के विषय लिखा, “क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे” (1 कुरिन्थियों 1:17)। सुसमाचार को उसकी सादगी, स्पष्टता, और शुद्धता में, जैसा वह है, वैसा ही दिया जाना है; अन्यथा मनुष्य की किसी भी बात की मिलावट के द्वारा वह अशुद्ध और अप्रभावी, परमेश्वर के उद्देश्यों के लिए अनुपयोगी हो जाता है। 

·        सुसमाचार में भले कार्यों का योगदान सिखाना भी उसे भ्रष्ट और अप्रभावी करना है। वचन में यह स्पष्ट लिखा और सिखाया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के भले कार्यों के द्वारा या कैसे भी कर्मों से उद्धार नहीं पा सकता है; यह केवल और केवल विश्वास द्वारा ही हो सकता है, क्योंकि उद्धार परमेश्वर से कमाया नहीं जा सकता है, उसे केवल दान के रूप में परमेश्वर से स्वीकार किया जा सकता है:जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।); क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है” (इफिसियों 2:5, 8)। मनुष्य के सभी भले कार्य परमेश्वर की दृष्टि में मैले चिथड़ों के समान हैं, “हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6)); वे किसी भी रीति से परमेश्वर के शुद्ध और पवित्र कार्य को संवार नहीं सकते हैं; बिगाड़ अवश्य सकते हैं, और बिगाड़ते भी हैं।  

·        सुसमाचार का उद्देश्य भली मनसा और भले कार्य करना समझाना है: यह शिक्षा देना मनुष्यों को भरमाना है, क्योंकि संसार भर में ऐसे अनेकों लोग हैं और हुए हैं जो मसीही विश्वास में नहीं हैं और न ही सुसमाचार पर विश्वास करते हैं; किन्तु उनके जीवन नैतिकता के भले कार्यों तथा औरों की भलाई करने से भरे हुए हैं, और इसके लिए वे लोगों में बहुत आदरणीय हैं, सुविख्यात हैं। अर्थात, भले कार्य और भलाई करना सुसमाचार से नहीं है; व्यक्ति का विवेक और मानसिकता भी उसे इनके लिए प्रेरित और कार्यकारी कर सकती है, करती है। क्योंकि न्याय के दिन प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, सुसमाचार के आधार पर ही लोगों का न्याय होगा, “जिस दिन परमेश्वर मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा” (रोमियों 2:16), इसलिए सुसमाचार का उद्देश्य लोगों को भले कामों के लिए प्रेरित करना नहीं, उन्हें उद्धार पाने के लिए प्रेरित करना है, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करना है।  

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 5-7          
  • मरकुस 11:1-19

सोमवार, 7 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (23)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार के विषय गलत शिक्षाएं (4) - सुसमाचार को अप्रभावी - कैसे? (1)

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। आज हम सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने की युक्तियों के बारे में देखेंगे।  

शैतान की गलत शिक्षाओं और बातों को पहचान पाने का आधार    

हमने पिछले लेख में देखा था कि सुसमाचार का सार 1 कुरिन्थियों 15:1-4 में दिया गया है। तात्पर्य यह, कि जिस भी सुसमाचार प्रचार में इन पदों की बातें नहीं हैं, या इन पदों की बातों के अतिरिक्त भी बातें डाली गई हैं, अर्थात, इन पदों में से कुछ घटाया या बढ़ाया गया है, वहसुसमाचारभ्रष्ट है, बिगाड़ा हुआ है, अस्वीकार्य है, क्योंकि वह अप्रभावी है! ये पद और उनके तथ्य हमारे लिए सुसमाचार संबंधित हर शिक्षा को जाँचने और परखने की कसौटी प्रदान करते हैं। 

शैतान की सुसमाचार को भ्रष्ट और अप्रभावी करने की इन युक्तियों को देखने और समझने से पहले हमें परमेश्वर, उसके वचन, और उसकी बातों से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण बात को ध्यान में लाना और हमेशा स्मरण रखना होगा।  यह बात है, परमेश्वर, उसका चरित्र और उसके गुण, उसका वचन, उसकी शिक्षाएं, सभी पवित्र, पूर्णतः शुद्ध, और हर रीति से संपूर्ण और सिद्ध हैं। उनमें न तो कुछ घटाया जा सकता है, न बढ़ाया जा सकता है, और न ही सुधारा जा सकता है; न ही उन्हें किसी भी रीति से संवार कर और बेहतर किया जा सकता है। ऐसा कुछ भी करने का प्रयास करना यह दिखाना है कि परमेश्वर द्वारा दी गई बात में कुछ अपूर्णता, कुछ कमी, कुछ असिद्धता है, जिसे मनुष्य अपनी बुद्धि और योजनाओं तथा कार्यों से और बेहतर कर सकता है, उससे भी बेहतर जो परमेश्वर ने कर के दिया है। स्मरण कीजिए, अदन की वाटिका में हुए पहले पाप का आधार यही विचार था। शैतान ने सर्प के रूप में, हव्वा को इसी बात से बहकाया और अनाज्ञाकारिता के पाप के लिए उकसाया कि “मेरे कहे तथा अपने मन की अभिलाषा के अनुसार कर ले, और जैसा परमेश्वर ने बनाया और दिया है तू उससे भी बेहतर हो जाएगी।” यदि हव्वा, परमेश्वर द्वारा कहे और दिए गए से और बेहतर करने के लालच में न पड़ती, तो अनाज्ञाकारिता का पाप भी नहीं करती। 

इसी संदर्भ में ध्यान करें कि मूसा को अपनी दस आज्ञाएँ देने के पश्चात, परमेश्वर ने अपनी उपासना और आराधना से संबंधित एक और आज्ञा भी दी, “मेरे लिये मिट्टी की एक वेदी बनाना, और अपनी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के होमबलि और मेलबलि को उस पर चढ़ाना; जहां जहां मैं अपने नाम का स्मरण कराऊं वहां वहां मैं आकर तुम्हें आशीष दूंगा। और यदि तुम मेरे लिये पत्थरों की वेदी बनाओ, तो तराशे हुए पत्थरों से न बनाना; क्योंकि जहां तुम ने उस पर अपना हथियार लगाया वहां तू उसे अशुद्ध कर देगा” (निर्गमन 20:24-25)। प्रमुख किए गए अंतिम वाक्य को स्मरण रखें - जैसे ही हम परमेश्वर की दी गई बातों में अपनी युक्तियाँ और कार्य लगाकर उसे और अधिक बेहतर या सुंदर बनाने का प्रयास करते हैं, हम उसे अशुद्ध कर देते हैं। फिर वे देखने में चाहे कितनी भी सुंदर और आकर्षक हों, लोगों को चाहे कितनी भी अच्छी प्रतीत हों और लोगों द्वारा उन की चाहे जितनी भी प्रशंसा की जाए, किन्तु परमेश्वर की वे बातें परमेश्वर के लिए उपयोगिता और उसके परमेश्वर को ग्रहण होने में वह व्यर्थ हो जाती हैं।

हम इससे पहले के विषयों के लेखों में देख चुके हैं कि शैतान ने प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर पवित्र आत्मा, और पवित्र आत्मा के कार्यों तथा वरदानों के बारे में बहुत सी गलत शिक्षाएं लोगों में फैला रखी हैं, उन्हीं में लोगों को भरमाता भटकाता रहता है। उन गलत शिक्षाओं में बहकाए जाने के कारण लोग अपने पापी होने को पहचानने, पापों से पश्चाताप के लिए कायल होने से बाधित रहते हैं और गलत बातों के निर्वाह में लगे रहते हैं। प्रेरितों 2 अध्याय इसका बहुत उत्तम उदाहरण है। पिन्तेकुस्त के दिन जब पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से प्रभु के शिष्य भर गए, और फिर जब पतरस ने प्रचार किया, वह उस समय वहाँ एकत्रितभक्त यहूदियों” (प्रेरितों 2:5) के मध्य किया गया था; अर्थात परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा के भक्त लोगों के मध्य जो व्यवस्था के अनुसार परमेश्वर की उपासना करने के लिए पृथ्वी भर के अनेकों स्थानों से आए हुए थे। किन्तु पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस द्वारा उन्हें भी किए गए प्रचार से उनके हृदय छि गए, उन्हें भी अपनी पापी दशा का बोध हुआ, और पतरस ने उन्हें सुसमाचार, पश्चाताप करने और प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने का ही संदेश दिया (प्रेरितों 2:37-38), जिससे लगभग 3000 लोगों ने उद्धार पाया (प्रेरितों 2:41)। अर्थात, जैसे कि हम पहले देख चुके हैं, जबकि व्यवस्था और पवित्र शास्त्र प्रभु यीशु मसीह की गवाही देते थे, उद्धारकर्ता के बारे में बताते थे, किन्तु शैतान ने उन लोगों की समझ और आँखों को अंधा कर रखा था कि वे सही बात को देख और समझ न सकें, प्रभु यीशु की वास्तविकता को स्वीकार न करें। सुसमाचार की ज्योति ने जिनके इस अंधकार को हटाया, वे फिर उद्धारकर्ता को भी पहचान सके और उन्होंने उद्धार भी पाया (2 कुरिन्थियों 4:4; इफिसियों 2:2; 4:18; कुलुस्सियों 1:12-13) शैतान हमें व्यर्थ की बातों में उलझा कर, सुसमाचार को पहचानने और मानने से बाधित करके रखता है, जब तक कि कोई वास्तविक शुद्ध सुसमाचार के द्वारा उसके अंधकार को हटा कर हमें प्रभु यीशु की ज्योति में न ले आए। 

 अगले लेख में हम शैतान द्वारा फैलाई जाने वाली सुसमाचार से संबंधित आम गलत शिक्षाओं को देखेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं या धारणाओं में न पड़े हों। यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 3-4          
  • मरकुस 10:32-52