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रविवार, 28 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 22b - Bible & Other Ancient Religious Writings / बाइबल और अन्य प्राचीन धार्मिक लेख - (2)

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अन्य प्राचीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के धार्मिक लेखों की तुलना में बाइबल - भाग - 2

बाइबल के आरंभ से लेकर अंत तक, उसकी विषय-वस्तु और अंतर्वस्तु प्रभु यीशु मसीहऔर केवल उन ही के द्वारा प्रदान की जा सकने वाले पापों से मुक्ति और उद्धार ही हैं, “और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहींक्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गयाजिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों 4:12)। यह विषय-वस्तुअर्थात, प्रभु यीशुउनका जीवनउनके गुण और चरित्रउनके कार्य और सेवकाईउनसे मिलने वाला उद्धार आदि, सभी को प्रभु यीशु मसीह के पृथ्वी पर जन्म लेने से सदियों पूर्व बाइबल के पुराने नियम खंड में विभिन्न प्रकार से बतायासिखाया, और उदहारणों द्वारा दर्ज किया गया है; विभिन्न शिक्षाओंनियमोंघटनाओंव्यवहारोंकुछ ऐतिहासिक लोगों के जीवनों और उनके लेखोंतथा अनेकों परिस्थितियों में मनुष्यों के साथ परमेश्वर के व्यवहारइत्यादि के द्वारा। इस बात को स्वयं प्रभु यीशु मसीह और बाइबल के अन्य लेखकों ने कहा है, और बारंबार इसकी पुष्टि की हैजैसा कि बाइबल के कुछ निम्नलिखित संबंधित हवालों से प्रकट है:
यूहन्ना 5:39 तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते होक्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता हैऔर यह वही हैजो मेरी गवाही देता है।
यूहन्ना 5:46 क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करतेतो मेरी भी प्रतीति करतेइसलिये कि उसने मेरे विषय में लिखा है।
यूहन्ना 12:41 यशायाह ने ये बातें इसलिये कहींकि उसने उस की महिमा देखीऔर उसने उसके विषय में बातें कीं।
लूका 24:27 तब उसने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरंभ कर के सारे पवित्र शास्‍त्रों में सेअपने विषय में की बातों का अर्थउन्हें समझा दिया।
1 कुरिन्थियों 15:1-4 हे भाइयोंमैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूं जो पहिले सुना चुका हूंजिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिस में तुम स्थिर भी हो। उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता हैयदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते होनहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दीजो मुझे पहुंची थीकि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया। और गाड़ा गयाऔर पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।
इब्रानियों 10:7 तब मैं ने कहादेखमैं आ गया हूं, (पवित्र शास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूं।

बाइबल का नया नियम खण्ड चार वृतांतों के साथ आरंभ होता है, जो प्रभु यीशु मसीह के पृथ्वी के जीवनतथा उन के द्वारा सम्पूर्ण मानव जाति, समस्त संसार के सभी लोगों के लिए उद्धार का मार्ग बनाने और उपलब्ध करवाने के बारे में हैं। यह उद्धार जो उन्होंने सभी के लिए मुफ्त में उपलब्ध करवाया है, उसे अब प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के लिए स्वेच्छा से अपनाना तथा कार्यान्वित करना हैबिना कोई भी कीमत चुकाएबिना किन्ही कर्मों या अनुष्ठानों के: “और उसने तुम्हें भी जिलायाजो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे। जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति परऔर आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थेजो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है। इन में हम भी सब के सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थेऔर शरीरऔर मन की मनसाएं पूरी करते थेऔर और लोगों के समान स्‍वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे। परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी हैअपने उस बड़े प्रेम के कारणजिस से उसने हम से प्रेम किया। जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थेतो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।) और मसीह यीशु में उसके साथ उठायाऔर स्‍वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर हैआने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए। क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ हैऔर यह तुम्हारी ओर से नहींवरन परमेश्वर का दान है। और न कर्मों के कारणऐसा न हो कि कोई घमण्‍ड करे (इफिसियों 2:1-9)। और प्रभु यीशु द्वारा इस प्रकार से उपलब्ध करवाई गई पापों की क्षमा के द्वारा उस व्यक्ति का परमेश्वर के साथ मेल होता है: “कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करेकि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलायातो तू निश्चय उद्धार पाएगा। क्योंकि धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता हैऔर उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है। क्योंकि पवित्र शास्त्र यह कहता है कि जो कोई उस पर विश्वास करेगावह लज्जित न होगा।; “क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे? (रोमियों 10:9-11; रोमियों 5:10)। 

नया नियमप्रभु यीशु मसीह के जीवन के बारे में लिखे गए लेखों के बाद फिर आगेप्रभु यीशु के कुछ अनुयायियों द्वारा लिखे गए अन्य लेखों के माध्यम से प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों – जो कि सामूहिक रूप में प्रभु का चर्च, उसके बुलाए हुए कहलाते हैं, की आरंभिक गतिविधियों के इतिहास, घटनाओंवृद्धिकार्यों, और दायित्वों का वर्णन प्रदान करता है। और अंत में बाइबल तथा नए नियम का समापन होता है प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के साथ – जो संसार के अंत समय की भविष्यवाणियों का लेख हैउन अंत के दिनों का जिन में आज हम जी रहे हैंजैसा कि हमारी आँखों के सामने पूरी हो रही विभिन्न अंत-समय की भविष्यवाणियों से प्रगट है (इनका एक विवरण मत्ती के 24 अध्याय में पढ़िए)। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में विस्तृत वर्णन है सारे संसार और उसमें जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य के होने वाले अवश्यंभावी न्याय काऔर उसके बाद के अनन्त जीवन का  वह चाहे स्वर्ग में परमेश्वर के साथ होया बिना परमेश्वर के नरक में हो – यह प्रत्येक मनुष्य द्वारा इस पृथ्वी पर अपने लिए किए गए उस चुनाव के अनुसार होगाजो निर्णय उन्होंने प्रभु यीशु मसीह और उसके द्वारा प्रदान किए जा रहे उद्धार की जानकारी मिलने पर लिया था, और जिसके साथ उन्होंने पृथ्वी का अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत किया था, अपने इस निर्णय को सुधारने के सभी अवसरों के प्रदान किए जाने के बावजूद: “फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उसको जो उस पर बैठा हुआ हैदेखाजिस के साम्हने से पृथ्वी और आकाश भाग गएऔर उन के लिये जगह न मिली। फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखाऔर पुस्‍तकें खोली गईऔर फिर एक और पुस्‍तक खोली गईऔर फिर एक और पुस्‍तक खोली गईअर्थात जीवन की पुस्‍तकऔर जैसे उन पुस्‍तकों में लिखा हुआ थाउन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया। और समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उस में थे दे दियाऔर मृत्यु और अधोलोक ने उन मरे हुओं को जो उन में थे दे दियाऔर उन में से हर एक के कामों के अनुसार उन का न्याय किया गया। और मृत्यु और अधोलोक भी आग की झील में डाले गएयह आग की झील तो दूसरी मृत्यु है। और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्‍तक में लिखा हुआ न मिलावह आग की झील में डाला गया (प्रकाशितवाक्य 20:11-15).

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।
- क्रमशः
अगला लेख: बाइबल अनुपम और अटल

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The Bible, in Comparison to the Religious Writings of Other Ancient Civilizations & Cultures - Part - 2

The theme and content of the Bible, from the beginning to the end is the Lord Jesus Christ, and the deliverance from sins and the salvation that only He provides, “Nor is there salvation in any other, for there is no other name under heaven given among men by which we must be saved” (Acts 4:12). This theme, i.e. the Lord Jesus, His life, His character and characteristics, His works and ministry, His salvation etc. are all indicated, taught, and exemplified through the various teachings, laws, events, happenings, lives and writings of certain historical people, God’s dealings with men in various circumstances, etc.  and have been recorded centuries before the birth of the Lord Jesus on earth in the Old Testament section of the Bible. The Lord Jesus Himself and other writers of The Bible testified of this repeatedly, as is apparent from some related references from the Bible, given below:
John 5:39 You search the Scriptures, for in them you think you have eternal life; and these are they which testify of Me.
John 5:46 For if you believed Moses, you would believe Me; for he wrote about Me.
John 12:41 These things Isaiah said when he saw His glory and spoke of Him.
Luke 24:27 And beginning at Moses and all the Prophets, He expounded to them in all the Scriptures the things concerning Himself.
1 Corinthians 15:1-4 Moreover, brethren, I declare to you the gospel which I preached to you, which also you received and in which you stand, by which also you are saved, if you hold fast that word which I preached to you--unless you believed in vain. For I delivered to you first of all that which I also received: that Christ died for our sins according to the Scriptures, and that He was buried, and that He rose again the third day according to the Scriptures.
Hebrews 10:7 Then I said, 'Behold, I have come-- In the volume of the book it is written of Me-- To do Your will, O God.'

The New Testament section of the Bible begins with four accounts of the earthly life of the Lord Jesus, and how He prepared and provided the way of salvation for the entire mankind, for the whole world. This salvation that He has made freely available is to be accepted voluntarily and made applicable in their lives personally by everyone, free of any cost, without any works or rituals: “And you He made alive, who were dead in trespasses and sins, in which you once walked according to the course of this world, according to the prince of the power of the air, the spirit who now works in the sons of disobedience, among whom also we all once conducted ourselves in the lusts of our flesh, fulfilling the desires of the flesh and of the mind, and were by nature children of wrath, just as the others. But God, who is rich in mercy, because of His great love with which He loved us, even when we were dead in trespasses, made us alive together with Christ (by grace you have been saved), and raised us up together, and made us sit together in the heavenly places in Christ Jesus, that in the ages to come He might show the exceeding riches of His grace in His kindness toward us in Christ Jesus. For by grace you have been saved through faith, and that not of yourselves; it is the gift of God, not of works, lest anyone should boast (Ephesians 2:1-9), and thereby the person is reconciled with God through the forgiveness of sins made available by the Lord Jesus: “that if you confess with your mouth the Lord Jesus and believe in your heart that God has raised Him from the dead, you will be saved. For with the heart one believes unto righteousness, and with the mouth confession is made unto salvation. For the Scripture says, "Whoever believes on Him will not be put to shame." ; “For if when we were enemies we were reconciled to God through the death of His Son, much more, having been reconciled, we shall be saved by His life. (Romans 10:9-11; Romans 5:10). 

The New Testament, after the biographical records of the Lord Jesus then goes on to provide the history, events, growth, practices and responsibilities of the disciples of the Lord Jesus, that collectively form His Church – the group of the called out ones, through the writings of some of the disciples of the Lord Jesus. And finally the Bible and New Testament culminate with the Book of Revelation – which is a prophetically given record, of the end of the world, of the end times – the times we are presently living in, as is evident from the various end-times prophecies being fulfilled before our eyes (Read an account in Matthew chpt. 24). The book of Revelation details the coming inevitable judgment of the whole world and of every person ever to inhabit it, and the eternal life to follow – with God in heaven, or without God in hell – as per the choice every person made while living on the earth, the decision they made when brought to the knowledge of the Lord Jesus and the salvation He freely offers to all, and lived with for their entire life on earth, despite all opportunities provided to them to correct their decision: “Then I saw a great white throne and Him who sat on it, from whose face the earth and the heaven fled away. And there was found no place for them. And I saw the dead, small and great, standing before God, and books were opened. And another book was opened, which is the Book of Life. And the dead were judged according to their works, by the things which were written in the books. The sea gave up the dead who were in it, and Death and Hades delivered up the dead who were in them. And they were judged, each one according to his works. Then Death and Hades were cast into the lake of fire. This is the second death. And anyone not found written in the Book of Life was cast into the lake of fire (Revelation 20:11-15).

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.
- To Be Continued
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गुरुवार, 25 मई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 21a - Sin & Salvation / पाप और मोक्ष (उद्धार) - 1

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मसीही विश्वास में पाप तथा पाप से मुक्ति (उद्धार या मोक्ष) - भाग 1

    उद्धार प्राप्त करने का अर्थ है पाप के दुष्परिणामों – अनन्त काल की मृत्यु, अर्थात पृथ्वी के इस जीवन के उपरान्त अनन्त काल के लिए परमेश्वर से दूर हो कर नरक में, जहां से कभी कोई लौट कर वापस नहीं आ सकता है “और इन सब बातों को छोड़ हमारे और तुम्हारे बीच एक भारी गड़हा ठहराया गया है कि जो यहां से उस पार तुम्हारे पास जाना चाहेंवे न जा सकेंऔर न कोई वहां से इस पार हमारे पास आ सके” (लूका 16:26), चले जाने से बच जाना। बचाए जाने का अर्थ प्रभु यीशु मसीह में होकर अनन्त काल के लिए परमेश्वर के सम्मुख धर्मी ठहरना और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप  हो जाना है “सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरेतो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।” “क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?” (रोमियों 5:110)। उद्धार पाने या बचाए जाने के साथ ही प्राप्त होने वाले अन्य लाभ हैं परमेश्वर की संतान बन जाना “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण कियाउसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दियाअर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लोहू सेन शरीर की इच्छा सेन मनुष्य की इच्छा सेपरन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (यूहन्ना 1:12-13), तथा मसीह यीशु के संगी वारिस बन जाना “और यदि सन्तान हैंतो वारिस भीवरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैंजब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं” (रोमियों 8:17)।

    प्रत्येक मनुष्य पाप करने के स्वभाव और प्रवृति के साथ जन्म लेता है “मनुष्य है क्या कि वह निष्कलंक होऔर जो स्त्री से उत्पन्न हुआ वह है क्या कि निर्दोष हो सके?” (अय्यूब 15:14); और “देखमैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआऔर पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा” (भजन 51:5)। पाप करना और अधर्मी होना हमारे अन्दर जन्म से विद्यमान प्रवृत्ति है जो हमारे आदि माता-पिता हव्वा और आदम के पाप के परिणामस्वरूप मनुष्य जाति में वंशानुगत रीति से है “इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आयाऔर पाप के द्वारा मृत्यु आईऔर इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गईइसलिये कि सब ने पाप किया” (रोमियों 5:12)। जैसे कि एक डूबता हुआ मनुष्य अपने सिर के बालों से अपने आप को खींच कर स्वयं को पानी से बाहर नहीं निकाल सकता है, वैसे ही पाप से अपवित्र एवं अशुद्ध मनुष्य अपने किसी भी प्रयास से अपने आप को पवित्र एवं शुद्ध नहीं कर सकता है हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैंऔर हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैंऔर हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6)। जैसे उस डूबते हुए मनुष्य को बचने के लिए बाहर से किसी की सहायता चाहिए होती है, उसी प्रकार से पाप में डूबे हुए मनुष्य को भी पाप से उभरने के लिए पाप से बाहर के किसी की सहायता की आवश्यकता होती है “जूफा से मुझे शुद्ध करतो मैं पवित्र हो जाऊंगामुझे धोऔर मैं हिम से भी अधिक श्वेत बनूंगा” (भजन 51:7)।

    पवित्र एवं निष्पाप परमेश्वर पाप के साथ संगति या समझौता नहीं कर सकता है – यह उसके स्वभाव तथा चरित्र के प्रतिकूल है “जब तुम मेरी ओर हाथ फैलाओतब मैं तुम से मुंह फेर लूंगातुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करोतौभी मैं तुम्हारी न सुनूंगाक्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं। परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया हैऔर तुम्हारे पापों के कारण उस का मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता।” “वे उस समय यहोवा की दोहाई देंगेपरन्तु वह उनकी न सुनेगावरन उस समय वह उनके बुरे कामों के कारण उन से मुंह फेर लेगा” (यशायाह 1:15; 59:2; मीका 3:4)। किन्तु वह अपनी सर्वश्रेष्ठ सृष्टि, मनुष्य, से बहुत प्रेम करता है और उस के साथ संगति रखना चाहता है – यद्यपि मनुष्य अब पाप में गिर चुका है। परमेश्वर न केवल प्रेमी है, वरन वह न्यायी भी है। वह पाप की यूं ही अनदेखी नहीं कर सकता है, परमेश्वर के न्याय की मांग है कि प्रत्येक पापी को अपने ही पाप के लिए परमेश्वर द्वारा निर्धारित दण्ड – मृत्य, अर्थात उससे पृथक हो जाने को सहना ही होगा “देखोसभों के प्राण तो मेरे हैंजैसा पिता का प्राणवैसा ही पुत्र का भी प्राण हैदोनों मेरे ही हैं। इसलिये जो प्राणी पाप करे वही मर जाएगा। जो प्राणी पाप करे वही मरेगान तो पुत्र पिता के अधर्म का भार उठाएगा और न पिता पुत्र काधर्मी को अपने ही धर्म का फलऔर दुष्ट को अपनी ही दुष्टता का फल मिलेगा” (यहेजकेल 18:4, 20)। यदि मनुष्य को यह दण्ड सहना पड़े, तो फिर वह परमेश्वर के साथ संगति में कभी लौटने नहीं पाएगा; किन्तु परमेश्वर, अपने बड़े प्रेम के कारण, मनुष्य से संगति रखना चाहता है।

    इस असंभव प्रतीत होने वाली विडंबना का समाधान भी परमेश्वर ने ही बनाया, जिससे उसके न्याय की मांग भी पूरी हो जाए और वह मनुष्य के साथ संगति भी रख सके। परमेश्वर ने स्वयं मनुष्य बनकर इस पृथ्वी पर प्रभु यीशु मसीह के रूप में जन्म लिया “आदि में वचन थाऔर वचन परमेश्वर के साथ थाऔर वचन परमेश्वर था। और वचन देहधारी हुआऔर अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा कियाऔर हम ने उस की ऐसी महिमा देखीजैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:1, 14), और एक सामान्य मनुष्य के समान जीवन जीते हुए भी एक निष्पाप तथा निष्कलंक जीवन बिताया “क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहींजो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सकेवरन वह सब बातों में हमारी समान परखा तो गयातौभी निष्‍पाप निकला।” “सो ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य थाजो पवित्रऔर निष्‍कपट और निर्मलऔर पापियों से अलगऔर स्वर्ग से भी ऊंचा किया हुआ हो” (इब्रानियों 4:15; 7:26); “न तो उसने पाप कियाऔर न उसके मुंह से छल की कोई बात निकली” (1 पतरस 2:22); “और तुम जानते होकि वह इसलिये प्रगट हुआकि पापों को हर ले जाएऔर उसके स्‍वभाव में पाप नहीं” (1 यूहन्ना 3:5)। प्रभु यीशु ने कभी कोई भी पाप नहीं किया, वे आजीवन पाप से अनजान रहे। फिर भी, प्रभु यीशु ने समस्त मानवजाति के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया, संसार के सभी मनुष्यों के पाप को अपना कर वे सभी मनुष्यों के लिए कलवारी के क्रूस पर पाप बन गए “जो पाप से अज्ञात थाउसी को उसने हमारे लिये पाप ठहरायाकि हम उस में हो कर परमेश्वर की धामिर्कता बन जाएं” (2 कुरिन्थियों 5:21), और मनुष्यों के स्थान पर उन्होंने स्वयं मृत्यु “क्योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता हैइसलिये कि हम यह समझते हैंकि जब एक सब के लिये मरा तो सब मर गए। और वह इस निमित्त सब के लिये मराकि जो जीवित हैंवे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:14-15); तथा परमेश्वर से दूर होने को सह लिया “तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहाएलीएलीलमा शबक्तनी अर्थात हे मेरे परमेश्वरहे मेरे परमेश्वरतू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। उन्होंने स्वेच्छा से तथा सब कुछ जानते हुए क्रूस पर अपना बलिदान दिया “पिता इसलिये मुझ से प्रेम रखता हैकि मैं अपना प्राण देता हूंकि उसे फिर ले लूं। कोई उसे मुझ से छीनता नहींवरन मैं उसे आप ही देता हूं: मुझे उसके देने का अधिकार हैऔर उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है” (यूहन्ना 10:17-18)। वे मारे गए, गाड़े गए, और तीसरे दिन मृतकों में से जी उठ कर अपने ईश्वरत्व को प्रमाणित किया “उसी कोजब वह परमेश्वर की ठहराई हुई मनसा और होनहार के ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गयातो तुम ने अधर्मियों के हाथ से उसे क्रूस पर चढ़वा कर मार डाला। परन्तु उसी को परमेश्वर ने मृत्यु के बन्‍धनों से छुड़ाकर जिलाया: क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता।” “क्योंकि उसने एक दिन ठहराया हैजिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगाजिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकरयह बात सब पर प्रामाणित कर दी है” (प्रेरितों 2:23-24; 17:31)।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।
- क्रमशः
अगला लेख: प्रभु यीशु मसीह की भूमिका एवं कार्य 

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Sin & Deliverance from Sins (Salvation) In the Christian Faith – Part - 1

Salvation, or to be saved means to be saved or to be rescued from the deleterious effect of sin  eternal death, i.e. to be rescued from being separated from God forever, and, after this earthly life, from being cast away into hell fire forever, from where none can ever come back, “And besides all this, between us and you there is a great gulf fixed, so that those who want to pass from here to you cannot, nor can those from there pass to us” (Luke 16:26). To be saved means to be justified before God and for eternity to be reconciled with God through the Lord Jesus “Therefore, having been justified by faith, we have peace with God through our Lord Jesus Christ”; and For if when we were enemies we were reconciled to God through the death of His Son, much more, having been reconciled, we shall be saved by His life (Romans 5:110)The added benefits of salvation or being saved are that we become God’s children But as many as received Him, to them He gave the right to become children of God, to those who believe in His name: who were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God (John 1:12-13), and a co-heir with Christ Jesus and if children, then heirs--heirs of God and joint heirs with Christ, if indeed we suffer with Him, that we may also be glorified together (Romans 8:17).

Every person is born unrighteous with a natural tendency to sin, “What is man, that he could be pure? And he who is born of a woman, that he could be righteous? (Job 15:14); and “Behold, I was brought forth in iniquity, And in sin my mother conceived me” (Psalms 51:5).  Unrighteousness and sinfulness is our in-born hereditary tendency because of the effects of the sin of our fore-parents, Adam and Eve, “Therefore, just as through one man sin entered the world, and death through sin, and thus death spread to all men, because all sinned (Romans 5:12). Just as a drowning person cannot lift himself out of the water by catching hold of his hair and trying to pull himself out of water, similarly a person made unholy and defiled by sin cannot make himself holy and pure by any self-efforts of being righteous, “But we are all like an unclean thing, And all our righteousnesses are like filthy rags; We all fade as a leaf, And our iniquities, like the wind, Have taken us away (Isaiah 64:6). Just as that drowning man needs help from someone outside, similarly a person drowning in sin needs the help of someone to be delivered from the sin, “Purge me with hyssop, and I shall be clean; Wash me, and I shall be whiter than snow (Psalm 51:7).

The Holy and Sinless God can never compromise or keep company with sin  this is contrary to His nature and character, “When you spread out your hands, I will hide My eyes from you; Even though you make many prayers, I will not hear. Your hands are full of blood “; “But your iniquities have separated you from your God; And your sins have hidden His face from you, So that He will not hear”; “Then they will cry to the Lord, But He will not hear them; He will even hide His face from them at that time, Because they have been evil in their deeds (Isaiah 1:15; 59:2; Micah 3:4). But He also loves His best creation, man, very much and wants to have fellowship with him – even though man has now fallen in sin. Not only is God a loving God, but He is also a just God. He cannot simply condone sin, God's justice demands that the sinner receive and bear the just and God determined punishment for his sin – death, i.e. to be separated from Him, “Behold, all souls are Mine; The soul of the father As well as the soul of the son is Mine; The soul who sins shall die”; “The soul who sins shall die. The son shall not bear the guilt of the father, nor the father bear the guilt of the son. The righteousness of the righteous shall be upon himself, and the wickedness of the wicked shall be upon himself (Ezekiel 18:420). If man were to undergo this punishment then he would never be able to return to fellowship with God; but God, in His great love for us, does want to have fellowship with man.

It was God who provided the way out of this seemingly impossible imbroglio, so that His justice could be met, as well as He could have fellowship with men. God was born as a man on this earth, incarnated as the Lord Jesus Christ, “In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God”; “And the Word became flesh and dwelt among us, and we beheld His glory, the glory as of the only begotten of the Father, full of grace and truth  (John 1:114), and lived a sinless and spotless even though living as a common man, “For we do not have a High Priest who cannot sympathize with our weaknesses, but was in all points tempted as we are, yet without sin”; “For such a High Priest was fitting for us, who is holy, harmless, undefiled, separate from sinners, and has become higher than the heavens (Hebrews 4:157:26); “Who committed no sin, Nor was deceit found in His mouth” (1 Peter 2:22)And you know that He was manifested to take away our sins, and in Him there is no sin” (1 John 3:5)The Lord Jesus never committed any sin; all through His life, He knew no sin. Yet the Lord Jesus took upon Himself all the sins of everyone in the whole world, and by taking up the sins of every person of earth, on the Cross of Calvary He became sin for all the people of the world, “For He made Him who knew no sin to be sin for us, that we might become the righteousness of God in Him (2 Corinthians 5:21), and He then bore the punishment for sin for the entire mankind, He suffered death, “For the love of Christ compels us, because we judge thus: that if One died for all, then all died; and He died for all, that those who live should live no longer for themselves, but for Him who died for them and rose again” (2 Corinthians 5:14-15) and separation from God in place of manAnd about the ninth hour Jesus cried out with a loud voice, saying, "Eli, Eli, lama sabachthani?" that is, "My God, My God, why have You forsaken Me?"  (Matthew  27:46). He knowingly and voluntarily sacrificed Himself on the cross, “Therefore My Father loves Me, because I lay down My life that I may take it again. No one takes it from Me, but I lay it down of Myself. I have power to lay it down, and I have power to take it again. This command I have received from My Father (John 10:17-18). He died, He was buried, and by resurrecting from the dead on the third day He proved His divinity, “Him, being delivered by the determined purpose and foreknowledge of God, you have taken by lawless hands, have crucified, and put to death; whom God raised up, having loosed the pains of death, because it was not possible that He should be held by it.”; “because He has appointed a day on which He will judge the world in righteousness by the Man whom He has ordained. He has given assurance of this to all by raising Him from the dead (Acts 2:23-2417:31).

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.
- To Be Continued
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सोमवार, 23 जुलाई 2018

भय



      भय मेरे हृदय में बिना कोई अनुमति लिए, चुपके से आ जाता है। वह मेरे अन्दर निःसहाय, बेबस, और आशा विहीन होने के भाव जगाता है। वह मेरी शान्ति और एकाग्रता को चुरा लेता है। मैं क्यों, और किस बात को लेकर भयभीत हो जाती हूँ? मैं अपने परिवार की सुरक्षा तथा अपने प्रिय जनों के स्वास्थ्य के लिए चिन्तित होती हूँ। मैं नौकरी के चले जाने या किसी संबंध के टूट जाने को लेकर घबराती हूँ। भय मुझे अपने ही अन्दर देखने, अपनी ही सामर्थ्य, अपने ही मन पर केंद्रित करता है; और मुझ में एक ऐसा मन प्रकट करता है जिसे किसी पर भरोसा करना कठिन लगता है।

      जब ये भय और चिंताएं हमला करती हैं तब परमेश्वर के वचन बाइबल में दाऊद का प्रार्थना का भजन, भजन 34, को पढ़कर उसपर मनन करना बहुत अच्छा होता है: “मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया” (पद 4)। परमेश्वर हमें हमारे भय से कैसे छुड़ाता है? जब हम “उसकी ओर दृष्टि” करते हैं (पद 5), उसपर ध्यान लगाते हैं, जब हम भरोसा रखते हैं कि प्रत्येक परिस्थिति परमेश्वर के नितंत्रण में है, तब हमारे भय मिटने लग जाते हैं ।

      इसके बाद दाऊद एक भिन्न प्रकार के भय की बात करता है – ऐसा भय नहीं जो पंगु कर दे, वरन ऐसा भय जो उसके प्रति है जो हमें चारों ओर से घेर कर सुरक्षित रखता है; यह भय उस परमेश्वर पिता के प्रति गहरी श्रद्धा, और महान आदर जगाता है (पद 7)। हम उसमें शरण लेते हैं क्योंकि वह भला है (पद 8)।

      उसकी भलाई का यह श्रद्धापूर्ण भय हमारे अपने भय को सही परिप्रेक्ष्य में लाता है। जब हम स्मरण करते हैं कि परमेश्वर कौन है और वह हमसे कितना प्रेम करता है, तब हम उसकी शान्ति में निश्चिन्त होकर विश्राम कर सकते हैं, क्योंकि दाऊद का निष्कर्ष था, “हे यहोवा के पवित्र लोगो, उसका भय मानो, क्योंकि उसके डरवैयों को किसी बात की घटी नहीं होती” (पद 9)।

      कितना अद्भुत है यह जानना कि परमेश्वर के भय में रहने से हम अपने सभी भय से मुक्ति पा सकते हैं। - कीला ओकोआ


परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको आपके भय से मुक्ति दे।

यहोवा परमेश्वर मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूं? यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ ठहरा है, मैं किस का भय खाऊं? – भजन 27:1

बाइबल पाठ: भजन 34:1-10
Psalms 34:1 मैं हर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा; उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी।
Psalms 34:2 मैं यहोवा पर घमण्ड करूंगा; नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे।
Psalms 34:3 मेरे साथ यहोवा की बड़ाई करो, और आओ हम मिलकर उसके नाम की स्तुति करें।
Psalms 34:4 मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।
Psalms 34:5 जिन्होंने उसकी ओर दृष्टि की उन्होंने ज्योति पाई; और उनका मुंह कभी काला न होने पाया।
Psalms 34:6 इस दीन जन ने पुकारा तब यहोवा ने सुन लिया, और उसको उसके सब कष्टों से छुड़ा लिया।
Psalms 34:7 यहोवा के डरवैयों के चारों ओर उसका दूत छावनी किए हुए उन को बचाता है।
Psalms 34:8 परखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है! क्या ही धन्य है वह पुरूष जो उसकी शरण लेता है।
Psalms 34:9 हे यहोवा के पवित्र लोगो, उसका भय मानो, क्योंकि उसके डरवैयों को किसी बात की घटी नहीं होती!
Psalms 34:10 जवान सिंहों तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं; परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होवेगी।


एक साल में बाइबल: 
  • भजन 33-34
  • प्रेरितों 24



गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

प्रेम से परिपूर्ण


   मेरे एक मित्र ने अपनी दादी को अपने जीवन में सबसे प्रभावी व्यक्तियों में से एक बताया। अपनी दादी से मिले भरपूर प्रेम और देखभाल के कारण वह उनके एक चित्र को सदा अपने कार्यस्थल की मेज़ पर रखे रहता है, जिससे वह सदा उनके निस्वार्थ प्रेम को स्मरण रखने पाए। उसका कहना है कि उन्होंने ही उसे प्रेम का अर्थ और प्रेम करना सिखाया है।

   सभी को ऐसा ही मानवीय प्रेम पाने का सौभाग्य चाहे ना मिला हो, लेकिन प्रभु यीशु मसीह में होकर संसार का प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के प्रेम की परिपूर्णता को अनुभव कर सकता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित यूहन्ना द्वारा लिखित प्रथम पत्री के चौथे अध्याय में प्रेम शब्द 27 बार आया है, तथा प्रभु यीशु में होकर हमें प्राप्त होने वाले परमेश्वर के प्रेम को हमारे परमेश्वर तथा एक दुसरे के प्रति प्रेम का उदगम स्त्रोत बताया गया है: "प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर ने प्रेम किया; पर इस में है, कि उसने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्‍चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा" (पद 10); " और जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उसको हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है; और परमेश्वर उस में बना रहता है" (पद 16); "हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उसने हम से प्रेम किया" (पद 19)।

   परमेश्वर का प्रेम बूँद-बूँद करके टपकने वाले नल या हमारे स्वयं खोदे जाने वाले किसी कुएँ के समान नहीं है जिस में से प्रेम-जल पाने के लिए हमें परिश्रम करना पड़े। वह तो एक बहती हुई नदी है जो उसके हृदय से निकलकर हमारे मनों में प्रवाहित होती रहती है और जिससे हम जब चाहें और जितना चाहें उतना शांतिदायक जीवन जल प्राप्त कर सकते हैं। हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि या जीवन के अनुभव चाहे जैसे भी रहे हों - चाहे हमने दूसरों से प्रेम पाने का अनुभव किया हो अथवा नहीं, लेकिन परमेश्वर से हमें सदा ही प्रेम मिलता रह सकता है। परमेश्वर के प्रेम के इस कभी ना खत्म होने वाले सोते से ना केवल हम तृप्त रह सकते हैं, वरन दूसरों को भी उसके पास इस तृप्ति के लिए ला सकते हैं।

   प्रभु यीशु में होकर संसार का प्रत्येक जन परमेश्वर के प्रेम से परिपूर्ण रह सकता है। - डेविड मैक्कैसलैंड


परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर सामर्थी और कुछ नहीं है।

हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उसने हम से प्रेम किया। - 1 यूहन्ना 4:19 

बाइबल पाठ: 1 यूहन्ना 4:7-21
1 John 4:7 हे प्रियों, हम आपस में प्रेम रखें; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है: और जो कोई प्रेम करता है, वह परमेश्वर से जन्मा है; और परमेश्वर को जानता है। 
1 John 4:8 जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता है, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। 
1 John 4:9 जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, वह इस से प्रगट हुआ, कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा है, कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। 
1 John 4:10 प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर ने प्रेम किया; पर इस में है, कि उसने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्‍चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा। 
1 John 4:11 हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया, तो हम को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए। 
1 John 4:12 परमेश्वर को कभी किसी ने नहीं देखा; यदि हम आपस में प्रेम रखें, तो परमेश्वर हम में बना रहता है; और उसका प्रेम हम में सिद्ध हो गया है। 
1 John 4:13 इसी से हम जानते हैं, कि हम उस में बने रहते हैं, और वह हम में; क्योंकि उसने अपने आत्मा में से हमें दिया है। 
1 John 4:14 और हम ने देख भी लिया और गवाही देते हैं, कि पिता ने पुत्र को जगत का उद्धारकर्ता कर के भेजा है। 
1 John 4:15 जो कोई यह मान लेता है, कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है: परमेश्वर उस में बना रहता है, और वह परमेश्वर में। 
1 John 4:16 और जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उसको हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है; और परमेश्वर उस में बना रहता है। 
1 John 4:17 इसी से प्रेम हम में सिद्ध हुआ, कि हमें न्याय के दिन हियाव हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही संसार में हम भी हैं। 
1 John 4:18 प्रेम में भय नहीं होता, वरन सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, क्योंकि भय से कष्‍ट होता है, और जो भय करता है, वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ। 
1 John 4:19 हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उसने हम से प्रेम किया। 
1 John 4:20 यदि कोई कहे, कि मैं परमेश्वर से प्रेम रखता हूं; और अपने भाई से बैर रखे; तो वह झूठा है: क्योंकि जो अपने भाई से, जिसे उसने देखा है, प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उसने नहीं देखा, प्रेम नहीं रख सकता। 
1 John 4:21 और उस से हमें यह आज्ञा मिली है, कि जो कोई अपने परमेश्वर से प्रेम रखता है, वह अपने भाई से भी प्रेम रखे।

एक साल में बाइबल: 
  • दानिय्येल 1-2 
  • 1 यूहन्ना 4


बुधवार, 4 दिसंबर 2013

शांति


   सृष्टि की शांति जाती रही जब हमारे आदि माता-पिता, आदम और हव्वा ने परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता का पाप कर के, अदन कि वाटिका में वह वर्जित फल खा लिया। यह पाप करते ही ना केवल उन की परमेश्वर से सहभागिता जाती रही, वरन उनकी परस्पर शांति भी जाती रही और वे आपस में भी एक दुसरे पर दोषारोपण करने लगे (उत्पत्ति 3:12-13)। परमेश्वर के साथ तथा परस्पर संबंधों में पाप के कारण आने वाली यही अशांति तब से लेकर आज तक संसार और मानवजाति के लिए दुख का कारण बनी हुई है। हम अपने द्वारा लिए गलत निर्णयों तथा किए गए गलत चुनावों के लिए दूसरों को दोषी ठहराने का प्रयास करते रहते हैं, और जब कोई हमसे इस प्रयास में सहमत नहीं होता तो हम क्रोधित होने लगते हैं। दूसरों पर दोषारोपण की इस प्रवृति के कारण परिवारों, चर्च मण्डली, समाज और राष्ट्रों में भी तनाव तथा कलह व्याप्त है। हम शांति स्थापित कर नहीं पा रहे हैं क्योंकि हमारे मन दूसरों को दोषी ठहराने में लगे रहते हैं और संसार बिखरता जा रहा है, खंडित होता जा रहा है।

   क्रिसमस शांति का मौसम है। परमेश्वर के वचन बाइबल का पुराने नियम का खण्ड हमें बताता है कि कैसे परमेश्वर ने शांति के राजकुमार (यशायाह 9:6), प्रभु यीशु के संसार में आगमन के लिए तैयारी करी। प्रभु यीशु संसार में आए जिससे उसके क्रूस पर बहाए गए लहु के द्वारा (कुल्लुसियों 1:20) पाप और दोषारोपण का यह कुचक्र तोड़ा जा सके और परमेश्वर के साथ तथा परस्पर मानव संबंधों में शांति स्थापित हो सके। हमारे पापों और कटु व्यवहार के कारण संसार में व्याप्त असंतोष तथा अशांति के लिए हमें दोषी ठहराने की बजाए, प्रभु यीशु ने सारे संसार के लोगों के सारे पापों का दोष अपने ऊपर ले लिया, उनका दण्ड सह लिया, और अपने बलिदान तथा पुनर्त्थान के द्वारा पापों के दोष तथा दण्ड से बच निकलने का मार्ग मानव जाति को बना के दे दिया। अब जो कोई भी प्रभु यीशु से अपने पापों की क्षमा मांग कर अपना जीवन उसे समर्पित कर देता है, वह उसका अनुयायी तथा परमेश्वर की सनतान बन जाता है (यूहन्ना 1:12-13)।

   जो परमेश्वर से पापों की क्षमा की यह अद्भुत शांति पा लेता है, फिर स्वतः ही उसके अन्दर दूसरों को भी इस अद्भुत शांति को पहुँचाने की लालसा जागृत हो जाती है। जो परमेश्वर के साथ शांति से जीवन व्यतीत कर पाता है, वह दूसरों के साथ भी शांति से रहने पाता है। जो अपने पापों के दोष से मुक्त हो जाने के अनुभव को जानता है वह दूसरों को भी दोषी ठहराने से दूर रहता है।

   आज परमेश्वर का द्वार संसार के प्रत्येक जन के लिए यह शांति तथा मुक्ति पा लेने के लिए खुला है। क्या आप ने इस अवसर का लाभ उठाया है? यही समय है अपने लिए शांति पा लेने और दूसरों को शांति तक पहुँचा देने का; इसे व्यर्थ ना जाने दीजिए। - जूली ऐकैरमैन लिंक


प्रभु यीशु ने हमारी अशांति अपने ऊपर ले ली जिससे कि हम उस की शांति अपने जीवनों में प्राप्त कर सकें।

क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्‌भुत, युक्ति करने वाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। - यशायाह 9:6

बाइबल पाठ: कुल्लुसियों 1:17-29
Colossians 1:17 और वही सब वस्‍तुओं में प्रथम है, और सब वस्तुएं उसी में स्थिर रहती हैं। 
Colossians 1:18 और वही देह, अर्थात कलीसिया का सिर है; वही आदि है और मरे हुओं में से जी उठने वालों में पहिलौठा कि सब बातों में वही प्रधान ठहरे। 
Colossians 1:19 क्योंकि पिता की प्रसन्नता इसी में है कि उस में सारी परिपूर्णता वास करे। 
Colossians 1:20 और उसके क्रूस पर बहे हुए लोहू के द्वारा मेल मिलाप कर के, सब वस्‍तुओं का उसी के द्वारा से अपने साथ मेल कर ले चाहे वे पृथ्वी पर की हों, चाहे स्वर्ग में की। 
Colossians 1:21 और उसने अब उसकी शारीरिक देह में मृत्यु के द्वारा तुम्हारा भी मेल कर लिया जो पहिले निकाले हुए थे और बुरे कामों के कारण मन से बैरी थे। 
Colossians 1:22 ताकि तुम्हें अपने सम्मुख पवित्र और निष्‍कलंक, और निर्दोष बनाकर उपस्थित करे। 
Colossians 1:23 यदि तुम विश्वास की नेव पर दृढ़ बने रहो, और उस सुसमाचार की आशा को जिसे तुम ने सुना है न छोड़ो, जिस का प्रचार आकाश के नीचे की सारी सृष्‍टि में किया गया; और जिस का मैं पौलुस सेवक बना।
Colossians 1:24 अब मैं उन दुखों के कारण आनन्द करता हूं, जो तुम्हारे लिये उठाता हूं, और मसीह के क्‍लेशों की घटी उस की देह के लिये, अर्थात कलीसिया के लिये, अपने शरीर में पूरी किए देता हूं। 
Colossians 1:25 जिस का मैं परमेश्वर के उस प्रबन्‍ध के अनुसार सेवक बना, जो तुम्हारे लिये मुझे सौंपा गया, ताकि मैं परमेश्वर के वचन को पूरा पूरा प्रचार करूं। 
Colossians 1:26 अर्थात उस भेद को जो समयों और पीढिय़ों से गुप्‍त रहा, परन्तु अब उसके उन पवित्र लोगों पर प्रगट हुआ है। 
Colossians 1:27 जिन पर परमेश्वर ने प्रगट करना चाहा, कि उन्हें ज्ञात हो कि अन्यजातियों में उस भेद की महिमा का मूल्य क्या है और वह यह है, कि मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है। 
Colossians 1:28 जिस का प्रचार कर के हम हर एक मनुष्य को जता देते हैं और सारे ज्ञान से हर एक मनुष्य को सिखाते हैं, कि हम हर एक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध कर के उपस्थित करें। 
Colossians 1:29 और इसी के लिये मैं उस की उस शक्ति के अनुसार जो मुझ में सामर्थ के साथ प्रभाव डालती है तन मन लगाकर परिश्रम भी करता हूं।

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजकेल 47-48 
  • 1 यूहन्ना 3


शनिवार, 17 नवंबर 2012

स्वच्छ और उपयोगी


   जब हम अपने हाथों को गन्दगी और कीटाणुओं से स्वच्छ करने के लिए धोते हैं, तो क्या वास्तव में हम ही उन्हें स्वच्छ करते हैं? उत्तर हाँ और नहीं दोनो ही है। हाँ इसलिए क्योंकि यह हमारे निर्णय, हमारे प्रयास और हमारी इच्छा से होता है, और नहीं इसलिए क्योंकि स्वच्छ करने का वास्तविक कार्य तो वह साबुन और पानी करते हैं जिनका हम प्रयोग करते हैं; हमारा निर्णय, प्रयास और इच्छा तो उन स्वच्छ करने में सक्षम माध्यमों को कार्यकारी होने देता है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पुलुस ने तिमुथियुस को अपनी दूसरी पत्री में लिखा: "यदि कोई अपने आप को इन से शुद्ध करेगा, तो वह आदर का बरतन, और पवित्र ठहरेगा; और स्‍वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा" (२ तिमुथियुस २:२१); पौलुस के कहने का तात्पर्य यह नहीं था कि हमारे पास अपने आप को पापों से शुद्ध करने की क्षमता है, वरन यह कि हम स्वेच्छा से अपने आप को उस माध्यम को समर्पित करें जो हमें पापों से शुद्ध करने और हमें परमेश्वर की दृष्टी में धर्मी कर देने में सक्षम है - अर्थात प्रभु यीशु मसीह को। इसी संदर्भ में, अपनी एक और पत्री में, पौलुस ने लिखा, "और उस में पाया जाऊं; न कि अपनी उस धामिर्कता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन उस धामिर्कता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है" (फिलिप्पियों ३:९)।

   जब हम प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करते हैं तो उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान हमें पाप के दण्ड और हमें बान्ध कर रखने वाली पाप की शक्ति से मुक्त कर देते हैं। यदि हम फिर कभी पाप में पड़ें भी, तब भी यह पुनः स्वच्छ हो पाने की सुविधा हमें प्रभु यीशु में उपलब्ध रहती है: "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है" (१ यूहन्ना १:९)।

   पाप और उसके दुष्परिणामों से मिली यह अद्भुत स्वतंत्रता हमें जवानी की अभिलाषाओं से मुँह मोड़ने तथा धार्मिकता अर्थात सही व्यवहार, विश्वास अर्थात सही आधार, प्रेम अर्थात सही प्रत्युत्तर और मेल-मिलाप अर्थात सही उद्देश्य जैसे सद्गुणों के पीछे बढ़ने में सक्षम करती है। जब हम अपने निर्णय, प्रयास और इच्छा से अपने आप को प्रभु यीशु को समर्पित करते हैं और उसके आत्मा को अपने अन्दर कार्य करने देते हैं तो वह हमें स्वच्छ और परमेश्वर के लिए उपयोगी बनाता है।

   क्या आप स्वच्छ और परमेश्वर के लिए उपयोगी होने को तैयार हैं? - एलबर्ट ली


सही सोच ही जीवन को सही रीति से जीने का मार्गदर्शन करती है।

जवानी की अभिलाषाओं से भाग; और जो शुद्ध मन से प्रभु का नाम लेते हैं, उन के साथ धर्म, और विश्वास, और प्रेम, और मेल-मिलाप का पीछा कर। - २ तिमुथियुस २:२२

बाइबल पाठ: २ तिमुथियुस २:२०-२६
2Ti 2:20  बड़े घर में न केवल सोने-चान्‍दी ही के, पर काठ और मिट्टी के बरतन भी होते हैं; कोई कोई आदर, और कोई कोई अनादर के लिये। 
2Ti 2:21  यदि कोई अपने आप को इन से शुद्ध करेगा, तो वह आदर का बरतन, और पवित्र ठहरेगा; और स्‍वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा। 
2Ti 2:22   जवानी की अभिलाषाओं से भाग; और जो शुद्ध मन से प्रभु का नाम लेते हैं, उन के साथ धर्म, और विश्वास, और प्रेम, और मेल-मिलाप का पीछा कर। 
2Ti 2:23  पर मूर्खता, और अविद्या के विवादों से अलग रह; क्‍योंकि तू जानता है, कि उन से झगड़े होते हैं। 
2Ti 2:24   और प्रभु के दास को झगड़ालू होना न चाहिए, पर सब के साथ कोमल और शिक्षा में निपुण, और सहनशील हो। 
2Ti 2:25  और विरोधियों को नम्रता से समझाए, क्‍या जाने परमेश्वर उन्‍हें मन फिराव का मन दे, कि वे भी सत्य को पहिचानें। 
2Ti 2:26  और इस के द्वारा उस की इच्‍छा पूरी करने के लिये सचेत होकर शैतान के फंदे से छूट जाएं।

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजकेल ५-७ 
  • इब्रानियों १२

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

यहोवा यिरे

एक नवविवाहिता युवती ने अपने कुछ मित्रों को भोजन पर बुलाया। कुछ आवश्यक वस्तुओं की कमी को देखकर वह अपनी पड़ौसिन के पास उन्हें उससे उधार लेने के लिये गई। उसकी मांगी हुई वस्तुओं को देने के बाद पड़ौसन ने, जो मेज़बानी में अनुभवी थी, उससे पूछा "क्या यह काफी होगा, या तुम्हें किसी अन्य चीज़ की भी आवश्यक्ता होगी?" युवती ने कहा "मुझे लगता है कि यह काफी होगा।" तब उसकी पड़ौसन ने कुछ और वस्तुएं भी अपने पास से उसे निकाल कर दीं और कहा कि इन्हें भी रख लो, तुम्हें इनकी भी आवश्यक्ता पड़ेगी। बाद में उस युवती ने बहुत धन्यवादी मन से कहा "भला हुआ कि मैं किसी ऐसे के पास गई जो मेरी आवश्यकता को जानती थी, मेरी सहायता करने को तत्पर थी और उसने मुझे वह दिया जिस की मुझे आवश्यक्ता थी, न कि वह जो मैं चाहती थी।"

यह उदाहरण परमेश्वर का हमारे प्रति बर्ताव का कितना अच्छा चित्रण है। बाइबल के पुराने नियम में परमेश्वर के नाम "यहोवा" के साथ उसके किसी विशेष गुण को दर्शाने वाला शब्द जोड़कर उसके नाम के अर्थ को समझाया गया है। इब्राहिम ने जिस जगह बलिदान का मेढ़ा पाया, उस स्थान का नाम "यहोवा यिरे" अर्थात "परमेश्वर उपलब्ध करायेगा" रखा। यह दर्शाता है कि परमेश्वर हमारी आवश्यक्ताओं को पहले से जानता है और उनका प्रबंध भी करके रखता है।

आज भी, अपने पुत्र के बलिदान के द्वारा, उसने समस्त मानव जाति की सबसे बड़ी आवश्यक्ता - पापों से मुक्ति, का प्रबंध उपलब्ध करा रखा है। उसके पुत्र प्रभु यीशु में विश्वास के द्वारा न केवल हमको पापों से मुक्ति और उद्धार मिलता है, वरन परमेश्वर का आत्मा भी हमारे अन्दर आकर बसता है और हमें परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की सामर्थ भी देता है।

"जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्‍तु उसे हम सब के लिये दे दिया: वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्‍योंकर न देगा।" - रोमियों ८:३२

यहोवा यिरे - उपलब्ध कराने वाला हमारा परमेश्वर। - पौल वैन गोर्डर


जिस काम के लिये परमेश्वर कहता है, उसकी आवश्यक्ताएं उपलब्ध भी कराता है।

और इब्राहीम ने उस स्थान का नाम यहोवा यिरे रखा : इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है, कि यहोवा के पहाड़ पर उपाय किया जाएगा। - उत्पत्ति २२:१४


बाइबल पाठ: रोमियों ८:२६-३४

इसी रीति से आत्मा भी हमारी र्दुबलता में सहायता करता है, क्‍योंकि हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए, परन्‍तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये बिनती करता है।
और मनों का जांचने वाला जानता है, कि आत्मा की मनसा क्‍या है क्‍योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्‍छा के अनुसार बिनती करता है।
और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्‍पन्न करती है; अर्थात उन्‍हीं के लिये जो उस की इच्‍छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।
क्‍योंकि जिन्‍हें उस ने पहिले से जान लिया है उन्‍हें पहिले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्‍वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।
फिर जिन्‍हें उस ने पहिले से ठहराया, उन्‍हें बुलाया भी, और जिन्‍हें बुलाया, उन्‍हें धर्मी भी ठहराया है, और जिन्‍हें धर्मी ठहराया, उन्‍हें महिमा भी दी है।
सो हम इन बातों के विषय में क्‍या कहें? यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?
जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्‍तु उसे हम सब के लिये दे दिया: वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्‍यों कर न देगा?
परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उनको धर्मी ठहराने वाला है।
फिर कौन है जो दण्‍ड की आज्ञा देगा? मसीह वह है जो मर गया वरन मुर्दों में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है।

एक साल में बाइबल:
  • लैव्यवस्था १-३
  • मत्ती २४:१-२८

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

बीज बोइये और फसल काटिये

मैंने एक छोटी कहानी पढ़ी - एक आदमी बीजों की दुकान में बीज देख रहा था, उसे अचानक विचित्र दृश्य दिखाई दिया, वहां परमेश्वर बीज बेचने वाला बनकर खड़ा था। वह आदमी तुरंत परमेश्वर के पास गया और उससे पूछा "आप क्या बेच रहे हैं?" परमेश्वर ने पलट कर पूछा "आप क्या चाहते हैं; आपके दिल की क्या इच्छा है?" आदमी ने उतर दिया "मैं केवल अपने लिये ही नहीं, सारे संसार के लिये खुशी, शांति और भय से मुक्ति चाहता हूँ।" परमेश्वर मुस्कुराया और बोला, "मैं बीज बेचता हूँ, फल नहीं!"

परमेश्वर के वचन, बाइबल में पौलुस ने जीवन में परमेश्वर का आदर और आज्ञाकारिता वाले व्यवहार रूपी बीज बोने के महत्व पर ज़ोर दिया, "क्‍योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा" (गलतियों ६:७)। यदि परमेश्वर की आशीशों के फल अनुभव करने हैं तो हमें अपना कर्तव्य भी निभाना होगा; उसके बिना यह सम्भव नहीं होगा।

इस कर्तव्य के निर्वाह में उन लोगों के उदाहरण का अनुसरण करना सहायक होगा जो अपने जीवनों में अच्छे बीज बोते रहे हैं। लेखक सैमुएल शूमेकर का कहना है कि अच्छा उदाहरण या तो हमें वैसा ही करने के लिये प्रेरित कर सकता है, यह हमें यह कहने के लिये बाध्य कर सकता है कि "हां, वह व्यक्ति ऐसा है। वह मेरी तरह गुस्से या अधीरता या चिंता से विचिलित नहीं होता। उसके स्वभाव में आनन्द है।" शूमेकर ने आगे कहा "शायद हम यह भूल जाते हैं कि उस व्यक्ति को मन की ऐसी शांति पाने के लिये बहुत संघर्ष करना पड़ा होगा, और जैसे संघर्ष कर के वह विजयी हुआ, हम भी वैसा ही संघर्ष करके विजयी हो सकते हैं।"

मसीही विश्वासी के लिये यह संघर्ष और आसान हो जाता है क्योंकि प्रभु यीशु ने अपने अनुयायीयों से वायदा किया "मैं तुम्हें शान्‍ति दिए जाता हूं, अपनी शान्‍ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे" (यूहन्ना १४:२७)। संसार की हर परिस्थिति में मसीही विश्वासी के लिये शांति का स्रोत प्रभु यीशु है "मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्‍ति मिले। संसार में तुम्हें क्‍लेश होता है, परन्‍तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है" (यूहन्ना १६:३३)।

क्या आप अपने आप से, अपने हालात से, अपने मन और जीवन की अशांति से परेशान हैं? प्रभु यीशु के पास आइये, समस्त संसार के लिये उसका खुला निमंत्रण है "हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो, क्‍योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे" (मत्ती ११: २८, २९)। आज ही नये व्यवहार और नये जीवन के बीज बोना आरंभ कीजिए, परमेश्वर का आत्मा उन बीजों के फल आपके जीवन में उत्पन्न करेगा। - जोनी योडर


जो बीज हम आज बोएंगे, कल मिलने वाले फल उन्ही से निर्धारित होंगे।

...क्‍योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा। - गलतियों ६:७


बाइबल पाठ: गलतियों ६:७-१०

धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्‍योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।
क्‍योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्‍त जीवन की कटनी काटेगा।
हम भले काम करने में हियाव न छोड़े, क्‍योंकि यदि हम ढीले न हों, तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे।
इसलिये जहां तक अवसर मिले हम सब के साथ भलाई करें; विशेष करके विश्वासी भाइयों के साथ।

एक साल में बाइबल:
  • यर्मियाह ३२, ३३
  • इब्रानियों १

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

पाप के बन्दी

सयंयुक्त राष्ट्र संघ के नशा और अपराध से संबंधित दफतर की सन २००८ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि संसार भर में किसी भी समय औसतन १ करोड़ लोग बन्दीगृहों में कैदी होते हैं। क्योंकि कुछ बन्दी छोड़े जाते हैं और कुछ नए बन्दी बनते हैं, इसलिये औसतन संसार भर में प्रतिवर्ष लगभग ३ करोड़ लोग बन्दी रहते हैं। इस तरह के आंकड़ों के कारण बन्दीयों के लिये काम करने को बहुत से लोग प्रेरित हुए और उनके प्रयासों से, बहुत से देशों में बन्दीगृहों की दशा में और बन्दी बनाये जाने से संबंधित कनूनों में सुधार हो रहे हैं।

आत्मिक दृष्टिकोण से बाइबल इससे भी अधिक गंभीर और झकझोरने वाला आंकड़ा देती है " परन्‍तु पवित्र शास्‍त्र ने सब को पाप के आधीन कर दिया..." (गलतियों ३:२२) - सारा संसार पाप का कैदी है!

एक परिच्छेद में, जिस को समझने में बहुत लोगों को कठिनाई होती है, पौलुस कहता है कि यद्यपि पुराने नियम में दी गई व्यवस्था जीवन नहीं दे सकती थी (गलतियों ३:२१), फिर भी वह एक प्रभावी शिक्षक थी हमें यह दिखाने के लिये कि हमें एक उद्धारकर्ता की आवश्यक्ता है जो जीवन दे सके (गलतियों ३:२४)। भले ही संसार का पाप का बन्दी होना बुरा समाचार है, परन्तु साथ ही, उसी पद में सुसमाचार भी है "... ताकि वह प्रतिज्ञा जिस का आधार यीशु मसीह पर विश्वास करना है, विश्वास करने वालों के लिये पूरी हो जाए" (गलतियों ३:२२)। अर्थात, पाप के बन्दियों [संसार] के लिये प्रभु यीशु मसीह में विश्वास के द्वारा मुक्ति का मार्ग उपलब्ध है और जो कोई विश्वास से इस मार्ग पर चलेगा वह अवश्य मुक्ति पाएगा।

जब हम अपने पापों से पश्चाताप करके, साधारण विश्वास के साथ अपने जीवन प्रभु यीशु को समर्पित करते हैं, जो व्यवस्था की सारी आवश्यक्ताओं को हमारे लिये पूरा कर चुका है, तो वह हमारे पाप क्षमा करके अपनी धार्मिकता हमें दे देता है, और हम पाप के दासत्व से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे लोग अब प्रभु की विश्वव्यापी मण्डली के सदस्य हो जाते हैं, जिसमें देश, राष्ट्रियता, रंग, भाषा, धर्म, सामाजिक ओहदे आदि बातों का कोई महत्व नहीं है। उस मण्डली में सब समान रूप से प्रभु के प्रिय तथा परमेश्वर की सन्तान और उसकी आशीशों के वारिस हैं। ऐसी कोई भी बात जो आज संसार के लोगों को विभाजित करती है, वहां महत्व नहीं रखती।

प्रभु यीशु में हम वास्तव में स्वतंत्र हैं! - डेविड मैककैसलैंड


पापों से मुक्ती ही सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।

परन्‍तु पवित्र शास्‍त्र ने सब को पाप के आधीन कर दिया, ताकि वह प्रतिज्ञा जिस का आधार यीशु मसीह पर विश्वास करना है, विश्वास करने वालों के लिये पूरी हो जाए। - गलतियों ३:२२


बाइबल पाठ: गलतियों ३:१९-२९

तब फिर व्यवस्था क्या रही? वह तो अपराधों के कारण बाद में दी गई, कि उस वंश के आने तक रहे, जिस की प्रतिज्ञा दी गई थी, और वह स्‍वर्गदूतों के द्वारा एक मध्यस्थ के हाथ ठहराई गई।
मध्यस्थ तो एक का नहीं होता, परन्‍तु परमेश्वर एक ही है।
तो क्‍या व्यवस्था परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के विरोध में है? कदापि न हो, क्‍योंकि यदि ऐसी व्यवस्था दी जाती जो जीवन दे सकती, तो सचमुच धामिर्कता व्यवस्था से होती।
परन्‍तु पवित्र शास्‍त्र ने सब को पाप के आधीन कर दिया, ताकि वह प्रतिज्ञा जिस का आधार यीशु मसीह पर विश्वास करना है, विश्वास करने वालों के लिये पूरी हो जाए।
पर विश्वास के आने से पहिले व्यवस्था की अधीनता में हमारी रखवाली होती थी, और उस विश्वास के आने तक जो प्रगट होने वाला था, हम उसी के बन्‍धन में रहे।
इसलिये व्यवस्था मसीह तक पहुंचाने को हमारा शिक्षक हुई है, कि हम विश्वास से धर्मी ठहरें।
परन्‍तु जब विश्वास आ चुका, तो हम अब शिक्षक के आधीन न रहे।
क्‍योंकि तुम सब उस विश्वास करने के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्‍तान हो।
और तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्‍होंने मसीह को पहिन लिया है।
अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी, न कोई दास, न स्‍वतंत्र, न कोई नर, न नारी; क्‍योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।
और यदि तुम मसीह के हो, तो इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो।
एक साल में बाइबल:
  • यर्मियाह २७-२९
  • तीतुस ३