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रविवार, 8 फ़रवरी 2026

Blessed and Successful Life - 3 - Outline of Instructions / आशीषित एवं सफल जीवन – 3 - निर्देशों की रूपरेखा

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 3 - निर्देश – रूपरेखा

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 निर्देशों की रूपरेखा

 

पुनःअवलोकन: हमने पिछले दो प्रस्तावना के लेखों में देखा है कि परमेश्वर का चुना हुआ होना सुलैमान के लिए इस बात की कोई निश्चितता नहीं था कि उसके लिए जीवन सहज होगा। वरन, इस्राएल का राजा होने की परमेश्वर द्वारा उसे दी गई ज़िम्मेदारी का निर्वाह करने में समस्याओं और परिस्थितियों का सामना तो उसे करना ही था। साथ ही दाऊद द्वारा उससे कही गयी बात में निहितार्थ था कि अपनी सुरक्षा और बचाव के लिए, उसे दाऊद द्वारा खड़ी की गई विशाल सेना पर नहीं, वरन परमेश्वर पर भरोसा रखना होगा, उसका आज्ञाकारी रहना होगा, और ऐसा ही करने से वह आशीषित एवं सफल भी होगा।


दाऊद, 1 राजाओं 2:2-4 में, सुलैमान को निर्देश देता है कि वह किस प्रकार से परमेश्वर की दृष्टि में सही, तथा परमेश्वर द्वारा दी गई सामर्थ्य, बुद्धिमानी, और मार्गदर्शन के द्वारा आशीषित एवं सफल हो सकता है। इसके लिए उसे इन चार बातों का पालन करना होगा, जिनकी रूप रेखा 1 राजाओं 2:2-4 में दी गई है:

1.   तू हियाव बांधकर पुरुषार्थ दिखा” (1 राजाओं 2:2)

2.   जो कुछ तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे सौंपा है, उसकी रक्षा कर”; अर्थात्, वह, परमेश्वर द्वारा उसी सौंपी गई बातों का एक अच्छा भण्डारी बने (1 राजाओं 2:3a)

3.   जितनी बातें परमेश्वर के वचन में लिखी हैं, वह उनका आज्ञाकारी बना रहे (1 राजाओं 2:3b)

4.   वह सावधान रहे, और हमेशा प्रभु के प्रति समर्पित बना रहे (1 राजाओं 2:4)

 

जैसे सुलैमान बातों के बारे में अपनी कल्पना के अनुसार नहीं चल सकता था, और न ही किसी भी बात को यूँ ही हलके में नहीं ले सकता था, ठीक उसी तरह से मसीही विश्वासी भी बातों को अपनी कल्पना के अनुसार नहीं ले सकते हैं, और न ही अपने मसीही जीवन और ज़िम्मेदारियों को हलके में ले सकते हैं। जो 4 निर्देश सुलैमान के लिए थे, वही प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए भी लागू होते हैं। उनके पालन करने से ही वे अपने मसीही जीवनों में आशीषित एवं सफल तथा परमेश्वर की आशीषों के भागीदार हो सकते हैं, विशेषकर इन अन्त के दिनों में, जब शैतानी शक्तियाँ हम पर, हमारे जीवन के सभी पक्षों पर निरंतर विभिन्न तरह से हमले करने में लगी हुई हैं।


हम एक समर्पित मसीही जीवन जीने के लिए तथा परमेश्वर द्वारा हमें दी गयी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए इन 4 सिद्धान्तों का उपयोग सीखेंगे। इससे हम हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु में लाए गए विश्वास के कारण, हमें परमेश्वर के अनुग्रह से मिले उद्धार के जीवन को, परमेश्वर की महिमा तथा अपनी आशीषों के लिए जी सकेंगे। आगे आने वाले लेखों में हम इन चारों में से प्रत्येक निर्देश के साथ जुड़ी हुई विभिन्न बातों की जांच करेंगे, यह देखने के लिए कि क्या हम उनके बारे में बाइबल की शिक्षाओं के अनुसार समझ-बूझ रखते हैं या नहीं; और यदि नहीं, तो इन में से प्रत्येक निर्देश से संबंधित बाइबल की शिक्षाओं को सीख कर अपनी गलतियों को सुधार लें।

  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



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Blessed and Successful Life - 3 - Instructions – Outline

English Translation

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Outline of Instructions


Review: We have seen in the previous two Introductory articles that being the chosen one of God was no guarantee of an easy life for Solomon. Rather, he was bound to face problems and situations in fulfilling his God assigned responsibility of being the King of Israel. David also implies to Solomon that for his safety and security, he should not rely upon the huge army that David had amassed; rather he must only rely upon God, be obedient to Him, which would also make him blessed and successful.


In 1 Kings 2:2-4, David instructs Solomon on how to be right with God and be blessed and successful through the strength, wisdom, and guidance of God. For this to happen, he has to do the following 4 things that have been outlined in 1 Kings 2:2-4:

1.   To "be strong and prove yourself a man" (1Ki 2:2).

2.   To "keep the charge of the Lord God", i.e., to be a good Steward of whatever God has given to him (1Ki 2:3a).

3.   To be obedient to the Word of God, in all things written in it. (1Ki 2:3b).

4.   To be careful, taking heed, to remain sincere and committed to the Lord always (1Ki 2:4b).


Just as Solomon could not assume things, nor take anything for granted, similarly we Christian Believers cannot assume anything, nor take our Christian life and responsibilities for granted. The same 4 instructions that were for Solomon, also apply to every Christian Believer. Only by obeying them can they be blessed and successful in their Christian lives and be partakers of God's blessings, particularly in these end times when we are facing the relentless attacks of satanic forces in various ways and in every aspect of our lives.


We will use these 4 principles to learn about living a committed Christian life, and fulfilling our God given responsibilities. Through this we will be able to live this life that we have received through the grace of God by coming to faith in the Lord Jesus as our Redeemer and Savior, in a manner that glorifies God, and brings blessings to our lives. In our study in the coming articles, we will examine and look into various aspects associated with each of these 4 instructions, to see if we have a Biblical understanding about them or not; and if not, then to rectify our errors by learning the Biblical teachings about each of these instructions.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


 

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सोमवार, 28 अगस्त 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 3 – Instructions / निर्देश

निर्देश – रूपरेखा

  

    हमने पिछले दो प्रस्तावना के लेखों में देखा है कि परमेश्वर का चुना हुआ होना सुलैमान के लिए इस बात की कोई निश्चितता नहीं था कि उसके लिए जीवन सहज होगा। वरन, इस्राएल का राजा होने की परमेश्वर द्वारा उसे दी गई ज़िम्मेदारी का निर्वाह करने में समस्याओं और परिस्थितियों का सामना तो उसे करना ही था। साथ ही दाऊद द्वारा उससे कही गयी बात में निहितार्थ था कि अपनी सुरक्षा और बचाव के लिए, उसे दाऊद द्वारा खड़ी की गई विशाल सेना पर नहीं, वरन परमेश्वर पर भरोसा रखना होगा, उसका आज्ञाकारी रहना होगा, और ऐसा करने से वह आशीषित एवं सफल भी होगा। दाऊद, 1 राजाओं 2:2-4 में, सुलैमान को निर्देश देता है कि वह किस प्रकार से परमेश्वर की दृष्टि में सही, तथा परमेश्वर द्वारा दी गई सामर्थ्य, बुद्धिमानी, और मार्गदर्शन के द्वारा आशीषित एवं सफल हो सकता है। इसके लिए उसे इन चार बातों का पालन करना होगा, जिनकी रूप रेखा 1 राजाओं 2:2-4 में दी गई है:

1.   तू हियाव बांधकर पुरुषार्थ दिखा” (1 राजाओं 2:2)

2.   जो कुछ तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे सौंपा है, उसकी रक्षा कर”; अर्थात, वह परमेश्वर द्वारा उसी सौंपी गई बातों का एक अच्छा भण्डारी बने (1 राजाओं 2:3a)

3.   जितनी बातें परमेश्वर के वचन में लिखी हैं, वह उनका आज्ञाकारी बना रहे (1 राजाओं 2:3b)

4.   वह सावधान रहे, और हमेशा प्रभु के प्रति समर्पित बना रहे (1 राजाओं 2:4)

 

    जैसे सुलैमान बातों के बारे में अपनी कल्पना के अनुसार नहीं चल सकता था, और न ही किसी भी बात को यूँ ही हलके में नहीं ले सकता था, ठीक उसी तरह से मसीही विश्वासी भी बातों को अपनी कल्पना के अनुसार नहीं ले सकते हैं, और न ही अपने मसीही जीवन और ज़िम्मेदारियों को हलके में ले सकते हैं। जो 4 निर्देश सुलैमान के लिए थे, वही प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए भी लागू होते हैं। उनके पालन करने से ही वे अपने मसीही जीवनों में आशीषित एवं सफल तथा परमेश्वर की आशीषों के भागीदार हो सकते हैं, विशेषकर इन अन्त के दिनों में, जब शैतानी शक्तियाँ हम पर, हमारे जीवन के सभी पक्षों पर निरंतर विभिन्न तरह से हमले करने में लगी हुई हैं।


    हम एक समर्पित मसीही जीवन जीने के लिए तथा परमेश्वर द्वारा हमें दी गयी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए इन 4 सिद्धान्तों का उपयोग सीखेंगे, जिस से कि हम हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु में लाए गए विश्वास के द्वारा हमें मिले जीवन को परमेश्वर की महिमा तथा अपनी आशीषों के लिए जी सकें। आगे आने वाले लेखों में हम इन में से प्रत्येक निर्देश के साथ जुड़ी हुई विभिन्न बातों की जांच करेंगे, यह देखने के लिए कि क्या हम उनके बारे में बाइबल की शिक्षाओं के अनुसार समझ-बूझ रखते हैं या नहीं; और यदि नहीं, तो इन में से प्रत्येक निर्देश से संबंधित बाइबल की शिक्षाओं को सीख कर अपनी गलतियों को सुधार लें।  


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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Instructions – Outline

 

    We have seen in the previous two Introductory articles that being the chosen one of God was no guarantee of an easy life for Solomon. Rather, he was bound to face problems and situations in fulfilling his God assigned responsibility of being the King of Israel. David also implies to Solomon that for his safety and security, he should not rely upon the huge army that David had amassed; rather he had to rely upon God, be obedient to Him, which would also make him blessed and successful. In 1 Kings 2:2-4, David instructs Solomon on how to be right with God and be blessed and successful through the strength, wisdom, and guidance of God. For this to happen, he has to do the following 4 things that have been outlined in 1 Kings 2:2-4:

1.   To "be strong and prove yourself a man" (1Ki 2:2).

2.   To "keep the charge of the Lord God", i.e., to be a good Steward of whatever God has given to him (1Ki 2:3a).

3.   To be obedient to the Word of God, in all things written in it. (1Ki 2:3b).

4.   To be careful, taking heed, to remain sincere and committed to the Lord always (1Ki 2:4b).


    Just as Solomon could not assume things, nor take anything for granted, similarly we Christian Believers cannot assume anything, nor take our Christian life and responsibilities for granted. The same 4 instructions that were for Solomon, also apply to every Christian Believer. Only by obeying them can they be blessed and successful in their Christian lives and be partakers of God's blessings, particularly in these end times when we are facing the relentless attacks of satanic forces in various ways and in every aspect of our lives.


    We will use these 4 principles to learn about living a committed Christian life, fulfilling our God given responsibilities, a life that glorifies God, and brings blessings to our lives through our faith in the Lord Jesus as our Redeemer and Savior. In our study in the coming articles, we will examine and look into various aspects associated with each of these instructions, to see if we have a Biblical understanding about them or not; and if not, then to rectify our errors by learning the Biblical teachings about each of these instructions.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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सोमवार, 10 जुलाई 2017

भार


   आप एक साइकिल के साथ जो ढो सकते हैं वह अद्भुत है। एक औसत व्यसक साइकिल से जुड़े विशेष ट्रेलर और कुछ निश्चय के साथ 300 पाउंड का भार 10 मील प्रति घंटा की रफतार से ले जा सकता है। लेकिन एक समस्या है; जितना अधिक भार ढोने का प्रयास करेंगे, रफतार उतनी ही धीमी होती जाएगी। यदि 600 पाउंड का भार ढोना हो तो केवल 8 मील प्रति घंटा की रफतार से ही चलने पाएंगे।

   परमेश्वर के वचन बाइबल का एक प्रमुख पात्र मूसा, जब इस्त्राएलियों को मिस्त्र की गुलामी से निकाल कर कनान देश की ओर उन्हें लेकर चला, तो उसे एक अन्य ही प्रकार का भार उठाना पड़ रहा था - भावनात्मक भार, जिसने उसे जड़ कर दिया था। वे इस्त्राएली थोड़े-थोड़े समय में अनेकों बातों के लिए कुड़कुड़ाते और परमेश्वर तथा मूसा पर दोषारोपण करते रहते थे; साथ ही मूसा को उनके व्यक्तिगत वाद-विवाद भी सुलझाते रहना पड़ता था। उनके विलाप और शिकायतों को सुनते-सुनते मूसा अघा गया, और थक कर उसने परमेश्वर से कहा, "मैं अकेला इन सब लोगों का भार नहीं सम्भाल सकता, क्योंकि यह मेरी शक्ति के बाहर है" (गिनती 11:14)।

   अपने आप में मूसा इस समस्या का समाधान पाने में असक्षम था। परन्तु परमेश्वर ने मूसा से कहा कि वह 70 लोगों को अपने साथ खड़े होने तथा उसके भार को बाँटने के लिए चुने: "...वे इन लोगों का भार तेरे संग उठाए रहेंगे, और तुझे उसको अकेले उठाना न पड़ेगा" (पद 17)।

   मसीह यीशु के अनुयायी होने के कारण हमें भी अपने भार अकेले उठाते रहने की आवश्यकता नहीं है। हमारे साथ हमारा प्रभु सदैव बना रहता है, और वह सदा हमारी सहायता के लिए तत्पर और तैयार रहता है। उसने अपनी मण्डली में हमें ऐसे भाई-बहन दिए हैं जो हमारा भार उठाने में हमारे सहायक हो सकते हैं। जब हम अपने भार उसे सौंपते हैं, तो वह हमें आवश्यक बुद्धिमानी और सहायता भी देता है कि उस भार को उठाया जा सके। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


परमेश्वर की सहायता केवल प्रार्थना की दूरी पर उपलब्ध रहती है।

हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। - मत्ती 11:28 

बाइबल पाठ: गिनती 11:1-17
Numbers 11:1 फिर वे लोग बुड़बुड़ाने और यहोवा के सुनते बुरा कहने लगे; निदान यहोवा ने सुना, और उसका कोप भड़क उठा, और यहोवा की आग उनके मध्य जल उठी, और छावनी के एक किनारे से भस्म करने लगी। 
Numbers 11:2 तब मूसा के पास आकर चिल्लाए; और मूसा ने यहोवा से प्रार्थना की, तब वह आग बुझ गई, 
Numbers 11:3 और उस स्थान का नाम तबेरा पड़ा, क्योंकि यहोवा की आग उन में जल उठी थी।
Numbers 11:4 फिर जो मिली-जुली भीड़ उनके साथ थी वह कामुकता करने लगी; और इस्त्राएली भी फिर रोने और कहने लगे, कि हमें मांस खाने को कौन देगा। 
Numbers 11:5 हमें वे मछलियां स्मरण हैं जो हम मिस्र में सेंत-मेंत खाया करते थे, और वे खीरे, और खरबूजे, और गन्दने, और प्याज, और लहसुन भी; 
Numbers 11:6 परन्तु अब हमारा जी घबरा गया है, यहां पर इस मन्ना को छोड़ और कुछ भी देख नहीं पड़ता। 
Numbers 11:7 मन्ना तो धनिये के समान था, और उसका रंग रूप मोती का सा था। 
Numbers 11:8 लोग इधर उधर जा कर उसे बटोरते, और चक्की में पीसते वा ओखली में कूटते थे, फिर तसले में पकाते, और उसके फुलके बनाते थे; और उसका स्वाद तेल में बने हुए पुए का सा था। 
Numbers 11:9 और रात को छावनी में ओस पड़ती थी तब उसके साथ मन्ना भी गिरता था। 
Numbers 11:10 और मूसा ने सब घरानों के आदमियों को अपने अपने डेरे के द्वार पर रोते सुना; और यहोवा का कोप अत्यन्त भड़का, और मूसा को भी बुरा मालूम हुआ। 
Numbers 11:11 तब मूसा ने यहोवा से कहा, तू अपने दास से यह बुरा व्यवहार क्यों करता है? और क्या कारण है कि मैं ने तेरी दृष्टि में अनुग्रह नहीं पाया, कि तू ने इन सब लोगों का भार मुझ पर डाला है? 
Numbers 11:12 क्या ये सब लोग मेरे ही कोख में पड़े थे? क्या मैं ही ने उन को उत्पन्न किया, जो तू मुझ से कहता है, कि जैसे पिता दूध पीते बालक को अपनी गोद में उठाए उठाए फिरता है, वैसे ही मैं इन लोगों को अपनी गोद में उठा कर उस देश में ले जाऊं, जिसके देने की शपथ तू ने उनके पूर्वजों से खाई है? 
Numbers 11:13 मुझे इतना मांस कहां से मिले कि इन सब लोगों को दूं? ये तो यह कह कहकर मेरे पास रो रहे हैं, कि तू हमे मांस खाने को दे। 
Numbers 11:14 मैं अकेला इन सब लोगों का भार नहीं सम्भाल सकता, क्योंकि यह मेरी शक्ति के बाहर है। 
Numbers 11:15 और जो तुझे मेरे साथ यही व्यवहार करना है, तो मुझ पर तेरा इतना अनुग्रह हो, कि तू मेरे प्राण एकदम ले ले, जिस से मैं अपनी दुर्दशा न देखने पाऊं।
Numbers 11:16 यहोवा ने मूसा से कहा, इस्त्राएली पुरनियों में से सत्तर ऐसे पुरूष मेरे पास इकट्ठे कर, जिन को तू जानता है कि वे प्रजा के पुरनिये और उनके सरदार हैं; और मिलापवाले तम्बू के पास ले आ, कि वे तेरे साथ यहां खड़े हों। 
Numbers 11:17 तब मैं उतरकर तुझ से वहां बातें करूंगा; और जो आत्मा तुझ में है उस में से कुछ ले कर उन में समवाऊंगा; और वे इन लोगों का भार तेरे संग उठाए रहेंगे, और तुझे उसको अकेले उठाना न पड़ेगा। 

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 41-42
  • प्रेरितों 16:22-40


रविवार, 25 सितंबर 2016

बोलना और सुनना


   वर्षों पहले किसी अज्ञात लेखक ने हमारे बोलने को सीमित रखने की बुद्धिमता से संबंधित एक लघु-कविता लिखी, जो कुछ इस प्रकार है:
एक बुद्धिमान बुज़ुर्ग उल्लू बाँझ वृक्ष पर रहता था;
जितना अधिक वह देखता था उतना ही कम वह बोलता था;
जितना कम वह बोलता था, उतना अधिक वह सुनता था;
क्यों नहीं हम उस उस बुद्धिमान पक्षी के समान बनते?

   बुद्धिमानी और हमारे बोलने को सीमित रखने में एक संबंध है; परमेश्वर का वचन बाइबल भी इस बात को सिखाती है: "जहां बहुत बातें होती हैं, वहां अपराध भी होता है, परन्तु जो अपने मुंह को बन्द रखता है वह बुद्धि से काम करता है" (नीतिवचन 10:19)। कुछ परिस्थितियों में हम क्या और कितना बोलते है, इसके प्रति सावधान रहने में बुद्धिमानी होती है। जब हम क्रोध या आवेश में हों तो अपने बोले गए शब्दों के प्रति सचेत और संयमी रहना भला होता है: "हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जानते हो: इसलिये हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्‍पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो" (याकूब 1:19)। परमेश्वर की उपस्थिति में अपने शब्दों के प्रयोग का नियंत्रण करना, उनके प्रति संयमी होना परमेश्वर के प्रति हमारे आदर और श्रद्धा को भी दिखाता है: "बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के साम्हने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों" (सभोपदेशक 3:7)। जब लोग दुःखी हों तो उनसे सांत्वना के बहुत शब्द कहने की बजाए उनके साथ हमारी मूक उपस्थिति उनके लिए कहीं अधिक शांतिदायक और सहायक हो सकती है: "तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही" (अय्यूब 2:13)।

   परमेश्वर का वचन हमें सिखाता है कि बोलने का भी समय होता है और शांत रहने का भी (सभोपदेशक 3:7)। कम बोलना हमें अधिक सुनने वाला वाला बनाता है। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


या तो आपके बोल आपके शांत रहने से बेहतर हों; 
अन्यथा शांत रहना बेहतर होता है।

फाड़ने का समय, और सीने का भी समय; चुप रहने का समय, और बोलने का भी समय है; - (सभोपदेशक 3:7)

बाइबल पाठ: नीतिवचन 10:17-21
Proverbs 10:17 जो शिक्षा पर चलता वह जीवन के मार्ग पर है, परन्तु जो डांट से मुंह मोड़ता, वह भटकता है। 
Proverbs 10:18 जो बैर को छिपा रखता है, वह झूठ बोलता है, और जो अपवाद फैलाता है, वह मूर्ख है। 
Proverbs 10:19 जहां बहुत बातें होती हैं, वहां अपराध भी होता है, परन्तु जो अपने मुंह को बन्द रखता है वह बुद्धि से काम करता है। 
Proverbs 10:20 धर्मी के वचन तो उत्तम चान्दी हैं; परन्तु दुष्टों का मन बहुत हलका होता है। 
Proverbs 10:21 धर्मी के वचनों से बहुतों का पालन पोषण होता है, परन्तु मूढ़ लोग निर्बुद्धि होने के कारण मर जाते हैं।

एक साल में बाइबल: 
  • श्रेष्ठगीत 6-8
  • गलतियों 4


गुरुवार, 2 जून 2016

सावधानी


   जैमाइका में देखने वाले स्थलों में से मेरा सबसे पसंदीदा स्थल है ओको रियोस - डन्न नदी जल प्रपात का स्थान। उस जल प्रपात को देखना एक ऐसा अद्भुत दृश्य है जिसकी विलक्षण्ता कभी समाप्त नहीं होती। नदी का पानी क्रमवार अनेकों चट्टानों की लंबी श्रंखला पर से होकर बहता हुआ नीचे कैरिबियन सागर की ओर बहता है। दुस्साहसी सैलानी उस प्रपात के मार्ग पर उन गोल चट्टानों और पत्थरों पर नीचे से ऊपर की ओर की एक रोमांचक चढ़ाई का आनन्द भी ले सकते हैं। बहता हुआ पानी, पत्थरों की चिकनी फिसलन भरी सतह, ऊँचाई के खड़े कोण आदि मिलकर इस चढ़ाई को धीमा और खतरनाक बनाते हैं। ऊपर तक पहुँचने के लिए चढ़ने वालों को प्रत्येक कदम देखभाल कर सावधानी से लेना होता है; ज़रा सी चूक से गिर जाने की संभावना लगातार बनी रहती है। सफलता-पूर्वक ऊपर पहुँचने की कुँजी है एकाग्रता तथा सावधानी।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में इफसुस के मसीही विश्वासियों को प्रेरित पौलुस ने उनके मसीही विश्वास की यात्रा के संबंध में जो सचेत किया है, मेरे विचार से डन्न नदी के जल-प्रपात की चढ़ाई से बेहतर उसका चित्रण अन्य कोई नहीं हो सकता है। पौलुस ने लिखा, "इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो" (इफिसियों 5:15)। स्पष्ट है कि जीवन मार्ग में हमारे विरोध में आने वाले अनेकों खतरों का सामना करते हुए जब हम ऊँचाईयों पर पहुँचने के लिए चढ़ते हैं तो अपने प्रभु यीशु के मार्गदर्शन में हम अपना प्रत्येक कदम बुद्धिमता एवं सावधानी से उठाएं और फिर उसे वहीं जमाएं जहाँ हमारा प्रभु चाहता है। पौलुस की यह चेतावनी साफ बताती है कि निर्बुद्धि लोग असावधानी से जीवन जीते हैं, किंतु बुद्धिमान लोग हर कदम सचेत और सावधान होकर बढ़ाते हैं जिससे वे ना तो लड़खड़ाएं और ना ही गिरें।

   जब पौलुस हमें कहता है कि हम परमेश्वर का अनुकरण करें (पद 1), तो यह उद्देश्य हमारे सावधानी और प्रेम में होकर चलने से पूरा होता है (पद 2, 15)। प्रत्येक मसीही विश्वासी में निवास करने वाले परमेश्वर के पवित्र-आत्मा की सहायता से हम सावधानी पूर्वक यह यात्रा परमेश्वर की महिमा के लिए पूरी कर सकते हैं। - डेव बैनन

यदि हम परमेश्वर को अपने मन-मस्तिष्क पर राज करने देंगे, 
तो वह हमारे कदमों को अपने सही मार्गों ले जाता रहेगा।

अपने पांव धरने के लिये मार्ग को समथर कर, और तेरे सब मार्ग ठीक रहें। - नीतिवचन 4:26

बाइबल पाठ: इफिसियों 5:1-17
Ephesians 5:1 इसलिये प्रिय, बालकों की नाईं परमेश्वर के सदृश बनो। 
Ephesians 5:2 और प्रेम में चलो; जैसे मसीह ने भी तुम से प्रेम किया; और हमारे लिये अपने आप को सुखदायक सुगन्‍ध के लिये परमेश्वर के आगे भेंट कर के बलिदान कर दिया। 
Ephesians 5:3 और जैसा पवित्र लोगों के योग्य है, वैसा तुम में व्यभिचार, और किसी प्रकार अशुद्ध काम, या लोभ की चर्चा तक न हो। 
Ephesians 5:4 और न निर्लज्ज़ता, न मूढ़ता की बातचीत की, न ठट्ठे की, क्योंकि ये बातें सोहती नहीं, वरन धन्यवाद ही सुना जाएं। 
Ephesians 5:5 क्योंकि तुम यह जानते हो, कि किसी व्यभिचारी, या अशुद्ध जन, या लोभी मनुष्य की, जो मूरत पूजने वाले के बराबर है, मसीह और परमेश्वर के राज्य में मीरास नहीं। 
Ephesians 5:6 कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे; क्योंकि इन ही कामों के कारण परमेश्वर का क्रोध आज्ञा ने मानने वालों पर भड़कता है। 
Ephesians 5:7 इसलिये तुम उन के सहभागी न हो। 
Ephesians 5:8 क्योंकि तुम तो पहले अन्धकार थे परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो, सो ज्योति की सन्तान की नाईं चलो। 
Ephesians 5:9 (क्योंकि ज्योति का फल सब प्रकार की भलाई, और धामिर्कता, और सत्य है)। 
Ephesians 5:10 और यह परखो, कि प्रभु को क्या भाता है 
Ephesians 5:11 और अन्धकार के निष्‍फल कामों में सहभागी न हो, वरन उन पर उलाहना दो। 
Ephesians 5:12 क्योंकि उन के गुप्‍त कामों की चर्चा भी लाज की बात है। 
Ephesians 5:13 पर जितने कामों पर उलाहना दिया जाता है वे सब ज्योति से प्रगट होते हैं, क्योंकि जो सब कुछ को प्रगट करता है, वह ज्योति है। 
Ephesians 5:14 इस कारण वह कहता है, हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी।
Ephesians 5:15 इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो। 
Ephesians 5:16 और अवसर को बहुमोल समझो, क्योंकि दिन बुरे हैं। 
Ephesians 5:17 इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो, कि प्रभु की इच्छा क्या है?

एक साल में बाइबल: 

  • 2 इतिहास 17-18
  • यूहन्ना 13:1-20


शनिवार, 26 सितंबर 2015

बुद्धिमानी


   कहा जाता है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलबर्ट आइन्सटाईन ने कहा था, "केवल दो चीज़ें असीम हैं, सृष्टि एवं मनुष्यों की मूर्खता; लेकिन इन में से प्रथम के बारे में मैं इतना निश्चित नहीं हूँ।" दुर्भाग्यवश, हम अपनी मूर्खता के कारण अपने आप को अकसर परेशानियों में डाल लेते हैं, या अपनी मूर्खता से दूसरों को परेशानी दे देते हैं अथवा दूसरों की बर्बादी का कारण बन जाते हैं; और हमारे ऐसा करते रहने की कोई सीमा नहीं है।

   ऐसे ही एक खेद के समय में दाऊद ने भजन 38 में अपनी हालत और शिकायत को परमेश्वर के सामने रखा। अपनी मूर्खता के कारण मिले दुखद परिणामों और असफलताओं का वर्णन करते हुए दाऊद ने गंभीर बात कही: "मेरी मूढ़ता के कारण से मेरे कोड़े खाने के घाव बसाते हैं और सड़ गए हैं" (भजन 38:5)। यद्यपि भजनकार यह तो नहीं बताता है कि वे मूर्खताएं क्या थीं या फिर उसके घाव कैसे थे, लेकिन जो बात स्पष्ट है वह है कि दाऊद को यह पता था कि उन दुखों का कारण उसकी मूर्खता ही है।

   ऐसी विनाशकारी मूर्खता के दुषपरिणामों से निकलने का एक ही मार्ग है - परमेश्वर की बुद्धिमानी की शरण में आ जाएं। परमेश्वर के वचन बाइबल की नीतिवचन नामक पुस्तक में लिखा है, "यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है" (नीतिवचन 9:10)। केवल परमेश्वर को हमें बदल देने की अनुमति देने और उससे ऐसा करने का आग्रह करने के द्वारा ही हम अपनी मूर्खताओं और उनके दुषपरिणामों से निकल सकते हैं। उसके धैर्यपूर्ण तथा सप्रेम मार्गदर्शन द्वारा हम बुद्धिमानी के मार्ग पर चलते रह सकते हैं। - बिल क्राउडर


जो नम्रता के साथ परमेश्वर से आग्रह करते हैं, उन्हें परमेश्वर अपनी बुद्धिमता अवश्य प्रदान करता है।

पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी। पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्‍देह न करे; क्योंकि सन्‍देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। - याकूब 1:5-6

बाइबल पाठ: भजन 38:1-15
Psalms 38:1 हे यहोवा क्रोध में आकर मुझे झिड़क न दे, और न जलजलाहट में आकर मेरी ताड़ना कर! 
Psalms 38:2 क्योंकि तेरे तीर मुझ में लगे हैं, और मैं तेरे हाथ के नीचे दबा हूं। 
Psalms 38:3 तेरे क्रोध के कारण मेरे शरीर में कुछ भी आरोग्यता नहीं; और मेरे पाप के कारण मेरी हडि्डयों में कुछ भी चैन नहीं। 
Psalms 38:4 क्योंकि मेरे अधर्म के कामों में मेरा सिर डूब गया, और वे भारी बोझ की नाईं मेरे सहने से बाहर हो गए हैं।
Psalms 38:5 मेरी मूढ़ता के कारण से मेरे कोड़े खाने के घाव बसाते हैं और सड़ गए हैं। 
Psalms 38:6 मैं बहुत दुखी हूं और झुक गया हूं; दिन भर मैं शोक का पहिरावा पहिने हुए चलता फिरता हूं। 
Psalms 38:7 क्योंकि मेरी कमर में जलन है, और मेरे शरीर में आरोग्यता नहीं। 
Psalms 38:8 मैं निर्बल और बहुत ही चूर हो गया हूं; मैं अपने मन की घबराहट से कराहता हूं।
Psalms 38:9 हे प्रभु मेरी सारी अभिलाषा तेरे सम्मुख है, और मेरा कराहना तुझ से छिपा नहीं। 
Psalms 38:10 मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है; और मेरी आंखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही।
Psalms 38:11 मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए। 
Psalms 38:12 मेरे प्राण के ग्राहक मेरे लिये जाल बिछाते हैं, और मेरी हानि के यत्न करने वाले दुष्टता की बातें बोलते, और दिन भर छल की युक्ति सोचते हैं। 
Psalms 38:13 परन्तु मैं बहिरे की नाईं सुनता ही नहीं, और मैं गूंगे के समान मूंह नहीं खोलता। 
Psalms 38:14 वरन मैं ऐसे मनुष्य के तुल्य हूं जो कुछ नहीं सुनता, और जिसके मुंह से विवाद की कोई बात नहीं निकलती।
Psalms 38:15 परन्तु हे यहोवा, मैं ने तुझ ही पर अपनी आशा लगाई है; हे प्रभु, मेरे परमेश्वर, तू ही उत्तर देगा।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 1-2
  • गलतियों 5


सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

शिक्षक


   मेरे पारिवारिक फोटो संग्रह में एक ऐसी फोटो है जहाँ मेरी बेटी, जब वह 4 वर्ष की थी, अपने हाथ में एक छोटी खिलौने वाली हथौड़ी लिए, मेरे साथ हमारे घर की खिड़की की मरम्मत का कार्य करती दिख रही है। उस दिन हम दोनों ने साथ साथ मिलकर घर की मरम्मत का काम किया था, मैं जो जो कर रहा था उसकी वह नकल करती जा रही थी, इस बात में बिलकुल निश्चित कि वह भी घर की मरम्मत में यथासंभव योगदान कर रही है। शायद ही किसी अन्य अवसर पर मुझे काम करने से ऐसा आनन्द आया होगा जैसा इस अवसर पर आया था।

   वह फोटो मुझे स्मरण कराती है कि हमारे बच्चे जो हम अभिभावकों में वार्तालाप और कार्यों में देखते हैं उसी का अनुसरण स्वयं भी करते हैं वैसे ही करते हैं। साथ ही उनके मनों में परमेश्वर की छवि भी हमारे द्वारा ही निर्धारित होती है। यदि हम कठोर और दयारहित होंगे तो सम्भवतः वे परमेश्वर को भी ऐसा ही समझेंगे। यदि हम उन से दूरी बना कर रखते हैं, उनके प्रति असंवेदनशील होते हैं तो उन्हें परमेश्वर भी ऐसा ही प्रतीत होगा। हम अभिभावकों की यह बहुत महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों के मनों में परमेश्वर कि सही पहचान और छवि बना कर दे सकें, विशेषकर परमेश्वर के निस्वार्थ और बिना किसी शर्त के प्रेम के बारे में।

   अपनी कलपना में मैं यह विचार रख सकता हूँ कि मुझे लेकर मेरे पिता परमेश्वर के पास भी एक ऐसा ही फोटो संग्रह होगा। मैं भी परमेश्वर से सीख रहा हूँ कि जीवन कैसे जीना है, प्रेम कैसे करना है, परमेश्वर को अपने जीवन का अभिन्न अंग कैसे बनाना है। मुझे यह सब सिखा कर परमेश्वर तैयार कर रहा है कि मैं भी इन बातों को दूसरों को सिखाने वाला बन सकूँ (व्यवस्थाविवरण 6:1-7)।

   परमेश्वर हमें ऐसी समझ प्रदान करे कि हम उसे जान कर यह बुद्धिमता दूसरों को भी पहुँचाने-सिखाने वाले अच्छे शिक्षक बन सकें। - रैन्डी किल्गोर


यदि आप परमेश्वर से भलि-भांति सीखेंगे तो अपने बच्चों को भी भलि-भांति सिखाने पाएंगे।

और हे बच्‍चे वालों अपने बच्‍चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन-पोषण करो। - इफिसियों 6:4

बाइबल पाठ: व्यवस्थाविवरण 6:1-9
Deuteronomy 6:1 यह वह आज्ञा, और वे विधियां और नियम हैं जो तुम्हें सिखाने की तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने आज्ञा दी है, कि तुम उन्हें उस देश में मानो जिसके अधिकारी होने को पार जाने पर हो; 
Deuteronomy 6:2 और तू और तेरा बेटा और तेरा पोता यहोवा का भय मानते हुए उसकी उन सब विधियों और आज्ञाओं पर, जो मैं तुझे सुनाता हूं, अपने जीवन भर चलते रहें, जिस से तू बहुत दिन तक बना रहे। 
Deuteronomy 6:3 हे इस्राएल, सुन, और ऐसा ही करने की चौकसी कर; इसलिये कि तेरा भला हो, और तेरे पितरों के परमेश्वर यहोवा के वचन के अनुसार उस देश में जहां दूध और मधु की धाराएं बहती हैं तुम बहुत हो जाओ। 
Deuteronomy 6:4 हे इस्राएल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है; 
Deuteronomy 6:5 तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना। 
Deuteronomy 6:6 और ये आज्ञाएं जो मैं आज तुझ को सुनाता हूं वे तेरे मन में बनी रहें; 
Deuteronomy 6:7 और तू इन्हें अपने बाल-बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना। 
Deuteronomy 6:8 और इन्हें अपने हाथ पर चिन्हानी कर के बान्धना, और ये तेरी आंखों के बीच टीके का काम दें। 
Deuteronomy 6:9 और इन्हें अपने अपने घर के चौखट की बाजुओं और अपने फाटकों पर लिखना।

एक साल में बाइबल: 
  • व्यवस्थाविवरण 4-6


शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

बुद्धि का स्त्रोत


   हमारे युवा समय में कार्ल ने, जो अब मेरे पति हैं, मेरे साथ सबंध प्रगाढ़ करने के लिए बहुत मेहनत करी। वे मुझे फोन करते, मुझे पत्र लिखते, मेरे लिए फूलों के गुलदस्ते लाते, मुझे मिठाई खरीद कर देते, मेरे लिए किताबें ले कर आते, मुझे बाहर खाने के लिए लेकर जाते और मुझे उपहार देते रहते। क्योंकि वे मेरे प्रति गंभीर थे, इसलिए वे मेरे साथ संबंध बनाए रखने के लिए भी प्रयासरत रहते थे।

   हज़ारों वर्ष पहले ईसा पूर्व 10वीं शताब्दी में राजा सुलेमान ने भी इसी प्रकार की गंभीरता के साथ किसी अन्य के लिए प्रयास में लगे रहने के निर्देश दिए - बुद्धि के खोजी होने के लिए। शब्दकोश के अनुसार बुद्धिमानी वह गुण है जिससे एक व्यक्ति सत्य, सही और स्थिर बने रहने वाली बात को समझ सकता है। यदि हमने अपने परमेश्वर पिता की महिमा के लिए जीवन जीना है तो बुद्धिमानी का यह गुण हम में होना बहुत आवश्यक है। शायद इसीलिए सुलेमान नें अपने नीतिवचनों में अनेक ऐसी क्रियाओं का उपयोग किया है जो सतत प्रयास को दर्शाती हैं। उसने बुद्धि प्राप्त करने के लिए नीतिवचन 2 में "ध्यान लगाकर सुनो", "मन लगाकर सोचो", "पुकारो", "खोजो", "ढ़ूंढो" आदि क्रियाओं का उपयोग किया है।

   बुद्धि को खोजने और पाने के लिए प्रयास की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर का वचन बाइबल ही हमें बताती है कि खरी बुद्धि कहाँ मिलती है: "क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं" (नीतिवचन 2:6)। साथ ही बाइबल परमेश्वर के विषय में यह भी सिखाती है कि "वह सीधे लोगों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है; जो खराई से चलते हैं, उनके लिये वह ढाल ठहरता है" (नीतिवचन 2:7)।

   अपने सारे मन और प्रयास से परमेश्वर के आज्ञाकारी बनें; आपके जीवन के लिए वह ही खरी बुद्धि का एकमात्र स्त्रोत है। - ऐनी सेटास


आप बहुत ज्ञान तो कहीं से भी प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु खरी बुद्धि परमेश्वर ही से मिलती है।

क्योंकि बुद्धि की प्राप्ति चान्दी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से भी उत्तम है। - नीतिवचन 3:14

बाइबल पाठ: नीतिवचन 2:1-9
Proverbs 2:1 हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करे, और मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े, 
Proverbs 2:2 और बुद्धि की बात ध्यान से सुने, और समझ की बात मन लगा कर सोचे; 
Proverbs 2:3 और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारे, 
Proverbs 2:4 ओर उसको चान्दी की नाईं ढूंढ़े, और गुप्त धन के समान उसी खोज में लगा रहे; 
Proverbs 2:5 तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा। 
Proverbs 2:6 क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं। 
Proverbs 2:7 वह सीधे लोगों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है; जो खराई से चलते हैं, उनके लिये वह ढाल ठहरता है। 
Proverbs 2:8 वह न्याय के पथों की देख भाल करता, और अपने भक्तों के मार्ग की रक्षा करता है। 
Proverbs 2:9 तब तू धर्म और न्याय, और सीधाई को, निदान सब भली-भली चाल समझ सकेगा;

एक साल में बाइबल: उत्पत्ति 6-9

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

बुद्धिमानी के उत्तर


   जब धार्मिक अगुवे व्यभिचार में पकड़ी गई उस स्त्री को लेकर प्रभु यीशु के पास आए और उससे पुछने लगे कि उस स्त्री के साथ क्या किया जाना चाहिए, तो प्रभु यीशु ने उन्हें तुरन्त उत्तर नहीं दिया; वरन वे नीचे झुककर भूमि पर कुछ लिखने लगे (यूहन्ना ८:६-११)। उन्होंने क्या लिखा यह तो हम नहीं जानते, परन्तु जब भीड़ उनसे पूछती ही रही तो एक छोटे वाक्य में प्रभु यीशु ने अपना उत्तर दे दिया: "...तुममें जो निष्‍पाप हो, वही पहिले उसको पत्थर मारे" (यूहन्ना ८:७)। इस छोटे से वाक्य के थोड़े से शब्द उन धार्मिक अगुवों को उनके अपने पाप दिखाने के लिए काफी थे, और वे सब एक एक करके वहां से चले गए। प्रभु यीशु के ये शब्द आज भी संसार भर में गूंज रहे हैं और लोगों को दूसरों पर दोष देने की बजाए स्वयं अपने पापों के प्रति सचेत रहने को प्रेरित कर रहे हैं।

   इन थोड़े शब्दों के बड़े प्रभावी होने का कारण था प्रभु यीशु की अपने स्वर्गीय पिता पर सदा बने रहने वाली निर्भरता; उन्होंने अपने विषय में कहा, "...उस की आज्ञा अनन्‍त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूं, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूं" (यूहन्ना १२:५०)। काश हम सब भी प्रभु यीशु के समान सदा अपने परमेश्वर पिता पर निर्भर रहते और उसकी बुद्धिमता पर निर्भर हो कर ही हर बात का उत्तर देने वाले होते।

   यह बुद्धिमानी आरंभ होती है याकूब की पत्री में लिखे उपदेश के पालन के साथ: "...इसलिये हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्‍पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो" (याकूब १:१९)। जिस धीमेपन की बात यहां करी जा रहा है वह अज्ञानता, भीतरी खोखलेपन, कायरता, लज्जा या दोषी होने के कारण होने वाली मूँह और बुद्धि की खामोशी नहीं है। यह वह खामोशी है जो परमेश्वर पर विचारमग्न रहने और उस पर ध्यान लगाए रखने से आई बुद्धिमानी द्वारा उत्पन्न होती है।

   हम से कई बार कहा जाता है कि बोलने से पहले ज़रा सा थम कर, विचार कर के, फिर बोलें। लेकिन मेरा मानना है कि उत्तर देने की प्रवृत्ति को इस स्तर से भी आगे ले जाकर, सदा परमेश्वर की सुनते रहें और उस पर निर्भर होकर उसके निर्देषों के अनुसार उत्तर देने को अपनी आदत बना लें। जब यह निर्भरता हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगी, तब हमारे सभी उत्तर भी बुद्धिमानी के उत्तर होंगे। - डेविड रोपर


परमेश्वर के लिए बोलने से पहले परमेश्वर की सुनने वाले बनें।

और मैं जानता हूं, कि उस की आज्ञा अनन्‍त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूं, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूं। - यूहन्ना १२:५०

बाइबल पाठ: यूहन्ना ८:१-११
Joh 8:1  परन्‍तु यीशु जैतून के पहाड़ पर गया। 
Joh 8:2  और भोर को फिर मन्‍दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्‍हें उपदेश देने लगा। 
Joh 8:3   तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उस को बीच में खड़ी करके यीशु से कहा। 
Joh 8:4   हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है। 
Joh 8:5  व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्‍त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्‍या कहता है? 
Joh 8:6  उन्‍होंने उस को परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्‍तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा। 
Joh 8:7  जब वे उस से पूछते रहे, तो उस ने सीधे होकर उन से कहा, कि तुम में जो निष्‍पाप हो, वही पहिले उसको पत्थर मारे। 
Joh 8:8   और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा। 
Joh 8:9  परन्‍तु वे यह सुनकर बड़ों से लेकर छोटों तक एक एक करके निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई। 
Joh 8:10 यीशु ने सीधे होकर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्‍या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी। 
Joh 8:11  उस ने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन १२३-१२५ 
  • १ कुरिन्थियों १०:१-१८

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

बुद्धिमानी के उत्तर


   जब धार्मिक अगुवे व्यभिचार में पकड़ी गई उस स्त्री को लेकर प्रभु यीशु के पास आए और उससे पुछने लगे कि उस स्त्री के साथ क्या किया जाना चाहिए, तो प्रभु यीशु ने उन्हें तुरन्त उत्तर नहीं दिया; वरन वे नीचे झुककर भूमि पर कुछ लिखने लगे (यूहन्ना ८:६-११)। उन्होंने क्या लिखा यह तो हम नहीं जानते, परन्तु जब भीड़ उनसे पूछती ही रही तो एक छोटे वाक्य में प्रभु यीशु ने अपना उत्तर दे दिया: "...तुममें जो निष्‍पाप हो, वही पहिले उसको पत्थर मारे" (यूहन्ना ८:७)। इस छोटे से वाक्य के थोड़े से शब्द उन धार्मिक अगुवों को उनके अपने पाप दिखाने के लिए काफी थे, और वे सब एक एक करके वहां से चले गए। प्रभु यीशु के ये शब्द आज भी संसार भर में गूंज रहे हैं और लोगों को दूसरों पर दोष देने की बजाए स्वयं अपने पापों के प्रति सचेत रहने को प्रेरित कर रहे हैं।

   इन थोड़े शब्दों के बड़े प्रभावी होने का कारण था प्रभु यीशु की अपने स्वर्गीय पिता पर सदा बने रहने वाली निर्भरता; उन्होंने अपने विषय में कहा, "...उस की आज्ञा अनन्‍त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूं, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूं" (यूहन्ना १२:५०)। काश हम सब भी प्रभु यीशु के समान सदा अपने परमेश्वर पिता पर निर्भर रहते और उसकी बुद्धिमता पर निर्भर हो कर ही हर बात का उत्तर देने वाले होते।

   यह बुद्धिमानी आरंभ होती है याकूब की पत्री में लिखे उपदेश के पालन के साथ: "...इसलिये हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्‍पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो" (याकूब १:१९)। जिस धीमेपन की बात यहां करी जा रहा है वह अज्ञानता, भीतरी खोखलेपन, कायरता, लज्जा या दोषी होने के कारण होने वाली मूँह और बुद्धि की खामोशी नहीं है। यह वह खामोशी है जो परमेश्वर पर विचारमग्न रहने और उस पर ध्यान लगाए रखने से आई बुद्धिमानी द्वारा उत्पन्न होती है।

   हम से कई बार कहा जाता है कि बोलने से पहले ज़रा सा थम कर, विचार कर के, फिर बोलें। लेकिन मेरा मानना है कि उत्तर देने की प्रवृत्ति को इस स्तर से भी आगे ले जाकर, सदा परमेश्वर की सुनते रहें और उस पर निर्भर होकर उसके निर्देषों के अनुसार उत्तर देने को अपनी आदत बना लें। जब यह निर्भरता हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगी, तब हमारे सभी उत्तर भी बुद्धिमानी के उत्तर होंगे। - डेविड रोपर


परमेश्वर के लिए बोलने से पहले परमेश्वर की सुनने वाले बनें।

और मैं जानता हूं, कि उस की आज्ञा अनन्‍त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूं, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूं। - यूहन्ना १२:५०

बाइबल पाठ: यूहन्ना ८:१-११
Joh 8:1  परन्‍तु यीशु जैतून के पहाड़ पर गया।
Joh 8:2  और भोर को फिर मन्‍दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्‍हें उपदेश देने लगा।
Joh 8:3   तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उस को बीच में खड़ी करके यीशु से कहा।
Joh 8:4   हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है।
Joh 8:5  व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्‍त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्‍या कहता है?
Joh 8:6  उन्‍होंने उस को परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्‍तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा।
Joh 8:7  जब वे उस से पूछते रहे, तो उस ने सीधे होकर उन से कहा, कि तुम में जो निष्‍पाप हो, वही पहिले उसको पत्थर मारे।
Joh 8:8   और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा।
Joh 8:9  परन्‍तु वे यह सुनकर बड़ों से लेकर छोटों तक एक एक करके निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई।
Joh 8:10 यीशु ने सीधे होकर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्‍या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी।
Joh 8:11  उस ने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।


एक साल में बाइबल: 

  • भजन १२३-१२५ 
  • १ कुरिन्थियों १०:१-१८

शुक्रवार, 22 जून 2012

भली विरासत

   मार्टिन लूथर ने, परमेश्वर के वचन बाइबल में सभोपदेशक ९:१५ पर अपनी टिप्पणी में एक युनानी सैनिक, थैमिस्टोक्लिस की कहानी बताई, जो एथेन्स में तैनात युनानी सेना का अधिकारी था। अपनी बुद्धिमता और युद्ध कौशल के कारण थैमिस्टोक्लिस ने सालामिस का युद्ध जीता, युनानी धरती से फारसी सेना को भगाया और अपने नगर को बचाया। इसके कुछ समय बाद वह अपने लोगों की नज़रों से गिर गया, और एथेन्स से बहिष्कृत कर दिया गया। मार्टिन लूथर ने कहानी का अन्त करते हुए लिखा, "थैमिस्टोक्लिस ने अपने नगर के लिए बहुत भला किया, किंतु प्रत्युत्तर में उसे उनसे बहुत कृतघ्नता ही मिली।"

   सामान्यतः यह देखा गया है कि ना जाने क्यों, लोग किसी गरीब या दीन जन द्वारा अपनी बुद्धिमता से किया गया भला कार्य शीघ्र ही भुला देते हैं। परवाह नहीं; चाहे दीन जन की बुद्धिमता तुच्छ जानी जाए तो भी वह पराक्रम से अधिक सामर्थी होती है "यद्यपि दरिद्र की बुद्धि तुच्छ समझी जाती है और उसका वचन कोई नहीं सुनता तौभी पराक्रम से बुद्धि उत्तम है" (सभोपदेशक ९:१६)। किसी अभिमानी, डींगमार मूर्ख व्यक्ति की बजाए एक नम्र, शांत और ईमानदार व्यक्ति होना बहुत भला है, जो चाहे लोगों द्वारा भुला भी दिया जाए, किंतु अपने पीछे एक भली विरासात छोड़ जाता है।

   अन्ततः जो बात महत्व रखती है वह लोगों से मिलने वाली प्रसिद्धी और वाहवाही नहीं, वरन वे भलाई और धार्मिकता के बीज हैं जो हम अपने नेक चरित्र द्वारा नम्र आत्माओं में बोकर जाते हैं, और जो आते समय में अपने फल अवश्य लाएंगे; वे समाज के लिए हमारी भली विरासत हैं। इसे दुसरे रूप में कहें तो, "पर ज्ञान अपनी सब सन्‍तानों से सच्‍चा ठहराया गया है" (लूका ७:३५)।

   क्या आपने अपने जीवन में प्रदर्शित परमेश्वर के भय और नेक चरित्र द्वारा किसी के जीवन में कोई भला बीज बोया है; क्या आपने कोई भली विरासत समाज के लिए छोड़ी है? - डेविड रोपर


बुद्धिमान व्यक्ति, अपने पृथ्वी के जीवन से ही, स्वर्गीय आशीषों को अपना लक्ष्य रखता है।


परन्तु उस में एक दरिद्र बुद्धिमान पुरूष पाया गया, और उस ने उस नगर को अपनी बुद्धि के द्वारा बचाया। तौभी किसी ने उस दरिद्र का स्मरण न रखा। - सभोपदेशक ९:१५

बाइबल पाठ: सभोपदेशक ९:१३-१८
Ecc 9:13  मैं ने सूर्य के नीचे इस प्रकार की बुद्धि की बात भी देखी है, जो मुझे बड़ी जान पड़ी।
Ecc 9:14  एक छोटा सा नगर था, जिस में थोड़े ही लोग थे, और किसी बड़े राजा ने उस पर चढ़ाई करके उसे घेर लिया, और उसके विरूद्ध बड़े बड़े धुस बनवाए।
Ecc 9:15  परन्तु उस में एक दरिद्र बुद्धिमान पुरूष पाया गया, और उस ने उस नगर को अपनी बुद्धि के द्वारा बचाया। तौभी किसी ने उस दरिद्र का स्मरण न रखा।
Ecc 9:16  तब मैं ने कहा, यद्यपि दरिद्र की बुद्धि तुच्छ समझी जाती है और उसका वचन कोई नहीं सुनता तौभी पराक्रम से बुद्धि उत्तम है।
Ecc 9:17  बुद्धिमानों के वचन जो धीमे धीमे कहे जाते हैं वे मूर्खों के बीच प्रभुता करने वाले के चिल्ला चिल्लाकर कहने से अधिक सुने जाते हैं।
Ecc 9:18  लड़ाई के हथियारों से बुद्धि उत्तम है, परन्तु एक पापी बहुत भलाई नाश करता है।


एक साल में बाइबल: 

  • एस्तेर ६-८ 
  • प्रेरितों ६