मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 26


मसीही विश्वासी के गुण (2) - प्रभु को प्राथमिक स्थान देता है 

सुसमाचारों में प्रभु यीशु मसीह द्वारा दिए गए मसीही विश्वासी के सात गुणों में से दूसरा गुण है कि वह प्रभु यीशु मसीह को अपने जीवन में प्राथमिक, सबसे उच्च स्थान देता है। प्रभु के शिष्य के लिए पारिवारिक एवं सांसारिक संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण प्रभु के साथ उसका संबंध होना चाहिए:

 मत्ती 10:37 जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं और जो बेटा या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं

लूका 14:26 यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और लड़के बालों और भाइयों और बहिनों वरन अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता

प्रभु ने इसका उदाहरण स्वयं अपने व्यवहार के द्वारा दिखाया; प्रभु के लिए उसके अपने परिवार जनों से अधिक महत्वपूर्ण वे लोग थे जो उसकी बात सुनते और मानते थे:और उस की माता और उसके भाई आए, और बाहर खड़े हो कर उसे बुलवा भेजा। और भीड़ उसके आसपास बैठी थी, और उन्होंने उस से कहा; देख, तेरी माता और तेरे भाई बाहर तुझे ढूंढते हैं। उसने उन्हें उत्तर दिया, कि मेरी माता और मेरे भाई कौन हैं? और उन पर जो उसके आस पास बैठे थे, दृष्टि कर के कहा, देखो, मेरी माता और मेरे भाई यह हैं। क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहिन और माता है” (मरकुस 3:31-35)

किन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं है कि मसीही शिष्य को अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन या लापरवाह होना चाहिए। परमेश्वर के वचन और प्रयोजन में परिवार ही वह इकाई है जिसमें होकर हम परमेश्वर और उसके प्रेम को समझने पाते हैं। परमेश्वर ने हमारे लिए अपने आप को परिवार के सदस्यों, जैसे कि पिता, पुत्र, पति; और अपने लोगों के साथ अपने संबंध तथा उन लोगों के परस्पर संबंधों को भी पारिवारिक संबंधों जैसे कि पुत्र और पुत्रियों, पत्नी, भाई, आदि के द्वारा व्यक्त किया है। वचन परिवार के प्रति व्यक्ति की जिम्मेदारियों को भी सिखाता है:

निर्गमन 20:12 तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिस से जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में तू बहुत दिन तक रहने पाए

लैव्यव्यवस्था 19:3 तुम अपनी अपनी माता और अपने अपने पिता का भय मानना, और मेरे विश्राम दिनों को मानना; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं

1 तीमुथियुस 5:8 पर यदि कोई अपनों की और निज कर के अपने घराने की चिन्ता न करे, तो वह विश्वास से मुकर गया है, और अविश्वासी से भी बुरा बन गया है

प्रभु यीशु मसीह ने इस ज़िम्मेदारी को भी क्रूस की वेदना सहते हुए निभाया, जब उन्होंने अपनी माता मरियम की ज़िम्मेदारी अपने शिष्य यूहन्ना को सौंपी:परन्तु यीशु के क्रूस के पास उस की माता और उस की माता की बहिन मरियम, क्‍लोपास की पत्नी, और मरियम मगदलीनी खड़ी थी। यीशु ने अपनी माता और उस चेले को जिस से वह प्रेम रखता था, पास खड़े देखकर अपनी माता से कहा; हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है। तब उस चेले से कहा, यह तेरी माता है, और उसी समय से वह चेला, उसे अपने घर ले गया” (यूहन्ना 19:25-27)

साथ ही हम यह भी देखते हैं कि प्रभु की मण्डली के अगुवों को सबसे पहले परिवार की उचित देखभाल करने वाला होना चाहिए, तब ही वह मण्डली की देखभाल ठीक से कर सकेंगे: 

1 तीमुथियुस 3:4-5 अपने घर का अच्छा प्रबन्‍ध करता हो, और लड़के-बालों को सारी गम्भीरता से आधीन रखता होजब कोई अपने घर ही का प्रबन्‍ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली क्योंकर करेगा?

1 तीमुथियुस 3:12 सेवक एक ही पत्नी के पति हों और लड़के बालों और अपने घरों का अच्छा प्रबन्‍ध करना जानते हों

पारिवारिक संबंधों से बढ़कर प्रभु को प्राथमिकता देने का अर्थ परिवार की अनदेखी करना नहीं है, वरन पारिवारिक जिम्मेदारियों की आड़ लेकर, प्रभु के कार्य की अनदेखी नहीं करना है। हमने मरकुस 3:14-15 में से शिष्य के लिए प्रभु के प्रयोजनों में से दूसरे प्रयोजन में देखा था कि प्रभु के शिष्य को जब और जहाँ प्रभु भेजे, तब और वहाँ जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। हम यह भी देख चुके हैं कि प्रभु जब भी किसी व्यक्ति को अपने किसी कार्य के लिए भेजता है, तो उससे संबंधित सारी तैयारियों को पूरा कर लेने के बाद ही ऐसा करता है। इसलिए प्रभु के शिष्य को प्रभु में इस बात के लिए भरोसा रखना चाहिए कि यदि प्रभु उसे कहीं जाने या कुछ करने के लिए कह रहा है, तो प्रभु ने उसके परिवार से संबंधित जिम्मेदारियों के बारे में भी कुछ प्रयोजन कर के रखा होगा, और उस शिष्य की अनुपस्थिति में परिवार को कोई हानि नहीं होगी। साथ ही, शिष्य द्वारा अपने परिवार को प्रभु के हाथों में सौंप कर, प्रभु के कहे के अनुसार करने के लिए जाना, इस बात का अभी सूचक है कि वह शिष्य यह मानता और निभाता है कि उसके परिवार की देखभाल भी प्रभु ही करता है, न कि वह स्वयं; जो कि उसके विश्वास की परिपक्वता का सूचक एवं चिह्न है।

जो प्रभु को महत्व देते हैं, प्रभु उनको भी बहुत महत्व और प्रतिफल देता है:यीशु ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिये घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या लड़के-बालों या खेतों को छोड़ दिया हो। और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और लड़के-बालों और खेतों को पर उपद्रव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन” (मरकुस 10:29-30) 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, अपने आप को प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी कहते हैं, तो प्रभु के सच्चे शिष्य की इस दूसरी पहचान की कसौटी पर आप कहाँ खड़े हैं? प्रभु, उसकी आज्ञाकारिता, और उस का वचन आपके जीवन में क्या महत्व रखता है; क्या स्थान पाता है? क्या आपने प्रभु को अपने जीवन में प्राथमिक तथा सर्वोच्च स्थान दिया है? वह राजाओं का राजा, प्रभुओं का प्रभु, सृष्टि का रचयिता एवं स्वामी और सर्वशक्तिमान परमेश्वर है; उसको उसकी महिमा और हस्ती के उपयुक्त स्थान न देना, उसका अपमान करना है। इसलिए यदि आप प्रभु के जन हैं, तो प्रभु को अपने जीवन में उसका सही आदर और स्थान भी प्रदान करें। 

और यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 9-11
  • 1 तिमुथियुस 6

सोमवार, 25 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 25


मसीही विश्वासी के गुण (1) - प्रभु के वचनों में बना रहता है 

      पिछले लेखों में हमने मरकुस 3:14-15 से प्रभु के अपने शिष्यों के लिए तीन प्रयोजनों को देखा था, कि शिष्य प्रभु के साथ रहें, और जब तथा जहाँ भी प्रभु उन्हें भेजे, वहाँ जाकर वह प्रचार करें जो प्रभु उन्हें करने को कहे। पहला प्रयोजन प्रभु के साथ रहकर उससे सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए है; दूसरा उसकी आज्ञाकारिता और उसके प्रति समर्पण में होकर, अपनी नहीं वरन उसकी इच्छा पूरी करने से संबंधित है; और तीसरा  प्रयोजन उस अधिकार के बारे में है, जो अपने साथ रहने वाले, और अपने आज्ञाकारी शिष्यों को प्रभु देता है। प्रभु के प्रत्येक शिष्य के जीवन में, उसकी प्रभावी और सफल मसीही सेवकाई के लिए, ये तीनों प्रयोजन बहुत महत्वपूर्ण, वरन अनिवार्य हैं।

इन प्रयोजनों के अतिरिक्त, सुसमाचारों प्रभु ने सात ऐसे गुणों को भी बताया जो उसके शिष्यों में पाए जाने चाहिएं। इन गुणों का होना ही किसी व्यक्ति के इस दावे की पुष्टि करेगा कि वह वास्तव में प्रभु यीशु मसीह का शिष्य है। आज हम इन सात में से पहले गुण के बारे में देखेंगे:

1. शिष्य प्रभु यीशु मसीह के वचनों में बना रहता है: प्रभु के वचन को जानना या पढ़ना, और उस वचन में बने रहना, दो भिन्न बातें हैं। वचन में बने रहने का अर्थ है कि प्रभु यीशु का सच्चा शिष्य केवल उस के वचनों को पढ़ता, और जानता नहीं है, वरन उन्हें सीखता, समझता है, और साथ ही उनका पालन करता है, उन्हें अपने व्यावहारिक जीवन में दिखाता है; तथा औरों को भी प्रभु के वचन के बारे में बताता और सिखाता है। इस संदर्भ में कुछ पदों को देखिए:

यूहन्ना 8:31 तब यीशु ने उन यहूदियों से जिन्होंने उन की प्रतीति की थी, कहा, यदि तुम मेरे वचन में बने रहोगे, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे

यूहन्ना 14:15 यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे

यूहन्ना 14:21 जिस के पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उस से मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उस से प्रेम रखूंगा, और अपने आप को उस पर प्रगट करूंगा

यूहन्ना 14:23 यीशु ने उसको उत्तर दिया, यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ वास करेंगे

इन पदों से यह स्पष्ट है कि स्वयं प्रभु यीशु मसीह के कहे के अनुसार, उनका सच्चा शिष्य वही है जो उनके वचन को अपने जीवन में प्राथमिक स्थान देता है, उन में बना रहता है, और उसकी बातों का पालन करता है। यदि कोई यह कहता है कि वह प्रभु से प्रेम करता है, तो यह भी इसी से प्रमाणित होता है कि वह प्रभु के वचन से कितना प्रेम करता है। यदि व्यक्ति परमेश्वर के वचन बाइबल से प्रेम नहीं करता है, तो प्रभु द्वारा यूहन्ना 14:21, 23 में कहे के अनुसार, उसका प्रभु से प्रेम करने का दावा अस्वीकार्य है।

प्रभु क्यों चाहता है कि उनके शिष्य उसके वचन में बने रहें? क्योंकि यदि शिष्य प्रभु में बना नहीं रहे, तो फिर वह प्रभु के लिए फलवंत, उपयोगी भी नहीं हो सकता है :तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग हो कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:4-5)। यदि शिष्य प्रभु के लिए फलवंत नहीं है, प्रभु द्वारा अपने शिष्यों को दी गई महान आज्ञा (मत्ती 28:18-20) का पालन नहीं कर रहा है, तो फिर उसकी शिष्यता व्यर्थ है। 

हम कैसे पहचान सकते हैं कि हम प्रभु के वचनों में बने हुए हैं? दो प्रमुख चिह्न हैं जो यह दिखाते हैं कि हम प्रभु के वचन के साथ केवल एक औपचारिकता नहीं निभा रहे हैं, वरन वास्तव में प्रभु के वचन में बने हुए हैं:

पहला चिह्न है, जो प्रभु के वचन में बना रहता है, वह उसका पालन भी करता है, “पर जो कोई उसके वचन पर चले, उस में सचमुच परमेश्वर का प्रेम सिद्ध हुआ है: हमें इसी से मालूम होता है, कि हम उस में हैं” (1 यूहन्ना 2:5); “और जो उस की आज्ञाओं को मानता है, वह उस में, और वह उन में बना रहता है: और इसी से, अर्थात उस आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है” (1 यूहन्ना 3:24) 

और दूसरा चिह्न है, कि उस शिष्य का चाल-चलन और व्यवहार प्रभु के समान होता जाता है,  “सो कोई यह कहता है, कि मैं उस में बना रहता हूं, उसे चाहिए कि आप भी वैसा ही चले जैसा वह चलता था” (1 यूहन्ना 2:6); “तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूं” (1 कुरिन्थियों 11:1)

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, अपने आप को प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी कहते हैं, तो प्रभु के सच्चे शिष्य की इस पहली पहचान की कसौटी पर आप कहाँ खड़े हैं? प्रभु का वचन आपके जीवन में क्या महत्व रखता है; क्या स्थान पाता है? और यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 6-8     
  • 1 तिमुथियुस 5

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 24

   

मसीही विश्वासी के प्रयोजन (8) - आश्चर्यकर्मों के लिए अधिकार

      मरकुस 3:14-15 में अपने शिष्यों के लिए प्रभु के तीन प्रयोजनों में से दो को, कि शिष्य प्रभु के साथ रहें, और जब तथा जहाँ भी प्रभु उन्हें भेजे, वहाँ जाकर वह प्रचार करें जो प्रभु उन्हें करने को कहे हम देख चुके हैं। प्रभावी और सफल सेवकाई के लिए ये तीनों प्रयोजन बहुत महत्वपूर्ण, वरन अनिवार्य हैं। पहला प्रयोजन प्रभु के साथ रहकर उससे सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए है; दूसरा उसकी आज्ञाकारिता और उसके प्रति समर्पण में होकर, अपनी नहीं वरन उसकी इच्छा पूरी करने से संबंधित है। और आज हम तीसरे प्रयोजन उस अधिकार के बारे में देखेंगे, जो अपने साथ रहने वाले, और अपने आज्ञाकारी शिष्यों को प्रभु देता है। 

तीसरा प्रयोजन हैऔर दुष्टात्माओं के निकालने का अधिकार रखें” (मरकुस 3:15)। प्रभु ने अपने शिष्यों को संसार में अपने प्रतिनिधि होने के लिए बुलाया और चुना था, और प्रभु की पृथ्वी की सेवकाई के पश्चात, उन्हें ही प्रभु के कार्य को आगे बढ़ाना था, सारे संसार में पहुँचाना था। जो संसार के सामने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रतिनिधि होंगे, उन प्रतिनिधियों में उन्हें यह अधिकार देने वाले के समान कुछ गुण भी अवश्य होंगे। इसीलिए हम देखते हैं कि प्रभु ने अपने आज्ञाकारी और समर्पित शिष्यों को एक ऐसा अधिकार भी दिया, जो संसार का कोई व्यक्ति, कोई सामर्थ्य उन्हें नहीं दे सकती थी - वे दुष्टात्माओं पर अधिकार रखें। मत्ती यह भी बताता है कि प्रभु ने न केवल दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार दिया, वरन बीमारियों और दुर्बलताओं को दूर करने का भी अधिकार दियाफिर उसने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें” (मत्ती 10:1)। और जब प्रभु ने उन्हें प्रचार के लिए भेजा, तो उन्होंने यह सब किया भीऔर उन्होंने जा कर प्रचार किया, कि मन फिराओ। और बहुतेरे दुष्टात्माओं को निकाला, और बहुत बीमारों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया” (मरकुस 6:12-13)। किन्तु मरकुस 9:14-29 (तथा मत्ती 17:14-20, और लूका 9:37-42) में एक और घटना भी है जब यही शिष्य एक लड़के में से एक दुष्टात्मा को नहीं निकाल सके। और प्रभु ने उनकी असफलता का कारण उनका अविश्वास और प्रार्थना की कमी को बताया। संभवतः शिष्यों में प्रभु की बजाए अपने आप पर, अपनी सामर्थ्य पर भरोसा आ गया था; वे प्रभु पर विश्वास के साथ नहीं, अपने ऊपर रखे गए विश्वास द्वारा यह करना चाह रहे थे, और जब असफल रहे तो संदेह में भी आ गए। 

प्रभु द्वारा शिष्यों के प्रयोजनों के लिए दिया गया क्रम और अभिप्राय आज भी उतने ही महत्वपूर्ण और कार्यकारी हैं। जो प्रार्थना और वचन के अध्ययन के द्वारा प्रभु के साथ बने रहते हैं; जो प्रभु के आज्ञाकारी रहते हैं, तब ही और वही कहते और करते हैं जब और जो प्रभु कहता है; और हर बात के लिए प्रभु पर निर्भर तथा उस पर विश्वास रखने वाले रहते हैं, वे फिर प्रभु के लिए अपनी सेवकाई के दौरान प्रभु से आश्चर्यकर्म भी करने की सामर्थ्य पाते हैं और उन कार्यों को करते हैं। प्रभु यीशु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई के अंत में, अपने स्वर्गारोहण के समय, शिष्यों को संसार में सुसमाचार प्रचार के लिए जाने से पहले फिर से यह अधिकार दिए थे (मरकुस 16:17-18), किन्तु प्राथमिकता फिर भीविश्वास करनेही की थी - जो विश्वास में स्थिर और दृढ़ होगा, उसी में ये बातें भी कार्यकारी होंगी। 

आज बहुत से लोग प्रभु यीशु के नाम में चमत्कार और अद्भुत कामों के द्वारा लोगों को लुभाने में लगे हुए हैं, और प्रभु ने बता भी दिया था कि ऐसे लोग होंगे, किन्तु प्रभु उन्हें स्वीकार नहीं करेगा; क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की आज्ञाकारिता में नहीं, अपनी ही इच्छा में होकर यह सब किया (मत्ती 7:21-23)। अंत के दिनों के लिए, जिनमें हम आज हैं, यह भविष्यवाणी है कि बहुत से लोग चिह्नों और चमत्कारों के द्वारा बहकाए जाएंगे (2 थिस्सलुनीकियों 2:9-12)। साथ ही 2 कुरिन्थियों 11:13-15 में भी चेतावनी दी गई है कि शैतान के दूत प्रभु के लोगों का भेष धरकर और उनके समान बातें करने के द्वारा लोगों को बहका और भटका देते हैं। किन्तु मरकुस 3:14-15 हमें इस धोखे में पड़ने और बहकाए जाने से बचे रहने का तरीका बताता है। जो भी अपने आप को प्रभु का शिष्य, उसका अभिषिक्त कहे, उसके जीवन में उपरोक्त तीनों प्रयोजन उसी क्रम में विद्यमान होने चाहिएं जिसमें प्रभु ने शिष्यों के लिए निर्धारित करे हैं, कहे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो सचेत हो जाने और उस जन को वचन की कसौटी पर बारीकी से परखने की आवश्यकता है।

प्रभु के सच्चे शिष्यों की प्राथमिकता प्रभु के साथ बने रहना और उसकी आज्ञाकारिता में रहना है, न कि चिह्न और चमत्कार दिखाकर लोगों को प्रभावित तथा आकर्षित करने, और उनसे भौतिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति रखना। प्रभु ने कभी भी अपने शिष्यों से यह नहीं कहा कि वे इन चिह्नों और चमत्कारों को करने की सामर्थ्य को भौतिक लाभ अर्जित करने का माध्यम बना लें; जो ऐसा करते हैं वे प्रभु की इच्छा का नहीं अपनी इच्छा का पालन करते हैं। इसीलिए प्रभु का निर्देश हैसब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो” (1 थिस्स्लुनीकियों 5:21)। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो सचेत होकर, प्रभु के वचन के अनुसार अच्छे से जाँच-परखकर ही इन विलक्षण और अद्भुत लगने वाली बातों और उनके करने वालों पर भरोसा करें। धोखे में पड़ने से स्वयं भी बचें, तथा औरों को भी बचाकर रखें।

जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 3-5     
  • 1 तिमुथियुस 4

शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 23

    

मसीही विश्वासी के प्रयोजन (7) - प्रचार के लिए तैयार (2)

प्रभु यीशु मसीह का, मरकुस 3:14-15 में, अपने शिष्यों के लिए दूसरा प्रयोजन थावह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें”, और हमने इसके तीसरे भाग, शिष्यप्रचार करेंको पिछले लेख में देखना आरंभ किया। अपने स्वर्गारोहण के समय प्रभु ने अपने शिष्यों को प्रचार करने के बारे में जो निर्देश दिए, वे हमें मत्ती 28:18-20, मरकुस 16:15-19, और प्रेरितों 1:8 में मिलते हैं। इन तीनों खण्डों में दिए गए प्रभु के निर्देशों के अनुसार प्रचार का कार्य करने से, बहुत विरोध, कठिनाइयों, और बाधाओं के बावजूद वे शिष्य सुसमाचार प्रचार बहुत प्रभावी और सफल रीति से कर सके, जिससे दो दशक के भीतर ही उनके लिए ये कहा जाने लगा कि “...ये लोग जिन्होंने जगत को उलटा पुलटा कर दिया है...” (प्रेरितों 17:6)। अर्थात, प्रभु द्वारा उन्हें दिए गए इन निर्देशों में वह सामर्थी कुंजी है, जो संसार भर में प्रभावी और सफल सुसमाचार प्रचार का मार्ग बताती है। आज हम अनेकों प्रकार के आधुनिक साधन और सहूलियतों के होने बावजूद, अपने मानवीय तरीकों से उतना प्रभावी और सफल सुसमाचार प्रचार नहीं करने पाते हैं, जितना उन आरंभिक दिनों में उन शिष्यों ने कर दिखाया था। यद्यपि सुसमाचार प्रचार से संबंधित बहुत सी शिक्षाएं प्रेरितों के काम की पूरी पुस्तक और नए नियम की अन्य पत्रियों में दी गई हैं, हम यहाँ पर केवल प्रभु के स्वर्गारोहण से संबंधित उपरोक्त तीनों खंडों में प्रभु द्वारा दिए गए इन निर्देशों में क्या विशेष था, जिससे वे शिष्य इतने प्रभावी हो सके, केवल उसे ही देखेंगे:

       प्रभु ने ये निर्देश अपने प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध शिष्यों को दिए थे। अर्थात, यह कार्य यरूशलेम से आरंभ कर के सारे संसार भर में (प्रेरितों 1:8), उनके द्वारा किए जाने के लिए था जिन्होंने सच्चे मन से प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण कर लिया था, और उसके कहे को करने के लिए प्रतिबद्ध थे। ये शिष्य प्रभु द्वारा इस कार्य के लिए तैयार किए तथा प्रभु के अधिकार (मत्ती 28:18) के साथ भेजे गए थे; किसी मनुष्य अथवा मानवीय विधि के द्वारा नहीं। सुसमाचार प्रचार के लिए इनकी योग्यता किसे कॉलेज अथवा सेमनरी से मिली डिग्री नहीं, वरन प्रभु की शिष्यता थी। उन शिष्यों ने यह कार्य अपने प्रभु के लिए किया था, न कि किसी नौकरी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए। उन्होंने यह प्रचार प्रभु के कहे के अनुसार, उसकी आज्ञाकारिता में, उसे प्रसन्न करने के लिए किया था, न कि किसी मत (denomination) या समुदाय की मान्यताओं के अनुसार अथवा उसके अधिकारियों की संतुष्टि के लिए।

उन शिष्यों को न तो किसी धर्म का प्रचार करना था, और न ही किसी का धर्म परिवर्तन करना था। उन्हें प्रभु यीशु के कहे के अनुसार मसीह यीशु के शिष्य बनाने थे, और फिर जो स्वेच्छा से शिष्य बन जाए, उसे बपतिस्मा देना था और प्रभु की बातें सिखानी थीं (मत्ती 28:19-20); यह सभी प्रचारकों और उपदेशकों के लिए जाँचने की बात है कि क्या वे प्रभु द्वारा दिए गए इस क्रम और निर्देश का पालन कर रहे हैं? उन्हें लोगों को लुभाना नहीं था, न ही कोई ऐसे आश्वासन देने थे जिनका प्रभु ने न तो कोई उल्लेख किया और न ही कोई निर्देश दिया। उनके द्वारा सुसमाचार प्रचार पापों के पश्चाताप के आह्वान के साथ होना था न कि सांसारिक बातों और भौतिक सुख-समृद्धि तथा शारीरिक चंगाइयों के प्रलोभन देने के द्वारा। न ही उन्हें किसी अन्य के धर्म या विश्वास को नीचा दिखाने, उसकी आलोचना करने के लिए कहा गया था; उन्हें केवल अपने व्यक्तिगत जीवन और व्यवहार एवं वार्तालाप से प्रभु यीशु मसीह और उसके कार्य को संसार के लोगों के सामने ऊंचे पर उठाना था, शेष कार्य परमेश्वर पवित्र आत्मा ने करना था।

क्योंकि ये शिष्य प्रभु के अधिकार के साथ, और प्रभु के निर्देशों के अंतर्गत, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त करने के साथ सुसमाचार प्रचार के लिए भेजे गए थे, इसलिए आवश्यकता के अनुसार, उनके प्रचार के दौरान, उनके प्रचार के साथ ही उनके द्वारा ईश्वरीय सामर्थ्य के कार्य भी हो जाने, और खतरों में भी प्रभु द्वारा सुरक्षित रखे जाने का आश्वासन उनके साथ था (मरकुस 16:15-18)। यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि प्रभु ने उन्हें आश्चर्यकर्म करके लोगों को प्रभावित करने और लुभाने, इन बातों के द्वारा अपने नाम को ऊंचा दिखाने के लिए नहीं भेजा था। जैसे प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के दौरान था, वैसे ही उन शिष्यों का प्राथमिक कार्य सुसमाचार प्रचार था। जैसे प्रभु ने आश्चर्यकर्म सुसमाचार प्रचार के दौरान आवश्यकतानुसार किए, उसी प्रकार इन शिष्यों को भी करना था। न प्रभु ने आश्चर्यकर्मों को लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रयोग किया, और न ही इन शिष्यों को ऐसा करना था। तात्पर्य यह कि अद्भुत काम और आश्चर्यकर्म प्राथमिक नहीं थे; सुसमाचार और पापों से पश्चाताप करना तथा उद्धार पाना प्राथमिक था; यही करना था, और शेष बातें समय और आवश्यकता के अनुसार स्वतः ही होनी थीं।

आज लोग सच्चे सुसमाचार के प्रचार में बहुत कम, और प्रभु यीशु मसीह के नाम में अपने मत या समुदाय की बातों के प्रचार में, या सांसारिक बातों, भौतिक समृद्धि, और शारीरिक चंगाइयों के प्रचार और प्रदर्शन में बहुत अधिक लगे हुए हैं। आज के प्रचारक प्रभु यीशु को प्रसन्न करने की बजाए, अपने द्वारा किए गए कार्यों के आँकड़े (statistics) अपने अधिकारियों और संसार के लोगों के सामने रखने में अधिक रुचि रखते हैं। हम जगत के अंतिम दिनों में रह रहे हैं; प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, “...देखो, मैं तुम से कहता हूं, अपनी आंखें उठा कर खेतों पर दृष्टि डालो, कि वे कटनी के लिये पक चुके हैं” (यूहन्ना 4:35); “...पके खेत बहुत हैं; परन्तु मजदूर थोड़े हैं: इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो, कि वह अपने खेत काटने को मजदूर भेज दे” (लूका 10:2)। आज प्रभु यीशु मसीह को किसी मत या समुदाय की नौकरी करने वाले प्रचारकों की नहीं, उसका शिष्य बनकर सच्चे समर्पण और आज्ञाकारिता तथा प्रतिबद्धता के साथ सुसमाचार प्रचार करने वालों की बहुत आवश्यकता है। क्या आप प्रभु के लिए यह निर्णय करेंगे, और अपने आप को उसकी सेवकाई के लिए समर्पित करेंगे?

 जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 1-2     
  • 1 तिमुथियुस  

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 22


मसीही विश्वासी के प्रयोजन (6) - प्रचार के लिए तैयार (1)

मसीही विश्वास एवं शिष्यता के अध्ययन के अंतर्गत हम मरकुस 3:14-15 से प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों के लिए रखे गए प्रयोजनों पर मनन कर रहे हैं। शिष्यों के लिए प्रभु के दूसरे प्रयोजनवह उन्हें भेजे, कि प्रचार करेंके पहले और दूसरे भाग को हम पिछले लेखों में देख चुके हैं, और आज इस दूसरे प्रयोजन के तीसरे भाग, प्रभु जब और जहाँ उन्हें भेजें, वे वहाँ जाकरप्रचार करेंको देखेंगे।

प्रचार करना, पुराने तथा नए नियम में, समस्त पवित्र शास्त्र में प्रभु के लोगों की एक प्रमुख गतिविधि रही है। प्रभु यीशु का अग्रदूत, यूहन्ना आया, जो जंगल में बपतिस्मा देता, और पापों की क्षमा के लिये मन फिराव के बपतिस्मा का प्रचार करता था” (मरकुस 1:4)। जब प्रभु यीशु की सेवकाई का समय आया, तब यूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मरकुस 1:14-15)। अपने बारह शिष्यों को चुनने के बाद, प्रभु ने उन्हें कुछ निर्देश देकर दो-दो करके भेजा (मरकुस 6:7-11), “और उन्होंने जा कर प्रचार किया, कि मन फिराओ। और बहुतेरे दुष्टात्माओं को निकाला, और बहुत बीमारों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया” (मरकुस 6:12-13)। और अपनी पृथ्वी की सेवकाई के अंत, अपने स्वर्गारोहण के समय प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को यरूशलेम से आरंभ करके संसार के छोर तक उसके गवाह होने (प्रेरितों 1:8) की ज़िम्मेदारी सौंपी, “और उसने उन से कहा, तुम सारे जगत में जा कर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करोजो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा” (मरकुस 16:15-16)। उन्हें सारे संसार में जाकर उद्धार के सुसमाचार को बताना था; और तब से लेकर आज दिन तक प्रभु यीशु के शिष्य, विभिन्न विधियों एवं उपलब्ध माध्यमों से, सारे संसार में यही करते आ रहे हैं।

न केवल प्रभु ने शिष्यों से प्रचार करने को कहा, वरन उन्हें उस प्रचार का मुख्य विषय, उसकी विधि, और संबंधित बातों का क्रम भी बतायायीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं” (मत्ती 28:18-20); “और उन्होंने निकलकर हर जगह प्रचार किया, और प्रभु उन के साथ काम करता रहा, और उन चिह्नों के द्वारा जो साथ साथ होते थे वचन को, दृढ़ करता रहा। आमीन” (मरकुस 16:20)। मत्ती और मरकुस रचित सुसमाचारों के अंत में दी गई प्रभु की ये बातें, बहुत महत्वपूर्ण और हमारे लिए बहुत ध्यान देने योग्य शिक्षाएं हैं, क्योंकि प्रभु का यही निर्देश, जगत के अंत तक, सफल और प्रभावी प्रचार की कुंजी है; और जब शिष्य प्रभु के कहे के अनुसार करते रहे, तो, जैसा उपरोक्त मरकुस 16:20 में लिखा है, प्रभु भी उनके साथ होकर कार्य करता रहा, उनके प्रचार को सफल और प्रभावी करता रहा। इसका प्रमाण हम कुछ ही समय पश्चात प्रेरितों के काम में लिखी एक बात में देखते हैं, “और उन्हें न पाकर, वे यह चिल्लाते हुए यासोन और कितने और भाइयों को नगर के हाकिमों के सामने खींच लाए, कि ये लोग जिन्होंने जगत को उलटा पुलटा कर दिया है, यहां भी आए हैं” (प्रेरितों 17:6) - यह लगभग 52 ईस्वी, अर्थात प्रभु यीशु के स्वर्गारोहण से लगभग 18-19 वर्ष बाद की बात है। तात्पर्य यह कि प्रभु यीशु के स्वर्गारोहण के दो दशकों के भीतर ही, प्रभु के शिष्यों ने अपने प्रचार द्वाराजगत को उलटा पुलटाकर दिया था, यानि कि जगत में खलबली मचा दी थी। 

उस समय उन प्रचारकों के पास न तो यात्रा के कोई विशेष साधन थे, संपर्क एवं संचार की कोई व्यवस्था थी, न ही सम्पूर्ण वचन लिखित और संकलित रूप में जैसा आज हमारे हाथों में है उपलब्ध था। अभी तो सारी पत्रियाँ लिखी भी नहीं गई थीं! उन आरंभिक प्रचारकों के लिए भी सुसमाचार प्रचार करना सहज अथवा सरल नहीं था; उनको भी बहुत विरोध और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। किन्तु फिर भी प्रभु द्वारा दिए गए सुसमाचार प्रचार के इस साधारण से सूत्र (फौरमुले), इस विधि ने उनके प्रचार को बहुत प्रभावी और सामर्थी बना दिया था। जो काम इस विधि के द्वारा तब किया गया, वही आज भी संभव है, क्योंकि प्रभु के समान उसका वचन, उसकी बात युगानुयुग एक सी है, कभी बदलती नहीं है और हर युग, हर स्थान, हर सभ्यता के लिए सदा प्रभावी और उपयोगी है। इसलिए प्रभावी सुसमाचार प्रचार के लिए आज हमें भी मनुष्यों द्वारा बनाई गई और सिखाई जाने वाली बातों के स्थान पर प्रभु के इस सुसमाचार प्रचार के उपाय को जानने, समझने, और उसका पालन करने की आवश्यकता है। अगले लेख में हम इसी के बारे में कुछ और देखेंगे।

यदि आप प्रभु के शिष्य हैं, और उसके लिए उपयोगी होना चाहते हैं, तो प्रभु के वचन का अध्ययन करने और प्रभु से मार्गदर्शन प्राप्त करते रहने के लिए प्रार्थना करते रहिए। उसके वचन, बाइबल, का अध्ययन करते समय, बाइबल में आपकी सेवकाई से संबंधित दी गई बातों को सीखने, समझने, और उनका पालन करने पर विशेष ध्यान दीजिए - वे ही प्रभु द्वारा उस सेवकाई के प्रभावी रीति से किए जाने, उसके प्रभु के लिए फलवंत होने का सही मार्ग हैं। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।     

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 65-66     
  • 1 तिमुथियुस 2

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 21

     

मसीही विश्वासी के प्रयोजन (5) - जाने को तैयार

 मसीही विश्वास एवं शिष्यता के अंतर्गत हम मरकुस 3:14-15 से प्रभु द्वारा अपने शिष्यों के लिए रखे गए प्रयोजनों पर मनन कर रहे हैं। पिछली बार हमने प्रभु के दूसरे प्रयोजनवह उन्हें भेजे, कि प्रचार करेंके पहले भाग को, कि प्रभु के शिष्य जब और जहाँ प्रभु कहे तब और वहाँ जाने के लिए तैयार हों को देखा था। आज हम इस दूसरे प्रयोजन के दूसरे भाग जबवह उन्हेंभेजे तब ही जाएं को देखेंगे। प्रभु की आज्ञाकारिता में होकर कार्य करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा शैतान हमें बहका कर गिरा देगा या किसी हानि अथवा बुराई में फंसा देगा और हमारी सेवकाई को व्यर्थ कर देगा। प्रभु की आज्ञाकारिता ही हमारी सुरक्षा है। हम आते समय और परिस्थितियों को नहीं जानते हैं, किन्तु प्रभु जानता है; इसीलिए वह हमें तब ही कहीं आगे बढ़ने के लिए कहता है जब वह निश्चिंत होता है कि अब आगे बढ़ने में कोई खतरा नहीं है। इसका एक उदाहरण और स्वरूप हम इस्राएलियों की मिस्र से कनान की यात्रा में देखते हैं। गिनती 9:18-23 में लिखा है कि जब तक यहोवा की उपस्थिति का बादल उन पर छाया रहता था, इस्राएली छावनी डाले रहते थे। वे तब ही कूच करते थे जब यहोवा की उपस्थिति का बादल उन पर से ऊपर उठता था; चाहे वह रात भर तक ही छाया रहे, अथवा कुछ दिन, या महीने, या वर्ष भर तक। उनकी यात्रा परमेश्वर के कहने पर ही होती थी, और कब कहाँ छावनी डालनी है, वह स्थान भी यहोवा ही निर्धारित करता था (व्यवस्थाविवरण 1:32-33)

गिनती 13 और 14 अध्याय में हम देखते हैं कि कनान के किनारे पर पहुँच कर, यह जानते हुए भी कि परमेश्वर उनको एक उत्तम देश दे रहा है, मनुष्यों की बातों में आकर पहले तो इस्राएलियों ने कनान में प्रवेश करने से मना किया। फिर जब यहोवा उनके इस अविश्वास से क्रोधित हुआ, तो फिर से उसकी इच्छा और आज्ञा के विरुद्ध, उन्होंने अपने ही निर्णय के अनुसार कनान में प्रवेश करना चाहा; और दोनों ही परिस्थितियों में उन्हें भारी हानि उठानी पड़ी - उनकी कुछ दिन की यात्रा 40 वर्ष की यात्रा बन गई, जिसमें बलवा करनी वाली सारी पीढ़ी के लोग मारे गए, उन बलवाइयों में से एक भी कनान में प्रवेश नहीं करने पाया। कनान में प्रवेश करने के बाद यहोशू ने परमेश्वर की आज्ञाकारिता में असंभव प्रतीत होने वाली विधि से, यरीहो पर एक महान विजय प्राप्त की। इसके तुरंत बाद हम यहोशू 6 और 7 अध्याय में देखते हैं कि एक छोटे से स्थान ऐ पर जब यहोशू ने अपनी बुद्धि और लोगों की सलाह के अनुसार चढ़ाई की, तो मुँह की खाई, उसे भारी पराजय मिली; अंततः उन्हें ऐ पर विजय परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार करने से ही मिली। नए नियम में भी पौलुस की सुसमाचार प्रचार सेवकाई में हम ऐसे ही उदाहरण देखते हैं। पौलुस, परमेश्वर की ओर से अन्यजातियों में सुसमाचार प्रचार के लिए नियुक्त किया गया था (गलातीयों 2:7-9)। हम प्रेरितों 16:6-10 से देखते हैं कि अपनी इसी सेवकाई को करने के प्रयास में दो बार पवित्र आत्मा ने उसे उसके गंतव्य में जाने से रोका; और फिर अंततः उसे मकिदुनिया जा कर प्रचार करने का दर्शन दिया, और तब पौलुस वहाँ इस निश्चय के साथ गया परमेश्वर ने उसे वहाँ भेजा है। 

प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने पुनरुत्थान के बाद शिष्यों से कहा कि वे यरूशलेम में प्रतीक्षा करें और जब पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त कर लें, तब ही सुसमाचार प्रचार की सेवकाई पर निकलें (प्रेरितों 1:4, 8)। वे शिष्य इससे पहले भी प्रभु के कहे के अनुसार इसी सेवकाई के लिए जा चुके थे और सेवकाई के दौरान उन्होंने बहुत से आश्चर्यकर्म भी किए थे (मरकुस 6:7-13; लूका 10:1-17)। किन्तु अब, प्रभु ने उन्हें प्रतीक्षा करने और निर्धारित सामर्थ्य प्राप्त करने के बाद ही सेवकाई पर निकलने के लिए कहा। प्रभु के कहे के अनुसार, वे शिष्य उस प्रतीक्षा में रहे और अपना समय प्रार्थना में और परमेश्वर की स्तुति करने में बिताते रहे (लूका 24:50-53; प्रेरितों 1:12-14)। जो लोग चाहे प्रभु के नाम से, किन्तु अपनी ही इच्छा के अनुसार प्रचार और कार्य करते हैं, प्रभु उसेकुकर्मकहता है, और उन लोगों को ग्रहण नहीं करता हैजो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:21-23) 

प्रभु हमें अपने लिए प्रयोग करना चाहता है; उसने अपने प्रत्येक शिष्य के लिए पहले से ही कार्य निर्धारित कर के रखे हैं (इफिसियों 2:10); किन्तु साथ ही वह यह भी चाहता है कि हम उन कार्यों को उसके कहे के अनुसार करें। प्रभु के शिष्यों को न केवल प्रभु के लिए जाने के लिए तैयार रहना चाहिए, वरन जब और जहाँ प्रभु कहे जाने, तब और वहाँ जाने वाला होना चाहिए। शिष्यों के प्रार्थना और वचन के अध्ययन में बने रहने के द्वारा प्रभु अपनी सेवकाई के लिए मार्गदर्शन करता है। हमें हर निर्णय प्रभु के कहे के अनुसार लेने वाली मनसा रखनी चाहिए।

यदि आप प्रभु के शिष्य हैं, तो क्या आप ने अपने आप को प्रभु को उपलब्ध करवाया है कि वह आपको अपनी सेवकाई में प्रयोग करे और आशीषित करे? यदि आप प्रभु के लिए उपयोगी, और उससे आशीषित होना चाहते हैं, तो क्या आप प्रभु के प्रयोजनों के अनुसार निर्णय तथा कार्य कर रहे हैं, या अपनी ही इच्छा अथवा किसी अन्य मनुष्य के कहे अथवा निर्देशों के अनुसार कर रहे हैं? प्रभु को स्वीकार्य कार्य वही है जो प्रभु के कहे पर, उसकी इच्छा के अनुसार किया जाए; अन्यथा प्रभु के नाम से किन्तु उसकी इच्छा और निर्देश के बाहर किया गया हर कार्य व्यर्थ औरकुकर्महै।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 62-64     
  • 1 तिमुथियुस 1

बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 20

 

मसीही विश्वासी के प्रयोजन (4) - जाने को तैयार  

       जैसा हमने पिछले लेखों में मरकुस 3:13-15 से देखा है, प्रभु यीशु मसीह ने जब अपने बारह शिष्यों को चुना, तो उनके लिए तीन प्रयोजन भी रखे। इन तीन में से पहले प्रयोजन, शिष्य प्रभु के साथ बने रहने वाले हों के बारे में हम पिछले दो लेखों में देख चुके हैं। प्रभु के साथ बने रहना, हर बात में प्रभु की इच्छा जानना और हर बात के लिए प्रभु का आज्ञाकारी होना ही मसीही सेवकाई का आधार है। जैसे ही हम अपनी इच्छा और अपनी बुद्धि के अनुसार काम करने लगते हैं, हम उत्पत्ति 3 में उल्लेखित घटना, हमारी आदि माता, हव्वा के समान स्थिति में आ जाते हैं, जब उसने अकेले ही शैतान की बातों को सुना, फिर परमेश्वर की आज्ञाकारिता में नहीं वरन अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार किया, और परिणामस्वरूप पाप को संसार और सृष्टि में प्रवेश मिल गया, जिसके परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। प्रभु हमें ऐसी स्थिति में पड़ने और शैतान द्वारा किसी भी बात में बहकाए और गिराए जाने से सुरक्षित रखना चाहता है, इसीलिए, अपने अनुयायियों के लिए प्रभु का पहला प्रयोजन है कि वे हर समय और हर बात के लिए प्रभु के साथ बने रहने को अपनी आदत, अपने जीवन की एक स्वाभाविक क्रिया बना लें।

       मरकुस 3:14 के अंतिम वाक्य में दिया गया अपने शिष्यों के लिए प्रभु का दूसरा प्रयोजन है कि, “वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करेंहम पहले देख चुके हैं कि इस दूसरे प्रयोजन के तीन भाग हैं:

  • वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें (पद 14)
    • भेजे जाने को तैयार हों
    • जहाँ और जब प्रभु कहे वहाँ और तब जाएं 
    • प्रभु के कहे के अनुसार प्रचार करने को तैयार हों

       जो कोई भी प्रभु का शिष्य बने, स्वेच्छा से अपने जीवन में उसके प्रभुत्व को स्वीकार करे, हर समय और हर बात के लिए प्रभु का आज्ञाकारी बने रहने का निर्णय ले, उसे उपरोक्त तीन बातों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। 

       सबसे पहली बात है भेजे जाने के लिए हर समय तैयार रहे। ऐसा न हो कि कहीं जाने के लिए जब प्रभु का बुलावा आए तो वह अपनी किसी बात या व्यस्तता के कारण प्रभु के कहे अनुसार जाने के लिए अपनी असमर्थता व्यक्त करे। जब प्रभु ने मत्ती को अपना शिष्य होने के लिए बुलाया तब वह अपने कार्य-स्थल में बैठा अपनी नौकरी का कार्य कर रहा था। प्रभु के आह्वान पर उसने तुरंत सब कुछ छोड़ दिया और प्रभु के पीछे हो लियावहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठ कर उसके पीछे हो लिया” (मत्ती 9:9)। इसी प्रकार से पतरस, अन्द्रियास, याकूब और यूहन्ना का भी प्रभु के आह्वान पर तुरंत उसके पीछे हो लेना था (मत्ती 4:18-22)। प्रभु द्वारा निर्धारित कार्य के प्रति भी शिष्यों का यही रवैया होना चाहिए। अपनी समझ से असंभव या कठिन लगने वाली बात के लिए भी प्रभु के कहे के अनुसार करने की प्रतिबद्धता। 

पकड़वाए जाने से पहले जब प्रभु ने यरूशलेम में प्रवेश करना था, तो अपने लिए एक गदही के बच्चे को मँगवाया, और शिष्यों से कहा कि अमुक स्थान पर वह बंधा हुआ मिल जाएगा, जाकर ले आओ; और यदि कोई पूछे तो कह देना कि प्रभु को इसका प्रयोजन हैकि अपने सामने के गांव में जाओ, वहां पहुंचते ही एक गदही बन्‍धी हुई, और उसके साथ बच्चा तुम्हें मिलेगा; उन्हें खोल कर, मेरे पास ले आओ। यदि तुम में से कोई कुछ कहे, तो कहो, कि प्रभु को इन का प्रयोजन है: तब वह तुरन्त उन्हें भेज देगा” (मत्ती 21:2-3); यह सुनने और समझने में असंभव सी बात लगती है, किन्तु हुआ वही जैसा प्रभु ने कहा था। अपने अंतिम भोज के लिए भी शिष्य फसह के भोज की तैयारी के विषय उससे पूछ रहे थे, परंतु प्रभु ने उन्हें पहले से तैयार स्थान के बारे में बताया और वहीं वह फसह का भोज भी खाया (मरकुस 14:12-16)। प्रभु ने जब स्वर्गदूत द्वारा फिलिप्पुस को कहा कि जंगल के एक मार्ग में जा, तो वह बिना किसी प्रश्न अथवा शंका के तुरंत चला गया, और कूश देश में प्रभु का वचन पहुँच गया (प्रेरितों 8:26-39)। अब्राहम से जब प्रभु ने कहा कि अपने देश और लोगों को छोड़कर उस स्थान को जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा, तो बिना कोई और विवरण पूछे वह परमेश्वर के कहे के अनुसार चल दियाविश्वास ही से इब्राहीम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था, और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूं; तौभी निकल गया” (इब्रानियों 11:8)

वचन में प्रभु के लोगों के प्रभु के कहे के अनुसार निकल पड़ने के अनेकों उदाहरण हैं। यह उनके जीवनों में प्रभु परमेश्वर का सर्वोपरि एवं प्राथमिक स्थान होने का सूचक है। प्रभु को सामर्थी, या कुशल एवं योग्य, या ज्ञानवान लोग नहीं चाहिएं। उसने तो जगत के निर्बलों, मूर्खों, और तुच्‍छों को अपने कार्य के लिए चुना है; वह ऐसों ही में होकर संसार के लोगों को अपनी सामर्थ्य को दिखाता हैहे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए। परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करे” (1 कुरिन्थियों 1:26-27)। प्रभु को अपने प्रति समर्पित और आज्ञाकारी लोग चाहिएं, जो बिना प्रश्न किए, जो इस पूरे भरोसे के साथ जाकर प्रभु के कहे को करने के लिए तैयार हों, कि यदि प्रभु ने कहा और भेजा है तो फिर इसके लिए जो कुछ आवश्यक है उसे तैयार भी करके रखा है। किन्तु जो प्रभु के प्रति ऐसा समर्पण नहीं रखते हैं, वे प्रभु के लिए उपयोगी नहीं हो सकते हैंउसने दूसरे से कहा, मेरे पीछे हो ले; उसने कहा; हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं। उसने उस से कहा, मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे, पर तू जा कर परमेश्वर के राज्य की कथा सुना। एक और ने भी कहा; हे प्रभु, मैं तेरे पीछे हो लूंगा; पर पहिले मुझे जाने दे कि अपने घर के लोगों से विदा हो आऊं। यीशु ने उस से कहा; जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं” (लूका 9:59-62)

आज प्रभु यीशु के प्रति आपकी स्थिति क्या है? पहला प्रश्न, क्या आपने प्रभु की शिष्यता को स्वीकार किया है? यदि नहीं, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी अपना निर्णय कर लीजिए। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

अब दूसरा प्रश्न, यदि आपने प्रभु यीशु का शिष्य होने का निर्णय ले लिया है तो उसके प्रति समर्पण, आज्ञाकारिता, और प्रतिबद्धता में आपकी स्थिति क्या है? प्रभु का जन बनना एक बात है किन्तु उसके लिए उपयोगी होना ही इस बात की पहचान है कि व्यक्ति का प्रभु की शिष्यता स्वीकार करने का उसका दावा सच्चा है कि नहीं। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो क्या आप जहाँ और जब प्रभु भेजे वहाँ पर और तब जाने के लिए भी तैयार हैं? “अपने आप को परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आप को जांचो, क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है नहीं तो तुम निकम्मे निकले हो” (2 कुरिन्थियों 13:5) 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 59-61     
  • 2 थिस्सलुनीकियों 3