बुधवार, 25 मई 2022

बाइबल, पाप और उद्धार / The Bible, Sin, and Salvation – 12


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पाप का समाधान - उद्धार - 8


    पिछले दो लेखों में हम दो लोगों के जीवनों के उदाहरण देख चुके हैं जो बहुत धर्मी थे, धार्मिकता का निर्वाह करते थे, परमेश्वर के वचन और आज्ञाओं को जानते थे और उनका पालन करने का दावा करते थे, समाज में उच्च ओहदा रखते थे। किन्तु दोनों ही अपने अंदर जानते थे कि अपने इस धर्म के निर्वाह, वचन की बातों को मानने, लोगों के दृष्टि में धर्मी और आदरणीय होने के बावजूद, वे परमेश्वर के सम्मुख खड़े हो पाने और उसके राज्य में प्रवेश कर पाने के अयोग्य थे। उनके मन और विवेक उन्हें चेतावनी दे रहे थे कि अभी, समय रहते, जब प्रभु का अनुग्रह उन्हें उपलब्ध है, इस स्थिति को ठीक कर लें; और इसी लिए समाधान को ढूँढने के लिए वे प्रभु यीशु मसीह के पास आए थे। उनमें से एक, नीकुदेमुस तो संभवतः आगे चलकर प्रभु यीशु मसीह का विश्वासी बन गया था, उसने अरमतियाह के यूसुफ के साथ मिलकर प्रभु यीशु की देह को क्रूस पर से उतरवाकर दफनाया था (यूहन्ना 19:38-39); किन्तु दूसरा व्यक्ति, जो धनी जवान सरदार था, सांसारिक संपत्ति के मोह से अपने आप को अलग नहीं कर पाया और वापस संसार में लौट गया। 

    आज हम तीसरे व्यक्ति के जीवन के उदाहरण से देखेंगे कि धर्म का निर्वाह कैसे व्यक्ति को सत्य के प्रति अंधा एवं उनके अनुसार सत्य का पालन नहीं करने वालों के प्रति क्रूर और निर्मम, अमानवीय, बना देता है। किन्तु जब सत्य से व्यक्ति की पहचान हो जाती है, तो जिस वचन की गलत समझ के कारण वह अनुचित व्यवहार करता था, उसकी सही समझ आ जाने से उसका जीवन, दृष्टिकोण, और व्यवहार कैसे अद्भुत रीति से बदल जाता है। यह तीसरा उदाहरण नए नियम के जाने-माने नायक पौलुस प्रेरित का है, जो मसीही विश्वासी होने से पहले शाऊल के नाम से जाना जाता था (प्रेरितों 13:9)। अपनी परवरिश और शिक्षा से पौलुस एक कट्टर फरीसी था; उसने अपने समय के बहुत आदरणीय और उत्तम शिक्षक गमलीएल (प्रेरितों 5:34) से शिक्षा पाई थी (प्रेरितों 22:3)। 

    इस कट्टर फरीसी, पौलुस का मानना था कि यीशु मसीह तथा मसीही विश्वासी विधर्मी हैं, परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का अपमान कर रहे हैं, और उन्हें इसके लिए पकड़ना और दंड दिलवाना चाहिए। इसके लिए वह स्थान-स्थान पर जाकर प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों को पकड़ कर लाया करता था, जिससे धर्म के ठेकेदार उन्हें विधर्मी होने के लिए दंडित कर सकें (प्रेरितों 7:60; 8:2-3; 26:12)। उसके दृष्टिकोण और विचारों को उसके ही शब्दों में देखते हैं: “मैं ने भी समझा था कि यीशु नासरी के नाम के विरोध में मुझे बहुत कुछ करना चाहिए। और मैं ने यरूशलेम में ऐसा ही किया; और महायाजकों से अधिकार पाकर बहुत से पवित्र लोगों को बन्‍दीगृह में डाला, और जब वे मार डाले जाते थे, तो मैं भी उन के विरोध में अपनी सम्मति देता था। और हर आराधनालय में मैं उन्हें ताड़ना दिला दिलाकर यीशु की निन्दा करवाता था, यहां तक कि क्रोध के मारे ऐसा पागल हो गया, कि बाहर के नगरों में भी जा कर उन्हें सताता था” (प्रेरितों 26:9-11)।

    उसे मिली उसके धर्म की शिक्षा और धार्मिकता के निर्वाह तथा व्यवहार के आधार पर, पौलुस की समझ उसे प्रेरित करती थी कि:

  • उसे यीशु नासरी के विरुद्ध बहुत कुछ करना चाहिए;

  • उसे पवित्र लोगों को बंदीगृह में डालना चाहिए; 

  • वह उन लोगों के मसीही विश्वास के लिए मार डाले जाने में सहमत रहे; 

  • हर आराधनालय में वह उनकी ताड़ना करता और उनसे जबरन यीशु की निन्दा करवाए;

  • बाहर के नगरों में भी जाकर मसीही विश्वासियों को सताए; 

    उनके विरुद्ध क्रोध के मारे वह पागल सा हो गया था। 

    पौलुस के धर्म, और धर्म के उसके ज्ञान तथा धार्मिकता ने उसका यह अमानवीय व्यवहार करवाने वाला हाल बना दिया था। किन्तु जब ऐसे ही एक अभियान पर दमिश्क जाते समय प्रभु यीशु मसीह से, उनके महिमित स्वरूप में, उसका साक्षात्कार हुआ, तो उसका जीवन, समझ, दृष्टिकोण, और व्यवहार सभी बदल गए (प्रेरितों 9:2-6; 26:13-15)। उस पहले साक्षात्कार में ही पौलुस ने यीशु को “प्रभु” मान लिया “उसने पूछा; हे प्रभु, तू कौन है? उसने कहा; मैं यीशु हूं; जिसे तू सताता है” (प्रेरितों 9:5)। प्रभु यीशु ने उसके समर्पण को स्वीकार किया और उद्धार के सुसमाचार के प्रचार की सेवकाई सौंपी, परंतु साथ ही यह भी बता दिया कि इस सेवकाई के निर्वाह में उसे बहुत दुख उठाने होंगे “परन्तु प्रभु ने उस से कहा, कि तू चला जा; क्योंकि यह, तो अन्यजातियों और राजाओं, और इस्राएलियों के सामने मेरा नाम प्रगट करने के लिये मेरा चुना हुआ पात्र है। और मैं उसे बताऊंगा, कि मेरे नाम के लिये उसे कैसा कैसा दुख उठाना पड़ेगा” (प्रेरितों 9:15-16); साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि उन सभी कठिन और दुखदाई परिस्थितियों में प्रभु उसकी रक्षा करेगा, उसके साथ रहेगा “और मैं तुझे तेरे लोगों से और अन्यजातियों से बचाता रहूंगा, जिन के पास मैं अब तुझे इसलिये भेजता हूं। कि तू उन की आंखें खोले, कि वे अंधकार से ज्योति की ओर, और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फिरें; कि पापों की क्षमा, और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएं” (प्रेरितों 26:17-18)। और तुरंत ही पौलुस इस सेवकाई में लग गया “और वह तुरन्त आराधनालयों में यीशु का प्रचार करने लगा, कि वह परमेश्वर का पुत्र है” (प्रेरितों 9:20)। 

    जिस धर्मशास्त्र की अपनी समझ के अनुसार वह प्रभु यीशु और उसके शिष्यों का घोर विरोध करता था, प्रभु से उसी धर्मशास्त्र की सही समझ प्राप्त करने के बाद वह उसी धर्मशास्त्र में से यीशु के मसीह होने को प्रमाणित करने लगा “परन्तु शाऊल और भी सामर्थी होता गया, और इस बात का प्रमाण दे देकर कि मसीह यही है, दमिश्क के रहने वाले यहूदियों का मुंह बन्द करता रहा” (प्रेरितों 9:22); “जब सीलास और तीमुथियुस मकिदुनिया से आए, तो पौलुस वचन सुनाने की धुन में लगकर यहूदियों को गवाही देता था कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5); “और पौलुस अपनी रीति के अनुसार उन के पास गया, और तीन सबत के दिन पवित्र शास्त्रों से उन के साथ विवाद किया। और उन का अर्थ खोल खोल कर समझाता था, कि मसीह को दुख उठाना, और मरे हुओं में से जी उठना, अवश्य था; और यही यीशु जिस की मैं तुम्हें कथा सुनाता हूं, मसीह है” (प्रेरितों 17:2-3)।

    अपने जीवन, तथा परमेश्वर के वचन के प्रति अपने दृष्टिकोण के इस अद्भुत परिवर्तन के विषय पौलुस ने फिलिप्पी की मसीही मंडली को लिखा, कि व्यवस्था की जिन बातों को वह पहले अति महत्वपूर्ण समझता था, अब मसीह यीशु द्वारा मानव जाति के उद्धार और मनुष्यों को परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए प्रभु यीशु द्वारा किए गए कार्य की सही पहचान हो जाने के बाद, वह अपनी उन पिछली धारणाओं के गलत एवं व्यर्थ होने को समझ गया, वचन और व्यवस्था के प्रति उसका दृष्टिकोण सुधर कर ठीक हो गया, और अब वह केवल मसीह यीशु के ज्ञान में बढ़ने की चाह रखने लगा, व्यवस्था से धर्मी माने जाने की नहीं (फिलिप्पियों 3:4-14)। 

    शाऊल/पौलुस के धर्म, शिक्षा, और उसकी अपनी समझ ने उसे उसी परमेश्वर और उस परमेश्वर के शिष्यों का बैरी और नाश करने वाला बना दिया, जिसकी वह सेवा करना चाहता था, और सोचता था कि मसीहियों को सताने के द्वारा वह उसकी सेवा कर रहा है। इस बात के विषय उसने अपने हृदय की व्यथा और खेद कुरिन्थुस तथा अपने सहकर्मी तिमुथियुस को लिखी हुई पत्रियों में व्यक्त व्यक्त की है, “और सब के बाद मुझ को भी दिखाई दिया, जो मानो अधूरे दिनों का जन्मा हूं। क्योंकि मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूं, वरन प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं, क्योंकि मैं ने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था” (1 कुरिन्थियों 15:8-9); “यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है, कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिन में सब से बड़ा मैं हूं” (1 तीमुथियुस 1:15)। किन्तु प्रभु यीशु मसीह पर लाए विश्वास ने उसे धर्मशास्त्र की सही समझ दी, उसकी सेवा को सही उद्देश्य और दिशा दी, उसे हर परिस्थिति में प्रभु परमेश्वर का साथ और सहायता को प्रदान किया। उसकी मसीही सेवकाई का जीवन बहुत कठिन और दुखों से भरा हुआ था; किन्तु अपने जीवन के अंत के समय उसके पास अभूतपूर्व शांति थी, उसे एक आश्वासन था, जो उसने सभी मसीही विश्वासियों के लिए भी व्यक्त किया “क्योंकि अब मैं अर्घ के समान उंडेला जाता हूं, और मेरे कूच का समय आ पहुंचा है। मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी, और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन उन सब को भी, जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं” (2 तीमुथियुस 4:6-8)। 

    पौलुस के जीवन में जो काम उसकी परवरिश एवं परमेश्वर के वचन के बारे में तथा धर्म के निर्वाह के लिए उसे मनुष्यों से मिली शिक्षा नहीं कर सकी; इन बातों पर आधारित उसकी समझ के अनुसार किए गए उसके “धर्म के काम” नहीं कर सके, वह प्रभु यीशु मसीह के प्रति सच्चे समर्पित विश्वास ने एक पल में करवा दिया; उसका जीवन, व्यवहार, और दृष्टिकोण बिल्कुल बदल दिया। पौलुस के धर्म ने उसे अनजाने में ही पागलों के समान मनुष्यों और परमेश्वर का विरोधी, उनका सताने वाला, प्रभु परमेश्वर का निरादर करने वाला बना दिया था। मसीही विश्वास ने उसे दुख उठा कर भी धीरज, सहनशीलता, और प्रेम के साथ मनुष्यों की भलाई और प्रभु परमेश्वर की सेवकाई करने वाला बना दिया, परमेश्वर के वचन के ऐसी गहरी, सच्ची, और ठोस समझ प्रदान की जो उसे और कहीं से नहीं मिल सकती थी। पौलुस में होकर परमेश्वर के वचन की वह व्याख्या हमें उपलब्ध हुई है, जो आज दो हज़ार साल बाद भी लोगों के दर्शनों को खोल रही है, उनके जीवन बदल रही है, और संसार के अंत तथा न्याय के लिए मसीही विश्वासियों को तैयार कर रही है। 

    अपने जीवन का आँकलन करके देखिए। कहीं आप भी धर्म और धार्मिकता के नाम पर मनुष्यों के बैरी, उन्हें सताने वाले, और परमेश्वर की निन्दा का कारण तो नहीं बन रहे हैं? प्रभु यीशु मसीह के सच्ची पहचान में आइए, उसे अपना प्रभु स्वीकार कीजिए, आपके जीवन का दृष्टिकोण और व्यवहार ही बदल जाएगा; परमेश्वर के वचन के प्रति आपकी समझ खुल जाएगी, नई हो जाएगी; आप परमेश्वर की निन्दा के नहीं, प्रशंसा के कारण, उसके गवाह बन जाएंगे। स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।” सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 


एक साल में बाइबल:

  • 2 इतिहास 13-15
  • यूहन्ना 7:1-27

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English Translation

The Solution for Sin - Salvation - 8


In the previous two articles we have seen from the lives of two people who were very religious, practiced righteousness through religious works, knew God’s Word and His Commandments and claimed to follow them, and they also had a high status in the society. But both of them knew within themselves that despite their diligently observing their religion, obeying the Commandments, being righteous and honorable in the sight of people they actually were not worthy of standing before God or of entering into his Kingdom. Their hearts and conscience were warning them that now while they have the opportunity, and the Lord's Grace is available to them, they should rectify their situation; so, they had come to the Lord Jesus to seek the solution to their problem. One of them, i.e., Nicodemus probably later on had become a disciple of the Lord Jesus Christ, and he along with Joseph of Arimathea, had asked for and taken the body of the Lord from the cross and buried Him (John 19:38-39). The second person, the rich young ruler, could not detach himself from the things of the world and his worldly possessions and had returned back into the world.


Today we will look through the example of the third person, how religion can not only make a person blind towards the truth, but can also make him cruel, merciless and inhuman towards those who do not follow his concept of the truth. But once a person actually comes to know the truth, then the inappropriate behavior he exhibited because of his wrong understanding of the truth, and his life, are all so wonderfully, absolutely transformed. This third example is of Paul, the well-known character of the New Testament, who before his becoming a Christian Believer was known as Saul (Acts 13:9). In his upbringing and education, Paul had been trained under the highly respected and renowned teacher of his time, Gamliel (Acts 5:34; 22:3); and was a very fanatical Pharisee.


This fanatical Pharisee, Paul believed that Jesus Christ and Christian Believers are heretics, who are insulting God and His Law, and therefore they deserve to be taken into custody and punished. To have this done he used to go from place to place, catch and fetch the disciples of the Lord Jesus Christ, so that the religious leaders can punish them for being heretics (Acts 7:60; 8:2-3; 26:12). Let us look at his point-of-view and his concepts, from his own words: “Indeed, I myself thought I must do many things contrary to the name of Jesus of Nazareth. This I also did in Jerusalem, and many of the saints I shut up in prison, having received authority from the chief priests; and when they were put to death, I cast my vote against them. And I punished them often in every synagogue and compelled them to blaspheme; and being exceedingly enraged against them, I persecuted them even to foreign cities” (Acts 26:9-11).


From his above statement we see that on the basis of the religious education he had received, his understanding of being religious and righteous compelled him to:

  • Do as much as and whatever he could against Jesus of Nazareth;

  • He should have the saints imprisoned;

  • He was consenting and willing to have them killed for their Christian Faith;

  • He should punish them in every synagogue, and compel them to blaspheme against Jesus;

  • Persecute the Christians even to foreign cities;

And he had become extremely enraged against them.


The religion and religious knowledge and righteousness of Paul had made him an inhuman persecutor. While going on one of his campaigns, to Damascus, he had an encounter with the Lord Jesus in the Lord’s glorious form, and that encounter totally changed his life, understanding, outlook, and behavior (Acts 9:2-6; 26:13-15). In that very first encounter, Pauls accepted Jesus as “Lord” - “And he said, "Who are You, Lord?" Then the Lord said, "I am Jesus, whom you are persecuting. It is hard for you to kick against the goads."” (Acts 9:5). The Lord Jesus accepted his submitting himself to His Lordship and handed him the responsibility of preaching the Gospel, but also made it very clear to him that he will have to suffer many pains and problems in this ministry “But the Lord said to him, "Go, for he is a chosen vessel of Mine to bear My name before Gentiles, kings, and the children of Israel. For I will show him how many things he must suffer for My name's sake."” (Acts 9:15-16). But at the same time the Lord also assured him that in all those sufferings and harsh circumstances, He will be with him and keep him safe, “I will deliver you from the Jewish people, as well as from the Gentiles, to whom I now send you, to open their eyes, in order to turn them from darkness to light, and from the power of Satan to God, that they may receive forgiveness of sins and an inheritance among those who are sanctified by faith in Me.'” (Acts 26:17-18). Paul immediately started with this ministry entrusted to him, “Immediately he preached the Christ in the synagogues, that He is the Son of God” (Acts 9:20). 


Based on his own learning and understanding of the Scriptures, he used to severely oppose the Lord Jesus and Christian Believers; but having received the correct understanding of those very Scriptures from the Lord, he immediately started to prove from those Scriptures that Jesus is the Messiah “But Saul increased all the more in strength, and confounded the Jews who dwelt in Damascus, proving that this Jesus is the Christ” (Acts 9:22); “When Silas and Timothy had come from Macedonia, Paul was compelled by the Spirit, and testified to the Jews that Jesus is the Christ” (Acts 18:5); “Then Paul, as his custom was, went in to them, and for three Sabbaths reasoned with them from the Scriptures, explaining and demonstrating that the Christ had to suffer and rise again from the dead, and saying, "This Jesus whom I preach to you is the Christ."” (Acts 17:3).


Regarding the marvelous transformation of his life, outlook, and understanding of God’s Word, Paul wrote in his letter to the Christian Believer’s assembly of Philippi, that the things of the Law which he formerly thought to be very important, now having come to gain the true understanding of the work of the Lord Jesus Christ for the salvation of mankind and to make mankind acceptable to God, he has come to realize that all his former understanding and concepts were wrong, and vain. Now he has gained the correct understanding and view-point about God’s Word and Law, and therefore, now his only desire is to increase in the knowledge of Christ, instead of being seen as righteous through being a follower of the Law (Philippians 3:4-14).


Saul’s/Paul’s religion, religious education, and his own learning and understanding had made him the opponent and destroyer of the same God, and of the disciples of the very God, that he was wanting to serve, and was thinking is serving by the persecution he was carrying out. In, writing to the Church at Corinth, and to his colleague, Timothy he expresses the regret he had in his heart about his former fanatic behavior, “Then last of all He was seen by me also, as by one born out of due time. For I am the least of the apostles, who am not worthy to be called an apostle, because I persecuted the church of God” (1 Corinthians 15:8-9); “This is a faithful saying and worthy of all acceptance, that Christ Jesus came into the world to save sinners, of whom I am chief” (1 Timothy 1:15). But his believing in the Lord Jesus gave him the proper understanding of the Scriptures, gave him the correct perspective and direction for his ministry, and made available to him the help and fellowship of the Lord God in and for everything, all circumstances. His life of Christian ministry was very tough and full of pains; but at the end of his life, he had a wonderful peace within himself, he had an assurance, which he has expressed for all Christian Believers also, “For I am already being poured out as a drink offering, and the time of my departure is at hand. I have fought the good fight, I have finished the race, I have kept the faith. Finally, there is laid up for me the crown of righteousness, which the Lord, the righteous Judge, will give to me on that Day, and not to me only but also to all who have loved His appearing” (2 Timothy 4:6-8).


In Paul’s life, what his upbringing, his learning and knowledge from men about his religion, about God’s Word, and about fulfilling religious obligations could never accomplish; and neither his doing the “religious works” and “works of righteousness” based on his own understanding could do, all that was done in one moment, as soon as he sincerely and completely submitted himself into the faith in the Lord Jesus Christ. Paul’s religion had inadvertently made him a fanatic, full of rage against men and God, their persecutor, and one who dishonored the Lord God. Christian Faith made him a man with immense patience, forbearance, and one behaving with love even while suffering opposition for his faith. He became one who did good for others and served God according to God’s calling and will. He was given a deep, factual, true, and solid understanding of God’s Word, which he could never get from anywhere else. Through Paul we have received such an understanding of God’s Word, that is even now, two thousand years later, still opening the understanding of people, changing their lives, and preparing the Christian Believers for the coming end of the world and judgment of God.


Please examine and evaluate your own life. Have you also, in the name of religion and righteousness through religious works, become opponents and persecutors of men, and blasphemers of the Lord God?  By coming into the true understanding of the Lord Jesus, by accepting Him as your Lord, your attitude and behavior will be totally transformed. You will get a new and true understanding of God’s Word, you will become a cause of praising and glorifying God, instead of dishonoring Him; you will become His witness for the world. A short prayer said voluntarily with a sincere heart and with heart-felt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company, wants to see you blessed; but to make this possible or not, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours. 



Through the Bible in a Year: 

  • 2 Chronicles 13-15

  • John 7:1-27


मंगलवार, 24 मई 2022

बाइबल, पाप और उद्धार / The Bible, Sin, and Salvation – 11


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पाप का समाधान - उद्धार - 7


    पिछले लेख में, उद्धार के लिए धर्म की व्यर्थता के सन्दर्भ में, हमने परमेश्वर के वचन बाइबल में से एक उदाहरण देखा था कि धर्म का अगुवा, परमेश्वर के वचन का विद्वान और शिक्षक होने, तथा समाज में उच्च स्थान रखने के बावजूद, फरीसियों के सरदार नीकुदेमुस के मन में परमेश्वर के सम्मुख अपने धर्मी स्वीकार होने के विषय संदेह था, जिसके निवारण के लिए वह प्रभु यीशु मसीह से मिलने आया था। यहूदियों के इस धर्मी और संभ्रांत धार्मिक अगुवे से प्रभु यीशु मसीह ने तीन बार दो टूक कह दिया कि उसे नया जन्म लेना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना न तो कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है, और न ही उसे देख सकता है। साथ ही उसे यह भी जता दिया कि यह प्रभु यीशु द्वारा दी जाने वाली कोई नई शिक्षा नहीं है, वरन बाइबल के पुराने नियम खंड, जिसका नीकुदेमुस ज्ञाता और शिक्षक था, में परमेश्वर द्वारा दी गई शिक्षाओं के अनुसार है - केवल शुद्ध मन वाले, न कि धार्मिक क्रिया-कर्म करके भी सांसारिक बातों में लगे रहने वाले, परमेश्वर के साथ संगति करने पाएंगे (भजन 15; 51:6, 10; 73:1; आदि)।

    आज इसी संदर्भ में बाइबल में से एक और उदाहरण देखेंगे, कि जैसे परमेश्वर के वचन का ज्ञाता और उस की व्यवस्था का पालन करने के बावजूद नीकुदेमुस के मन में अपने उद्धार के विषय शंका थी, वैसे ही एक अन्य धनी जवान सरदार द्वारा व्यवस्था की बातों का पालन करने के बावजूद, उसके मन में भी अनन्त जीवन का भागी होने के विषय संदेह था। इस धनी जवान सरदार का वृतांत हमको पहले तीनों सुसमाचारों में मिलता है (मत्ती 19:16-29; मरकुस 10:17-30; लूका 18:18-27)। यहाँ पर हम मरकुस रचित सुसमाचार के लेख को लेकर चलेंगे, किन्तु साथ ही अन्य दोनों वृतांतों में से भी कुछ बातों को देखते जाएंगे। मरकुस रचित सुसमाचार का वृतांत इस प्रकार है:

 

मरकुस 10:17 और जब वह निकलकर मार्ग में जाता था, तो एक मनुष्य उसके पास दौड़ता हुआ 

आया, और उसके आगे घुटने टेककर उस से पूछा हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?

मरकुस 10:18 यीशु ने उस से कहा, तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर

मरकुस 10:19 तू आज्ञाओं को तो जानता है; हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, छल न करना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना

मरकुस 10:20 उसने उस से कहा, हे गुरु, इन सब को मैं लड़कपन से मानता आया हूं

मरकुस 10:21 यीशु ने उस पर दृष्टि कर के उस से प्रेम किया, और उस से कहा, तुझ में एक बात की घटी है; जा, जो कुछ तेरा है, उसे बेच कर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले

मरकुस 10:22 इस बात से उसके चेहरे पर उदासी छा गई, और वह शोक करता हुआ चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था

हम अब यहाँ और अन्य संबंधित वृतांतों में दी गई कुछ बातों को देखते हैं:

  • पद 17 - लूका 18:18 से हम देखते हैं कि यह एक सरदार अर्थात, अधिकारी, समाज में उच्च स्थान रखने वाला था; मत्ती 19:20 हमें बताता है कि वह जवान था; और मरकुस 10:22 बताता है कि वह बहुत धनी था। फिर भी यह व्यक्ति सार्वजनिक मार्ग पर जा रहे प्रभु यीशु के पास दौड़ता हुआ आया और उसे आदर मान देते हुए उसके सामने घुटने टेके, उसे “उत्तम गुरु” कह कर संबोधित किया। उसने प्रभु से अपने मन की व्यथा के विषय प्रश्न पूछा “अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?”; अर्थात उसे अपने विषय आभास था कि वह अनत जीवन का अधिकारी नहीं है; अभी उसके जीवन में कुछ है जो उसे अनन्त जीवन का वारिस होने से रोक रहा है, और उसका मन, उसका विवेक उसे इसके विषय सचेत कर रहा है। 

  • पद 18 - प्रभु ने उसके प्रश्न का उत्तर देने से पहले उसके मन के अंदर प्रभु के वास्तविक स्थान को उजागर कर दिया। प्रभु ने पलट कर उससे प्रश्न किया, “तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर” अर्थात, “मुझे उत्तम गुरु कहकर संबोधित करने के द्वारा क्या तू स्वीकार करता है कि मैं प्रभु परमेश्वर हूँ; एकमात्र जो अनन्त जीवन दे सकता है? प्रभु के प्रश्न के लिए उस जवान के उत्तर पर बहुत कुछ निर्भर था; हम इसे कुछ आगे, जहाँ उसका उत्तर है, वहाँ पर फिर देखेंगे।

  • पद 19 - प्रभु ने अपने बात को आगे जारी रखते हुए उससे आज्ञाओं का पालन करने के विषय कहा। मत्ती 19:18 बताता है कि उस जवान ने प्रभु से प्रश्न किया, “कौन सी आज्ञाएँ?”, जो उसके अंदर विद्यमान उसकी धार्मिकता के प्रति दंभ का सूचक है। उसके उत्तर में प्रभु ने जिन आज्ञाओं का उल्लेख किया वे परमेश्वर द्वारा इस्राएलियों के लिए मूसा में होकर दी गई “दस आज्ञाओं” का भाग हैं। प्रभु ने उन दस आज्ञाओं में से पहली चार आज्ञाओं को, जो मनुष्य के परमेश्वर के प्रति व्यवहार से संबंधित हैं, उससे नहीं कहा; वरन बाद की छः आज्ञाएँ, जो मनुष्य के मनुष्य के साथ व्यवहार से संबंध रखती हैं, केवल उन्हें ही उसके सामने कहा।

  • पद 20 - यहाँ दिया गया उस जवान व्यक्ति का एक वाक्य का संक्षिप्त उत्तर, “हे गुरु, इन सब को मैं लड़कपन से मानता आया हूं” उसके विषय बहुत कुछ प्रकट कर देता है। मत्ती 19:20 में लिखा है कि उस जवान ने स्पष्ट यह भी कहा, “अब मुझ में किस बात की घटी है?” अर्थात उसका विवेक गवाही दे रहा था कि उसका लड़कपन से आज्ञाओं को जानने और मानने का दावा, उसकी अपनी धार्मिकता उसे अनन्त जीवन का अधिकारी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। 

    • प्रभु ने उससे कहा था कि उत्तम केवल परमेश्वर है, तू क्यों मुझे उत्तम कहता है? उस जवान द्वारा इसके बाद भी प्रभु को उत्तम कह कर संबोधित करना यह प्रकट कर देता कि वह प्रभु यीशु को परमेश्वर, अनन्त जीवन का स्त्रोत स्वीकार करता है। किन्तु उसने यह नहीं किया; यहाँ पर अब वह उसे “उत्तम गुरु” नहीं, केवल “हे गुरु” संबोधित करता है; अर्थात, उसके लिए प्रभु यीशु आदरणीय तो था, आराध्य नहीं था। वह एक “गुरु” से “ज्ञान” प्राप्त करने आया था, प्रभु से उद्धार का मार्ग सीखने नहीं। यदि वह यीशु को प्रभु स्वीकार करता होता, तो आगे प्रभु द्वारा उसे दिए गए समाधान के प्रति उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती। 

    • उसने यह तो तुरंत कह दिया कि मैं इन आज्ञाओं को लड़कपन से मानता आया हूँ, किन्तु यह नहीं कहा कि “प्रभु इन्हें ही नहीं, वरन पहली चार आज्ञाओं को भी लड़कपन से मानता आया हूँ।” उसका मन, जो उसे उद्धार के विषय बेचैन करता था, यह जानता था कि वह मनुष्यों को दिखाने वाला व्यवहार तो ठीक से निभा रहा है, किन्तु परमेश्वर के प्रति उसका व्यवहार जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं है। 

    • उसको लगा होगा कि “बच गया! यदि यीशु ने मुझसे पहली चार आज्ञाओं के लिए भी कहा होता, तो मैं फंस जाता।” किन्तु प्रभु ने उसके सामने एक दर्पण रख दिया था, जिसमें उसे अपनी सच्ची छवि दिख रहे थी, कि वह परमेश्वर की दृष्टि में कैसा दिखता है।

  • पद 21 - उसके इस दिखावे के दोगले जीवन के बावजूद, प्रभु ने उससे फिर भी प्रेम किया; उसका तिरस्कार नहीं किया, वरन उसे उसकी समस्या का समाधान और सिद्धता का मार्ग बता दिया। मत्ती 19:21 से हम देखते है कि प्रभु ने उसे सिद्ध होने के आह्वान के साथ उत्तर दिया, “यीशु ने उस से कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है; तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले”। अब आगे की प्रतिक्रिया उस जवान के निर्णय पर, उसकी मनसा पर निर्भर थी - वह किस धन को अधिक महत्व देता था, स्वर्गीय धन को अथवा सांसारिक धन को।

  • पद 22 - प्रभु द्वारा दिए गए समाधान, सांसारिक संपत्ति के मोह से निकलकर, यीशु को अपना प्रभु, केवल ‘गुरु’ ही नहीं, मानकर, उसके पीछे हो ले, को सुनकर वह उदास हो गया, उस समाधान को अस्वीकार करके, वह शोक करता हुआ वापस लौट गया। उसके वचन के ज्ञान, वचन के पालन, सारी धार्मिकता, दिखाने को प्रभु के प्रति आदर, आदि के बाद भी उसकी वास्तविकता कुछ और ही थी। धर्म के निर्वाह ने उसके मन को नहीं बदला था, उसका मन वास्तव में परमेश्वर से बहुत दूर था। वह अनन्त जीवन के स्रोत के पास आकर भी, उस स्रोत से प्रेम, अनन्त जीवन का निमंत्रण एवं मार्ग प्राप्त करने के बाद भी, अपने अपरिवर्तित मन के कारण वापस नाशमान संसार और विनाश में लौट गया।  

    • वह एक बाहर से मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला जीवन जी रहा था, किन्तु अंदर से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर पा रहा था, और इसीलिए वह प्रभु यीशु के पास समाधान के लिए आया था।

    • यदि प्रभु उसके लिए वास्तव में “उत्तम गुरु” होता, तो उसके लिए प्रभु की बात को स्वीकार करना अधिक सहज होता। किन्तु यीशु उसके लिए प्रभु नहीं था; केवल एक “गुरु” था। 

    • यदि उसकी धार्मिकता ने उसके मन को बदला होता तो वह परमेश्वर द्वारा दी गई सभी आज्ञाओं का ईमानदारी से पालन कर रहा होता, वह इस बात को प्रकट भी करता, और उसके मन की स्थिति दोष भावना वाली नहीं होती। 

    • जैसे अन्य मनुष्यों के प्रति, उसने प्रभु के प्रति भी बाहर से बहुत आदर दिखाया, किन्तु प्रभु ने उसके सामने उसके मन की स्थिति खोल कर रख दी। 

    • उस सारी धार्मिकता, आज्ञाओं को जानने, उन्हें मानने का दावा करने, स्वर्गीय अनन्त जीवन पाने की इच्छा रखने के बावजूद, मन में वह अभी भी संसार से बंधा हुआ था, और संसार को छोड़ना नहीं चाहता था। उसके धर्म के निर्वाह और वचन के ज्ञान ने उसे संसार के मोह से मुक्ति नहीं दी थी, उसके मन की बेचैनी को शान्त नहीं किया था। 

 

    आज परमेश्वर की दृष्टि में, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, आपकी वास्तविक स्थिति क्या है? कहीं आपकी दिखने वाली धार्मिकता और अच्छा सामाजिक व्यवहार एक बाहरी आवरण तो नहीं है, जिसे आप अपने अंदर की परमेश्वर से दूरी को ढाँपने के लिए प्रयोग कर रहे हैं? धर्म और धार्मिक बातों के पालन के बावजूद, परमेश्वर की आज्ञाओं को आदर देने और मानने का दावा करने के बावजूद, वह जवान जानता था कि वह अनन्त जीवन से दूर है; उसके अंदर कमी है, जिसका समाधान आवश्यक है। कहीं आप भी तो उस जवान के समान अपने धर्म, धार्मिकता और कर्मों के द्वारा अपने आप को सही और अनन्त जीवन का अधिकारी समझने का प्रयास तो नहीं कर रहे हैं? जैसे उस जवान के लिए, वैसे ही आपके लिए भी ये सभी प्रयास व्यर्थ होंगे।

    जैसे प्रभु ने उस जवान से उसकी प्रभु को परमेश्वर अस्वीकार करने, उसके मन की दोगलेपन की स्थिति में भी प्रेम किया, वैसे ही वह आपकी वास्तविकता जानने के बावजूद आज आप से भी प्रेम करता है, आपको भी अनन्त जीवन का मार्ग, आपकी समस्या का समाधान देना चाहता है, आपको सिद्धता का मार्ग दिखाना चाहता है। क्या आपने प्रभु यीशु को वास्तव में अपना प्रभु, अपना स्वामी, अपना उद्धारकर्ता माना है? क्या आप उसके कहे के अनुसार करने के लिए तैयार हैं? आप से भी उसका आह्वान है, इस नश्वर संसार और संसार की नाशमान बातों, आकर्षण, संपदा आदि के मोह से निकलकर, सच्चे और समर्पित मन से, स्वेच्छा से यीशु को अपना प्रभु स्वीकार कर लें, उसके पीछे हो लें। उसके पक्ष में लिए गए निर्णय के पल से लेकर अनन्तकाल के लिए आपके दोनों लोक संवर जाएंगे, आप स्वर्गीय सुरक्षा और आशीषों के भागी हो जाएंगे। स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।” सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 


एक साल में बाइबल: 

  • 2 इतिहास 13-15

  • यूहन्ना 7:1-27

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English Translation

The Solution for Sin - Salvation - 7


    In the previous article, in context of vanity of religion for salvation, we saw about a high-ranking religious leader, as an example from God's Word, the Bible. Despite being a religious leader, a scholar and teacher of God's Word, and having a high position in society, Nicodemus, the leader of the Pharisees, knew that he is not righteous before God. Since he had his doubts about his being righteous through the requirements of the religion he was fulfilling, so he came to meet the Lord Jesus Christ about it. The Lord Jesus Christ told this self-righteous and elite religious leader of the Jews three times that he must be born again, because without doing so one cannot enter the kingdom of God or even see it. The Lord also made it clear to him that this was not a new teaching being given by the Lord Jesus, but it was in a teaching of God, given in the Word of God (the present Old Testament section of the Bible), of which Nicodemus was a scholar and teacher. The Lord reminded him that only those with a pure heart, will be able to have fellowship with God (Psalm 15; 51:6, 10; 73:1; etc.), and not those who in trust in fulfilling religious activities and rituals while remaining attached to worldly things.


    Today we will see another example from the Bible in the same context, that just as Nicodemus had doubts about his salvation in spite of knowing the Word of God and following God’s law, so did another wealthy young leader have doubts about his having eternal life despite his religiously observing the words of God’s Law. We find the account of this wealthy young leader in the first three gospels (Matthew 19:16-29; Mark 10:17-30; Luke 18:18-27). Here we'll mainly take the gospel account of Mark for our consideration, but will also look at some things from the other two accounts. The account of the Gospel of Mark is follows:

Mark 10:17 Now as He was going out on the road, one came running, knelt before Him, and asked Him, "Good Teacher, what shall I do that I may inherit eternal life?"

Mark 10:18 So Jesus said to him, "Why do you call Me good? No one is good but One, that is, God.

Mark 10:19 You know the commandments: 'Do not commit adultery,' 'Do not murder,' 'Do not steal,' 'Do not bear false witness,' 'Do not defraud,' 'Honor your father and your mother.' "

Mark 10:20 And he answered and said to Him, "Teacher, all these things I have kept from my youth."

Mark 10:21 Then Jesus, looking at him, loved him, and said to him, "One thing you lack: Go your way, sell whatever you have and give to the poor, and you will have treasure in heaven; and come, take up the cross, and follow Me."

Mark 10:22 But he was sad at this word, and went away sorrowful, for he had great possessions.


Let us now look at some things from this and other related accounts:

  • Verse 17 - From Luke 18:18 we see that he was a “ruler”, or, an official, holding a high position in society; Matthew 19:20 tells us that he was young; And Mark 10:22 states that he was very wealthy. Yet this man came running to the Lord Jesus on the public road and came down on his knees before the Lord in reverence, and addressed Him as "good teacher". He asked the Lord the question about the issue troubling his heart, "Good Teacher, what shall I do that I may inherit eternal life?" Clearly, he knew within himself that he was not yet entitled to eternal life; There was something in his life that was preventing him from inheriting eternal life; his mind, and his conscience were alerting him to this.

  • Verse 18 - Before answering his question, the Lord revealed to him the actual status he had accorded to the Lord in his heart, despite all the external show of reverence. The Lord counter-questioned him, "Why do you call Me good? No one is good but One, that is, God." In other words, the Lord was asking him "By addressing me as ‘Good Teacher’, are you really accepting that I am the Lord God; the one who alone can give eternal life?” Much depended on the young man's answer to the Lord's question; We'll look at this a little later, where the answer young man’s answer is recorded.

  • Verse 19 - The Lord then continued, and asked him to obey the commandments. Matthew 19:18 tells that the young man asked the Lord, "Which ones?", indicating his inner arrogance and pride regarding his righteousness. The commandments that the Lord mentioned in His answer to this young man are part of the "Ten Commandments" given by God to the Israelites through Moses. Take note, in answering the young man, the Lord did not mention the first four of the Ten Commandments, which are related to man's behavior toward God; But only mentioned the latter six commandments, which deal with man's dealings with man.

  • Verse 20 - The short one sentence answer of the young man to this, "Teacher, all these things I have kept from my youth" reveals a lot about him. It is written in Matthew 19:20 that the young man also asked, "What do I still lack?" Implying that his conscience was testifying to him that his claim to have known and obeyed the commandments from his youth, his own sense of righteousness, were not enough to entitle him to eternal life.

    • The Lord had told him that, “why do you call me good; only God is good?” If after this, had the young man continued to address the Lord as “good” it would have shown that he accepts the Lord Jesus as God, the source of eternal life. But he did not; now he no longer addresses him as "good teacher", but only as "Teacher"; i.e., for him the Lord Jesus was worthy of honor, but not of being worshipped. He had come to get "knowledge" or an opinion from a "teacher", not to learn the path of salvation from the Lord. Had he accepted Jesus as Lord, his reaction to the solution given to him by the Lord would have been different too.

    • His immediate response was that “I have been obeying these commandments since childhood”, but did not say that "Lord, I have been obeying not only these, but even the first four commandments also from my youth." His conscience, which was troubling him about his salvation, knew that while he was doing the right things to show men, but his behavior towards God was not as it ought to be.

    • He might have heaved a silent sigh of relief within himself, thinking "Escaped! If Jesus had asked me about the first four commandments as well, I would have been in trouble." But actually, the Lord had placed a mirror in front of him, and shown him his true image, as how he looked to the eyes of God.

  • Verse 21 - Despite this pretentious life of his, the Lord still loved him; He did not despise him, but told him the solution to his problem and the way to perfection. From Matthew 19:21 we see that the Lord had responded by giving him an opportunity to be perfect, "Jesus said to him, "If you want to be perfect, go, sell what you have and give to the poor, and you will have treasure in heaven; and come, follow Me." From here on everything depended on the decision and response of the young man, on his attitude - which wealth did he give more importance to, heavenly wealth or worldly wealth.

  • Verse 22 - He was saddened to hear the solution given by the Lord, that he do away with his attachment of worldly possessions, accept Jesus as his Lord instead of just a ‘teacher’, and start following Him. He rejected that God given solution, and mournfully turned back. Despite his knowledge of God’s Word, his keeping the commandments, all his self-righteousness, his showing respect for the Lord, etc., his inner reality was quite different. His practicing of religion had not changed him from within in his heart and mind; his heart and mind were really far from God. He came to the source of eternal life, and despite receiving love and guidance, the invitation and way to eternal life, from that source, because of his unrepentant heart and mind, returned back into the perishable world and destruction.

    • He was living a life pleasing to men on the outside, but was unable to please God on the inside, and that's why he came to the Lord Jesus for a solution.

    • Had the Lord indeed been the "good teacher" for him, it would have been easier for him to accept the Lord's words. But Jesus was not Lord to him; He was only a "teacher".

    • If his self-righteousness through the practice of his religion had changed his heart and mind, he would not only have been faithfully obeying all the Ten Commandments given by God, but he would also have disclosed this, and his conscience would not have been convicting him as guilty.

    • From outside, as to other people, he showed great respect to the Lord also, but the Lord exposed his actual inner state, and the reality of the ‘respect’ he showed towards the Lord, to him.

    • Despite all that righteousness, knowing the commandments, claiming to obey them, wanting to have heavenly eternal life, in his heart he was still bound to the world, and did not want to leave the world. His practice of religion and knowledge of the Word had not freed him from the attachment of the world, had not quieted his restlessness.

    What is your real position today in the sight of God, from whom nothing is hidden? Is your externally evident righteousness and good social behavior only an outer covering that you are using to cover your inner distance from God? Despite the observance of religion and righteousness, claiming to respect and obey God's commands, the young man knew that he was far from eternal life; it was deficient in his life, and he needed to correct this. Are you, like that young man, trying to think of yourself to be the right and having eternal life through your fulfilling your religion, your own righteousness and good deeds? Just like for that young man, all these efforts will be in vain for you too.


    Just as the Lord loved that young man, even in his inner state of rejection of the Lord and his hypocrisy, he loves you too, despite knowing your reality, and is giving you the way to eternal life, the solution to your problems, the way to perfection, today. Have you actually accepted and received the Lord Jesus to be your Lord, your Master, and your Savior? Are you willing and ready to do as he says? He is calling you to come out of the fatal attraction of this perishing world and the world's perishable things, charms, wealth, etc., and with a sincere and submitted heart, willingly accept Jesus as your Lord, and follow Him. From the moment you decide about this in his favor, both your present and your eternal life will become blessed for eternity, you will become partaker of heavenly protection and blessings. A short prayer said voluntarily with a sincere heart and with heart-felt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company, wants to see you blessed; but to make this possible or not, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours. 


Through the Bible in a Year: 

  • 2 Chronicles 13-15

  • John 7:1-27