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रविवार, 29 मई 2011

परमेश्वर की चिंता

१९वीं सदी का विख्यात कवि विलियम कूपर यद्यपि मसीही विश्वासी था, तौ भी वह निराशा की गहराईयों में इतना उतर चुका था कि उसने आत्म हत्या करने की ठान ली। उसने एक कोहरे भरी रात में बघ्घी मंगवाई जिससे वह लंडन शहर की थेम्स नदी में डूबकर आत्म हत्या कर सके। घने कोहरे में दो घंटे तक बघ्घी चलाते रहने के पश्चात कोचवान ने कूपर से कबूल किया कि वह मार्ग भटक गया है और उसे अब पता नहीं है कि वह कहाँ है। इस देरी से खिसियाकर कूपर बघ्घी से उतर पड़ा, यह सोचकर कि अब वह स्वयं पैदल ही नदी का मार्ग ढूँढ लेगा। थोड़ी ही दूर चलकर उसने पाया कि वह अपने ही घर के दरवाज़े के सामने खड़ा है। तब कूपर को एहसास हुआ कि बघ्घी वहीं उसी इलाके के चक्कर लगाए जा रही थी; और उसने परमेश्वर के उसे विनाश से रोक लेने वाले हाथ को पहचाना।

परमेश्वर के आत्मा द्वारा कायल होकर कूपर ने जान लिया कि उसकी मुसीबतों से निकलने का मार्ग नदी में कूदना नहीं, परमेश्वर की ओर अपनी नज़र लगाना है। वह परमेश्वर के प्रति कृतज्ञाता से भर गय और उसने वहीं बैठकर अपनी कृतज्ञता का एक भजन परमेश्वर के लिए लिखा जो उस समय से आज तक अनगिनत लोगों के लिए सांत्वना और आशा का कारण रहा है। उस भजन के भाव इस प्रकार हैं: "परमेश्वर रहस्यमय ढंग से अपने अद्भुत कार्य करता है; वह समुद्र पर अपने पाँव जमाता और तूफान पर सवारी करता है; हे भयभीत संत, नई हिम्मत बाँध; जिन निराशा के बादलों से तू इतना भयभीत है वे तो वास्तव में करुणा से भरे हैं और परमेश्वर की आशीश बन कर तुझपर बरसेंगे।"

भजनकार ने लिखा है, "देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करूणा की आशा रखते हैं बनी रहती है, कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उनको जीवित रखे।" (भजन ३३:१८, १९)

इसीलिए प्रेरित पतरस ने लिखा, "परमेश्वर के बलवन्‍त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। और अपनी सारी चिन्‍ता उसी पर डाल दो, क्‍योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है" (१ पतरस ५:६, ७)।

हमारी आवश्यक्ताएं परमेश्वर की चिंता हैं और उनकी पूर्ति उसकी ज़िम्मेवारी। - हैनरी बौश



कोई जीवन आशा रहित नहीं है, जब तक मसीह को ही जीवन से न निकाल दिया गया हो।

देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करूणा की आशा रखते हैं बनी रहती है, कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उनको जीवित रखे। - भजन ३३:१८, १९


बाइबल पाठ: भजन ३४:१-२२

Psa 34:1 मैं हर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा; उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी।
Psa 34:2 मैं यहोवा पर घमण्ड करूंगा, नम्र लोग यह सुनकर आनन्दित होंगे।
Psa 34:3 मेरे साथ यहोवा की बड़ाई करो, और आओ हम मिलकर उसके नाम की स्तुति करें।
Psa 34:4 मैं यहोवा के पास गया, तब उस ने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।
Psa 34:5 जिन्होंने उसकी ओर दृष्टि की उन्होंने ज्योति पाई और उनका मुंह कभी काला न होने पाया।
Psa 34:6 इस दीन जन ने पुकारा तब यहोवा ने सुन लिया, और उसको उसके सब कष्टों से छुड़ा लिया।
Psa 34:7 यहोवा के डरवैयों के चारों ओर उसका दूत छावनी किए हुए उनको बचाता है।
Psa 34:8 परख कर देखो कि यहोवा कैसा भला है! क्या ही धन्य है वह पुरूष जो उसकी शरण लेता है।
Psa 34:9 हे यहोवा के पवित्र लोगों, उसका भय मानो, क्योंकि उसके डरवैयों को किसी बात की घटी नहीं होती!
Psa 34:10 जवान सिहों को तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं, परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होवेगी।
Psa 34:11 हे लड़कों, आओ, मेरी सुनो, मैं तुम को यहोवा का भय मानना सिखाऊंगा।
Psa 34:12 वह कौन मनुष्य है जो जीवन की इच्छा रखता, और दीर्घायु चाहता है ताकि भलाई देखे?
Psa 34:13 अपनी जीभ को बुराई से रोक रख, और अपने मुंह की चौकसी कर कि उस से छल की बात न निकले।
Psa 34:14 बुराई को छोड़ और भलाई कर, मेल को ढूंढ और उसी का पीछा कर।
Psa 34:15 यहोवा की आंखे धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उसकी दोहाई की ओर लगे रहते हैं।
Psa 34:16 यहोवा बुराई करने वालों के विमुख रहता है, ताकि उनका स्मर्ण पृथ्वी पर से मिटा डाले।
Psa 34:17 धर्मी दोहाई देते हैं और यहोवा सुनता है, और उनको सब विपत्तियों से छुड़ाता है।
Psa 34:18 यहोवा टूटे मन वालों के समीप रहता है, और पिसे हुओं का उद्वार करता है।
Psa 34:19 धर्मी पर बहुत सी विपत्तियां पड़ती तो हैं, परन्त यहोवा उसको उन सब से मुक्त करता है।
Psa 34:20 वह उसकी हड्डी हड्डी की रक्षा करता है, और उन में से एक भी टूटने नहीं पाती।
Psa 34:21 दुष्ट अपनी बुराई के द्वारा मारा जाएगा, और धर्मी के बैरी दोषी ठहरेंगे।
Psa 34:22 यहोवा अपने दासों का प्राण मोल लेकर बचा लेता है; और जितने उसके शरणागत हैं उन में से कोई भी दोषी न ठहरेगा।

एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास ७-९
  • यूहन्ना ११:१-२९

शनिवार, 28 मई 2011

परमेश्वर पर आशा

रेडियो बाइबल क्लास के दफतर में एक पत्र आया जिस पर भेजने वाले ने न अपना नाम लिखा था और न उसका कोई पता था। पत्र में लिखा था कि, "जब तक यह पत्र आपके पास पहुँचेगा, मैं आत्म हत्या कर चुका होऊँगा। मैंने दो वर्ष पहले मसीह को ग्रहण किया था; कुछ समय से मेरा संसार मेरे चारों ओर बिखरता जा रहा है और अब मुझ में और सहने की शक्ति नहीं बची है। मैं अब पुनः बुरी आदतों में तो जा नहीं सकता और न ही फिर से बुरा बन सकता हूँ। मुझ में और परमेश्वर में दूरियाँ आ गई हैं....अब प्रभु ही मेरी सहायता करे।"

मसीही विश्वासी भी ऐसी घोर निराशा के शिकार हो सकते हैं कि वे अपने जीवन को ही समाप्त कर देना चाहें। १ राजा १९ अध्याय में हम पढ़ते हैं कि एलिय्याह शारीरिक और आत्मिक रीति से इतना थक गया कि उसने परमेश्वर से प्रार्थना करी कि वह उसके प्राण ले ले। यद्यपि यह आत्म हत्या नहीं है, लेकिन उसकी यह प्रार्थना वैसी ही निराशा से उत्पन्न हुई। लेकिन परमेश्वर ने एलिय्याह की प्रार्थना का उतर उसे निराशा से निकालने के द्वारा दिया। परमेश्वर ने एलियाह को भोजन और निद्रा द्वारा पहले विश्राम दिया, फिर उसकी शिकायत सुनी, फिर धीमी शाँत आवाज़ में उससे बात करके, उसे एक नया कार्य सौंप कर परमेश्वर ने उसे पुनः प्रोत्साहित किया और कोमलता से उसकी गलती को सुधारा।

घोर निराशा में पड़कर ही लोग आत्म हत्या करते हैं। उनके लिए सत्य का स्वरूप इतना बिगड़ चुका होता है कि वे अपने इस दुष्कार्य के स्वार्थ और पाप को पहचान नहीं पाते। लेकिन परमेश्वर उन्हें फिर से स्थापित करना चाहता है। उन्हें बहाल करने के लिए कभी कभी वह स्वयं ही उनसे बातें करता है, परन्तु अधिकांशतः वह अपने संवेदनशील और परवाह करने वाले लोगों को निराश जनों की सहायता के लिए भेजता है।

प्रभु यीशु मसीह ने कहा, "पुनरूत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्‍तकाल तक न मरेगा; मार्ग और सच्‍चाई और जीवन मैं ही हूं, बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता" (युहन्ना ११:२५, २६; १४:६)। निराशा में पड़े लोगों को मसीह यीशु में मिलने वाली आनन्त आशा का सन्देश दे कर मसीह के प्रत्येक विश्वासी निराश लोगों की सहायता के लिए परमेश्वर की आशा बन सकते हैं। - डेनिस डी हॉन


जब हम विनाश के सबसे निकट होते हैं, परमेश्वर की सहायता भी हमारे सबसे निकट होती है।

वहां उस ने यह कह कर अपनी मृत्यु मांगी कि हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ। - १ राजा १९:४


बाइबल पाठ: १ राजा १९:१-१०

1Ki 19:1 तब अहाब ने ईज़ेबेल को एलिय्याह के सब काम विस्तार से बताए कि उस ने सब नबियों को तलवार से किस प्रकार मार डाला।
1Ki 19:2 तब ईज़ेबेल ने एलिय्याह के पास एक दूत के द्वारा कहला भेजा, कि यदि मैं कल इसी समय तक तेरा प्राण उनका सा न कर डालूं तो देवता मेरे साथ वैसा ही वरन उस से भी अधिक करें।
1Ki 19:3 यह देख एलिय्याह अपना प्राण लेकर भागा, और यहूदा के बेशॅबा को पहुंच कर अपने सेवक को वहीं छोड़ दिया।
1Ki 19:4 और आप जंगल में एक दिन के मार्ग पर जाकर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहां उस ने यह कह कर अपनी मृत्यु मांगी कि हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ।
1Ki 19:5 वह झाऊ के पेड़ तले लेट कर सो गया और देखो एक दूत ने उसे छूकर कहा, उठकर खा।
1Ki 19:6 उस ने दृष्टि करके क्या देखा कि मेरे सिरहाने पत्थरों पर पकी हुई एक रोटी, और एक सुराही पानी धरा है; तब उस ने खाया और पिया और फिर लेट गया।
1Ki 19:7 दूसरी बार यहोवा का दूत आया और उसे छूकर कहा, उठकर खा, क्योंकि तुझे बहुत भारी यात्रा करनी है।
1Ki 19:8 तब उस ने उठकर खाया पिया, और उसी भोजन से बल पाकर चालीस दिन रात चलते चलते परमेश्वर के पर्वत होरेब को पहुंचा।
1Ki 19:9 वहां वह एक गुफा में जाकर टिका और यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा, कि हे एलिय्याह तेरा यहां क्या काम?
1Ki 19:10 उस ने उत्तर दिया सेनाओं के परमेश्वर यहोवा के निमित्त मुझे बड़ी जलन हुई है, क्योकि इस्राएलियों ने तेरी वाचा टाल दी, तेरी वेदियों को गिरा दिया, और तेरे नबियों को तलवार से घात किया है, और मैं ही अकेला रह गया हूँ; और वे मेरे प्राणों के भी खोजी हैं।

एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास ४-६
  • यूहन्ना १०:२४-४२

शुक्रवार, 27 मई 2011

ज्ञानवृद्धि का उद्देश्य

कुछ साल पहले मैं एक विद्यार्थी से चर्चा कर रहा था; उसका कहना था कि वह धर्म में बहुत रुचि रखता है, और धर्म के बारे में सब कुछ जान लेना चाहता है। जब मैंने उसके इस शौक के बारे में उससे थोड़ी गहराई से जानकारी ली तो पता चला कि वह केवल अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए ऐसा करना चाहता था। उसकी जिज्ञासा उसे यह जाने को उकसाती थी कि धर्म में आखिर ऐसा क्या है जिससे लोग उसमें आस्था रखते हैं, परन्तु उसके लिए परमेश्वर का कोई महत्व नहीं था, और ना ही वह अपने लिए परमेश्वर की इच्छा जानने या उसे मानने में कोई रुचि रखता था।

यदि आप बाइबल के बारे में अपनी जानकारी केवल अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए चाहते हैं, ना कि इसलिए कि परमेश्वर को निकटता से जानकर उसकी इच्छा पूरी करने में जुटें, तो आप भी उस छात्र से भिन्न नहीं हैं।

प्रेरित पतरस ने कहा कि हमें अपने परमेश्वर संबंधी ज्ञान को केवल एक उद्देश्य के लिए बढ़ाना चाहिए - कि हमारा विश्वास परिपक्व हो सके। पतरस ने लिखा कि, "और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्‍न करके, अपने विश्वास पर सदगुण, और सदगुण पर समझ। और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति। और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ। क्‍योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पहचानने में निकम्मे और निष्‍फल न होने देंगी" (२ पतरस १:५-८)। मसीही विश्वास में परिपक्वता का यही मार्ग है।

परमेश्वर हमें केवल ज्ञानवर्धन के लिए अपने ज्ञान के खोजी होने को नहीं कहता, वरन इसलिए क्योंकि, "अनन्‍त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्‍चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जानें" (युहन्ना १७:३); और अपने जीवनों में परमेश्वर को केंद्रबिंदु बना कर प्रेम और सदगुणों से भर जाएं और परमेश्वर के लिए फलदायी हों। - मार्ट डी हॉन


जिस ज्ञान से समझ-बूझ और परिपक्वता न बढ़े वह खातरनाक होता है।

अनन्‍त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्‍चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जानें। - युहन्ना १७:३


बाइबल पाठ: २ पतरस १:१-११

2Pe 1:1 शमौन पतरस की और से जो यीशु मसीह का दास और प्रेरित है, उन लोगों के नाम जिन्‍होंने हमारे परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की धामिर्कता से हमारा सा बहुमूल्य विश्वास प्राप्‍त किया है।
2Pe 1:2 परमेश्वर के और हमारे प्रभु यीशु की पहचान के द्वारा अनुग्रह और शान्‍ति तुम में बहुतायत से बढ़ती जाए।
2Pe 1:3 क्‍योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्‍ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिस ने हमें अपनी ही महिमा और सदगुण के अनुसार बुलाया है।
2Pe 1:4 जिन के द्वारा उस ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूटकर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्‍वभाव के समभागी हो जाओ।
2Pe 1:5 और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्‍न करके, अपने विश्वास पर सदगुण, और सदगुण पर समझ।
2Pe 1:6 और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति।
2Pe 1:7 और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ।
2Pe 1:8 क्‍योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पहचानने में निकम्मे और निष्‍फल न होने देंगी।
2Pe 1:9 और जिस में ये बातें नहीं, वह अन्‍धा है, और धुन्‍धला देखता है, और अपने पूर्वकाली पापों से धुलकर शुद्ध होने को भूल बैठा है।
2Pe 1:10 इस कारण हे भाइयों, अपने बुलाए जाने, और चुन लिये जाने को सिद्ध करने का भली भांति यत्‍न करते जाओ, क्‍योंकि यदि ऐसा करोगे, तो कभी भी ठोकर न खाओगे।
2Pe 1:11 वरन इस रीति से तुम हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्‍त राज्य में बड़े आदर के साथ प्रवेश करने पाओगे।

एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास १-३
  • यूहन्ना १०:१-२३

गुरुवार, 26 मई 2011

संतुलित सत्य

१९वीं सदी में प्रचलित एक बच्चों की कहानी मुझे बहुत विचलित करती है क्योंकि यह कहानी परमेश्वर के बारे में बहुत गलत दृष्टीकोण देती है।

यह कहानी एक छोटे बच्चे के बारे में है, जिसने अपनी माँ की आज्ञा के विरुद्ध, उसकी पीठ पीछे केक का एक छोटा टुकड़ा लेकर खा लिया। इस कारण उस कहानी में इस बच्चे को नीच, निन्दनीय, कपटी और किसी भी आदरणीय या उदार भावना से सर्वथा विहीन आदि कहा गया। उसके बाद इस "धोखेबाज़ लड़के" का परमेश्वर के सिंहासन के सामने न्याय के लिए प्रस्तुत किया जाना और वहाँ उसे कठोर दंड की आज्ञा के साथ कहा जाना कि, " हे श्रापित लोगों, मेरे साम्हने से उस अनन्‍त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है" (मत्ती २५:४१) दिखाया गया है।

यह कहानी अनज्ञाकारिता और झूठ के विरुद्ध चेतावनी देने की बात में तो ठीक है, लेकिन यह परमेश्वर के विलंब से कोप करने, धैर्य रखने, क्षमा देने जैसे गुणों को बिलकुल अन्देखा कर देती है और परमेश्वर के गुणों का असंतुलित चित्रण प्रस्तुत करती है। इसकी तुलना में, १ कुरिन्थियों ६:९-११ में हम अधर्म और अनुचित चाल-चलन के विरुद्ध कड़ी चेतावनी तो पाते हैं, किंतु साथ ही अधर्म के निन्दनीय कार्यों की सूची के बाद ये कोमल शब्द भी पाते हैं, " और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्‍तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे" (१ कुरिन्थियों ६:११); क्योंकि हमारा परमेश्वर किसी भी पापी के नाश से नहीं वरन प्रत्येक के बचाए जाने से प्रेम रखता है, "प्रभु यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्न होता हूँ? क्या मैं इस से प्रसन्न नहीं होता कि वह अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे?" (यहेजकेल १८:२३)। प्रभु यीशु ने कहा " परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्‍तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए" (युहन्ना ३:१७); "यीशु ने यह सुनकर, उन से कहा, भले चंगों को वैद्य की आवश्यकता नहीं, परन्‍तु बीमारों को है: मैं धमिर्यों को नहीं, परन्‍तु पापियों को बुलाने आया हूं।" (मरकुस २:१७)

कुछ मसीही बिना परमेश्वर की करूणा का ध्यान करे परमेश्वर के कोप पर इतना ज़ोर देते हैं कि वे उसकी दया और क्षमाशीलता को भूल जाते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे मसीही भी हैं जो परमेश्वर की दया, करुणा और क्षमाशीलता पर इतना ज़ोर देते हैं कि वे उसकी पवित्रता, न्याय और पाप से घृणा (पापी से नहीं) को नज़रांदाज़ कर देते हैं और पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टीकोण को बहुत हल्का प्रदर्शित करते हैं। जहाँ हमें परमेश्वर की पवित्रता, न्याय के प्रति कटिबद्धता और पाप से घृणा को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए वहीं उसके प्रेम, दया और अनुग्रह को भी अन्देखा नहीं करना चाहिए।

जब हम परमेश्वर के गुणों को सही जानने और समझने लगेंगे तब ही हम अपना जीवन भी सही जी सकेंगे। सत्य के संतुलित ज्ञान द्वारा ही हम लोगों को भी सही मार्गदर्शन दे सकते हैं। - हर्ब वैन्डर लुग्ट


परमेश्वर के अनुग्रह के वर्णन के बिना परमेश्वर के क्रोध की शिक्षा अधूरी तथा असंतुलित है।

जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उस को हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है और परमेश्वर उस में बना रहता है। - १ युहन्ना ४:१६


पर जैसा तुम्हारा बुलाने वाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल चलन में पवित्र बनो। क्‍योंकि लिखा है, कि पवित्र बनो, क्‍योंकि मैं पवित्र हूं। - १ पतरस १:१६


बाइबल पाठ: १ कुरिन्थियों ६:९-२०

1Co 6:9 क्‍या तुम नहीं जानते, कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे धोखा न खाओ, न वेश्यागामी, न मूर्त्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरूषगामी।
1Co 6:10 न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देने वाले, न अन्‍धेर करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।
1Co 6:11 और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्‍तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।
1Co 6:12 सब वस्‍तुएं मेरे लिये उचित तो हैं, परन्‍तु सब वस्‍तुएं लाभ की नहीं, सब वस्‍तुएं मेरे लिये उचित हैं, परन्‍तु मैं किसी बात के आधीन न हूंगा।
1Co 6:13 भोजन पेट के लिये, और पेट भोजन के लिये है, परन्‍तु परमेश्वर इस को और उस को दोनों को नाश करेगा, परन्‍तु देह व्यभिचार के लिये नहीं, वरन प्रभु के लिये और प्रभु देह के लिये है।
1Co 6:14 और परमेश्वर ने अपनी सामर्थ से प्रभु को जिलाया, और हमें भी जिलाएगा।
1Co 6:15 क्‍या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह मसीह के अंग हैं सो क्‍या मैं मसीह के अंग लेकर उन्‍हें वेश्या के अंग बनाऊं? कदापि नहीं।
1Co 6:16 क्‍या तुम नहीं जानते, कि जो कोई वेश्या से संगति करता है, वह उसके साथ एक तन हो जाता है क्‍योंकि वह कहता है, कि वे दोनों एक तन होंगे।
1Co 6:17 और जो प्रभु की संगति में रहता है, वह उसके साथ एक आत्मा हो जाता है।
1Co 6:18 व्यभिचार से बचे रहो: जितने और पाप मनुष्य करता है, वे देह के बाहर हैं, परन्‍तु व्यभिचार करने वाला अपनी ही देह के विरूद्ध पाप करता है।
1Co 6:19 क्‍या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्‍दिर है जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो?
1Co 6:20 कयोंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास २८-२९
  • यूहन्ना ९:२४-४१

बुधवार, 25 मई 2011

के बारे में जानना; को जानना

एक शाम को आई आंधी-बारिश के बाद मैंने आकाश में अति सुन्दर इन्द्रधनुष देखा, ऐसा जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। लेकिन जब मैंने उसका वर्णन अपनी पत्नि के सामने करना चाहा तो मैं बहुत कुण्ठित हो गया क्योंकि उसकी सुन्दरता बयान करने के लिए मुझे शब्द नहीं मिल रहे थे।

जो मैंने देखा उसे समझने के लिए मैंने ज्ञान के विश्वकोष में खोजा; वहाँ मुझे इन्द्रधनुष को समझाने वाले तथ्य मिले कि इन्द्र्धनुष तब बनता है जब प्रकाश के पानी की बून्दों में होकर निकलने से वह अपनी विभिन्न तरंगों में बिखर जाता है, प्रत्येक तरंग का रंग अलग होता है और इस कारण इन्द्रधनुष आकाश में एक रंगीन पट्टी दिखता है। विश्वकोष ने मेरे ज्ञान को तो बढ़ाया, लेकिन जो मैंने जाना वे केवल वैज्ञानिक तथ्य मात्र थे, इन तथ्यों में इन्द्रधनुष की सुन्दरता नहीं थी।

पतरस की दूसरी पत्री के पहले अध्याय में दो तरह के ज्ञान के बारे में बताया गया है। मूल युनानी भाषा में आत्मिक उन्नति के संबंध में, ५ और ६ पद में, लेखक जो शब्द प्रयोग करता है उसका तात्पर्य तत्व ज्ञान से है; किंतु पद २, ३ और ८ में आत्मिक उन्नति के संबंध में जो शब्द प्रयोग हुआ है उसका तात्पर्य मसीह के व्यावाहरिक और व्यक्तिगत ज्ञान से है। इन दोनो अलग अलग शब्दों का प्रयोग बताता है कि प्रभु के बारे जानना और प्रभु को जानना वैसे ही भिन्न हैं जैसे इन्द्रधनुष के बारे में जानना और उसकी सुन्दरता को जानना।

अय्युब ने भी इस भिन्नता को पहचाना, और उसने परमेश्वर से कहा, "मैंने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं" (अय्युब ४२:५)।

जैसे जैसे आप परमेश्वर के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाते हैं, यह प्रयास भी कीजिए कि आप परमेश्वर को जानने वाले भी हो सकें। - मार्ट डी हॉन


सच्चा ज्ञान विश्वास से भरे हृदय से आरंभ होता है, तथ्यों से भरे दिमाग से नहीं।

परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में हैं, उसी ने उसे प्रगट किया। यूहन्ना १:१८


यीशु ने उस से कहा; हे फिलप्‍पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्‍या तू मुझे नहीं जानता? जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है। युहन्ना १४:९

बाइबल पाठ: २ पतरस १:१-११

2Pe 1:1 शमौन पतरस की और से जो यीशु मसीह का दास और प्रेरित है, उन लोगों के नाम जिन्‍होंने हमारे परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की धामिर्कता से हमारा सा बहुमूल्य विश्वास प्राप्‍त किया है।
2Pe 1:2 परमेश्वर के और हमारे प्रभु यीशु की पहचान के द्वारा अनुग्रह और शान्‍ति तुम में बहुतायत से बढ़ती जाए।
2Pe 1:3 क्‍योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्‍ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिस ने हमें अपनी ही महिमा और सदगुण के अनुसार बुलाया है।
2Pe 1:4 जिन के द्वारा उस ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूटकर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्‍वभाव के समभागी हो जाओ।
2Pe 1:5 और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्‍न करके, अपने विश्वास पर सदगुण, और सदगुण पर समझ।
2Pe 1:6 और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति।
2Pe 1:7 और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ।
2Pe 1:8 क्‍योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पहचानने में निकम्मे और निष्‍फल न होने देंगी।
2Pe 1:9 और जिस में ये बातें नहीं, वह अन्‍धा है, और धुन्‍धला देखता है, और अपने पूर्वकाली पापों से धुलकर शुद्ध होने को भूल बैठा है।
2Pe 1:10 इस कारण हे भाइयों, अपने बुलाए जाने, और चुन लिये जाने को सिद्ध करने का भली भांति यत्‍न करते जाओ, क्‍योंकि यदि ऐसा करोगे, तो कभी भी ठोकर न खाओगे।
2Pe 1:11 वरन इस रीति से तुम हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्‍त राज्य में बड़े आदर के साथ प्रवेश करने पाओगे।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास २५-२७
  • यूहन्ना ९:१-२३

मंगलवार, 24 मई 2011

कम बोलिए, अधिक कहिए

सन १९७२ में सैन फ्रैनसिस्को के विशाल गोल्डन गेट पुल के नीचे दो तेल के टैंकर आपस में टकरा गए जिससे ८४०,००० गैलन तेल खाड़ी में बह गया। तेल रिसाव के कारण मरे हुए समुद्री पक्षी, मछलियाँ और समुद्री जीव बह कर किनारों पर आने लगे। इस त्रासदी से प्रभावित होकर उस पुल के समीप रहने वाले एक मनुष्य ने ठान लिया कि अब से वह ऐसा सादगी का जीवन व्यतीत करेगा जिससे कम से कम प्राकृतिक संसाधनों का व्यय हो। पहले उसने हर जगह चल कर ही जाना आरंभ किया। लगभग एक साल के पश्चात उसने निर्णय लिया कि प्राकृतिक संसाधनों के व्यर्थ व्यय की ओर लोगों का ध्यान खींचने के लिए वह मौन धारण कर लेगा। अगले १३ वर्ष में वह केवल एक बार बोला, जब उसने अपने माता-पिता को फोन करके बताया कि अपने इस उद्देश्य को सर्वविदित करने के लिए वह एक पैदल यात्रा करने जा रहा है। अपनी यात्रा में वह बिना बोले अपनी बात लोगों को पहुँचाता रहा; लेकिन कुछ ही समय में उसने यह भी जाना कि मौन रहकर वह लोगों की बातों को अधिक सुन सकता है, और फिर वह यह बात भी लोगों को पहुँचाने लगा।

जो इस व्यक्ति ने किया, वह हम सब पर भी लागू होता है। कम बोलने से न केवल हम अधिक सुन सकेंगे, वरन अपनी बात अधिक प्रभावी रीति से कह भी सकेंगे। अकसर किसी विष्य पर हमारा शाँत रहना हमारे शब्दों से अधिक प्रभावकारी और वाग्मी होता है।

बुद्धिमान व्यक्ति की बात सुनी भी जाती है और वह स्वयं भी औरों की बात सुनता है, क्योंकि वह जानता है कि उसे कब बोलना चाहिए और कब मौन रहना चाहिए; उसका मौन भी अपनी बात कहने की एक विधी है।

राजा सुलेमान ने अपने नीतिवचनों में इस सत्य की ओर कई बार ध्यान खींचा है कि कम बोलकर भी अधिक कह जाना बुद्धिमान की निशानी है। - मार्ट डी हॉन


शांति मनोहर है। जब तक कहने को उससे सुन्दर कुछ न हो, तब तक शांत ही रहिए।

मूढ़ भी जब चुप रहता है, तब बुद्धिमान गिना जाता है; और जो अपना मुंह बन्द रखता वह समझ वाला गिना जाता है। - नीतिवाचन १७:२८


बाइबल पाठ: नीतिवाचन १७:२७-१८:४

Pro 17:27 जो संभलकर बोलता है, वही ज्ञानी ठहरता है; और जिकी आत्मा शान्त रहती है, वो ही समझ वाला पुरूष ठहरता है।
Pro 17:28 मूढ़ भी जब चुप रहता है, तब बुद्धिमान गिना जाता है; और जो अपना मुंह बन्द रखता वह समझ वाला गिना जाता है।
Pro 18:1 जो औरों से अलग हो जाता है, वह अपनी ही इच्छा पूरी करने के लिये ऐसा करता है,
Pro 18:2 और सब प्रकार की खरी बुद्धि से बैर करता है। मूर्ख का मन समझ की बातों में नहीं लगता, वह केवल अपने मन की बात प्रगट करना चाहता है।
Pro 18:3 जहां दुष्ट आता है, वहां अपमान भी आता है; और निन्दित काम के साथ नामधराई होती है।
Pro 18:4 मनुष्य के मुंह के वचन गहिरा जल, वा उमण्डने वाली नदी वा बुद्धि के सोते हैं।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास २२-२४
  • यूहन्ना ८:२८-५९

सोमवार, 23 मई 2011

बुद्धि और ज्ञान

एक कार्टून रेखाचित्र में दिखाया गया कि एक युवती सर पर टोपी और काला चोगा पहने हुए और अपने हाथ में अपनी स्नातक डिगरी लिए खड़ी है। उसका सर गर्व से ऊँचा है और वह संसार को नीची निगाहों से देख रही है। संसार ने उससे पूछा कि वह कौन है तो वह घमंड से उत्तर देती है, "क्या तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं ने प्रतिष्ठा विद्यापीठ से स्नातक की डिगरी ली है।" संसार उसे उत्तर देता है, "बस इतनी सी बात; मेरे साथ आओ, शेष मैं अब तुम्हें सिखाऊंगा।"

उस युवती के स्नातक के डिगरी प्राप्त करने और शिक्षा अर्जित करने को हम तुच्छ नहीं जान सकते, उसने कुछ गलत नहीं किया। किंतु केवल कुछ वर्ष की पढाई और कक्षा में बैठकर सीखने से तो कोई बुद्धिमान नहीं बन जाता। कठिन परिस्थितियों के अनुभव स्कूल कालेज की पढाई से कहीं अधिक मूल्यवान शिक्षाएं देते हैं। क्या शिक्षा का कोई महत्व है? बिलकुल है, शिक्षा आवश्यक है, परन्तु शिक्षित होने के साथ बुद्धिमान होना भी बहुत आवश्यक है। ज्ञान तथ्यों को जानना है, बुद्धिमानी तथ्यों का सही उपयोग करना जानना है। लेकिन इन सब से ऊपर है वह ज्ञन जो परमेश्वर से मिलता है, क्योंकि परमेश्वरीय ज्ञान ही इन सब बातों का सही उपयोग सिखा सकता है।

सबसे उत्तम शिक्षा और बहुत प्रकार का अनुभव होने पर भी मनुष्य परमेश्वर से अलग रहकर कुछ नहीं कर सकता; इसलिए परमेश्वर का वचन हमें हिदायत देता है कि अपनी शिक्षा और अनुभवों के साथ हम स्वर्गीय बुद्धि को भी जोड़ लें, और इसे पाना बहुत सहज है। याकूब १:५-७ में लिखा है कि "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है और उस को दी जाएगी। पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्‍देह न करे, क्‍योंकि सन्‍देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। ऐसा मनुष्य यह न समझे, कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा" और नीतिवचन ९:१० बताता है कि "यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है।"

जहाँ ऐसा स्वर्गीय ज्ञान होगा वहाँ कभी घमण्ड नहीं होगा। - रिचर्ड डी हॉन


शिक्षा का मर्म मन को शिक्षित करना है।

अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना। - नीतिवचन ३:७


बाइबल पाठ: नीतिवचन ३:१३-२०

Pro 3:13 क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, और वह मनुष्य जो समझ प्राप्त करे,
Pro 3:14 क्योंकि बुद्धि की प्राप्ति चान्दी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से भी उत्तम है।
Pro 3:15 वह मूंगे से अधिक अनमोल है, और जितनी वस्तुओं की तू लालसा करता है, उन में से कोई भी उसके तुल्य न ठहरेगी।
Pro 3:16 उसके दाहिने हाथ में दीर्घायु, और उसके बाएं हाथ में धन और महिमा है।
Pro 3:17 उसके मार्ग मनभाऊ हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं।
Pro 3:18 जो बुद्धि को ग्रहण कर लेते हैं, उनके लिये वह जीवन का वृक्ष बनती है; और जो उसको पकड़े रहते हैं, वे धन्य हैं।
Pro 3:19 यहोवा ने पृथ्वी की नेव बुद्धि ही से डाली और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।
Pro 3:20 उसी के ज्ञान के द्वारा गहिरे सागर फूट निकले, और आकाशमण्डल से ओस टपकती है।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास १९-२१
  • यूहन्ना ८:१-२७