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सोमवार, 10 जून 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 96

 

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आरम्भिक बातें – 57

हाथ रखना – 5

 

पिछले लेख में हमने बाइबल के अंग्रेजी के NKJV अनुवाद में से, अय्यूब की पुस्तक में वाक्यांश “हाथ रखना” के तीन भिन्न प्रकार से उपयोग होने के बारे में देखा था। ये तीन हैं, सहानुभूति रखने और सहायता करने वाला होना;  किसी ज़ारी प्रक्रिया को समाप्त कर देना; अपना हाथ धरने के द्वारा छूने का प्रयास करना। इसके बाद बाइबल में इस वाक्यांश का अगला उपयोग यशायाह 11:14 में हुआ है, और वहाँ एक बार फिर, इसे हानि पहुँचाने के अभिप्राय से उपयोग किया गया है, जिस पर हम पहले विचार कर चुके हैं। इसके बाद यह वाक्यांश, परमेश्वर के वचन बाइबल में नए नियम में उपयोग किया गया है, मत्ती 9:18 “वह उन से ये बातें कह ही रहा था, कि देखो, एक सरदार ने आकर उसे प्रणाम किया और कहा मेरी पुत्री अभी मरी है; परन्तु चलकर अपना हाथ उस पर रख, तो वह जीवित हो जाएगी” जो प्रभु यीशु के द्वारा याईर की बेटी के मृतकों में से जिलाए जाने के वृतान्त में से है; और इसी घटना और वाक्यांश को मरकुस 5:23 में भी दिया गया है। इसके बाद मरकुस 16:18 में भी इस वाक्यांश को इसी अभिप्राय के साथ उपयोग किया गया है, “नई नई भाषा बोलेंगे, सांपों को उठा लेंगे, और यदि वे नाशक वस्तु भी पी जाएं तौभी उन की कुछ हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे।” यहाँ पर इसे प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों को, स्वर्गारोहण से पहले दी गयी महान आज्ञा में कहा गया है। इसके अतिरिक्त इस वाक्यांश को मत्ती 21:46. मरकुस 12:12, और लूका  20:19, 21:12 में भी हानि पहुंचाने के अभिप्राय से उपयोग किया गया, इसलिए हम नए नियम के इन तीनों उपयोगों पर विचार नहीं करेंगे, वरन केवल चँगाई से सम्बन्धित वाक्यांश के उपयोग को ही देखेंगे।

मत्ती 9:18 में, याईर नामक एक आराधनालय का सरदार प्रभु यीशु से विनती कर रहा है कि आ कर उसकी बेटी पर, जो बीमार है और मरने पर है, हाथ रखे। याईर का विश्वास था कि प्रभु के उसकी बेटी पर हाथ रखने से वह चँगी हो जाएगी। दूसरे हवाले, मरकुस 16:18 में, प्रभु अपने शिष्यों को, उनकी कुछ समय बाद आरंभ होने वाली सुसमाचार प्रचार की विश्वव्यापी सेवकाई के दौरान, लोगों पर हाथ रखने के द्वारा उन्हें चँगा करने की सामर्थ्य दे रहा है। इसी सन्दर्भ में, प्रेरितों के काम पुस्तक में, हम देखते हैं कि पौलुस, जो उस समय शाऊल के नाम से जाना जाता था, के प्रभु यीशु के साथ दमिश्क के मार्ग पर हुए साक्षात्कार के बाद, उस को दिखाई देना बन्द हो गया था (प्रेरितों 9:1-9)। पौलुस ने फिर से देखना तब आरम्भ किया जब परमेश्वर के भेजे जाने पर हनन्याह ने आ कर उस पर हाथ रखे “तब हनन्याह उठ कर उस घर में गया, और उस पर अपना हाथ रखकर कहा, हे भाई शाऊल, प्रभु, अर्थात यीशु, जो उस रास्ते में, जिस से तू आया तुझे दिखाई दिया था, उसी ने मुझे भेजा है, कि तू फिर दृष्टि पाए और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जाए” (प्रेरितों 9:17)। पौलुस ने भी, जब उसे रोम ले जाया जा रहा था, और उनका जहाज़ टूट जाने के कारण वे माल्टा नामक द्वीप पर थे, वहाँ पर पूबलियुस के पिता को उस पर हाथ रख कर चँगा किया था “पुबलियुस का पिता ज्‍वर और आंव लहू से रोगी पड़ा था: सो पौलुस ने उसके पास घर में जा कर प्रार्थना की, और उस पर हाथ रखकर उसे चंगा किया” (प्रेरितों 28:8)। तो, इस प्रकार से परमेश्वर के वचन में यह इस वाक्यांश का सातवाँ भिन्न प्रकार का उपयोग है, चँगाई देने के सन्दर्भ में उपयोग।

बाइबल में चँगाई केवल हाथ रखने के द्वारा ही नहीं दी गई है। हम मत्ती 8:8 में देखते हैं कि सूबेदार ने प्रभु से कहा कि वह जहां पर है, वहीं से वह बस कह दे, और दूर स्थान पर उसका सेवक चँगा हो जाएगा। प्रभु यीशु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई के दिनों में लोगों को चँगा करने के लिए, बोलने, छूने, मिट्टी गीली कर के लगाने, आदि का उपयोग किया। इसी प्रकार से याकूब 5:14-15 में लिखा है कि चँगा करने के लिए बीमार पर कलीसिया के प्राचीनों द्वारा तेल लगाकर प्रार्थना की जाए; तथा चँगा करना पवित्र आत्मा के वरदानों में से भी एक है (1 कुरिन्थियों 12:9)। तो, परमेश्वर का वचन, ईश्वरीय सामर्थ्य से शारीरिक चँगाई मिलने को केवल हाथ रखने के द्वारा ही नहीं दिखाता है; बल्कि चँगाई देने के विभिन्न तरीकों में से एक तरीका हाथ रखना भी है। हाथ रखने के द्वारा, चँगाई देने के लिए परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जा रहा व्यक्ति, उस बीमार जन के साथ गहरी सहानुभूति और एकता व्यक्त करता है; और ऐसी परिस्थितियों में प्रेम और सहानुभूति के साथ किया गया मानवीय स्पर्श, बीमार के लिए आश्वस्त करने वाला और शान्तिदायक होता है, उस बीमार व्यक्ति की आशंकाओं को शान्त तथा उस की पीड़ा को कम करता है।

हम इस वाक्यांश के विभिन्न अभिप्रायों के साथ उपयोग किए जाने के अपने इस अध्ययन को परमेश्वर के वचन बाइबल के अंग्रेजी के NKJV अनुवाद में से देखने को अगले लेख में ज़ारी रखेंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


The Elementary Principles – 57

Laying on of Hands - 5

 

   In the previous article, we had seen three different meanings in which the phrase “laying of hands,” or “laying on of hands” has been used in the book of Job, in the NKJV translation of the Bible. These meanings were, to be sympathetic and helpful; to stop or end and ongoing process; and simply to touch by placing one’s hand on another. The next use of this phrase in the Bible is in Isaiah 11:14, and there again it is used in the sense of causing harm, which we have already considered. Then this phrase is used in God’s Word the Bible in the New Testament, in Matthew 9:18 “While He spoke these things to them, behold, a ruler came and worshiped Him, saying, "My daughter has just died, but come and lay Your hand on her and she will live"”, in the incidence of the Lord Jesus raising the daughter of Jairus from the dead; the same incidence, and the same phrase, has also been stated again in Mark 5:23. Then in Mark 16:18 this phrase has been stated again in the same sense, “they will take up serpents; and if they drink anything deadly, it will by no means hurt them; they will lay hands on the sick, and they will recover.” Here it has been used by the Lord Jesus in His Great Commission to His disciples before His ascension. This phrase has also been used in Matthew 21:46. Mark 12:12, and Luke 20:19, 21:12 in the sense of causing harm, so we will not be considering these three New Testament instances of its use, but will only consider its use for healing.

   In Matthew 9:18, Jairus, a ruler in a synagogue is pleading with the Lord Jesus to come and lay hands on his daughter, who is sick and on the verge of death. Jairus believed that by the Lord’s placing of His hands on his daughter, she will recover. In the second reference of Mark 16:18 the Lord is giving His disciples the power to heal the sick by laying hands on them, in their worldwide gospel preaching ministry, which they would be beginning in  short time. In the same context, in the book of Acts, we see that Paul, then known as Saul, after his encounter with the Lord Jesus on the road to Damascus, becomes blind (Acts 9:1-9). Paul received his eyesight back when Ananias, sent by God, came to and laid his hands on Paul “And Ananias went his way and entered the house; and laying his hands on him he said, "Brother Saul, the Lord Jesus, who appeared to you on the road as you came, has sent me that you may receive your sight and be filled with the Holy Spirit."” (Acts 9:17). Paul too, when being taken to Rome, was shipwrecked on the island of Malta, and there he healed the father of Publius by laying hands on him “And it happened that the father of Publius lay sick of a fever and dysentery. Paul went in to him and prayed, and he laid his hands on him and healed him” (Acts 28:8).  So, this is the seventh different use of this phrase in God’s Word, being used for bringing about healing.

The laying of hands is not the only way healing has been shown to occur in the Bible. The Centurion said to the Lord to just say the words from where He (the Lord) was and the Centurion’s servant would be healed at a distant place (Matthew 8:8). The Lord Jesus during His earthly ministry, spoke, touched, used clay etc. to bring about healing. Similarly, in James 5:14-15 prayer and anointing with oil have been prescribed to bring healing; and healing is also a gift of the Holy Spirit given to some (1 Corinthians 12:9). So, God’s Word does not confine physical healing occurring through divine intervention, to only be by laying of hands; but laying of hands to heal is also one of the various ways to bring divine healing. By laying of hands, the person being used to heal someone by God, expresses oneness and deep sympathy with the sick person; and the loving, sympathetic human touch in such circumstances is reassuring and soothing, helping to calm the apprehensions and pain of the sick.

We will continue our study on the use of this phrase, as it occurs in different senses in the English NKJV Bible in the next article.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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रविवार, 9 जून 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 95

 

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आरम्भिक बातें – 56

हाथ रखना – 4

 

इब्रानियों 6:1-2 में दी गई आरम्भिक बातों में से चौथी, “हाथ रखना” को समझने और उसके अर्थ देखने के लिए हम इस वाक्यांश के बाइबल में उपयोग किए जाने को देखते आ रहे हैं, और इसके लिए हम अंग्रेजी की NKJV बाइबल में इस वाक्यांश के उपयोग के अनुसार इस का अध्ययन कर रहे हैं। अभी तक हमने तीन भिन्न रीतियों – हानि के लिए, बलि के पशु पर पापों को स्थानान्तरित करने, अर्थात ज़िम्मेदारी के स्थानान्तरण और स्वीकार किए जाने के लिए, और परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी कार्य या सेवकाई के लिए विधिवत नियुक्त करने या निर्धारित करने के लिए इस वाक्यांश के उपयोग किए जाने को देखा है। यह स्पष्ट दिखाता है कि परमेश्वर के वचन में इस वाक्यांश का उपयोग केवल उस तात्पर्य के साथ सीमित नहीं है जो कुछ मसीही समुदायों और डिनॉमिनेशनों में प्रभु को स्वीकार करने के बाद विश्वासी को दिए जाने वाले बपतिस्मे के बाद अगुवों के द्वारा उस पर “हाथ रखकर” प्रार्थना करने के साथ देखा जाता है। बाइबल में इसके अन्य उतने ही वैध और उपयुक्त अर्थ तथा उपयोग किए जाने के उदाहरण हैं। आज हम देखेंगे कि अय्यूब की पुस्तक में इस वाक्यांश को कैसे चार भिन्न प्रकार से उपयोग किया गया है।

इस वाक्यांश का पहला उपयोग अय्यूब 1:12 में है “यहोवा ने शैतान से कहा, सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना। तब शैतान यहोवा के सामने से चला गया।” यहाँ पर किए गए उपयोग से यह प्रकट है कि यह शैतान द्वारा अय्यूब को कोई शारीरिक हानि पहुँचाने से  परमेश्वर द्वारा वर्जित करना है। क्योंकि हानि पहुँचाने के लिए इस वाक्यांश के उपयोग किए जाने बारे में हम पहले देख चुके हैं, इसलिए हम इसे और आगे नहीं देखेंगे।

इस वाक्यांश का दूसरा उपयोग अय्यूब 9:33 में है “हम दोनों के बीच कोई बिचवई नहीं है, जो हम दोनों पर अपना हाथ रखे। वह अपना सोंटा मुझ पर से दूर करे।“ यहाँ पर अय्यूब अपने निर्दोष होने की दुहाई दे रहा है और चाह रहा है कि किसी रीति से परमेश्वर के सम्मुख उसकी पहुँच हो सके और वह अपने मुद्दे को रख सके, परमेश्वर के सामने गिड़गिड़ा सके। अय्यूब अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख पहुँच पाने और अपना पक्ष रख पाने से असमर्थ पाता है क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो उसके लिए मध्यस्थ का काम करे, उस की बात को परमेश्वर के सामने लाए। यह ध्यान देने योग्य और विडम्बनापूर्ण बात है कि अय्यूब 1 और 2 अध्याय में उस की कर्मों की धार्मिकता के बयान के बावजूद, जब अय्यूब के परमेश्वर के सम्मुख आ पाने और अपनी सफाई देने की बात आती है, तो अय्यूब अपने आप को असहाय पाता है; उसकी सारी भक्ति, धार्मिकता, और उस के निर्दोष होने की दुहाई, उसकी कोई सहायता नहीं करने पाते हैं। यहाँ पर यह वाक्यांश किसी ऐसे जन के संदर्भ में उपयोग किया गया है जो अय्यूब के प्रति सहानुभूति दिखा सके और परमेश्वर के सामने उसे सही ठहरा सके। आज मसीही विश्वासियों के लिए यह कार्य प्रभु यीशु मसीह द्वारा किया जा रहा है (रोमियों 8:34; 1 तीमुथियुस 2:5; इब्रानियों 7:25; 1 यूहन्ना 2:1-2)। इसलिए हम कभी भी, किसी भी बात के लिए परमेश्वर के सम्मुख आ सकते हैं; क्योंकि अब हम उसकी सन्तान हैं, उसके परिवार का अंग हैं (यूहन्ना 1:12-13)। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि इस वाक्यांश का चौथा अर्थ है सहानुभूति रखने और सहायता करने वाला होना।

इस वाक्यांश का तीसरा उपयोग अय्यूब 40:4 में है “देख, मैं तो तुच्छ हूँ, मैं तुझे क्या उत्तर दूं? मैं अपनी अंगुली दांत तले दबाता हूँ।” IBP हिन्दी बाइबल में लिखा है “देख, मैं तो तुच्छ हूं; मैं तुझे क्या उत्तर दूं? मैं अपना हाथ अपने मुंह पर रखता हूं” जो अंग्रेजी अनुवादों के समान है। यहाँ पर वाक्यांश “हाथ रखना” का स्पष्ट अभिप्राय है बात को समाप्त करना, आगे कुछ भी नहीं बोलना। सम्पूर्ण पुस्तक में, इस स्थान पर आने तक, अय्यूब अपने आप को सही और निर्दोष ठहराता आया है; किन्तु जैसे ही उसका सामना परमेश्वर से हुआ, उसे तुरन्त ही अपनी वास्तविक स्थिति का एहसास हो गया और उसने आगे कुछ भी नहीं बोलना ही उचित समझा। परमेश्वर का वचन हमें सचेत करता है कि हम परमेश्वर के सामने बहुत सतर्क होकर आएँ, अपने शब्दों को सीमित रखें, और व्यर्थ बातों को उसके सामने दोहराते रहने से दूर रहें (नीतिवचन 10:19; सभोपदेशक 5:1-7; मत्ती 6:7-8)। यहाँ पर किए गए उपयोग के अनुसार, इस वाक्यांश का पाँचवाँ अर्थ है किसी ज़ारी प्रक्रिया को समाप्त कर देना।

इस वाक्यांश का चौथा उपयोग अय्यूब 41:8 में है “तू उस पर अपना हाथ ही धरे, तो लड़ाई को कभी न भूलेगा, और भविष्य में कभी ऐसा न करेगा।” यहाँ पर परमेश्वर लिव्यातान नामक एक विशाल और भयानक जन्तु के सन्दर्भ में बात कर रहा है (अय्यूब 41:1 से इसे देखिए)। इस पद में परमेश्वर अय्यूब को स्मरण करवा रहा है कि उस पर केवल हाथ धरना मात्र, अर्थात उसे छू भर लेना कितना खतरनाक हो सकता है और उसे चेतावनी देता है कि लिव्यातान के साथ फिर कभी ऐसा नहीं करे; वाक्य से प्रतीत होता है कि अय्यूब ने, या उस की जानकारी में किसी ने यह करने का प्रयास किया और लिव्यातान ने इसकी बहुत हिंसक प्रतिक्रिया दी। तो, इस वाक्यांश का छठा अर्थ है अपना हाथ धरने के द्वारा छूने का प्रयास करना।

हम इस वाक्यांश के विभिन्न अभिप्रायों के साथ उपयोग किए जाने के अपने इस अध्ययन को परमेश्वर के वचन बाइबल के अंग्रेजी के NKJV अनुवाद में से देखने को अगले लेख में ज़ारी रखेंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


The Elementary Principles – 56

Laying on of Hands - 4

 

    To study and see the meanings of the phrase “laying of hands,” or “laying on of hands” which is the fourth elementary principle mentioned in Hebrews 6:1-2, we are looking at the various instances of this phrase being used in the English NKJV Bible. So far, we have seen three different ways this phrase has been used – with intention of causing harm, for transferring sins on to the sacrificial animal, i.e., for transferring and taking up responsibility, and to ordain or commission for some God assigned responsibility. This clearly shows that the use of this phrase in God’s word is not confined to the understanding of “laying of hands” practiced by some sects and denominations once someone has accepted the Lord and has been baptized; there are other and equally valid meanings and uses of this phrase in the Bible. Today we will see how this phrase has been used in four different ways in the book of Job.

    The first use of this phrase is in Job 1:12 “And the Lord said to Satan, "Behold, all that he has is in your power; only do not lay a hand on his person." So Satan went out from the presence of the Lord.” From this usage it is apparent that it is about God forbidding Satan from causing physical harm to Job. Since we have already seen about this usage, we will not consider it any further.

    The second use of this phrase is in Job 9:33 “Nor is there any mediator between us, Who may lay his hand on us both.” Here Job is speaking about his innocence, and his desire of being able to approach God to lay his case before Him and plead with Him. Job finds himself unable to approach God and plead before Him, since there is no one to mediate for him and plead his case before God. It is quite ironical to note that despite all his righteousness through works, spoken for him in Job 1 and 2, when it came to approaching and pleading before God, Job found himself helpless; all his piety, righteousness and pleadings of innocence were of no help to him for this. The phrase here indicates someone who can sympathetically treat Job, help him in appealing to God, and vindicate him before God. For the Christian Believers today, this function is being carried out by the Lord Jesus (Romans 8:34; 1 Timothy 2:5; Hebrews 7:25; 1 John 2:1-2), and therefore we can approach God at any time, for anything, being the children of God and part of His family (John 1:12-13). So, we can understand the fourth meaning of this phrase is to be sympathetic and helpful.

    The third use of the phrase is in Job 40:4 “Behold, I am vile; What shall I answer You? I lay my hand over my mouth.” The phrase here clearly is about saying no more, stopping one-self from speaking. Job, throughout this book, up to this point was justifying himself and pleading his innocence. But now, once God confronts him, Job immediately realizes and acknowledges his actual state, and decides to stop speaking altogether. God’s word cautions to be very circumspect before God, and limit our words, altogether avoiding vain expressions before Him (Proverbs 10:19; Ecclesiastes 5:1-7; Matthew 6:7-8). Therefore, the fifth meaning of this phrase is to put an ongoing process to an end.

    The fourth use of this phrase is in Job 41:8 “Lay your hand on him; Remember the battle-- Never do it again!” Here God is speaking about a giant and ferocious creature, “Leviathan” (see from Job 41:1 onwards). In this particular verse, God is reminding Job how dangerous and foolish it is to even attempt to even lay a hand i.e., even to touch Leviathan and cautions him never to do it again; from the sentence it seems that Job or someone else had tried doing this at some time, and the Leviathan had reacted quite violently to it. So, the sixth meaning of this phrase in God’s Word is simply to touch by placing one’s hand on another.

    We will continue our study on the use of this phrase, as it occurs in different senses in the English NKJV Bible in the next article.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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बुधवार, 24 जून 2020

सान्तवना


     मैंने एक माँ के बारे में पढ़ा जो स्कूल से लौटी अपनी बेटी को कमर से नीचे कीचड़ में लथपथ देखकर चकित रह गई। उसकी बेटी ने स्पष्टीकरण दिया, स्कूल से लौटते समय उसकी एक सहेली फिसल कर कीचड़ में गिर गई, और उसका पैर चोटिल हो गया, वह खड़ी नहीं हो पा रही थी। उनकी एक अन्य सहेली दौड़कर किसी को सहायता करने के लिए लेने गई, और वह वहीं अपनी सहेली के साथ खड़ी थी। उसे अपनी सहेली को अपनी दुखती हुई टांग पकडे हुए कीचड़ में बैठे देखना अच्छा नहीं लगा, इसलिए वह भी उसके साथ वहीं कीचड़ में बैठ गई, जब तक कि सहायता के लिए उनकी शिक्षिका नहीं आ गई।

     परमेश्वर के वचन बाइबल में जब अय्यूब पर विपदाएँ आईं, उसके बच्चे और धन-संपत्ति जाते रहे, और उसके शरीर पर पीड़ादायक फोड़े निकल आए, तो उसका दुःख असहनीय था। बाइबल बताती है कि उसके तीन मित्र उसे सांत्वना देने के लिए आए। जब वे अय्यूब के पास पहुंचे और उन्होंने उसके हाल देखे, “जब उन्होंने दूर से आंख उठा कर अय्यूब को देखा और उसे न चीन्ह सके, तब चिल्लाकर रो उठे; और अपना अपना बागा फाड़ा, और आकाश की ओर धूलि उड़ाकर अपने अपने सिर पर डाली। तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही” (अय्यूब 2:12-13)।

     अय्यूब के मित्रों ने आरंभ में तो सराहनीय समझदारी दिखाई। वे समझ गए कि अय्यूब को बस उसके साथ बैठकर शोक करने वाला कोई चाहिए, और उन्होंने यही किया। परन्तु आगे के अध्यायों में हम देखते हैं कि जब उन्होंने उसके साथ बोलना और परामर्श देना आरम्भ किया, तो उनकी बातें और परामर्श व्यर्थ तथा दुखदायी थे (अय्यूब 16:1-4)।

     अपने किसी दुखी मित्र को सान्तवना देने के लिए हम जो सबसे अच्छा कार्य कर सकते हैं, वह है उनके साथ उनकी परिस्थिति में आकर बैठ जाएँ। - लीसा सामरा

 

दुःख के समय में एक मित्र की उपस्थिति बहुत शान्तिदायक होती है।


प्रभु यहोवा ने मुझे सीखने वालों की जीभ दी है कि मैं थके हुए को अपने वचन के द्वारा संभालना जानूं। भोर को वह नित मुझे जगाता और मेरा कान खोलता है कि मैं शिष्य के समान सुनूं। - यशायाह 50:4

बाइबल पाठ: अय्यूब 2:7-13

अय्युब 2:7 तब शैतान यहोवा के साम्हने से निकला, और अय्यूब को पांव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया।

अय्युब 2:8 तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा ले कर राख पर बैठ गया।

अय्युब 2:9 तब उसकी स्त्री उस से कहने लगी, क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।

अय्युब 2:10 उसने उस से कहा, तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें? इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुंह से कोई पाप नहीं किया।

अय्युब 2:11 जब तेमानी एलीपज, और शूही बिलदद, और नामाती सोपर, अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं, तब वे आपस में यह ठान कर कि हम अय्यूब के पास जा कर उसके संग विलाप करेंगे, और उसको शान्ति देंगे, अपने अपने यहां से उसके पास चले।

अय्युब 2:12 जब उन्होंने दूर से आंख उठा कर अय्यूब को देखा और उसे न चीन्ह सके, तब चिल्लाकर रो उठे; और अपना अपना बागा फाड़ा, और आकाश की ओर धूलि उड़ाकर अपने अपने सिर पर डाली।

अय्युब 2:13 तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही।    

 

एक साल में बाइबल: 

  • अय्यूब 1-2
  •  प्रेरितों 7:22-43


शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

प्रार्थना



      प्रार्थना करने की इच्छुक एक महिला ने एक खाली कुर्सी को खींचा, और उसके सामने घुटने टेकते हुए आंसुओं से भीगी आँखों के साथ कहा, “मेरे प्रिय स्वर्गीय पिता, कृपया यहाँ बैठें; मुझे और आपको कुछ बात करनी आवश्यक है!” और फिर उस खाली कुर्सी की ओर ध्यान से देखते हुए , वह प्रार्थना करने लगी। उसने प्रभु के समक्ष आने में भरोसा दिखाया; उसने विश्वास किया कि प्रभु वहाँ उसके पास उस कुर्सी पर बैठा हुआ है, और उसके निवेदन को सुन रहा है।

      प्रभु के साथ वार्तालाप में बिताया गया समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। जब हम परस्पर संभागी होकर उसके निकट आते हैं, वह भी हमारे निकट आता है (याकूब 4:8)। प्रभु ने हमें आश्वासन दिया है, “और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं” (मत्ती 28:20)। हमारा स्वर्गीय पिता सदा हमारी बाट जोहता है कि हम उसके पास आएँ और अपने मन की बात उससे कहें; वह हमारी सुनने के लिए सदा तैयार रहता है।

      ऐसे भी समय आते हैं जब हमारे लिए प्रार्थना कर पाना कठिन होता है, हमारी थकान, नींद, बीमारी, या दुर्बलता के कारण। परन्तु हम किसी भी कारण से असक्षम अथवा दुर्बल हों, प्रभु परमेश्वर हमारी हर परिक्षा में हमारे प्रति सहानुभूति रखता है (इब्रानियों 4:15)। इसलिए हम “हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्‍धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे” (पद 16)। - लॉरेंस दरमानी


परमेश्वर सर्वव्यापी है, सदा उपलब्ध रहता है, और सर्वदा सुनता है।

परमेश्वर के निकट आओ, तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा: हे पापियों, अपने हाथ शुद्ध करो; और हे दुचित्ते लोगों अपने हृदय को पवित्र करो। - याकूब 4:8

बाइबल पाठ: इब्रानियों 4:14-16
Hebrews 4:14 सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्‍वर्गों से हो कर गया है, अर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशु; तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहे।
Hebrews 4:15 क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्‍पाप निकला।
Hebrews 4:16 इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 4-6
  • प्रेरितों 17:16-34



बुधवार, 3 अप्रैल 2019

सहानुभूति



      हम सात लोग एक स्थान पर संगीत उत्सव देखने गए जिसके लिए बहुत से लोगों की भीड़ आई हुई थी। हम सभी एक साथ बैठना चाह रहे थे, इसलिए हम बैठने के स्थान की एक ही पंक्ति की ओर जाने लगे, कि इतने में एक महिला अपने दो साथियों को लिए हुए हम लोगों के बीच में से घुसकर उस स्थान पर आगे को आ गई और जहाँ हम बैठने जा रहे थे वहाँ बैठ गई। मेरी पत्नी ने उससे कहा कि हम सब एक साथ हैं और साथ बैठना चाह रहे हैं परन्तु उसने वह स्थान नहीं छोड़ा और हम लोगों को तीन और चार के गुट में होकर आगे पीछे की पंक्तियों में होकर बैठना पड़ा।

      हम तीन जन पीछे वाली पंक्ति में बैठे हुए थे कि मेरी पत्नि सू ने ध्यान किया कि उस महिला के एक साथी के साथ कुछ दिक्कत थी और उसे विशेष ध्यान की आवश्यकता थी। तब हमें आभास हुआ कि उस महिला का भी प्रयास था कि वह अपने साथियों के साथ इकट्ठे बैठ सके जिससे उसके साथी की देखभाल होती रहे। यह आभास होते ही उस महिला के प्रति हमारी चिढ़चिढ़ाहट शान्त हो गई। सू ने कहा, “ज़रा सोचो, ऐसी भीड़ भरे स्थानों में उसे कितनी कठिनाई होती होगी।” अवश्य ही उस महिला ने रूखेपन से व्यवहार किया था परन्तु हम उसके प्रति क्रोधित होने के स्थान पर, सहानुभूति से प्रत्युत्तर दे सकते थे।

      हम जहाँ भी जाएँगे, हमें ऐसे लोग मिलेंगे जिन्हें सहानुभूति की आवश्यकता है। हो सकता है कि परमेश्वर के वचन बाइबल में पौलुस प्रेरित द्वारा लिखे गए ये वचन हमें अपने चारों ओर के लोगों के प्रति एक भिन्न दृष्टिकोण – सहानुभूति का दृष्टिकोण रखने में सहायता करें: “इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो” (कुलुस्सियों 3:12-13)।

      जब हम सहानुभूति दिखाते हैं, तब हम लोगों को प्रभु यीशु की ओर देखने का संकेत देते हैं जिसने अपना अनुग्रह और सहानुभूति भरा हृदय हमारे लिए उंडेल दिया। - डेव ब्रैनन


औरों की परेशानियों को समझकर उनके सहायक होना ही सहानुभूति है।

पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देख कर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्योंकर बना रह सकता है? - 1 यूहन्ना 3:17

बाइबल पाठ: कुलुस्सियों 3:12-17
Colossians 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो।
Colossians 3:13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।
Colossians 3:14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्‍ध है बान्‍ध लो।
Colossians 3:15 और मसीह की शान्‍ति जिस के लिये तुम एक देह हो कर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।
Colossians 3:16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ।
Colossians 3:17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।

एक साल में बाइबल:  
  • न्यायियों 19-21
  • लूका 7:31-50



शनिवार, 2 मार्च 2019

समान



      लोकप्रिय कार्टून कॉमिक श्रंखला ‘पीनट्स’ के रचियता, चार्ल्स शुल्ज़ (1922-2000) के मृत्योपरांत, उनकी यादगार सभा में उनके मित्र और साथी कार्टूनिस्ट कैथी गुज़्वाईट ने उनकी मनुष्यता और सहानुभूति के बारे में कहा, “उन्होंने सँसार के सभी लोगों के लिए वे चरित्र दिए जो वैसा दिखाते थे जैसा हम अनुभव करते हैं, जो हमें अकेला अनुभव नहीं होने देते थे। और फिर उन्होंने अपने आप को भी हमें दिया और हमें अनुभव करवाया कि हम अकेले नहीं हैं...उन्होंने हमें प्रोत्साहित किया, हमारे साथ सहानुभूति प्रकट की और यह अनुभूति दी कि वे भी हमारे ही समान हैं।”

      हमें जब भी लगे कि कोई हमें समझता या पहचानता नहीं है, या हम असहाय हैं, तो हमें स्मरण करना चाहिए कि प्रभु यीशु ने अपने आप को हमारे लिए दे दिया, और वह जानता है कि हम कौन हैं, और आज किन बातों तथा परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

      परमेश्वर के वचन बाइबल में इब्रानियों 2:9-18 में इस अद्भुत सत्य का वर्णन दिया गया है कि प्रभु यीशु इस सँसार के अपने जीवन काल में हमारी मनुष्यता के पूर्णतः भागीदार हुए (पद 14)। उन्होंने “सब के लिए मृत्यु का स्वाद चखा” (पद 9), शैतान को निकम्मा किया (पद 14), और “जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे,उन्हें छुड़ा लिया” (पद 15)। प्रभु यीशु हमारे समान बन गए “इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिस से वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्‍ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वास योग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्‍चित्त करे” (पद 17)।

      हे प्रभु आपका धन्यवाद हो कि आप हमारी मनुष्यता में भागीदार हुए जिससे हम आज आपकी सहायता का अनुभव कर सकें और अनन्तकाल तक आपकी उपस्थिति में रह सकें। - डेविड मैक्कैस्लैंड


प्रभु यीशु के समान हमें और कोई नहीं समझता है।

इसी लिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उन का पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उन के लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है। सो ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य था, जो पवित्र, और निष्‍कपट और निर्मल, और पापियों से अलग, और स्वर्ग से भी ऊंचा किया हुआ हो। - इब्रानियों 7:25-26

बाइबल पाठ: इब्रानियों 2:9-18
Hebrews 2:9 पर हम यीशु को जो स्‍वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्‍वाद चखे।
Hebrews 2:10 क्योंकि जिस के लिये सब कुछ है, और जिस के द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुंचाए, तो उन के उद्धार के कर्ता को दुख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।
Hebrews 2:11 क्योंकि पवित्र करने वाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही मूल से हैं: इसी कारण वह उन्हें भाई कहने से नहीं लजाता।
Hebrews 2:12 पर कहता है, कि मैं तेरा नाम अपने भाइयों को सुनाऊंगा, सभा के बीच में मैं तेरा भजन गाऊंगा।
Hebrews 2:13 और फिर यह, कि मैं उस पर भरोसा रखूंगा; और फिर यह कि देख, मैं उन लड़कों सहित जिसे परमेश्वर ने मुझे दिए।
Hebrews 2:14 इसलिये जब कि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं, तो वह आप भी उन के समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे।
Hebrews 2:15 और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्‍व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले।
Hebrews 2:16 क्योंकि वह तो स्‍वर्गदूतों को नहीं वरन इब्राहीम के वंश को संभालता है।
Hebrews 2:17 इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिस से वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्‍ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वास योग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्‍चित्त करे।
Hebrews 2:18 क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उन की भी सहायता कर सकता है, जिन की परीक्षा होती है।  


एक साल में बाइबल: 
  • गिनती 26-27
  • मरकुस 8:1-21



रविवार, 23 सितंबर 2018

वचन



      उनके पिता के देहांत के कुछ दिन पश्चात, 30 वर्षीय सी. एस. ल्यूइस को उस महिला का पत्र मिला, जिसने बीस वर्ष से भी अधिक पहले बीमारी और देहांत के समय में उनकी माँ की देखभाल की थी। उस महिला ने उनकी क्षति के लिए अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं और उनसे पूछा कि क्या उन्हें उसकी स्मृति है? ल्यूइस ने उसे उत्तर दिया, “मेरी प्रिय नर्स डेविसन, आपकी स्मृति है कि नहीं; जी हाँ, आप मुझे याद हैं।”

      ल्यूइस ने स्मरण किया कि उस कठिन समय में उनके घर में उसकी उपस्थिति का उनके, उनके भाई, और उनके पिता के लिए कितना अधिक महत्व था। उन्होंने सहानुभूति के उसके शब्दों के लिए उसका धन्यवाद किया और कहा, “उन बीते दिनों की यादों में लौट जाना बहुत सांतवना देता है। वह समय जब आप मेरी माँ के साथ थीं एक बच्चे के लिए बहुत लंबा समय था और आप हमारे घर का एक भाग बन गई थीं।”

      जब हम जीवन की परिस्थितियों के साथ संघर्ष करते हैं, दूसरों से मिलने वाला प्रोत्साहन का एक शब्द हमारी आत्मा को उभार सकता है और हमारी आँखे प्रभु की ओर उठा सकता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में पुराने नियम के भविष्यद्वक्ता यशायाह ने लिखा “प्रभु यहोवा ने मुझे सीखने वालों की जीभ दी है कि मैं थके हुए को अपने वचन के द्वारा संभालना जानूं” (यशायाह 50:4)। जब हम प्रभु की ओर देखेते हैं, तो उससे हमने आशा और अन्धकार में ज्योति के वचन मिलते हैं। - डेविड मैक्कैस्लैंड


दयालु शब्द बोझिल हृदय को उभार सकते हैं।

क्योंकि मैं तुम्हें ऐसा बोल और बुद्धि दूंगा, कि तुम्हारे सब विरोधी साम्हना या खण्‍डन न कर सकेंगे। - लूका 21:15

बाइबल पाठ: यशायाह 50:4-10
Isaiah 50:4 प्रभु यहोवा ने मुझे सीखने वालों की जीभ दी है कि मैं थके हुए को अपने वचन के द्वारा संभालना जानूं। भोर को वह नित मुझे जगाता और मेरा कान खोलता है कि मैं शिष्य के समान सुनूं।
Isaiah 50:5 प्रभु यहोवा ने मेरा कान खोला है, और मैं ने विरोध न किया, न पीछे हटा।
Isaiah 50:6 मैं ने मारने वालों को अपनी पीठ और गलमोछ नोचने वालों की ओर अपने गाल किए; अपमानित होने और थूकने से मैं ने मुंह न छिपाया।
Isaiah 50:7 क्योंकि प्रभु यहोवा मेरी सहायता करता है, इस कारण मैं ने संकोच नहीं किया; वरन अपना माथा चकमक के समान कड़ा किया क्योंकि मुझे निश्चय था कि मुझे लज्जित होना न पड़ेगा।
Isaiah 50:8 जो मुझे धर्मी ठहराता है वह मेरे निकट है। मेरे साथ कौन मुकद्दमा करेगा? हम आमने-साम्हने खड़े हों। मेरा विरोधी कौन है? वह मेरे निकट आए।
Isaiah 50:9 सुनो, प्रभु यहोवा मेरी सहायता करता है; मुझे कौन दोषी ठहरा सकेगा? देखो, वे सब कपड़े के समान पुराने हो जाएंगे; उन को कीड़े खा जाएंगे।।
Isaiah 50:10 तुम में से कौन है जो यहोवा का भय मानता और उसके दास की बातें सुनता है, जो अन्धियारे में चलता हो और उसके पास ज्योति न हो? वह यहोवा के नाम का भरोसा रखे, और अपने परमेश्वर पर आशा लगाए रहे।


एक साल में बाइबल: 
  • श्रेष्ठगीत 1-3
  • गलतियों 2



रविवार, 20 अगस्त 2017

पड़ौसी


   मेरी को सप्ताह के मध्य में होने वाली चर्च समूह की सभा में भाग लेना अच्छा लगता था। उस सभा में वह और उसके मित्र मिलकर प्रार्थना करते, परमेश्वर की आराधना करते और पिछले इतवार के सन्देश पर चर्चा करते, एक दूसरे के प्रश्नों के उत्तर देते थे। इस बार की सभा में उनकी चर्चा का विषय था चर्च "जाना" और दुःखी संसार के समक्ष प्रभु यीशु मसीह का चर्च "होना"। मेरी अपने मित्रों से मिलने और उनके साथ चर्चा में भाग लेने के लिए आतुर थी।

   मेरी ने सभा के लिए निकलने के लिए अपनी कार की चाबियाँ उठाई ही थीं कि दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़े पर उसकी पड़ौसन सू खड़ी थी, जिससे मेरी की औपचारिकता मात्र ही की पहचान भर थी। सू ने कहा, "आपको कष्ट दे रही हूँ, क्षमा कीजिए, परन्तु क्या आपके पास अभी कुछ समय है?" मेरी कहने ही वाली थी कि वह अपने काम से बाहर जा रही है, कि इतने में सू ने आगे कहा, "मुझे अपनी कार मरम्मत करवाने के लिए ले जाकर उसे वहाँ छोड़ कर आना है। सामान्यतः ऐसा होने पर मैं वहाँ से या तो साइकल चला कर या फिर पैदल ही लौट आती हूँ, परन्तु मेरी पीठ में चोट आई है और मैं न चल पा रही हूँ, और न ही साइकल चला पा रही हूँ। क्या आप मेरे साथ चलकर, मुझे वापस घर छोड़ देंगी?" मेरी को थोड़ी सी हिचकिचाहट हुई, परन्तु उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अवश्य", और उसके साथ चल पड़ी।

   उस दिन मेरी अपने मित्रों के साथ चर्चा में बैठने नहीं जा सकी। जब वह अपनी पड़ौसन को वापस घर ला रही थी तो उसे मालुम पड़ा कि कैसे सू अपने पति की देखभाल कर रही है, जिन्हें मानसिक रोग है, और बहुत देखभाल की आवश्यकता रहती है। इस गहन देखभाल के कारण सू कैसे कठिन संघर्ष से होकर निकल रही है। मेरी ने सहानुभूति के साथ सू की बात को सुना, उसे सांत्वना दी और उसके लिए प्रार्थना करने का वायदा किया, और साथ ही कभी भी किसी भी प्रकार से सू की सहायता करने के लिए उपलब्ध होने का आश्वासन दिया।

   मेरी जो उस दिन की सैध्दान्तिक चर्चा में नहीं कर पाई, वह उसने व्यावाहरिक जीवन में करा। उसने अपने पड़ौसी तक, उसकी कठिन परिस्थिति में, मसीह यीशु का प्रेम और सांत्वना को पहुँचाया; मसीही विश्वासी होने की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाया। - मेरियन स्ट्राउड


हमारा मसीही विश्वास का प्रमाण हमारा व्यावाहरिक मसीही जीवन है।

हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले? - मीका 6:8

बाइबल पाठ: लूका 10:29-37
Luke 10:29 परन्तु उसने अपने आप को धर्मी ठहराने की इच्छा से यीशु से पूछा, तो मेरा पड़ोसी कौन है? 
Luke 10:30 यीशु ने उत्तर दिया; कि एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था, कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिये, और मार पीट कर उसे अधमूआ छोड़कर चले गए। 
Luke 10:31 और ऐसा हुआ; कि उसी मार्ग से एक याजक[पुरोहित, धर्मोपदेशक] जा रहा था: परन्तु उसे देख के कतरा कर चला गया। 
Luke 10:32 इसी रीति से एक लेवी[मंदिर में सेवादार] उस जगह पर आया, वह भी उसे देख के कतरा कर चला गया। 
Luke 10:33 परन्तु एक सामरी[नीच जाती का समझा जाने वाला] यात्री वहां आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया। 
Luke 10:34 और उसके पास आकर और उसके घावों पर तेल और दाखरस डालकर पट्टियां बान्‍धी, और अपनी सवारी पर चढ़ाकर सराय में ले गया, और उस की सेवा टहल की। 
Luke 10:35 दूसरे दिन उसने दो दिनार निकाल कर भटियारे को दिए, और कहा; इस की सेवा टहल करना, और जो कुछ तेरा और लगेगा, वह मैं लौटने पर तुझे भर दूंगा। 
Luke 10:36 अब तेरी समझ में जो डाकुओं में घिर गया था, इन तीनों में से उसका पड़ोसी कौन ठहरा? 
Luke 10:37 उसने कहा, वही जिसने उस पर तरस खाया: यीशु ने उस से कहा, जा, तू भी ऐसा ही कर।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 105-106
  • 1 कुरिन्थियों 3


रविवार, 22 मई 2016

सुनना


   अपनी पुस्तक Listening to Others में लेखिका जॉयस हगेट सुनने के महत्व तथा जो कठिन परिस्थितियों में हैं उन्हें उचित प्रतिक्रिया देने के बारे में बताती हैं। इन बातों को वे अपने अनुभवों के आधार पर बताती हैं, जब दुःखों और कठिनाईयों में पड़े लोगों के साथ बैठकर उन्होंने उनकी बातें सुनने में समय बिताया। वे बताती हैं कि अनेकों लोगों ने उनका बहुत धन्यवाद किया उस सहायता के लिए जो उन्होंने उन लोगों के लिए करी, जबकि जॉयस का कहना है कि बहुत बार तो उन्होंने कुछ भी नहीं किया था, केवल शांत बैठकर उन लोगों की बात सुनी थी, उन्हें अपने मन की व्यथा निर्बाधित उंडेल लेने दी थी। जॉयस का निषकर्ष था कि दुःखी लोगों की सहायता करने का एक प्रभावी तरीका, ध्यान लगाकर उनकी बात सुनना भी है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल के एक पात्र अय्युब के साथ भी हम यही बात पाते हैं। अय्युब के परमेश्वर में विश्वास को गिराने के लिए शैतान उसकी घोर परीक्षा लेता है, उसका घर-बार, परिवार, संपत्ति और सेहत सब पर शैतान हमला करके सब ले लेता है, किंतु अय्युब का विश्वास परमेश्वर पर से नहीं हटता। उसके इस घोर दुःख के समय में उसके मित्र उससे मिलने और उसे सांत्वना देने आते हैं। उसकी दशा देखकर वे मित्र सात दिन तक चुपचाप उसके साथ बैठे तो रहते हैं (अय्युब 2:13), लेकिन जब अय्युब अपनी व्यथा उनके सामने कहना आरंभ करता है तो उसकी व्यथा का वर्णन सुनने की बजाए वे उस से अपने ही विचार कहने लगते हैं, उस पर दोषारोपण करते हैं, और उसके जीवन में किसी पाप के कारण ही इन दुःखों के आने का इलज़ाम उस पर लगाते हैं। उनकी उपस्थिति अय्युब के लिए सांत्वना का नहीं वरन कष्ट का कारण हो जाती है और वह कहता है, "भला होता कि मेरा कोई सुनने वाला होता! (सर्वशक्तिमान अभी मेरा न्याय चुकाए! देखो मेरा दस्तखत यही है)। भला होता कि जो शिकायतनामा मेरे मुद्दई ने लिखा है वह मेरे पास होता!" (अय्युब 31:35)।

   जब हम किसी की बात ध्यान से सुनते हैं, तो हम उस पर प्रगट करते हैं कि तुम्हारे संदर्भ में जो तुम्हारी चिंताएं है, वे मेरी भी है; जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, वह मेरे लिए भी है। अवश्य ही कठिनाई में पड़े लोगों को नेक और भली सलाह की आवश्यकता होती है; लेकिन इससे भी बढ़कर अनेकों बार लोगों को ऐसे साथियों की आवश्यकता होती है जो उनसे प्रेम करते हैं, उनकी चिंता करते हैं, उनकी बात ध्यान से सुनने के लिए समय देते हैं। ऐसे ध्यान से किसी की बात सुनना सरल कार्य नहीं है; किसी के मन की बात को सुन कर समझ पाना और फिर उसे एक सही एवं उचित प्रतिक्रीया दे पाने के लिए समय, नम्रता और लगन की आवश्यकता होती है जो उसके प्रति हमारी सच्ची सहानुभूति का सूचक है।

   हे प्रभु हमें प्रेम से भरा मन और दूसरों की सुनने वाले कान दे। - डेविड रोपर


जब कोई बोल रहा हो, और हम उसकी बात का उत्तर सोचना आरंभ कर दें, 
तो वास्तव में हम उसकी बात को सुन नहीं रहे होते।

हे बुद्धिमानों! मेरी बातें सुनो, और हे ज्ञानियो! मेरी बातों पर कान लगाओ; क्योंकि जैसे जीभ से चखा जाता है, वैसे ही वचन कान से परखे जाते हैं। - अय्युब 34:2-3

बाइबल पाठ: अय्युब 2:11-13
Job 2:11 जब तेमानी एलीपज, और शूही बिलदद, और नामाती सोपर, अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं, तब वे आपस में यह ठान कर कि हम अय्यूब के पास जा कर उसके संग विलाप करेंगे, और उसको शान्ति देंगे, अपने अपने यहां से उसके पास चले। 
Job 2:12 जब उन्होंने दूर से आंख उठा कर अय्यूब को देखा और उसे न चीन्ह सके, तब चिल्लाकर रो उठे; और अपना अपना बागा फाड़ा, और आकाश की ओर धूलि उड़ाकर अपने अपने सिर पर डाली। 
Job 2:13 तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 16-18
  • यूहन्ना 7:28-53