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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

Blessed and Successful Life - 1 - Introduction - 1 / आशीषित एवं सफल जीवन – 1 - प्रस्तावना – 1

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 1 - प्रस्तावना – 1

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 प्रस्तावना – 1


आज से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जो परमेश्वर की सहायता, बुद्धिमता, और मार्गदर्शन में, उसके तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता के द्वारा, एक आशीषित और सफल जीवन जीने के बारे में है। यह जीवन परमेश्वर के पुत्र प्रभु यीशु मसीह में स्वेच्छा से विश्वास लाने और स्वेच्छा से उसे अपना उद्धारकर्ता ग्रहण करने से उद्धार पाने, अर्थात् नया-जन्म प्राप्त करने से मिलता है। उस जीवन को जीने के लिए हमें उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा को दे दिया जाता है। तब से लेकर जीवन भर, पवित्र आत्मा हमारा सहायक, मार्गदर्शक, और एक अद्भुत जीवन के लिए सामर्थ्य प्रदान करने के स्त्रोत के रूप में, प्रत्येक मसीही विश्वासी में हमेशा निवास करता है। यह अद्भुत जीवन और ईश्वरीय सामर्थ्य, उद्धार के साथ, केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, एक उपहार के समान ही प्राप्त हो सकते हैं; कर्मों से कमाए नहीं जाते हैं। उपहार प्राप्त करना एक बात है, परन्तु उसे समझ कर उसका उचित उपयोग करना पूर्णतः भिन्न बात है। जब तक हम उपहार को और उसकी उपयोगिता को समझेंगे नहीं, हम उससे कोई लाभ नहीं प्राप्त कर सकेंगे।

  

यह श्रृंखला राजा दाऊद द्वारा अपने पुत्र सुलैमान को अपने स्थान पर अपना उत्तराधिकारी राजा नियुक्त करने के बाद दिए गए निर्देशों पर आधारित है। दाऊद द्वारा सुलैमान को दिए गए निर्देशों को हम चार मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत देखेंगे। किन्तु प्रत्येक शीर्षक की व्याख्या करते समय, हम विषय-वस्तु को कुछ और उप-शीर्षकों के अंतर्गत भी देखेंगे। विषय-वस्तु की प्रस्तुति और व्याख्या मुख्यतः ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इस्राएल के राजाओं के बारे में नहीं होगी, वरन हमारे वर्तमान के इन संकटपूर्ण अन्त के दिनों, जिन में हम रह रहे हैं, की आवश्यकताओं और दृष्टिकोण के अनुसार की जाएगी। हम दाऊद द्वारा सुलैमान को दिए गए निर्देशों से संकेत लेंगे, और फिर उनके बारे में परमेश्वर के वचन बाइबल से सीखेंगे। हम सीखेंगे कि हम नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों को परमेश्वर को भावता हुआ जीवन जीने के लिए क्या करना चाहिए। हम अपना आंकलन करेंगे कि हम इसमें कहाँ चूक गए हैं। हम स्वयं को जांच कर देखेंगे कि कहीं शैतान ने हमें भरमा कर किसी गलत और बाइबल के विपरीत मार्ग पर बहका तो नहीं दिया है, किसी गलत धारणा अथवा सिद्धान्त में तो नहीं फँसा दिया है? और सीखकर, परमेश्वर के साथ अपने चलने को ठीक कर के सही मार्ग पर लौटेंगे, ताकि सभी समस्याओं और सताव के बावजूद हम अपने जीवनों में आशीषित और सफल हो सकें।


इस श्रृंखला के लिए हमारी अगुवाई करने वाला खण्ड होगा 1 राजाओं 2:2-4, जहाँ पर राजा दाऊद, अपने देहांत से पहले अपने युवा पुत्र सुलैमान को निर्देश दे रहा है। दाऊद ने सुलैमान को परमेश्वर की इच्छा में होकर राजा बनाया था  (1 राजाओं 1:47-48; 1 इतिहास 28:5), और बाद में अन्य-जाति शासकों, जैसे कि हूराम और शीबा की रानी ने भी इस बात को माना (2 इतिहास 2:11-12; 9:8)। दाऊद द्वारा सुलैमान को दिए गए इन निर्देशों का विषय और सामग्री है कि किस प्रकार से वह एक परमेश्वर-भक्ति का जीवन जिए जिससे कि वह परमेश्वर की कृपा में बढ़ता रहे, संपन्न रहे, और इस से आशीषित, सुरक्षित, और परमेश्वर द्वारा उसे सौंपी गई ज़िम्मेदारी, अर्थात्  इस्राएल पर शासन करने और उन्हें परमेश्वर के भय में सुरक्षित और समृद्ध बनाए रखने, में सफल बना रहे।

 

यह हमारे सामने एक बहुत महत्वपूर्ण बात को लेकर आता है, जिस पर हम सभी को बहुत गंभीरता और गहराई से मनन करना चाहिए, तथा हमेशा उसे स्मरण रखना चाहिए – कि परमेश्वर द्वारा चुने जाने और नियुक्त किए जाने, उसकी कृपा का पात्र होने, परमेश्वर द्वारा ओहदा और ज़िम्मेदारियाँ मिलना इस बात की निश्चितता नहीं है कि परमेश्वर के जन के लिए जीवन सरल, सुरक्षित, और सकुशल होगा। शैतान हमेशा ही हमारी हानि करने और हमें बहकाने के प्रयास करता रहेगा (2 कुरिन्थियों 11:3; 1 पतरस 5:8)। सभी मसीही विश्वासियों को संसार में समस्याओं और सताव का सामना करना ही पड़ेगा (यूहन्ना 16:33; फिलिप्पियों 1:29; 2 तीमुथियुस 3:12)। मसीही विश्वासी कभी भी जीवन को सहज और हलके में नहीं ले सकते हैं, आराम से बैठकर मज़े नहीं ले सकते हैं। बल्कि उन्हें सदा “अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते” रहना होगा (फिलिप्पियों 2:12) – इसका तात्पर्य उद्धार पाने के लिए कार्य करना नहीं है; वरन प्रभु यीशु मसीह पर लाए गए विश्वास और परमेश्वर के अनुग्रह से दिये गये उद्धार को, अपने जीवन और कार्यों के द्वारा जी कर दिखाना है। इस परिचय को हम अगले लेख में भी ज़ारी रखेंगे।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, और प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



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Blessed and Successful Life - 1 - Introduction - 1

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Introduction – 1


From today we are starting a new series on learning to lead a blessed and successful life with the help, wisdom and guidance of God, through being obedient to Him and His Word. This life begins with voluntarily coming to faith in His Son the Lord Jesus Christ, voluntarily accepting Him as our Savior and being saved i.e., Being Born-Again. To live this life, from the moment we are saved, God the Holy Spirit is given to us. From then, throughout our lives, the Holy Spirit lives in every Christian Believer, as our helper, guide, and the source of power for this wonderful life. This life and divine power, along with salvation, can only be received as a gift from God, by His grace; they can never be earned by any works. But receiving a gift is one thing, understanding and properly utilizing it is quite another. Unless we understand about the gift and its proper utilization, we cannot be benefitted by it.

 

This series is based upon the instructions given by King David to his son Solomon, after appointing him as his successor, as the king of Israel. We will consider David’s instructions to Solomon under four main headings. But while expounding upon each heading, we will also have and consider the matter through other sub-headings. The subject matter will mainly be presented and expounded not from an ancient historical perspective of the Kings of Israel, but from our present-day need and perspective of the perilous end-times that we are living through. We will be taking cue from David’s instructions to Solomon, and learn about them from God’s Word the Bible. We will learn that as Born-Again Christian Believers what do we need to do to live a life pleasing to the Lord God. We will evaluate ourselves and see where we may have faltered in doing this. We will examine ourselves to check if we have been waylaid and misguided by Satan into something wrong, into some unBiblical belief or doctrine? And, by learning these, we  will rectify our walk with God, come back on to the right path, so that even through the problems and persecutions, we may be blessed and successful in our lives.


Our lead portion for this series will be 1 Kings 2:2-4, where King David, before his death, is instructing his young son, Solomon. David made Solomon as King of Israel in the will of God (1 Kings 1:47-48; 1 Chronicles 28:5), and even the Gentile rulers like King Hiram and the Queen of Sheba acknowledged this (2 Chronicles 2:11-12; 9:8). The theme and matter of David’s instructions to Solomon is about how to live a godly life, to grow and prosper in God's favor, and thereby be blessed, safe and successful in his God given responsibility, i.e., reign over Israel and keep them safe and prosperous in the fear of God.


This brings before us something very important which we should all very seriously ponder over and always bear in mind – being the chosen of God, having God’s favor, receiving a God given status and responsibilities, is no guarantee of life being easy, safe, and secure for God’s people. Satan will always keep trying to mislead and harm us (2 Corinthians 11:3; 1 Peter 5:8). All Christian Believers will always suffer persecution and problems in this world (John 16:33; Philippians 1:29; 2 Timothy 3:12). Christian Believers can never take life for granted, sit back and enjoy. Rather, they must always be “working out their salvation” (Philippians 2:12) – not working for their salvation; but, having been saved by coming to faith in the Lord Jesus and by the grace of God, they should always be demonstrating their saved life, through their life and works. We will continue this Introduction further, in the next article as well.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


 

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बुधवार, 6 नवंबर 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 243

 

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मसीही जीवन से सम्बन्धित बातें – 88


मसीही जीवन के चार स्तम्भ - 4 - प्रार्थना (30) 


व्यावहारिक मसीही जीवन जीने का एक महत्वपूर्ण भाग है परमेश्वर के साथ जुड़े रहना, उसके साथ वार्तालाप अर्थात, प्रार्थना करने में लगे रहना। प्रेरितों 2:42 में चार बातें दी गईं हैं, जिनमें आरम्भिक मसीही विश्वासी लौलीन रहते थे। इन चार में से चौथी बात है प्रार्थना करना, अर्थात हर बात के लिए परमेश्वर के साथ निरन्तर सम्पर्क में बने रहना। आज के मसीहियों में भी ये चार बातें पाई जाती हैं, किन्तु वे उनमें लौलीन नहीं रहते हैं, वरन रीति के निर्वाह के लिए, इन चारों को औपचारिकता पूर्वक पूरा कर लेते हैं। प्रार्थना करने, यानि परमेश्वर से हर बात के बारे में वार्तालाप करने में भी सामान्यतः वह रुचि और लग्न नहीं देखी जाती है। व्यावहारिक मसीही जीवन से सम्बन्धित इन चारों बातों के मूल स्वरूप और निर्वाह के बारे में हम परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए उदाहरणों और सम्बन्धित पदों से देखते आ रहे हैं। वर्तमान में, प्रार्थना के विषय बाइबल से सीखते हुए, अब हम तथाकथित “प्रभु की प्रार्थना” के बारे में मत्ती 6:5-15 के आधार पर विचार कर रहे हैं। हमने देखा है कि वास्तव में यह प्रभु यीशु द्वारा दी गई कोई “प्रार्थना” नहीं है, जिसे रट कर हर अवसर और हर बात के लिए बिना विचारे, बिना सोचे समझे बोल दिया जाए, जैसा आज मसीहियों में किया जाता है। वरन यह परमेश्वर को स्वीकार्य प्रार्थनाओं को बनाने और करने के लिए एक रूपरेखा, एक ढाँचा है, जिसके आधार पर मसीहियों को अपने जीवन और प्रार्थनाएं ढालनी चाहिएं। हम देख चुके हैं कि परमेश्वर के सामने प्रस्तुत होने से पहले एक तैयारी आवश्यक है; और उससे कुछ माँगने वाले होने से पहले, उसे आराधना, आदर, सम्मान, आज्ञाकारिता देने वाला होना अनिवार्य है। आज से हम प्रभु द्वारा अपने शिष्यों को यहाँ पर सिखाए गए प्रार्थना के विषयों के बारे में विचार करना आरम्भ करेंगे।

 

प्रार्थना के इस ढाँचे, इस रूपरेखा में, मत्ती 6:11-13a में प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों के सामने, परमेश्वर से माँगने के लिए तीन विषय रखे हैं - पद 11 में प्रतिदिन के लिए रोटी या भोजन; पद 12 में क्षमा करने वाला बनना; और पद 13a बुराई से बचे रहने के लिए परमेश्वर से सुरक्षा; और फिर पद 13b में परमेश्वर के गुणानुवाद, उसे आदर और महिमा देने के साथ यह रूपरेखा समाप्त हो जाती है। इसके बाद के पद 14-15 में पद 12 के विषय, क्षमा करने वाला बनने से सम्बन्धित प्रभु द्वारा दी गई एक व्याख्या और चेतावनी है। यदि हम अपने मसीही जीवनों, व्यवहार, और परमेश्वर से माँगी गई अपनी प्रार्थनाओं के बारे में देखते हैं, तो उन्हें प्रभु द्वारा सिखाई गई इन तीन बातों से बहुत भिन्न पाते हैं। यदि हम अपनी प्रार्थनाओं पर, हम जो परमेश्वर से प्राप्त करना चाहते हैं और उसके सामने अपने जिन विषयों को रखते हैं, उन बातों पर विचार करें, तो हमारे प्रार्थना के विषय इन तीन विषयों से बहुत कम मेल खाते हैं। ऐसे बहुत ही कम मसीही होंगे जो इन तीन बातों को परमेश्वर से नित्य माँगते होंगे। लेकिन इसके विपरीत, शायद ही कोई ऐसा मसीही होगा जो नहीं चाहता होगा कि उसके लिए परमेश्वर इन तीनों बातों को स्वतः ही, बिना माँगे ही, पूरा करता रहे। अर्थात, ये तीनों बातें अपने जीवन में चाहिएं तो सभी को, लेकिन इन तीनों से सम्बन्धित जो अन्य बातें इन पदों में दी गई हैं, उन्हें कोई करना नहीं चाहता है। इसलिए इन बातों को परमेश्वर से माँगने से कतराते हैं। क्योंकि जीवन में इन तीनों बातों के होने के लाभ और महत्व को सभी जानते हैं, इसलिए उन्हें अपने लिए चाहते सब हैं; किन्तु आगे होकर, पहल करके, उन्हें औरों को कोई देना नहीं चाहता है, इसलिए उनके लिए प्रार्थना में शान्त रहते हैं।

 

ऐसी ही एक दूसरी विडम्बना भी है। हम आज जिन बातों को सामान्यतः अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर से माँगते हैं, वे प्रभु के द्वारा इससे थोड़ा सा आगे मत्ती 6:19-34 में दी गई हैं; प्रार्थना में माँगने के लिए नहीं, वरन परमेश्वर द्वारा अपने सच्चे, समर्पित आज्ञाकारी शिष्यों की उसके प्रति आज्ञाकारिता और उसकी इच्छा के अनुसार जीवन जीने और काम करने के कारण परमेश्वर से मिलने वाले उपहार के समान। शैतान ने हमारी बुद्धि कैसी भ्रष्ट कर रखी है कि हम परमेश्वर से प्रार्थनाओं में, विभिन्न तरह से धन, सम्पत्ति, मकान, वस्त्र, प्रतिष्ठा, भोजन, साँसारिक बातों में बढ़ोतरी और उन्नति, आदि को तो माँगते हैं, जिन्हें माँगने के लिए प्रभु ने सिखाया ही नहीं है। लेकिन जिन तीन बातों को परमेश्वर से माँगने के लिए सिखाया है, जो अनन्तकाल की आशीषों और आत्मिक बढ़ोतरी तथा उन्नति से सम्बन्धित हैं, जो इस लोक और परलोक दोनों के लिए लाभदायक हैं, उन्हें शायद ही कोई मसीही परमेश्वर से माँगता होगा। मत्ती 6:19-34 में प्रभु ने हमारी प्रार्थनाओं के इन विषयों की व्यर्थता के बारे में, आकाश के पक्षियों, जंगली सोसनों, स्वयं की आयु पर नियन्त्रण न कर पाने, सांसारिक धन के नाशमान होने, आदि के उदाहरणों के द्वारा समझाया है कि इनकी लालसा करना कितना व्यर्थ है। साथ ही पद 32 में यह उलाहना भी दिया है कि इन वस्तुओं की खोज में रहना, इनकी लालसा में रहना, अन्यजातियों का गुण है, परमेश्वर के लोगों का नहीं। और फिर अपने शिष्यों को सम्बोधित करते हुए आश्वस्त किया और कहा, “इसलिये पहिले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी” (मत्ती 6:33)। प्रभु की प्रतिज्ञा प्रकट है, कि जो परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता को अपने जीवन में प्राथमिकता देगा, उसे न केवल स्वर्ग में प्रतिफल, वरन, स्वतः ही संसार की आवश्यक बातें भी परमेश्वर कि ओर से दे दी जाएंगी। आवश्यकता अपने जीवनों में सही प्राथमिकताओं को निर्धारित करने और निर्वाह करने की है।

 

यहाँ पर शैतान ने हमें चुपके से कैसी युक्ति में फँसा रखा है, उसपर ध्यान कीजिए। हम इस पर ध्यान नहीं देते और समझते नहीं हैं कि परमेश्वर ने जो कहा है, वह उसे अवश्य पूरा करेगा; और जो नहीं कहा है, उसे कभी नहीं करेगा, उसे चाहे कोई भी और कैसे भी क्यों न माँगे। लेकिन शैतान परमेश्वर के इस गुण को अच्छे से जानता और समझता है, और हमारी बुद्धि को भ्रष्ट करके, हमें बहका और भरमा के, परमेश्वर के इस गुण को हमारे विरुद्ध प्रयोग करता है। परमेश्वर के वचन की अधूरी और गलत समझ रखने के कारण, हम शैतान के प्रभाव और बहकावे में फँसकर उसकी युक्ति के अनुसार करते हैं। ध्यान दीजिए कि शैतान ने हमें किस गलती में डाल रखा है: परमेश्वर के वचन और शिक्षाओं के अनुसार हमें जो और जैसे माँगना चाहिए, हम उसे नहीं माँगते हैं; इसलिए परमेश्वर से उन बातों से सम्बन्धित आशीषों को प्राप्त नहीं करते हैं। साथ ही, हमें परमेश्वर के लिए जो करना चाहिए, जो उसके प्रति हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, हम उसे भी नहीं करते हैं; इसलिए उसके प्रतिफल में जो हमें स्वतः ही परमेश्वर से मिल जाता, उससे भी वंचित रह जाते हैं। लेकिन वचन के अनुसार जिसे माँगने की कोई आवश्यकता नहीं है, और जो माँगने पर भी परमेश्वर देगा नहीं, क्योंकि उसने उसे प्रार्थना के उत्तर में नहीं, आज्ञाकारिता के उपहार के रूप में देना ठहराया है, हम उसी के लिए प्रार्थनाएं करते हैं, फिर निराश होते हैं, परमेश्वर और उसके वचन पर अविश्वास करने लगते हैं। परमेश्वर के वचन के प्रति हमारी लापरवाही और अनाज्ञाकारिता के कारण गलती तो हम करते हैं, लेकिन उस गलती और उससे होने वाली हानि के लिए ज़िम्मेदार परमेश्वर को ठहराते हैं। और इस सारी प्रक्रिया में हर तरह से शैतान सफल और हम हानि उठाने वाले रहते हैं। इसलिए आवश्यकता परमेश्वर के वचन को जानने, सीखने, और मानने की है। तब ही हम ऐसी मूर्खताओं से निकलने और आशीषित तथा सुरक्षित रहने पाएंगे।

 

अगले लेख में हम प्रभु द्वारा दिए गए प्रार्थना के तीनों विषयों पर यहाँ से आगे विचार करना ज़ारी रखेंगे।

  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


Things Related to Christian Living – 88


The Four Pillars of Christian Living - 4 - Prayer (30)


An important part of practical Christian living is remaining connected with God, to keep praying, i.e., conversing with Him at all times. We have in Acts 2:42 four things that the initial Christian Believers observed steadfastly. The fourth of these four is prayer, or continually being in touch with God for everything. These four things are seen amongst the Christians today also, but they do not observe them steadfastly; instead, they do it like a ritual, perfunctorily. The kind of interest and sincere desire as was amongst the initial Christians is not seen today, even for prayers. We have been looking at and pondering over the original form and observance of these four things through the related examples and verses given in God’s Word the Bible. Presently, while learning about prayer, we are now considering the so-called “Lord’s Prayer” through Matthew 6:5-15. We have seen that actually speaking it is not a “prayer” given by the Lord Jesus, that should be memorized, and then on all occasions and for everything be repeated by rote without understanding or thinking about it, as is commonly done by the Christians today. Instead, it is a framework, an outline, based on which the Christians should make and mold their individual prayers. We have seen that there is preparation that is necessary prior to appearing before God with prayers; and before being a person who asks God for something, it is essential to be one who gives to God His due honor, reverence, obedience, and worship in and through our lives. From today we will start considering the topics that the Lord taught to His disciples to ask for in prayer.


In this framework, this outline of prayer, in Matthew 6:11-13a, the Lord has given three topics for them to ask from God - in verse 11 it is our daily bread or food; in verse 12 it is being one who forgives others; and in verse 13a it is asking for God’s security and safety to be kept from evil; and then this ‘prayer’ ends by praising God and giving Him glory and honor in verse 13b. Then after this, in verses 14-15 we have a comment and caution by the Lord related to the topic of verse 12, i.e., forgiveness. If we consider our Christian lives, behavior, and our own prayers, that we ask of God, then we find them to be quite different from the three things the Lord has taught. If we think over our prayers, the things that we want to receive from God and the topics we place before God for being fulfilled by Him, then we see them to be quite different from what the Lord has taught here. There would be hardly any Christians who would regularly pray for these things in their lives. But on the contrary, there would be hardly any Christian who would not want God to automatically and continually fulfill these three things for them in their lives, without their even asking for them. In other words, everyone wants these three things to be available to them in their lives, but no one wants to do the associated things given in the same verses. Therefore, they shy away from asking God for them. Because everyone knows about the importance and benefits of having these three things in their lives, therefore everyone desires to have them; but none wants to step up and first do these for others, so they remain silent about them in their prayers.


Here, there is another similar irony too. The things that we commonly ask God for in our prayers are given a little ahead in Matthew 6:19-34; not for being asked in prayer, but as God’s reward to His true, surrendered, obedient disciples, who carry out His will, work and live out their lives as God wants them to do - God automatically gifts these things to them. Satan has so corrupted our minds and understanding, that in various ways we ask God for wealth, possessions, house, clothes, name and fame, growth and increase in things or the world; things which the Lord has not taught to pray about. But the three things that the Lord has taught to pray about, things that are related to eternal blessings, to spiritual edification and growth, things that are beneficial for us in this world as well as the next, hardly any Christian ever prays about and asks for them. In Matthew 6:19-34, the Lord has taught about the vanity of desiring them through the examples of the birds, lilies of the fields, inability to control our age, fate of worldly wealth etc. And in verse 32 here He has also chided by saying that to desire these and to be engaged in acquiring these is a characteristic of the Gentiles, not of the people of God. Then addressing His disciples, the Lord assured them and says, “But seek first the kingdom of God and His righteousness, and all these things shall be added to you” (Matthew 6:33). The Lord’s promise is clear: whoever gives priority to God’s kingdom and His righteousness in his life, not only will he get the rewards in heaven, but even the worldly things he requires will be provided for Him by God. The necessity is of having the right priorities in our lives and of following them.


Here, take note of how subtly Satan has trapped us in his devious devices. We neither pay attention to nor understand God’s attribute that whatever God has said He will surely fulfill; and what He has not said, He will never do it, no matter who and how much anyone may ask for it. But Satan knows and understands this attribute of God very well, and by corrupting our minds and understanding, he deceives and misleads us, and uses this attribute of God against us. Because of our scanty knowledge and misunderstandings of God’s Word, we fall for Satan’s devious schemes and do as he misleads us. Pay attention to the error that Satan has entangled us in: what we should be asking for from God in accordance with His Word, we do not ask for it; therefore, we do not receive the associated blessings from God. Also, what we should be doing for God, the priority that we should be having in our lives related to things of God, we do not do them either; therefore, the gifts and rewards we would have automatically received from God, we miss out on them as well. But we ask for things that the Lord has taught that there is no need to ask for, and so God will not give us those things; because He has decreed to give them as gifts and rewards to those who are obedient to Him, and not as answers to prayers. So, we ask for things that God will not give as answers to prayers, then we are disappointed, and start distrusting God and His Word. Through our carelessness and disobedience towards God’s Word, it is we who make mistakes and do wrongs, but hold God responsible for the harmful consequences. In this whole process, it is Satan who has the success and we are the ones who remain at loss. Therefore, the necessity is to know, learn and obey God’s Word. Only then will we be able to come out of such foolishness, and stay safe and blessed.


In the next article, we will move on from here, and consider the three things spoken of by the Lord.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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बुधवार, 31 मार्च 2021

सर्वोत्तम उपहार

 

          मेरी सहेली बनने के बाद से, बारबरा ने मुझे प्रोत्साहित करने के लिए असंख्य कार्ड और उपहार दिए हैं। जब मैंने उसे बताया कि मैंने प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता और प्रभु ग्रहण कर लिया है, तब उसने मुझे वह उपहार दिया था, जिसे मैं उसके द्वारा दिया गया सर्वोत्तम उपहार मानती हूँ – परमेश्वर के वचन बाइबल की मेरी पहली प्रति। उसे देते समय उसने मुझ से कहा, “इसके द्वारा तुम परमेश्वर की निकटता में बढ़ती जा सकती हो, आत्मिक जीवन में परिपक्व होती जा सकती हो; इसमें होकर प्रभु से प्रतिदिन मिलने, संपर्क रखने, उसकी आज्ञाकारिता करते रहने, उस पर भरोसा बनाए रखने, और प्रार्थना करते रहने के द्वारा।” बारबरा द्वारा मुझे दिए गए इस उपहार, मार्गदर्शन और आमंत्रण के द्वारा मेरा जीवन पूर्णतः बदल गया।

          बारबरा मुझे प्रेरित फिलिप्पुस का स्मरण करवाती है। प्रभु यीशु द्वारा फिलिप्पुस को अपने पीछे हो लेने का निमंत्रण देने के पश्चात (यूहन्ना 1:43), उसने तुरंत जाकर अपने मित्र नतनएल को बताया कि वह यीशु ही है जिसके बारे में मूसा ने व्यवस्था में, और नबियों ने अपनी पुस्तकों में लिखा था (पद 45)। जब नतनएल को संदेह हुआ, तो फिलिप्पुस ने न तो कोई वाद-विवाद किया, न उसकी आलोचना की, न उसे उसके हाल पर छोड़ दिया, वरन उसे निमंत्रण दिया कि वह आकर स्वयं प्रभु यीशु से मिले और वास्तविकता को समझ तथा जान ले (पद 46)।

          मैं फिलिप्पुस के आनन्द की कल्पना कर सकती हूँ जब उसने नतनएल को कहे सुना कि वास्तव में यीशु ही “परमेश्वर का पुत्र” और “इस्राएल का राजा” है (पद 49)। उसके लिए यह कैसी अद्भुत आशीष की बात रही होगी जब उसने प्रभु से यह सुना कि आते समय में वे और भी बड़ी बड़ी बातों और कार्यों को देखने पाएँगे (पद 50-51)।

          परमेश्वर का पवित्र आत्मा परमेश्वर के साथ हमारे संबंध का आरंभ करवाता है, और फिर जो उसकी बात के अनुसार सही प्रतिक्रिया देते हैं, प्रभु यीशु में विश्वास करके उसे अपना प्रभु और उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं, उनमें निवास करता है, उन्हें विश्वास और मसीही जीवन की परिपक्वता तथा आशीषों में बढ़ाता जाता है। वही सभी मसीही विश्वासियों को सक्षम करता है कि वे प्रभु परमेश्वर को व्यक्तिगत रीति से और घनिष्ठता से जानते चले जाएँ, उसके वचन की समझ-बूझ और व्यावहारिक उपयोगिता में बढ़ते चले जाएँ; तथा औरों को भी उसके संपर्क में लाने वाले बनें, उन्हें भी प्रभु को व्यक्तिगत रीति से जानने के लिए आमंत्रित करें। समस्त संसार के प्रत्येक जन के उद्धारकर्ता के संपर्क में आने का निमंत्रण और सृष्टिकर्ता परमेश्वर के साथ घनिष्ठता का मार्ग, जीवन का वह सर्वोत्तम उपहार है जो आप किसी को दे सकते हैं। - सोहचील डिक्सन

 

प्रभु यीशु को जानना वह सर्वोत्तम उपहार है जो हम स्वीकार कर सकते हैं; 

उसे औरों के जीवन में पहुँचाना वह सर्वोत्तम उपहार है जो हम प्रदान कर सकते हैं।


यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता। - यूहन्ना 4:10

बाइबल पाठ: यूहन्ना 1:43-51

यूहन्ना 1:43 दूसरे दिन यीशु ने गलील को जाना चाहा; और फिलिप्पुस से मिलकर कहा, मेरे पीछे हो ले।

यूहन्ना 1:44 फिलिप्पुस तो अन्द्रियास और पतरस के नगर बैतसैदा का निवासी था।

यूहन्ना 1:45 फिलिप्पुस ने नतनएल से मिलकर उस से कहा, कि जिस का वर्णन मूसा ने व्यवस्था में और भविष्यद्वक्ताओं ने किया है, वह हम को मिल गया; वह यूसुफ का पुत्र, यीशु नासरी है।

यूहन्ना 1:46 नतनएल ने उस से कहा, क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है? फिलिप्पुस ने उस से कहा, चलकर देख ले।

यूहन्ना 1:47 यीशु ने नतनएल को अपनी ओर आते देखकर उसके विषय में कहा, देखो, यह सचमुच इस्राएली है: इस में कपट नहीं।

यूहन्ना 1:48 नतनएल ने उस से कहा, तू मुझे कहां से जानता है? यीशु ने उसको उत्तर दिया; उस से पहिले कि फिलिप्पुस ने तुझे बुलाया, जब तू अंजीर के पेड़ के तले था, तब मैं ने तुझे देखा था।

यूहन्ना 1:49 नतनएल ने उसको उत्तर दिया, कि हे रब्बी, तू परमेश्वर का पुत्र है; तू इस्राएल का महाराजा है।

यूहन्ना 1:50 यीशु ने उसको उत्तर दिया; मैं ने जो तुझ से कहा, कि मैं ने तुझे अंजीर के पेड़ के तले देखा, क्या तू इसी लिये विश्वास करता है? तू इस से बड़े बड़े काम देखेगा।

यूहन्ना 1:51 फिर उस से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि तुम स्वर्ग को खुला हुआ, और परमेश्वर के स्‍वर्गदूतों को ऊपर जाते और मनुष्य के पुत्र के ऊपर उतरते देखोगे।

 

एक साल में बाइबल: 

  • न्यायियों 11-12
  • लूका 6:1-26

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

कृपा

 

          काम से वापस घर लौटने पर मेरी माँ ने मुझसे कहा, “एस्तेरा, हमारी सहेली हैलन ने तुम्हारे लिए एक उपहार भेजा है।” बचपन में हमारे पास कुछ अधिक वस्तुएँ नहीं थीं, इसलिए डाक के द्वारा उपहार पाना, दोबारा क्रिसमस मनाने के समान था। इस अद्भुत महिला के द्वारा किए गए कृपा के इस कार्य ने मुझे उसमें होकर परमेश्वर के द्वारा प्रेम किया हुआ, स्मरण रखा हुआ, और मूल्यवान समझा हुआ महसूस करवाया।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में, जिन गरीब विधवाओं के लिए तबीता (दोरकास) ने वस्त्र बनाए थे, उन्होंने भी ऐसा ही अनुभव किया होगा। दोरकास प्रभु यीशु की अनुयायी थी, याफा में रहती थी, और समाज में अपने भले कार्यों के लिए जानी जाती थी। उसके लिए बाइबल में लिखा है कि “याफा में तबीता अर्थात दोरकास नाम एक विश्वासिनी रहती थी, वह बहुतेरे भले भले काम और दान किया करती थी” (प्रेरितों 9:36)। वह बीमार होकर मर गई थी। उस समय पतरस प्रेरित पास के एक नगर में आया हुआ था, इसलिए दो मसीही विश्वासी गए और उससे विनती की, कि वह याफा आए।

          जब पतरस याफा आया, तो दोरकास ने जिन विधवाओं की सहायता की थी, उन्होंने पतरस को उसकी कृपा के प्रमाण पतरस को दिखाए – “जो कुरते और कपड़े दोरकास ने उन के साथ रहते हुए बनाए थे, दिखाने लगीं” (पद 39)। हम यह तो नहीं जानते कि उन्होंने पतरस से कुछ करने के लिए कहा या नहीं, परन्तु पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस ने प्रार्थना की और परमेश्वर ने दोरकास को फिर से जीवित कर दिया। परमेश्वर की इस कृपा का परिणाम था कि “यह बात सारे याफा में फैल गई: और बहुतेरों ने प्रभु पर विश्वास किया” (पद 42)।

          क्या हम अपने आस-पास के लोगों के प्रति कृपालु होते हैं? लोगों के प्रति हमारे कृपा का परिणाम उनका परमेश्वर की ओर मुड़ना हो सकता है। - एस्तेरा पिरोसका एस्कोबार

 

परमेश्वर की कृपा के जीवित उदाहरण बनें 

– आपके चेहरे में कृपा, आँखों में कृपा, मुस्कराहट में कृपा हो। - मदर टेरेसा


परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से अभिषेक किया: वह भलाई करता, और सब को जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था। - प्रेरितों 10:38

बाइबल पाठ: प्रेरितों 9:32-42

प्रेरितों 9:32 और ऐसा हुआ कि पतरस हर जगह फिरता हुआ, उन पवित्र लोगों के पास भी पहुंचा, जो लुद्दा में रहते थे।

प्रेरितों 9:33 वहां उसे ऐनियास नाम झोले का मारा हुआ एक मनुष्य मिला, जो आठ वर्ष से खाट पर पड़ा था।

प्रेरितों 9:34 पतरस ने उस से कहा; हे ऐनियास! यीशु मसीह तुझे चंगा करता है; उठ, अपना बिछौना बिछा; तब वह तुरन्त उठ खड़ हुआ।

प्रेरितों 9:35 और लुद्दा और शारोन के सब रहने वाले उसे देखकर प्रभु की ओर फिरे।

प्रेरितों 9:36 याफा में तबीता अर्थात दोरकास नाम एक विश्वासिनी रहती थी, वह बहुतेरे भले भले काम और दान किया करती थी।

प्रेरितों 9:37 उन्‍हीं दिनों में वह बीमार हो कर मर गई; और उन्होंने उसे नहला कर अटारी पर रख दिया।

प्रेरितों 9:38 और इसलिये कि लुद्दा याफा के निकट था, चेलों ने यह सुनकर कि पतरस वहां है दो मनुष्य भेज कर उसने बिनती की कि हमारे पास आने में देर न कर।

प्रेरितों 9:39 तब पतरस उठ कर उन के साथ हो लिया, और जब पहुंच गया, तो वे उसे उस अटारी पर ले गए; और सब विधवाएं रोती हुई उसके पास आ खड़ी हुई: और जो कुरते और कपड़े दोरकास ने उन के साथ रहते हुए बनाए थे, दिखाने लगीं।

प्रेरितों 9:40 तब पतरस ने सब को बाहर कर दिया, और घुटने टेककर प्रार्थना की; और लोथ की ओर देखकर कहा; हे तबीता उठ: तब उसने अपनी आंखें खोल दी; और पतरस को देखकर उठ बैठी।

प्रेरितों 9:41 उसने हाथ देकर उसे उठाया और पवित्र लोगों और विधवाओं को बुलाकर उसे जीवित और जागृत दिखा दिया।

प्रेरितों 9:42 यह बात सारे याफा में फैल गई: और बहुतेरों ने प्रभु पर विश्वास किया।

 

एक साल में बाइबल: 

  • लैव्यव्यवस्था 19-20
  • मत्ती 27:51-66

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

उपहार

 

          प्रत्येक क्रिसमस पर, मेरा एक मित्र अपनी पत्नी को एक लंबा पत्र लिखता है, जिसमें वह साल भर की घटनाओं की समीक्षा करता है और भविष्य के बारे में सपने देखता है। वह हमेशा उसे बताता है कि वह उससे कितना प्रेम करता है, और क्यों। साथ ही वह अपनी सभी पुत्रियों को भी पत्र लिखता है। प्रेम के उस के ये शब्द उन लोगों के लिए एक अविस्मरणीय उपहार होते हैं।

          हम यह कह सकते हैं कि प्रथम क्रिसमस का मूल प्रेम पत्र प्रभु यीशु मसीह थे, जो देहधारी बनकर इस संसार में आए। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित यूहन्ना ने अपने द्वारा लिखे गए सुसमाचार में इस सत्य को प्रमुख किया: “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था” (यूहन्ना 1:1)। प्राचीन दर्शनशास्त्र में, वचन के लिए यूनानी मूल शब्द ‘लोगोस’ का अर्थ एक दैवीय मनसा या व्यवस्था जो कि सच्चाई से मिलाती थी, होता था। लेकिन यूहन्ना इस परिभाषा को और विस्तृत कर के वचन को एक व्यक्तित्व – प्रभु यीशु, के रूप में प्रस्तुत करता है; प्रभु यीशु परमेश्वर के पुत्र, जो ‘आदि से परमेश्वर के साथ थे’ (पद 2)। यह वचन, जो पिता का एकलौता पुत्र था, देहधारी हुआ और उसने हमारे मध्य में डेरा किया (पद 14)। वचन यीशु में होकर परमेश्वर अपने आप को पूर्ण रूप से प्रगट करता है।

          धर्मशास्त्री इस मनोहर रहस्य के साथ सदियों से जूझ रहे हैं। हम चाहे इसे समझ पाने में कितने भी अक्षम क्यों न हों, हम इस बात के लिए निश्चित रह सकते हैं कि प्रभु यीशु वचन होने के द्वारा हमारे पाप से अंधियारे हुए संसार को ज्योति प्रदान करते हैं (पद 9)। यदि हम प्रभु यीशु में विश्वास लाएं और उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करें, तो हम भी परमेश्वर की संतान होने के अद्भुत उपहार को प्राप्त कर सकते हैं (पद 12)।

          प्रभु यीशु हमारे लिए परमेश्वर का प्रेम पत्र हैं। वे हमारे लिए संसार में आए और अपने विश्वासियों के साथ रहते हैं – हम मनुष्यों के लिए यह कितना अद्भुत उपहार है। - एमी बाउचर पाई

 

परमेश्वर के अद्भुत उपहार प्रभु यीशु को संसार के साथ बाँटें।


देखो पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएं, और हम हैं भी: इस कारण संसार हमें नहीं जानता, क्योंकि उसने उसे भी नहीं जाना। - 1 यूहन्ना 3:1

बाइबल पाठ: यूहन्ना 1:1-14

यूहन्ना 1:1 आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

यूहन्ना 1:2 यही आदि में परमेश्वर के साथ था।

यूहन्ना 1:3 सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

यूहन्ना 1:4 उस में जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी।

यूहन्ना 1:5 और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।

यूहन्ना 1:6 एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिस का नाम यूहन्ना था।

यूहन्ना 1:7 यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाएं।

यूहन्ना 1:8 वह आप तो वह ज्योति न था, परन्तु उस ज्योति की गवाही देने के लिये आया था।

यूहन्ना 1:9 सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी।

यूहन्ना 1:10 वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।

यूहन्ना 1:11 वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।

यूहन्ना 1:12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।

यूहन्ना 1:13 वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहन्ना 1:14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • योना 1-4
  • प्रकाशितवाक्य 10