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गुरुवार, 7 नवंबर 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 244

 

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मसीही जीवन से सम्बन्धित बातें – 89


मसीही जीवन के चार स्तम्भ - 4 - प्रार्थना (31) 


व्यावहारिक मसीही जीवन से सम्बन्धित बातों के बारे में सीखते हुए, हम प्रेरितों 2:42 में दी गई चार बातों को, जिनका पालन आरम्भिक मसीही विश्वासी लौलीन होकर किया करते थे, परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए उनसे सम्बन्धित पदों और उदाहरणों के आधार पर देख रहे हैं। पहली तीन बातों को देखने के बाद अब हम चौथी बात, प्रार्थना करने के बारे में मत्ती 6:5-15 के आधार पर विचार कर रहे हैं। हम देख चुके हैं कि जिसे सामान्यतः “प्रभु की प्रार्थना” कहा जाता है, और जिसे बचपन से ही रट लेने के बाद सामान्यतः मसीही हर अवसर पर और हर बात के लिए, बिना उसके बारे में सोचे-समझे, उस पर विचारे, यूँ ही बोलते रहते हैं, वह वास्तव में प्रभु यीशु द्वारा दी गई कोई ‘प्रार्थना’ नहीं है। बल्कि पिता परमेश्वर को स्वीकार्य प्रार्थनाएं बनाने के लिए एक रूपरेखा, एक ढाँचा है। प्रत्येक मसीही को प्रभु द्वारा दिए गए इस ढाँचे के अनुसार अपने आप को, अपने जीवन और व्यवहार को सही करके, उसमें दी गई बातों के आधार पर परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करने के लिए अपने निवेदनों को तैयार करना चाहिए। पिछले लेख में हमने देखा था कि किस प्रकार से शैतान ने हमें बहका और भरमा कर, यहाँ पर प्रभु ने जो प्रार्थना के विषय दिए हैं, उन्हें तो नज़रन्दाज़ करवा दिया है। लेकिन इससे थोड़ा सा आगे, मत्ती 6:19-34 में जो बातें परमेश्वर ने स्वतः ही अपने सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी विश्वासियों को उपहार के समान देने के लिए रखी हुई हैं, उन्हें हमारे प्रार्थना के विषय बनवा दिया है। परिणामस्वरूप, हमें न तो प्रार्थना वाली बातें मिलती हैं, और न ही उपहार में मिलने वाली बातें। क्योंकि पहली हम माँगते नहीं हैं, और दूसरी को पाने के लिए जो करना चाहिए उसे करने की बजाए, उनके लिए बस प्रार्थना करते रह जाते हैं। परमेश्वर के वचन को समझने और पालन करने में गलती हमारी है, किन्तु अपेक्षित उत्तर न पाने के लिए हम दोष परमेश्वर पर लगाते हैं, कि वह हमारी सुनता ही नहीं है। जबकि सच तो यह है कि हम उसकी नहीं सुनते हैं, उसके कहे के अनुसार नहीं करते हैं; बल्कि मनुष्यों की कही और गढ़ी हुई बातों में, उनकी सिखाई हुई गलतियों में फंसे और हानि उठाते रहते हैं। आज हम प्रभु द्वारा प्रार्थना में माँगने के लिए जो तीन बातें दी हैं, उनपर विचार करना आरम्भ करेंगे।

 

जैसा हमने पहले देखा है, मत्ती 6:11-13a में प्रभु ने तीन बातें बताई हैं, जिन्हें मसीही विश्वासियों को पिता परमेश्वर से माँगना चाहिए। पहली बात, पद 11 में दी गई है, “हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे” (मत्ती 6:11)। प्रभु की यह बात इस्राएलियों के मिस्र के दासत्व से निकलकर मिस्र की यात्रा के समय उनके भोजन के बारे में ध्यान करवाती है। हम उत्पत्ति 16 अध्याय में देखते हैं कि उन इस्राएलियों के भोजन के लिए, परमेश्वर उन्हें प्रतिदिन मन्ना दिया करता था। उन्हें प्रतिदिन सवेरे उठकर उसे एकत्रित करना होता था, और उनके पास हमेशा परिवार के प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार दिन भर का मन्ना उपलब्ध रहता था, चाहे वे कम या अधिक, जितना भी एकत्रित करें। यदि अधिक एकत्रित करते थे, तो जो आवश्यकता से अधिक था, वह सड़ जाता था; और यदि कम एकत्रित किया होता था, तो भी कोई भूखा नहीं रहता था। केवल सबत के दिन के लिए वे दो दिन की आवश्यकता के अनुसार मन्ना एकत्रित किया करते थे, और वह खराब नहीं होता था। जब तक वे इस्राएली कनान में आकर बस नहीं गए, उनके पास खेती करके भोजन का साधन नहीं हो गया, परमेश्वर उन्हें मन्ना देता रहा (यहोशू 5:12)। लेकिन जंगल की 40 वर्ष की यात्रा में परमेश्वर के उन लोगों, इस्राएलियों को, कभी एक दिन, या एक बार भी मन्ना दिए जाने के लिए परमेश्वर से कोई प्रार्थना नहीं करनी पड़ी। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि उन्हें प्रतिदिन मन्ना मिलेगा, और प्रति भोर, मन्ना उनके लिए उपलब्ध होता था, उन्हें बस जाकर उसे एकत्रित करना होता था। तो फिर प्रभु यहाँ पर अपने शिष्यों से प्रतिदिन की रोटी माँगने के लिए क्यों कह रहा है? उसने, उन शिष्यों से यह क्यों नहीं कहा कि परमेश्वर से माँगो कि जैसे इस्राएलियों को प्रतिदिन उनका भोजन मिल जाता था, वैसे ही हमें भी जीवन भर स्वतः ही भोजन मिलता रहे; माँगने की आवश्यकता ही न हो?


उस समय की इस्राएलियों की परिस्थिति का ध्यान कीजिए; वे यात्रा में थे। परमेश्वर उनके मार्ग का, उन्हें कितना चलना है, कब और कहाँ रुकना है, कितने समय रुकना है, कब फिर से चल देना है, अगला पड़ाव कब और कहाँ होगा, आदि सभी बातों को तय करता था, और उसके अनुसार उन्हें लेकर चलता था (गिनती 9:17-22)। इसलिए उस पूरी यात्रा में, उनकी बलवई और अनाज्ञाकारिता की प्रवृत्ति के बावजूद, उन इस्राएलियों के पास सिवाए परमेश्वर पर मन्ना के लिए निर्भर रहने के, भोजन के लिए अन्य कोई विकल्प था ही नहीं। वे मिस्र के भोजन को याद करके विलाप कर सकते थे, लेकिन कनान में पहुँचने से पहले वैसे भोजन को प्राप्त नहीं कर सकते थे। उन इस्राएलियों के समान, आज के मसीही भी बलवई हैं, ढीठ और अनाज्ञाकारी तो हैं; लेकिन एक तरह से, भोजन के लिए परमेश्वर पर निर्भर नहीं हैं। आज वे अपने प्रयत्न, अपने परिश्रम से, या संसार के साथ समझौते करके, शारीरिक भोजन प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, अपने शिष्यों को प्रार्थना में माँगने के लिए पहली बात प्रतिदिन का भोजन, को रखने के द्वारा प्रभु अपने शिष्यों के अन्दर यह प्रवृत्ति, यह निर्भरता चाहता है कि वे अपनी शारीरिक सामर्थ्य और साँसारिक योग्यता पर, अपनी सम्पन्नता पर भरोसा ना करें, वरन केवल परमेश्वर पर निर्भर रहने वाले हों। 


उन इस्राएलियों के, परमेश्वर के प्रति हर प्रकार के व्यवहार के बावजूद, परमेश्वर उन्हें प्रतिदिन उनकी आवश्यकता के अनुसार मन्ना देता ही रहा; उसे कभी रोका नहीं। अर्थात परमेश्वर के प्रावधान उसके लोगों के लिए हमेशा और हर परिस्थिति में उपलब्ध रहते हैं, “जवान सिंहों तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं; परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होवेगी” (भजन 34:10)। लेकिन जो परमेश्वर पर नहीं, बल्कि स्वयं पर निर्भर रहते हैं, वे नहीं जानते हैं कि कब परिस्थिति बदले, कब कोई दुर्घटना, कोई रोग, कोई आपदा आए, और वे सम्पन्नता से कंगाली में पहुँच जाएं; बहुतायत से निकलकर दाने-दाने को तरस जाएं। संसार कि जिन लोगों पर वे भरोसा कर रहे हैं, वे कब उन्हें धोखा दे दें, कब उनसे उनका सब कुछ छीन लें। इसलिए प्रभु के सच्चे शिष्यों को परमेश्वर से जो माँगना है, उसमें सब से पहली बात है परमेश्वर पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति, जिससे वे कभी किसी धोखे में, हानि में न आएं; उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का स्त्रोत हमेशा उपलब्ध बना रहे। अगले लेख में हम यहाँ से आगे देखेंगे। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


Things Related to Christian Living – 89


The Four Pillars of Christian Living - 4 - Prayer (31)


While learning about things related to practical Christian living, we have been considering the four things given in Acts 2:42, which the initial Christian Believers observed steadfastly, through the examples and verses given about them in God’s Word, the Bible. Having seen the first three things, we are now considering the fourth one, prayer; and on the basis of Matthew 6:5-15 we are seeing about the “Lord’s Prayer.” We have seen that what is commonly called the “Lord’s Prayer,” and is usually memorized in childhood and then is routinely spoken by rote on all occasions, for everything without trying to understand about it or ponder over it, is actually not a ‘prayer’ given by the Lord. Instead, it is an outline, a framework to build prayers acceptable to God the Father. Every Christian should correct and build their lives and behavior according to this framework and the things given in it, and then prepare their prayers to offer to God according to this outline. In the previous article we have seen how Satan has deceived and misled us to ignore the things stated by the Lord in these verses to pray about. But a little ahead, in Matthew 6:19-34 what God has given as things that He will automatically gift to His true, surrendered, obedient disciples, those, under Satan’s influence on us, have become our prayer points. Consequently, neither do we receive the things that should be our topics for prayer, nor those which are meant to be given as gifts or rewards. Because we never pray and ask for the first ones, and do not do what we should be doing to receive the second ones, but only keep praying about them. The fault of not understanding and obeying God’s Word is ours, but since we do not get our expected answers, we hold God responsible and accuse Him of not answering our prayers. Whereas, the truth is that instead of listening to God, we listen to men and their contrived teachings, and remain caught up in their wrong teachings and keep suffering loss. Today we will begin considering the three topics for prayer that have been stated by the Lord here.


As we have seen earlier, the Lord has said three things in Matthew 6:11-13a, which the Christian should be praying about to God. The first is in verse 11 “Give us this day our daily bread” (Matthew 6:11). What the Lord has said brings to mind the way God provided food for the Israelites when they came out of slavery in Egypt and journeyed to the Promised Land. We see in Exodus chapter 16 that God gave them food for the day in the form of manna every day. Every morning the Israelites had to gather manna for the day, and they always had enough for the needs of the family throughout the day, no matter how much or how little they would gather. If they gathered in excess, it would rot, even if they had gathered less, no one went hungry. Only for the Sabbath day could they gather enough to last them for two days and it would not rot. They continued to receive manna till they settled in Canaan and had their first harvest (Joshua 5:12). But throughout their 40 years of travel in the wilderness, never once did the Israelite have to ask for manna to be provided to them. God had promised that they would receive it every morning, and every morning it was there, available for them; all they had to do was go and gather it for the day. Then why is the Lord asking His disciples to pray for their daily bread? Instead, why did He not ask the disciples to ask God to automatically keep giving them food daily, as He gave to the Israelites, without having to pray for it?


Ponder over the situation of the Israelites at that time; they were traveling. It was God who decided the way they had to take, for how long they had to continue traveling, when and where they were to break journey, for how long they had to stop, when they were to resume the journey, when and where would be the next camping, etc. (Numbers 9:17-22). Therefore, in that whole journey, despite their being rebellious, stiff-necked, and disobedient, the Israelites had no one but God to depend upon and no alternative for food except for the manna He provided to them as their food for the day. They could sorrow and lament for the food they ate in Egypt, but till they reached Canaan, they could never have it again. Like those Israelites, today’s Christians too are similarly rebellious, stiff-necked, and disobedient; but in a way, are not totally dependent upon God for their food as the Israelites were. Today, through their efforts, work, or compromising with the world, they can arrange for food for their physical needs. Therefore, by keeping their daily provision of food as the first prayer matter, the Lord wants the disciples to develop this tendency, this dependency that they will never rely on their physical strength, their capabilities, their prosperity, the world, but only trust and rely upon God for everything.


Despite whatever way those Israelites treated God, God continued to provide them with manna according to their needs; He never stopped it for them. In other words, God’s provisions are always available for His people, under all circumstances “The young lions lack and suffer hunger; But those who seek the Lord shall not lack any good thing” (Psalm 34:10). But those who depend not upon God but upon themselves, they never know when circumstances will change and they will go from being prosperous to being paupers. Some disease, some accident, some natural disaster would change everything for them. The people of the world that they have been relying upon, may deceive them and loot them out of everything they have. Therefore, the true disciples of the Lord, the first thing they should learn to ask from God is to have the nature of totally depending upon Him for everything, so that they will never be deceived by anyone, suffer any loss from anyone, and they always have available the inexhaustible source to meet their needs. From the next article, we will consider ahead from here.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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शनिवार, 8 सितंबर 2018

स्त्रोत



      मैं 18 वर्ष की थी जब मुझे मेरी पहली पूर्णकालिक नौकरी मिली, और मैंने पैसे बचाने के अनुशासन के बारे में एक महत्वपूर्ण शिक्षा सीखी। मैं काम करती रही और पैसे बचाती रही, जब तक कि मेरे पास स्कूल की एक वर्ष की फीस चुकाने के लिए पैसे एकत्रित नहीं हो गए। तभी मेरी माँ को अचानक ही ऑपरेशन के लिए ले जाना पड़ा, और मुझे एहसास हुआ कि मेरे पास बैंक में उनके इलाज के लायक पैसे हैं। मेरी माँ के प्रति मेरा प्रेम, मेरे भविष्य के लिए मेरी योजनाओं से बढ़कर था।

      ऐसे में इलाज़बेथ इलियट द्वारा उनकी पुस्तक Passion and Purity में लिखे गए ये शब्द मेरे लिए और भी अधिक अर्थपूर्ण हो गए: “यदि हमें जो दिया गया है, हम उसे कस कर पकड़ लेते हैं और समयानुसार उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते हैं, या उसका वैसा प्रयोग नहीं करते हैं जैसा हमें देने वाला चाहता है कि हम करें, तो हम अपनी आत्मा की उन्नति में बाधा डालते हैं। यहाँ यह गलती करना बहुत सरल रहता है कि हम यह कहें कि ‘क्योंकि यह मुझे परमेश्वर से मिला है इसलिए यह मेरा ही है; मैं इसके साथ जैसा चाहे वैसा कर सकता हूँ।’ जी नहीं! सत्य यह है कि वह हमारे पास इसलिए है जिससे हम उसके लिए उस देने वाले स्त्रोत का धन्यवाद करें, और उस वस्तु को पुनः उसे ही समर्पित कर दें,...वह दे देने के लिए मेरा है।”

      उस समय मुझे एहसास हुआ कि मेरी नौकरी, और पैसे बचाने का मेरा वह अनुशासन मुझे परमेश्वर से मिले उपहार थे! मैं अपने परिवार को उदारता से दे सकी क्योंकि मैं जानती थी कि परमेश्वर किसी और रीति से मुझे स्कूल की पढ़ाई करवा देगा, और उसने ऐसा ही किया भी।

      आज परमेश्वर कैसे चाहता है कि हम दाऊद की प्रार्थना, “मैं क्या हूँ? और मेरी प्रजा क्या है? कि हम को इस रीति से अपनी इच्छा से तुझे भेंट देने की शक्ति मिले? तुझी से तो सब कुछ मिलता है, और हम ने तेरे हाथ से पाकर तुझे दिया है” (1 इतिहास 29:14) को अपने जीवनों में  लागू करें; यह जानते और मानते हुए कि परमेश्वर ही हमारी सभी आवाश्यकताओं की पूर्ति का स्त्रोत है। - कीला ओकोआ


सब कुछ परमेश्वर का, और परमेश्वर से ही है।

क्योंकि उस की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है: उस की महिमा युगानुयुग होती रहे: आमीन। - रोमियों 11:36

बाइबल पाठ: 1 इतिहास 29:14
1 Chronicles 29:14 मैं क्या हूँ? और मेरी प्रजा क्या है? कि हम को इस रीति से अपनी इच्छा से तुझे भेंट देने की शक्ति मिले? तुझी से तो सब कुछ मिलता है, और हम ने तेरे हाथ से पाकर तुझे दिया है।
1 Chronicles 29:15 तेरी दृष्टि में हम तो अपने सब पुरखाओं के समान पराए और परदेशी हैं; पृथ्वी पर हमारे दिन छाया के समान बीते जाते हैं, और हमारा कुछ ठिकाना नहीं।
1 Chronicles 29:16 हे हमारे परमेश्वर यहोवा! वह जो बड़ा संचय हम ने तेरे पवित्र नाम का एक भवन बनाने के लिये किया है, वह तेरे ही हाथ से हमे मिला था, और सब तेरा ही है।
1 Chronicles 29:17 और हे मेरे परमेश्वर! मैं जानता हूँ कि तू मन को जांचता है और सिधाई से प्रसन्न रहता है; मैं ने तो यह सब कुछ मन की सिधाई और अपनी इच्छा से दिया है; और अब मैं ने आनन्द से देखा है, कि तेरी प्रजा के लोग जो यहां उपस्थित हैं, वह अपनी इच्छा से तेरे लिये भेंट देते हैं।
1 Chronicles 29:18 हे यहोवा! हे हमारे पुरखा इब्राहीम, इसहाक और इस्राएल के परमेश्वर! अपनी प्रजा के मन के विचारों में यह बात बनाए रख और उनके मन अपनी ओर लगाए रख।
1 Chronicles 29:19 और मेरे पुत्र सुलैमान का मन ऐसा खरा कर दे कि वह तेरी आज्ञाओं चितौनियों और विधियों को मानता रहे और यह सब कुछ करे, और उस भवन को बनाए, जिसकी तैयारी मैं ने की है।


एक साल में बाइबल: 
  • नीतिवचन 3-5
  • 2 कुरिन्थियों 1



बुधवार, 30 अगस्त 2017

सत्यापित


   मुझे और मेरे मित्रों को ईमेल के द्वारा एक सूचना प्राप्त हुई - एक घातक मकड़ा अमेरिका में आ गया है और लोगों को मार रहा है। उस सूचना में, उसे सच्चा जताने के लिए, कई वैज्ञानिक संज्ञाएं और जीवन की वास्तविक परिस्थितियाँ भी दी गईं थीं, जिससे सूचना सच्ची लग रही थी। परन्तु जब मैंने उस सूचना की पुष्टि के लिए इंटरनैट पर कुछ भरोसे मंद वेबसाईट्स पर खोज की तो पता चला कि वह सच्ची नहीं थी, इंटरनैट पर फैलाए जाने वाले धोखों में से एक थी। यह सच्चाई एक विश्वासयोग्य स्त्रोत से पुष्टि के द्वारा ही स्पष्ट हो पाई।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में हम पाते हैं कि प्रथम ईसवीं में, मकिदूनिया के कुछ मसीही विश्वासियों ने भी जो प्रचार वे सुन रहे थे, उसे सत्यापित करने के महत्व को समझा, जिसके लिए बाइबल में उनकी प्रशंसा की गई: "ये लोग तो थिस्सलुनीके के यहूदियों से भले थे और उन्होंने बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया, और प्रति दिन पवित्र शास्‍त्रों में ढूंढ़ते रहे कि ये बातें यों ही हैं, कि नहीं" (प्रेरितों 17:11)। बेरिया में रहने वाले वे विश्वासी प्रेरित पौलुस से प्रभु का सन्देश सुनते थे, परन्तु साथ ही वे जाकर उस सन्देश को परमेश्वर के वचन के तब उपलब्ध पुराने नियम खण्ड से सत्यापित भी करते थे। संभवतः पौलुस उन्हें बता रहा था कि पुराने नियम में यह लिखा गया है कि मसीहा दुःख उठाएगा और लोगों के पापों के लिए मारा जाएगा। परन्तु वे स्वयं मूल स्त्रोत से आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि जो कहा जा रहा है वह सत्य है।

   जब कभी भी हम ऐसे आत्मिक विचारों या शिक्षाओं को सुनें जो हमें विचलित करें या अटपटी लगें, तो हमें सचेत हो जाना चाहिए। हमें स्वयं पवित्र-शास्त्र से खोजना चाहिए, भरोसेमंद स्त्रोतों से पता करना चाहिए, उसके विषय सही निर्णय करने के लिए प्रार्थना में प्रभु यीशु से बुद्धिमता माँगनी चाहिए। प्रत्येक आत्मिक शिक्षा को सत्यापित करके, तब ही उसे ग्रहण करना चाहिए। - डेव ब्रैनन

परमेश्वर का सत्य हर प्रकार की जाँच में खरा ही उतरेगा।

सब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो। - 1 थिस्सलुनीकियों 5:21

बाइबल पाठ: प्रेरितों 17:10-13, 1 यूहन्ना 4:1-6
Acts 17:10 भाइयों ने तुरन्त रात ही रात पौलुस और सीलास को बिरीया में भेज दिया: और वे वहां पहुंचकर यहूदियों के आराधनालय में गए। 
Acts 17:11 ये लोग तो थिस्सलुनीके के यहूदियों से भले थे और उन्होंने बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया, और प्रति दिन पवित्र शास्‍त्रों में ढूंढ़ते रहे कि ये बातें यों ही हैं, कि नहीं। 
Acts 17:12 सो उन में से बहुतों ने, और यूनानी कुलीन स्‍त्रियों में से, और पुरूषों में से बहुतेरों ने विश्वास किया। 
Acts 17:13 किन्‍तु जब थिस्सलुनीके के यहूदी जान गए, कि पौलुस बिरीया में भी परमेश्वर का वचन सुनाता है, तो वहां भी आकर लोगों को उकसाने और हलचल मचाने लगे। 

1 John 4:1 हे प्रियों, हर एक आत्मा की प्रतीति न करो: वरन आत्माओं को परखो, कि वे परमेश्वर की ओर से हैं कि नहीं; क्योंकि बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता जगत में निकल खड़े हुए हैं। 
1 John 4:2 परमेश्वर का आत्मा तुम इसी रीति से पहचान सकते हो, कि जो कोई आत्मा मान लेती है, कि यीशु मसीह शरीर में हो कर आया है वह परमेश्वर की ओर से है। 
1 John 4:3 और जो कोई आत्मा यीशु को नहीं मानती, वह परमेश्वर की ओर से नहीं; और वही तो मसीह के विरोधी की आत्मा है; जिस की चर्चा तुम सुन चुके हो, कि वह आने वाला है: और अब भी जगत में है। 
1 John 4:4 हे बालको, तुम परमेश्वर के हो: और तुम ने उन पर जय पाई है; क्योंकि जो तुम में है, वह उस से जो संसार में है, बड़ा है। 
1 John 4:5 वे संसार के हैं, इस कारण वे संसार की बातें बोलते हैं, और संसार उन की सुनता है। 
1 John 4:6 हम परमेश्वर के हैं: जो परमेश्वर को जानता है, वह हमारी सुनता है; जो परमेश्वर को नहीं जानता वह हमारी नहीं सुनता; इसी प्रकार हम सत्य की आत्मा और भ्रम की आत्मा को पहचान लेते हैं।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 129-131
  • 1 कुरिन्थियों 11:1-16


गुरुवार, 15 जून 2017

ऊपर देखो


   हमारे घर के निकट के एक उद्यान में एक पगडंडी है जिस पर चलना मुझे बहुत अच्छा लगता है। उस पगडंडी के एक भाग से गार्डन ऑफ द गौड्स में स्थित लाल पत्थर की चट्टानों का विहंगम दृश्य दिखता है, जिनके पीछे 14,115 फुट ऊँची पाईक्स पीक नामक पर्वत चोटी दिखाई देती है और यह सारा दृश्य बड़ा ही मनोरम होता है। कभी-कभी, किसी समस्या में उलझा हुआ मैं उस भाग से अपना सिर झुकाए, नीचे सपाट पगडंडी को देखता हुआ चला जाता हूँ। ऐसे में, यदि मेरे आस-पास कोई और ना हो तो मैं ठिठक कर रुक भी जाता हूँ और ऊँची आवाज़ में अपने आप से कहता हूँ, "डेविड, ऊपर देखो!"

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भजन संहिता नामक पुस्तक में कुछ भजन हैं (भजन 120-134) जिन्हें "यात्रा के गीत" कहा जाता है। ये वो भजन हैं जिन्हें इसत्राएल के लोग, जब वे तीनों वार्षिक तीर्थ-त्यौहारों को मनाने के लिए आते थे, तो यरुशलेम की ओर चढ़ते जाते हुए गाते थे। इनमें से भजन 121 का आरंभ एक प्रशन से होता है: "मैं अपनी आंखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा। मुझे सहायता कहां से मिलेगी?" (पद 1), और अगले पद में उसका उत्तर भी दिया गया है, "मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है" (पद 2)। हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर ऐसा नहीं है जो हमसे अलग-थलग रहता हो, वरन वह हमारा ऐसा साथी है जो सदा हमारे साथ बना रहता है, हमारी परिस्थितियों के प्रति सदिव सजग रहता है (पद 3-7), हमारी जीवन यात्रा में, "अब से लेकर सदा तक" हमारा मार्गदर्शन एवं सुरक्षा प्रदान करता रहता है (पद 8)।

   जीवन के पथ पर हमारा अपने प्रभु परमेश्वर पर, जो हमारी सहायता का स्त्रोत है, अपनी दृष्टि लगाए रखना कितना आवश्यक है। जब भी हम अपनी परिस्थितियों या किसी परेशानी से अभिभूत और निराश अनुभव करते हैं, हमें भी रुक कर अपने आप से ऊँची आवाज़ में कहना चाहिए, "ऊपर देखो!" - डेविड मैक्कैसलैंड


अपनी सहायता के स्त्रोत, प्रभु परमेश्वर पर, अपनी दृष्टि सदा लगाए रखें।

परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक। - भजन 46:1

बाइबल पाठ: भजन 121
Psalms 121:1 मैं अपनी आंखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा। मुझे सहायता कहां से मिलेगी? 
Psalms 121:2 मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है।
Psalms 121:3 वह तेरे पांव को टलने न देगा, तेरा रक्षक कभी न ऊंघेगा। 
Psalms 121:4 सुन, इस्राएल का रक्षक, न ऊंघेगा और न सोएगा।
Psalms 121:5 यहोवा तेरा रक्षक है; यहोवा तेरी दाहिनी ओर तेरी आड़ है। 
Psalms 121:6 न तो दिन को धूप से, और न रात को चांदनी से तेरी कुछ हानि होगी।
Psalms 121:7 यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। 
Psalms 121:8 यहोवा तेरे आने जाने में तेरी रक्षा अब से ले कर सदा तक करता रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • नहेम्याह 1-3
  • प्रेरितों 2:1-21


रविवार, 5 फ़रवरी 2017

आशापूर्ण जीवन


   आज कल सेहत सुधारने के लिए सकारात्मक तथा आशावादी होने के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, चाहे हम किसी कठिन बिमारी का सामना कर रहे हों या ढेरों गन्दे कपड़ों को धोने की कठिनाई का। नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रोफेसर, बारबरा फ्रेड्रिकसन (पी.एच.डी.) का कहना है कि हमें उन गतिविधियों में संलग्न रहने का प्रयास करना चाहिए जो आनन्द, प्रेम और अन्य सकारात्मक भावनाओं को विकसित करती हैं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि ऐसी अच्छी भावनाओं के लिए केवल इच्छा रखना ही काफी नहीं है। हमारे अन्दर एक बहुत मज़बूत निश्चय भी होना चाहिए कि आनन्द, शांति और प्रेम का कोई ऐसा स्त्रोत भी है जिसपर हम विश्वास कर सकते हैं, निर्भर रह सकते हैं।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भजन 37:1-8 में दी गई सकारात्मक क्रियाओं को हम निराशा और नकारात्मक सोच के प्रतिरोध के लिए प्रयोग कर सकते हैं। इस खंड में मनोदशा सुधारने वाली दी गई कुछ बातों पर ध्यान कीजिए: प्रभु में भरोसा बनाए रखो, भलाई करो, देश में बने रहो, सच्चाई में मन लगाओ (पद 3); प्रभु में आनन्दित रहो (पद 4); अपने मार्गों को प्रभु पर छोड़ दो, उस पर भरोसा रखो (पद 5); प्रभु के सामने शांत रहो, धैर्य के साथ उसकी प्रतीक्षा करो, कुड़कुड़ाओ मत (पद 7); क्रोध से परे रहो, जलजलाहट को छोड़ दो (पद 8)।

   क्योंकि उपरोक्त सभी कार्य प्रभु परमेश्वर के साथ जुड़े हुी हैं, इसलिए इन्हें महज़ काल्पनिक अथवा अव्यावहारिक सुझाव नहीं समझना चाहिए। ये सब केवल प्रभु यीशु और उससे मिलने वाली सामर्थ के कारण हमारे लिए संभव होते हैं। हमारे आशापूर्ण होने तथा रहने का सच्चा और खरा स्त्रोत है हमें पापों से मिला वह छुटकारा जो प्रभु यीशु ने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान द्वारा संभव करवाया है, हम सब के लिए उपलब्ध करवाया है। हमारे आशापूर्ण जीवन का भरोसेमन्द स्त्रोत केवल प्रभु यीशु ही है। - डेविड मैक्कैसलैंड


संसार की बुराईयों से होने वाली निराशा में 
प्रभु यीशु में मिलने वाली आनन्त आशा भलाई का सुसमाचार है।

तू पापियों के विषय मन में डाह न करना, दिन भर यहोवा का भय मानते रहना। क्योंकि अन्त में फल होगा, और तेरी आशा न टूटेगी। - नीतिवचन 23:17-18

बाइबल पाठ: भजन 37:1-15
Psalms 37:1 कुकर्मियों के कारण मत कुढ़, कुटिल काम करने वालों के विषय डाह न कर! 
Psalms 37:2 क्योंकि वे घास की नाईं झट कट जाएंगे, और हरी घास की नाईं मुर्झा जाएंगे। 
Psalms 37:3 यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर; देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह। 
Psalms 37:4 यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा।
Psalms 37:5 अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा। 
Psalms 37:6 और वह तेरा धर्म ज्योति की नाईं, और तेरा न्याय दोपहर के उजियाले की नाईं प्रगट करेगा।
Psalms 37:7 यहोवा के साम्हने चुपचाप रह, और धीरज से उसका आसरा रख; उस मनुष्य के कारण न कुढ़, जिसके काम सफल होते हैं, और वह बुरी युक्तियों को निकालता है! 
Psalms 37:8 क्रोध से परे रह, और जलजलाहट को छोड़ दे! मत कुढ़, उस से बुराई ही निकलेगी। 
Psalms 37:9 क्योंकि कुकर्मी लोग काट डाले जाएंगे; और जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वही पृथ्वी के अधिकारी होंगे। 
Psalms 37:10 थोड़े दिन के बीतने पर दुष्ट रहेगा ही नहीं; और तू उसके स्थान को भलीं भांति देखने पर भी उसको न पाएगा। 
Psalms 37:11 परन्तु नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और बड़ी शान्ति के कारण आनन्द मनाएंगे। 
Psalms 37:12 दुष्ट धर्मी के विरुद्ध बुरी युक्ति निकालता है, और उस पर दांत पीसता है; 
Psalms 37:13 परन्तु प्रभु उस पर हंसेगा, क्योंकि वह देखता है कि उसका दिन आने वाला है।
Psalms 37:14 दुष्ट लोग तलवार खींचे और धनुष बढ़ाए हुए हैं, ताकि दीन दरिद्र को गिरा दें, और सीधी चाल चलने वालों को वध करें। 
Psalms 37:15 उनकी तलवारों से उन्हीं के हृदय छिदेंगे, और उनके धनुष तोड़े जाएंगे।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 36-38
  • मत्ती 23:1-22


रविवार, 29 जनवरी 2017

स्त्रोत


   बीस वर्षीय लेगॉन स्टीवेन्स एक अनुभवी पर्वतारोही थीं; इतनी कम आयु में भी उन्होंने मैक्किन्ले पर्वत और रेनियर पर्वत के शिखर, इक्वेडोर में स्थित एण्डियन पर्वत श्रंखला की चार चोटियों और कॉलोराडो के 39 सबसे ऊँचे पहाड़ों की सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी। वह कहती थीं, "मैं इसलिए चढ़ती हूँ क्योंकि मुझे पहाड़ अच्छे लगते हैं, और वहाँ मेरी भेंट परमेश्वर से होती है।" जनवरी 2008 में दक्षिण कॉलोराडो की लिटल बीयर चोटी पर अपने भाई के साथ चढ़ते हुए लेगॉन की मृत्यु हिम-स्खलन के कारण हो गई, परन्तु उसका भाई बच गया।

   लेगॉन की मृत्योपरांत उसके माता-पिता को लेगॉन की डायरियाँ मिलीं, जिनमें उसके द्वारा लिखे गए प्रभु यीशु मसीह के साथ उसकी बहुत घनिष्टता के संबंधों को पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए। उसकी माँ ने कहा, "प्रभु यीशु उसके लिए सदा ही एक चमकती हुई ज्योति थे; लेगॉन ने उनके साथ संबंधों की वह गहराई और खराई अनुभव की थी जो मसीही विश्वास के अनुभवी जन भी पाने की लालसा रखते हैं।"

   हिम-स्खलन से हुई मृत्यु के तीन दिन पहले तंबू में बैठे हुए लेगॉन ने डायरी में अपनी अन्तिम बात लिखी, "परमेश्वर भला है, और हमारे जीवनों के लिए उसकी विशेष योजना है, जो उस सब से कहीं अधिक भली और आशीषित है जो हम स्वयं अपने लिए बनाते हैं; और इस बात के लिए मैं उसकी बहुत धन्यवादी हूँ। मैंने अपना सब कुछ, अपना भविष्य उसके हाथों में छोड़ दिया है, और बस उसे हर बात के लिए धन्यवाद कहती हूँ।"

   लेगॉन के यह शब्द, परमेश्वर के वचन बाइबल में भजनकार द्वारा कहे गए शब्दों : "मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है" (भजन 121:2) के अनुसार है। लेगॉन के समान हमें भी इस एहसास के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए कि परमेश्वर ही हमारे जीवन, हमारे जीवन की प्रत्येक बात का स्त्रोत है; वही हमारे लिए सब कुछ निर्धारित करता है, और वह हर बात में हमारे लिए भला ही करता है। - डेविड मैक्कैसलैंड


अज्ञात भविष्य के लिए हम अपने सर्वज्ञानी परमेश्वर पर भरोसा रख सकते हैं।

और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं। - रोमियों 8:28 

बाइबल पाठ: भजन 121
Psalms 121:1 मैं अपनी आंखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा। मुझे सहायता कहां से मिलेगी? 
Psalms 121:2 मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है।
Psalms 121:3 वह तेरे पाँव को टलने न देगा, तेरा रक्षक कभी न ऊंघेगा। 
Psalms 121:4 सुन, इस्राएल का रक्षक, न ऊंघेगा और न सोएगा।
Psalms 121:5 यहोवा तेरा रक्षक है; यहोवा तेरी दाहिनी ओर तेरी आड़ है। 
Psalms 121:6 न तो दिन को धूप से, और न रात को चांदनी से तेरी कुछ हानि होगी।
Psalms 121:7 यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। 
Psalms 121:8 यहोवा तेरे आने जाने में तेरी रक्षा अब से ले कर सदा तक करता रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 21-22
  • मत्ती 19


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

चिंता और संतुष्टि


   न्यू यॉर्क के एक कानूनी व्यवसायसंघ द्वारा करवाए गए ऑन-लाईन सर्वेक्षण से पता चला कि वॉल स्ट्रीट से कार्य करने वाले व्यवसायियों, दलालों, निवेश बैंकरों और अन्य आर्थिक सेवाओं में लगे व्यवसायियों में से 52% मानते हैं कि अपने व्यवसाय में सफल होने के लिए या तो वे गैर-कानूनी कार्यविधि में संलग्न रहें हैं अथवा यदि आवश्यक लगा तो हो जाएंगे। सर्वेक्षण का निष्कर्ष था कि आर्थिक सेवाओं से संबंधित ये अगुवे अपना नैतिक दिशासूचक खो चुके हैं और उन्होंने व्यावसायिक समुदाय में गैर कानूनी कार्यों को आवश्यक बुराई स्वीकार कर लिया है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में, जवान तिमुथियुस को मसीही विश्वास से संबंधित परामर्श देते हुए प्रेरित पौलुस ने उसे चिताया कि धन के लोभ और धनवान हो जाने के आकर्षण ने अनेकों को पथभ्रष्ट कर दिया है। उन्होंने प्रलोभनों और परीक्षाओं के सामने घुटने टेक दिए और अनेक हानिकारक और व्यर्थ लालसाओं को अपना लिया (1 तिमुथियुस 6:9)। पौलुस ने धन के लोभ को (धन को नहीं) सब प्रकार की बुराईयों की जड़ कहा है (पद 10); विशेषकर प्रभु यीशु पर निर्भर होने की बजाए धन पर निर्भर होने को।

   जैसे जैसे हम यह सीखते और पहचानते हैं कि जो कुछ भी हमारे पास है उसका स्त्रोत मसीह यीशु ही है, वैसे वैसे हम भौतिक संपत्ति में नहीं वरन प्रभु में संतुष्टि ढूँढ़ने लगेंगे। जब हम धन-संपत्ति की बजाए परमेश्वर भक्ति के खोजी बनेंगे, तो जो भी हमारे पास है उसमें ही परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने की अभिलाषा हमारे अन्दर बढ़ने लगेगी।

   हम मसीही विश्वासियों को चाहिए कि हम अपने अन्दर परमेश्वर में संतुष्टि और उसको पूर्ण समर्पण का रवैया विकसित करें, क्योंकि हमारा प्रभु ही हमारे लिए प्रत्येक प्रावधान करने वाला है, उसे हमारी आवश्यकताओं की चिंता है। - मार्विन विलियम्स


धन से प्रेम जीवन के स्त्रोत प्रभु को नज़रन्दाज़ करवा देता है।

इसलिये परमेश्वर के बलवन्‍त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। और अपनी सारी चिन्‍ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है। - 1 पतरस 5:6-7

बाइबल पाठ: 1 तिमुथियुस 6:6-10
1 Timothy 6:6 पर सन्‍तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है। 
1 Timothy 6:7 क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं। 
1 Timothy 6:8 और यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो, तो इन्‍हीं पर सन्‍तोष करना चाहिए। 
1 Timothy 6:9 पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं। 
1 Timothy 6:10 क्योंकि रूपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटक कर अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है।

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजेकल 42-44
  • 1 यूहन्ना 1


गुरुवार, 31 मार्च 2016

जीवन जल


   यहाँ अमेरिका में, हम अमेरिका निवासी पिछ्ले अनेक वर्षों से बोतल-बन्द पानी पीने के आदि हो गए हैं, जबकि अधिकांश लोगों के पास नलों से साफ और सुरक्षित जल पाने की सुविधा है, लेकिन फिर भी लोग पानी खरीद कर ही पीना पसन्द करते हैं। लोगों को लगता है कि खरीदा गया पानी नल में आने वाले मुफ्त पानी से अच्छा है। जब एक सही चीज़ आपको निःशुल्क मिल रही है तो उसे खरीदने के लिए कीमत चुकाने की बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आती।

   यही बात हमारे आत्मिक जीवन पर भी लागू होती है। अनेक लोगों के लिए पापों की क्षमा और उद्धार को परमेश्वर से मुफ्त मिलने वाले उपहार के रूप में स्वीकार करना बहुत कठिन है; वे उसे प्राप्त करने के लिए कुछ कीमत चुकाना चाहते हैं, अपने प्रयास करना चाहते हैं। लेकिन इस कीमत चुकाने की इच्छा के साथ समस्य यह है कि पापों की क्षमा और उद्धार बहुत महंगा है, और कोई ऐसा नहीं है जो इतनी कीमत चुका सके, क्योंकि इसे खरीद पाना पूर्ण सिद्धता द्वारा ही संभव है (मत्ती 19:21)। इसीलिए मानव इतिहास में उस एकमात्र व्यक्ति ने ही, जो मन-ध्यान-विचार तथा प्राण-देह आत्मा में पूर्णतः सिद्ध, निष्पाप और निषकलंक था (रोमियों 5:18), सब के लिए यह कीमत चुका कर इस क्षमा और उद्धार को सबके लिए मुफ्त उपहार के रूप में उपलब्ध करवा दिया है। अब जो भी एक प्यासे के समान जीवन का जल पीने के लिए उसके पास आता है, उसे वह अनन्त जीवन का यह जल सेंत-मेंत प्रदान करने का वायदा करता है (यूहन्ना 4:14; प्रकाशितवाक्य 21:6)।

   लेकिन फिर भी कुछ लोग अनन्त जीवन के इस जल को पाने के लिए कुछ कीमत चुकाने का प्रयास करते हैं, अपने भले कार्यों, उपकारों तथा दान-दक्षिणा के द्वारा। यद्यपि आत्मिक सेवा के ये कार्य परमेश्वर की नज़रों में भले और महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके द्वारा परमेश्वर से पापों की क्षमा और उद्धार खरीदा नहीं जा सकता है। समस्त मानव जाति के सभी लोगों के लिए प्रभु यीशु ने अपने बलिदान द्वारा सभी के लिए यह कीमत चुका कर, अपने पुनरुत्थान द्वारा सबके लिए उद्धार का मार्ग खोल दिया है; अब दोबारा यह कीमत चुकाने का प्रयास करने की ना तो आवश्यक्ता है और ना ही यह कर पाना संभव है। परमेश्वर द्वारा जो उप्लब्ध करवा दिया गया है, उसे तो बस धन्यवाद के साथ ग्रहण ही किया जा सकता है।

   आज जो भी आत्मिक जीवन की प्यास बुझाने के लिए उस जीवन के जल की नदी प्रभु यीशु के पास पश्चाताप और विश्वास के साथ आता है, उसे परमेश्वर की ओर से यह जीवन जल भरपूरी के साथ सेंत-मेंत मिलता है। और अद्भुत बात यह है कि जो यह जीवन जल स्वीकार करता है, परमेश्वर का यह जीवन जल फिर उस व्यक्ति में होकर औरों के लिए भी प्रवाहित होने लग जाता है (यूहन्ना 7:37-38)। - जूली ऐकैरमन लिंक


प्रभु यीशु ही वह एक मात्र स्त्रोत है जो आत्मा की प्यास बुझा सकता है।

फिर पर्व के अंतिम दिन, जो मुख्य दिन है, यीशु खड़ा हुआ और पुकार कर कहा, यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्र शास्त्र में आया है उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियां बह निकलेंगी। - यूहन्ना 7:37-38

बाइबल पाठ: यूहन्ना 4:10-14; रोमियों 5:12-21
John 4:10 यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता। 
John 4:11 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया? 
John 4:12 क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिसने हमें यह कूआं दिया; और आप ही अपने सन्तान, और अपने ढोरों समेत उस में से पीया? 
John 4:13 यीशु ने उसको उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा। 
John 4:14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा। 

Romans 5:12 इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, इसलिये कि सब ने पाप किया। 
Romans 5:13 क्योंकि व्यवस्था के दिए जाने तक पाप जगत में तो था, परन्तु जहां व्यवस्था नहीं, वहां पाप गिना नहीं जाता। 
Romans 5:14 तौभी आदम से ले कर मूसा तक मृत्यु ने उन लोगों पर भी राज्य किया, जिन्हों ने उस आदम के अपराध की नाईं जो उस आने वाले का चिन्ह है, पाप न किया। 
Romans 5:15 पर जैसा अपराध की दशा है, वैसी अनुग्रह के वरदान की नहीं, क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध से बहुत लोग मरे, तो परमेश्वर का अनुग्रह और उसका जो दान एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के अनुग्रह से हुआ बहुतेरे लागों पर अवश्य ही अधिकाई से हुआ। 
Romans 5:16 और जैसा एक मनुष्य के पाप करने का फल हुआ, वैसा ही दान की दशा नहीं, क्योंकि एक ही के कारण दण्ड की आज्ञा का फैसला हुआ, परन्तु बहुतेरे अपराधों से ऐसा वरदान उत्पन्न हुआ, कि लोग धर्मी ठहरे।
Romans 5:17 क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कराण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे। 
Romans 5:18 इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ। 
Romans 5:19 क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे। 
Romans 5:20 और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। 
Romans 5:21 कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे।

एक साल में बाइबल: 
  • न्यायियों 11-12
  • लूका 6:1-26


रविवार, 28 फ़रवरी 2016

स्त्रोत


   अमेरिका के मिशिगन प्रांत के ऊपरी प्रायद्वीप में एक अद्भुत प्राकृतिक अजूबा है - एक कुण्ड जो लगभग 40 फीट गहरा और 300 फीट चौड़ा है। उस इलाके के मूल निवासी उसे "किच-इटी- किपि" अर्थात "बड़ा ठण्डा पानी" कहते थे। आज यह कुण्ड "बड़ा झरना" कहलाता है। इस कुण्ड का स्त्रोत धरती के अन्दर से चट्टानों में होकर आने वाला पानी है जो 10,000 गैलन प्रति मिनिट की गति से इसमें आता रहता है। इसकी एक और विलक्षण बात है इसका निरन्तर एक समान रहने वाला तापमान - हर ऋतु में इस झरने के जल का तापमान 45 डिग्री फैरन्हाईट ही बना रहता है; इसलिए उस इलाके की भीषण ठण्ड में भी इसका पानी जमता नहीं और सैलानी सारे वर्ष इसका आनन्द ले सकते हैं।

   जब प्रभु यीशु का, सामरिया के एक गाँव में स्थित याकूब के कुएं पर, एक स्त्री से वार्तालाप हुआ तो प्रभु ने उस स्त्री को एक सदा सन्तुष्ट करने वाले जल-स्त्रोत के बारे में बताया। लेकिन यह जल-स्त्रोत कोई झरना, कुण्ड, नदी या तालाब नहीं था, और ना ही कोई सामान्य दिखने वाला जल था। प्रभु यीशु ने उस स्त्री से जीवन के जल की बात करी जो अनन्त जीवन के लिए था: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)।

   किसी भी प्राकृतिक जल के स्त्रोत से मिलने वाली तृप्ति बढ़कर वह तृप्ति है जो प्रभु यीशु मसीह से हमें मिलती है। केवल प्रभु यीशु से मिलने वाले जीवन के जल से ही हमारी अनन्त जीवन की प्यास बुझ सकती है, और ना केवल वह जीवन जल हमारी प्यास बुझाता है वरन हम में होकर औरों तक भी पहुँचता है उनकी भी प्यास बुझाता है। संसार के सभी लोगों के लिए प्रभु यीशु ही जीवन-जल का कभी ना समाप्त होने वाला स्त्रोत है। - बिल क्राउडर


जीवन की प्यास बुझाने का एकमात्र सच्चा स्त्रोत है प्रभु यीशु मसीह।

यीशु ने उन से कहा, जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा। - यूहन्ना 6:35

बाइबल पाठ: यूहन्ना 4:5-14
John 4:5 सो वह सूखार नाम सामरिया के एक नगर तक आया, जो उस भूमि के पास है, जिसे याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दिया था। 
John 4:6 और याकूब का कूआं भी वहीं था; सो यीशु मार्ग का थका हुआ उस कूएं पर यों ही बैठ गया, और यह बात छठे घण्टे के लगभग हुई। 
John 4:7 इतने में एक सामरी स्त्री जल भरने को आई: यीशु ने उस से कहा, मुझे पानी पिला। 
John 4:8 क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गए थे। 
John 4:9 उस सामरी स्त्री ने उस से कहा, तू यहूदी हो कर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते)। 
John 4:10 यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता। 
John 4:11 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया? 
John 4:12 क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिसने हमें यह कूआं दिया; और आप ही अपने सन्तान, और अपने ढोरों समेत उस में से पीया? 
John 4:13 यीशु ने उसको उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा। 
John 4:14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • गिनती 20-22
  • मरकुस 7:1-13


शनिवार, 16 अगस्त 2014

जुड़े हुए


   मेरी पत्नि घर पर अपने लैपटॉप कंप्यूटर पर कार्य कर रही थी; उसका ध्यान लैप्टॉप की बैट्री की दशा दिखाने वाले सूचक पर गया, जो दिखा रहा था कि बैट्री लगभग समाप्त हो चुकी थी और कंप्यूटर अब बस बन्द होने वाला था। उसे यह अटपटा लगा क्योंकि उसने लैपटॉप को बिजली के प्लग से जोड़ा था, इसलिए लैपटॉप को बैट्री पर नहीं घर की बिजली से चलना था। उसने लैपटॉप के तार का मुआयना किया तो पाया कि लैपटॉप का तार एक्स्टेन्शन तार में तो जुड़ा था, पर एक्स्टेन्शन का तार मेन सॉकेट प्लग से जुड़ा हुआ नहीं था, इस कारण लैपटॉप को घर की बिजली से कोई करंट नहीं मिल रहा था और वह बैट्री पर चलते हुए अब बस बन्द होने को था। यह देखकर उसने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और कहा, इसमें कहीं ना कहीं कोई आत्मिक सन्देश छिपा है।

   उसके यह कहने पर मुझे परमेश्वर के वचन बाइबल में यशायाह नबी की पुस्तक से परमेश्वर की सामर्थ के संबंध में एक परिच्छेद स्मरण हो आया: यशायाह 40:27-31। इस परिच्छेद में यशायाह सच्चे और कभी ना समाप्त होने वाले ऊर्जा के स्त्रोत, परमेश्वर के विषय में बताता है, जिसमें से हमें सामर्थ प्राप्त करते रहना है। वह उन से, जिनकी सामर्थ क्षीण होती जा रही है कहता है कि वे परमेश्वर की बाट जोहें, उससे जुड़े रहें जिससे वे नया बल प्राप्त करते जाएं (पद 29-31)।

   प्रभु यीशु ने भी अपने चेलों से दाख की लता का उदाहरण देते हुए कहा कि वे लता की डालियों के समान, लता के तने अर्थात उससे सदा जुड़े रहें जिससे सदा उसकी सामर्थ उनमें प्रवाहित होती रहे (यूहन्ना 15:4-5)। प्रभु यीशु का यह कथन यशायाह द्वारा लिखित उपरोक्त परिच्छेद के अन्तिम भाग के समानन्तर ही है।

   जब कभी हम अपने आप को थका हुआ और व्यथित पाते हैं, तो यह जाँच लेना आवश्यक है कि क्या हम सामर्थ के अपने स्त्रोत से वास्तव में जुड़े हुए हैं कि नहीं। क्योंकि हमारी अपनी सामर्थ तो क्षणिक है, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ कभी समाप्त नहीं होगी, हमारे जीवनों को सदा कार्यकारी बनाए रखेगी। - रैण्डी किलगोर


इस सृष्टि के सृजनहार में सामर्थ की कोई घटी नहीं है।

मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा। - यशायाह 41:10

बाइबल पाठ: यशायाह 40:27-31
Isaiah 40:27 हे याकूब, तू क्यों कहता है, हे इस्राएल तू क्यों बोलता है, मेरा मार्ग यहोवा से छिपा हुआ है, मेरा परमेश्वर मेरे न्याय की कुछ चिन्ता नहीं करता? 
Isaiah 40:28 क्या तुम नहीं जानते? क्या तुम ने नहीं सुना? यहोवा जो सनातन परमेश्वर और पृथ्वी भर का सिरजनहार है, वह न थकता, न श्रमित होता है, उसकी बुद्धि अगम है। 
Isaiah 40:29 वह थके हुए को बल देता है और शक्तिहीन को बहुत सामर्थ देता है। 
Isaiah 40:30 तरूण तो थकते और श्रमित हो जाते हैं, और जवान ठोकर खाकर गिरते हैं; 
Isaiah 40:31 परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे, वे उकाबों की नाईं उड़ेंगे, वे दौड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 61-63


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

स्त्रोत


   मुझे दालचीनी का स्वाद बहुत पसन्द है, इसलिए मैं दालचीनी डालकर बनाए गए सभी व्यनजनों को बहुत चाहता हूँ और बड़े आनन्द से खाता हूँ। दालचीनी एक ऐसा मसाला है जो दूसरी वस्तुओं के स्वाद को बेहतर बना देता है। लेकिन इतने वर्षों से दालचीनी डालकर बनाए गए कितने ही व्यनजनों को खाते रहने के बाद भी कभी मैंने यह नहीं सोचा था कि दालचीनी का स्त्रोत कहाँ है। हाल ही में मुझे श्री लंका की अपनी यात्रा के दौरान पता चला कि सारे संसार में उपलब्ध दालचीनी में से 90% श्री लंका से आती है। इतने वर्षों से दालचीनी के स्वाद का आनन्द लेते रहने के बावजूद मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि मेरे उस पसन्दीदा स्वाद का स्त्रोत क्या है!

   अफसोस की बात यह है कि मेरी मसीही जीवन की यात्रा में भी मैं कभी कभी यही रवैया लागू कर लेता हूँ। परमेश्वर ने मुझे बहुत अच्छी पत्नि, पाँच बच्चे और ढेरों नाती-पोते दिए हैं, जो सब मेरे लिए अत्याधिक आनन्द का कारण हैं। उनके बीच में आनन्दित रहते हुए मैं कभी कभी अपने इस आनन्द और अपनी आशीषों के स्त्रोत को भूल जाता हूँ जिसके लिए याकूब ने लिखा: "क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिस में न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, ओर न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है" (याकूब 1:17)।

   यदि हम अपने उस स्वर्गीय परमेश्वर पिता के प्रति, जो समस्त सृष्टि और हमारे जीवन का स्त्रोत है, हर बात के लिए धन्यवादी ना बने रहें तो हम कैसे स्वार्थी और कृत्घन ठहरेंगे। परमेश्वर ने अपनी आशीषें हमारे जीवन में बहुतायत से उंडेली हैं, आईए हम भी अपने हृदय और अपना जीवन धन्यवाद के साथ उसे अर्पित कर दें। - बिल क्राउडर


परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होना परमेश्वर को आदर देना है।

क्योंकि यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है; यहोवा अनुग्रह करेगा, और महिमा देगा; और जो लोग खरी चाल चलते हैं; उन से वह कोई अच्छा पदार्थ रख न छोड़ेगा। - भजन 84:11

बाइबल पाठ: याकूब 1:12-18
James 1:12 धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है; क्योंकि वह खरा निकल कर जीवन का वह मुकुट पाएगा, जिस की प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है। 
James 1:13 जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे, कि मेरी परीक्षा परमेश्वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है। 
James 1:14 परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा में खिंच कर, और फंस कर परीक्षा में पड़ता है। 
James 1:15 फिर अभिलाषा गर्भवती हो कर पाप को जनती है और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है। 
James 1:16 हे मेरे प्रिय भाइयों, धोखा न खाओ। 
James 1:17 क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिस में न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, ओर न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है। 
James 1:18 उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, ताकि हम उस की सृष्‍टि की हुई वस्‍तुओं में से एक प्रकार के प्रथम फल हों।

एक साल में बाइबल: 
  • गिनती 4-6


गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

प्रभाव का स्त्रोत


   प्रति वर्ष कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में असाधारण कार्य और छोड़े गए प्रभाव के लिए लोगों को नोबल पुरस्कार दिया जाता है। अर्थ शास्त्र, भौतिक विज्ञान, साहित्य, चिकित्सा, शांति के क्षेत्रों में अभूतपूर्व योगदान के लिए इन क्षेत्रों में कार्य कर रहे प्रतिभाशाली व्यक्तियों को इस परस्कार द्वारा मान्यता दी जाती है। यह पुरस्कार इस बात का सूचक है कि उस व्यक्ति ने अपने कार्य क्षेत्र में वर्षों के प्रशिक्षण, प्रयास, शिक्षा और त्याग द्वारा श्रेष्ठता की एक मिसाल कायम करी है - ये बातें उसके जीवन का वह निवेश रही हैं, जिनके कारण वह अपनी एक अनुपम छाप समाज पर छोड़ सका; ये उसके प्रभाव का स्त्रोत हैं।

   आत्मिक रीति से भी लोग समाज पर विलक्षण प्रभाव छोड़ते हैं; उन्हें देखकर हम भी विचार कर सकते हैं कि उनकी आत्मिक सेवा और प्रभाव का स्त्रोत क्या है? कैसे हम भी आत्मिक रूप से उनके समान प्रभावी हो सक्ते हैं? प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए यह व्यक्तिगत रीति से गंभीरता के साथ विचार करने की बात है कि यदि हमें अपने उद्धारकर्ता मसीह यीशु के लिए प्रभावी होना है, तो हमारा निवेश किन बातों में होना चाहिए?

   प्रभु यीशु के आरंभिक अनुयायी प्रभु यीशु के साथ समय बिताने के द्वारा प्रभावी हुए। जब प्रभु ने अपने बारह चेले चुने, तो उन चेलों के लिए प्रभु का उद्देश्य था कि वे उसके साथ रहें और उसके लिए उपलब्ध रहें "फिर वह पहाड़ पर चढ़ गया, और जिन्‍हें वह चाहता था उन्‍हें अपने पास बुलाया; और वे उसके पास चले आए। तब उस ने बारह पुरूषों को नियुक्त किया, कि वे उसके साथ साथ रहें, और वह उन्‍हें भेजे, कि प्रचार करें"(मरकुस ३:१३-१४)। आगे चलकर उन चेलों की सेवकाई से इस्त्राएल के धार्मिक अगुवे इस बात को पहचान गए: "जब उन्‍होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं" (प्रेरितों ४:१३)।

   प्रभु यीशु की सेवकाई में प्रशिक्षण और ज्ञान का महत्व अवश्य है, किंतु प्रभु यीशु के साथ बिताए गए समय का कोई विकल्प नहीं है। हमारा कोई ज्ञान, कोई प्रशिक्षण प्रभु यीशु से, उसके साथ बिताए गए समय द्वारा, मिलने वाली सामर्थ और योग्यता का स्थान नहीं ले सकता; और यही सामर्थ तथा योग्यता हमें प्रभु यीशु के लिए प्रभावी कर सकती है। प्रेरितों के कार्य से लिए गए ऊपर उद्वत पद में स्पष्ट है कि उस घटना के समय प्रभु यीशु के चेले पतरस और युहन्ना अनपढ़ और साधारण मनुष्य ही थे, ठीक वैसे ही जैसे वे प्रभु से मिली अपनी बुलाहट के समय थे। किंतु प्रभु यीशु के साथ रहने से अब उनमें एक ऐसी विलक्षण सामर्थ तथा योग्यता आ गई थी जिसके सामने इस्त्राएली समाज के वे प्रशिक्षित और ज्ञानवान धार्मिक अगुवे टिक नहीं सके।

   यदि मसीह यीशु के लिए इस संसार में प्रभावी होना है तो परमेश्वर के जीवते वचन मसीह यीशु (यूहन्ना १:१-२) के साथ समय बिताना आरंभ कीजिए। जितना समय आप उसके साथ बिताएंगे, आप उतने ही प्रभावी होने पाएंगे, क्योंकि परमेश्वर का जीवता वचन मसीह यीशु ही हमारे प्रभावी होने का स्त्रोत है। परमेश्वर के वचन के अध्ययन और मनन में अधिक से अधिक समय बिताएं, प्रभाव संसार को अपने आप ही दिखने लगेंगे। - बिल क्राउडर


जीवन में प्रभावी होने के लिए जीवन के स्त्रोत मसीह यीशु के साथ समय व्यतीत करें।

जब उन्‍होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं। - प्रेरितों ४:१३

बाइबल पाठ: यूहन्ना १५:१-८
Joh 15:1 सच्‍ची दाखलता मैं हूं; और मेरा पिता किसान है। 
Joh 15:2  जो डाली मुझ में है, और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छांटता है ताकि और फले। 
Joh 15:3  तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो। 
Joh 15:4  तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। 
Joh 15:5 मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्‍योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। 
Joh 15:6 यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली की नाई फेंक दिया जाता, और सूख जाता है, और लोग उन्‍हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं। 
Joh 15:7  यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा। 
Joh 15:8  मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे १२-१४ 
  • प्रकाशितवाक्य ४

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

स्त्रोत

इंगलैंड के ब्रिस्टॉल शहर में जौर्ज म्यूलर २००० बच्चों के लिये अनाथालय चलाते थे। एक शाम, यह जानकर कि बच्चों के प्रातः के नाशते तक के लिये अनाथालय में भोजन सामग्री नहीं बची है, उन्होंने अपने सहकर्मियों को बुलाया, और उन्हें स्थिति से अवगत कराया। उसके बाद वे सब प्रार्थना करने बैठे। जब दो, तीन जन प्रार्थना कर चुके तो जौर्ज म्यूलर ने कहा कि "इतना काफी है, अब आईये उठकर प्रार्थना का उत्तर देने के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करें"; इसके बाद वे सब अपने अपने स्थानों को विश्राम के लिये चले गये। प्रातः होने पर जब उन्होंने अनाथालय का प्रवेश द्वार खोलने का प्रयास किया तो किसी चीज़ के दबाव के कारण वे उसे खोलने नहीं पाये। कारण जांचने के लिये वे पिछले दरवाज़े से बाहर निकले और अनाथालय का चक्कर लगा कर प्रवेश द्वार पर पहुंचे और कारण देखा - भोजन से भरे हुए कई टोकरे जो द्वार से सटाकर रखे गए थे, जिससे द्वार खुल नहीं पा रहा था। बाद में अनाथालय के एक कार्यकर्ता ने कहा, "हम यह तो जानते हैं कि यह सब भोजन किसने भेजा, बस यह नहीं जानते कि यहां तक लेकर कौन आया।"

यदि हम मसीही विश्वासी अपने जीवन में होने वाली अनपेक्षित घटनाओं के पीछे चलने वाली प्रक्रिया को देख सकते तो पाते कि सब कुछ परमेश्वर द्वारा अद्भुत रीति से नियंत्रित और संचालित है। वह अपने प्रत्येक सन्तान की प्रत्येक आवश्यक्ता को जानता भी है और उसे पूरा करने का इंतज़ाम भी करता है। परमेश्वर कई प्रकार के सन्देशवाहक और साधन अपनी आशीशें अपने बच्चों तक पहुंचाने के लिये प्रयोग करता है। चाहे हम उसके छिपे हुए हाथ को कार्य करते नहीं देख पाते, लेकिन वह सदा हमारे लिये कार्यरत रहता है। कभी कभी हमें लगता है कि हम अपने संसाधनों के बिल्कुल अंत पर आ गये हैं, परन्तु आश्वस्त रहिये, आप का स्वर्गीय पिता स्थिति को भली भांति जानता है, और यह भी कि आपको कब किस चीज़ की आवश्यक्ता है।

जब हम स्त्रोत को जानते हैं और उस पर विश्वास रखते हैं, तो हमें उसके द्वारा उपलब्ध कराने के माध्यम, विधि और समय के लिये चिंतित या विचिलित होने की आवश्यक्ता नहीं है। हमारा दिव्य स्त्रोत ही हमारे मसीही विश्वासी जीवन में शांति और सन्तुष्टि का कारण है। - पौल वैन गौर्डर


परमेश्वर अकसर अपनी सहायता मनुष्यों द्वारा ही उपलब्ध कराता है।

...और तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्‍तुएं चाहिएं। - मत्ती ६:३२


बाइबल पाठ: मत्ती ६:२४-३४

कोई मनुष्य दो स्‍वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्‍योंकि वह एक से बैर ओर दूसरे से प्रेम रखेगा, वा एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्‍छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनो की सेवा नहीं कर सकते।
इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्‍ता न करना कि हम क्‍या खाएंगे और क्‍या पीएंगे और न अपने शरीर के लिये कि क्‍या पहिनेंगे? क्‍या प्राण भोजन से, और शरीर वस्‍त्र से बढ़कर नहीं?
आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता उन को खिलाता है, क्‍या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते?
तुम में कौन है, जो चिन्‍ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?
और वस्‍त्र के लिये क्‍यों चिन्‍ता करते हो? जंगली सोसनों पर ध्यान करो, कि वै कैसे बढ़ते हैं, वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं।
तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे वैभव में उन में से किसी के समान वस्‍त्र पहिने हुए न था।
इसलिये जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्‍त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्‍योंकर न पहिनाएगा?
इसलिये तुम चिन्‍ता करके यह न कहना, कि हम क्‍या खाएंगे, या क्‍या पीएंगे, या क्‍या पहिनेंगे?
क्‍योंकि अन्यजाति इन सब वस्‍तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्‍तुएं चाहिएं।
इसलिये पहिले तुम उसके राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्‍तुएं तुम्हें मिल जाएंगी।
सो कल के लिये चिन्‍ता न करो, क्‍योकि कल का दिन अपनी चिन्‍ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुख बहुत है।

एक साल में बाइबल:
  • लैव्यवस्था ११-१२
  • मत्ती २६:१-२५