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मंगलवार, 6 जून 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 28 - Touching Feet / पैरों को छूना

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क्या मसीही विश्वासियों के लिए बड़ों के पैर छूना उचित है?
किसी आयु में बड़े या वृद्ध व्यक्ति के पैरों को झुक कर हाथ लगाना उसे आदर प्रदान करने का सूचक माना जाता है। कभी-कभी किसी आदरणीय या महान समझे जाने वाले पुरुष के सम्मुख झुकना, उसकी वंदना करने के समान या उसे आराध्य समझने के समान भी माना जा सकता है। झुक कर पैरों को हाथ लगाने में ये दोनों ही अभिप्राय भी सम्मिलित हो सकते हैं। यह करने के द्वारा हाथ लगाने वाला, जिसके पैरों को हाथ लगाया जा रहा है, उसे यह जताता है कि मैं आपकी आयु और आपके अनुभव, आपके दर्जे/स्तर, आपके गुणों, आदि का आदर करता हूँ; आपके सामने मैं आपके पैरों की धूल के समान हूँ, और मुझे आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है।

किन्तु वास्तविकता यही है कि हर वह मनुष्य जिसके पाँव छुए जाते हैं वास्तव में सच्चा, खरा, आदर्श, अनुसरण करने योग्य, और बहुधा किसी आदर के योग्य भी नहीं होता है। सामान्यतः, पैरों को छूना उस व्यक्ति के गुणों के लिए नहीं, एक प्रथा निभाने के लिए लिए किया जाता है; और यदि न किया जाए तो जिसे इसकी आशा होती है वह बुरा भी मान जाता है, क्रोधित भी हो जाता है। बहुत बार जो दूसरे के पैर छू रहा होता है, वह मन ही मन उसे उसके चरित्र, व्यवहार, दुष्कर्मों आदि किसी बात के लिए भला-बुरा भी कह रहा होता है। सामान्यतः लोग पैरों को छूने की बजाए, लोग थोड़ा सा झुककर और पैरों की तरफ थोड़ा सा हाथ बढ़ाकर, अपनी ओर से इसे औपचारिकता के रूप में पूरा कर लेते हैं; उनके मन में उस व्यक्ति के प्रति सच्चा आदर नहीं होता है, वे बस प्रथा निभाने भर के लिए इसका संकेत भर कर देते हैं। अर्थात, वर्तमान समाज और व्यवहार में पैर छूना शायद ही कभी वास्तव में आदर देने और उचित कारण से होता है; अधिकांशतः तो यह बिना किसी वास्तविक या उपयुक्त एवं उचित भावना के, मात्र एक औपचारिकता अथवा प्रथा के निर्वाह के लिए किया जाता है

यह प्रथा मसीही विश्वासियों में नहीं देखी जाती है, क्योंकि परमेश्वर के वचन – बाइबल में किसी भी मनुष्य को वन्दना अथवा आराध्य समझना या मानना वर्जित है, और बाइबल के स्पष्ट उदाहरण हैं कि सृजे हुओं ने अन्य सृजे हुओं से वंदना या आराधना के भाव में नमन को अस्वीकार किया, ऐसा करने के लिए मना किया (प्रेरितों 10:25-26; 14:14-15; प्रकाशितवाक्य 19:10; 22:8-9)। पैर छूने की यह अपेक्षा उनमें ही देखी जाती है जो मसीही विश्वासी नहीं हैं।

एक मसीही विश्वासी, पापों से किए गए पश्चाताप प्रभु यीशु मसीह द्वारा कलवरी के क्रूस पर किए गए कार्य के आधार पर प्रभु के नाम में मांगी गई पापों से क्षमा, और प्रभु परमेश्वर को जीवन समर्पण के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह से परमेश्वर की संतान है (यूहन्ना 1:12-13), उसकी देह पवित्र आत्मा का, जो उसमें निवास करता है, मंदिर है (1 कुरिन्थियों 6:19), वह अन्य विश्वासियों के साथ मिलकर परमेश्वर का निवास स्थान बनाया जा रहा है (इफिसियों 2:21-22), प्रभु यीशु मसीह के स्वरूप में ढाला जा रहा है (रोमियों 8:29; 2 कुरिन्थियों 3:18), और संपूर्ण विश्वव्यापी कलीसिया के एक अंग के रूप में प्रभु यीशु मसीह की दुल्हन (इफिसियों 5:25-27), मसीह यीशु का संगी वारिस (रोमियों 8:16-17), और प्रभु यीशु मसीह की ओर से जगत के मार्गदर्शन के लिए ज्योति (मत्ती 5:14) है।

इसकी तुलना में, प्रत्येक मनुष्य पाप स्वभाव के साथ जन्म लेता है (भजन 51:5) और जीवन भर पाप करता रहता है (1 यूहन्ना 1:8, 10); परमेश्वर के सम्मुख मनुष्य की बुद्धिमत्ता भी मूर्खता है (1 कुरिन्थियों 1:25-27); किसी भी मनुष्य के मन में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती है (यिर्मयाह 17:9; मरकुस 7:20-23); मनुष्य की सभी कल्पनाएं बुरी ही होती हैं (सभोपदेशक 9:3, अय्यूब 15:14-16); और उसमें से कोई भली वस्तु नहीं आ सकती है (अय्यूब 14:4); मनुष्य अपने स्वभाव से परमेश्वर के प्रतिकूल रहने वाला है (रोमियों 8:7); मनुष्य नश्वर है (याकूब 4:14); और मनुष्य शारिरिक दशा में कदापि अविनाशी नहीं हो सकता है (1 कुरिन्थियों 15:50)।

मनुष्य के विषय बाइबल में लिखी उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अब, इस सामान्यतः कहे जाने वाले वाक्य, "मसीही विश्वासी के लिए झुक कर किसी के पैर छूने में कुछ अनुचित अथवा असंगत नहीं है, यह करना केवल आदर प्रदान करने का सूचक है, और कुछ नहीं" को लीजिए, और इसमें कुछ शब्दों के स्थान पर उनके तात्पर्यों को रख कर उसका भावार्थ देखिए कि उसका क्या अर्थ निकलता है इस वाक्य में 'मसीही विश्वासी' के स्थान पर मसीही विश्वासी के उपरोक्त गुण – "परमेश्वर की संतान, पवित्र आत्मा के मंदिर...", 'किसी के पैर' के स्थान पर उस शारीरिक मनुष्य की वास्तविक दशा और गुण – "पापी, बुराई से भरा हुआ, नश्वर...", तथा 'पैर छूने' के स्थान पर उसके अभिप्राय, "मैं आपकी आयु और आपके अनुभव, आपके दर्जे/स्तर, आपके गुणों, आदि का आदर करता हूँ; आपके सामने मैं आपके पैरों की धूल के समान हूँ, और मुझे आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है" को रखकर इस वाक्य का निर्माण करके उसे देखिए, उसकी वास्तविकता को समझिए।

ऐसा करने पर इस वाक्य का स्वरूप कुछ इस प्रकार हो जाएगा : "[मसीही विश्वासी] ‘परमेश्वर की संतान, पवित्र आत्मा के मंदिर, परमेश्वर के निवास स्थान, प्रभु यीशु मसीह के स्वरूप समान, प्रभु यीशु मसीह की दुल्हन, मसीह के संगी वारिस, जगत के मार्गदर्शन के लिए प्रभु यीशु की ज्योति के लिए झुक कर [किसी के] पाप स्वभाव के साथ जन्मे, पाप करते रहने वाले, परमेश्वर के सम्मुख निर्बुद्धि, मन में भली बातों से रहित, जिसकी सभी कल्पनाएं बुरी ही होती हैं, और जिसमें से कोई भली वस्तु नहीं आ सकती है, ऐसा नश्वर मनुष्य, जो स्वभाव से परमेश्वर के प्रतिकूल रहने वाला है’ [के पैर छूने] ‘को यह जताने में कि मैं आपकी आयु और आपके अनुभव, आपके दर्जे/स्तर, आपके गुणों, आदि का आदर करता हूँ; आपके सामने मैं आपके पैरों की धूल के समान हूँ, और मुझे आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है में कुछ अनुचित अथवा असंगत नहीं है, यह केवल आदर का सूचक है, और कुछ नहीं।" इस आधार पर निर्णय कीजिए कि क्या इस विवरण के साथ इसी बात को कहने पर क्या वह अब भी पहले जैसी उचित और सुसंगत प्रतीत होती है?

अब इस पर विचार कीजिए कि क्या ऐसे व्यक्ति के लिए, जो परमेश्वर की सन्तान, परमेश्वर पवित्र-आत्मा का मंदिर प्रभु यीशु मसीह के स्वरूप में ढलता जा रहा है और सँसार के सम्मुख मसीह यीशु की ज्योति को प्रकट करने के लिए रखा गया है, एक ऐसे व्यक्ति के सम्मुख यह अभिप्राय देना उचित होगा जो पाप स्वभाव के साथ है, नश्वर है, परमेश्वर की बुद्धिमता से विहीन है, जो स्वभाव से परमेश्वर के प्रतिकूल है, कि मुझे आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है क्योंकि मैं आपके सम्मुख आपके पैर की धूल के समान हूँ!

उत्तर स्वतः ही प्रगट है कि मसीही विश्वासी की आत्मिक वास्तविकता और परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान की गई हस्ती और स्तर के आधार पर, उसके लिए किसी मनुष्य के सामने झुककर उसके पैर छूना, उसके अभिप्रायों के आधार पर, उचित नहीं है।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

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Is it appropriate for a Christian Believer touch the feet of elders?
Stooping or bowing to touch the feet of an elder is considered an act of giving honor to the elder. To bow before a person considered honorablecan also be considered as venerating him or considering him worthy of veneration. Generally speaking, in bowing to touch the feet of a person, both of these are implied. By doing so the person touching the feetis conveying to the person whose feet are being touched, that I respect and honor your age, experience, status, qualities and attributes etc. and consider myself as the dust of your feet, and I need your blessings.

But the reality is that every person, whose feet are touched, is not actually true, honest, ideal, worthy of emulation, and often is not worthy of any honor. Usually, touching of feet is done not for any person's qualities, but to fulfill a tradition; and if it is not done then the one expecting this feels offended, and may even react angrily. Many times, the person who is touching another's feet, in his heart he is cursing the person whose feet he is touching for that person's character, behavior, bad things done by him, etc. Very commonly, people instead of actually touching the feet, often just bend a bit and slightly reach out towards the other person's feet, and thus fulfill the formality from their end; they have no true honor or respect for the other person, they do this merely to fulfill a tradition. In other words, in the present society and behavior, touching of feet is very rarely to give honor or for any other genuine reason; most often this is done without any appropriate or worthy feeling or really meaning it, rather it is usually done to either fulfill a formality or a tradition. 

This practice is not seen amongst Christian Believers since the Word of God – the Bible forbids any man from being considered as venerableand there are clear examples in the Bible where created beings have refused to accept veneration from other created beings(Acts 10:25-26; 14:14-15; Revelation 19:10; 22:8-9). Usually this expectation of touching of feet is seen in those who are not Christian Believers.

A Christian Believerby repenting of his sins and having received the forgiveness of sins on the basis of the accomplished work on the Cross of Calvary by the Lord Jesusand having submitted his life to the Lord, is by the grace of God a child of God (John 1:12-13), his body is the temple of the Holy Spirit who resides in him (1 Corinthians 6:19), he is being built up into a dwelling place for God along with other Christian Believers (Ephesians 2:21-22), he is being changed into the likeness of the Lord Jesus Christ (Romans 8:29; 2 Corinthians 3:18), and as a member of His Worldwide Church is a Bride of Christ (Ephesians 5:25-27), is a joint heir with Christ Jesus (Romans 8:16-17), and is a light to the world on behalf of the Lord Jesus (Matthew 5:14).

In contrast to thisman is born with sin nature (Psalms 51:5and continues to sin (1 John 1:8, 10), before God his wisdom is foolishness (1 Corinthians 1:25-27), nothing good resides in him (Jeremiah 17:9; Mark 7:20-23), all his imaginations are evil (Ecclesiastes 9:3, Job 15:14-16), and nothing good can come out of him (Job 14:4), and by his very nature is contrary to God (Romans 8:7); man is temporal (James 4:14), and cannot inherit eternity in his state of flesh (1 Corinthians 15:50).

Keeping in mind the various characteristics of man, nowin this sentence, " There is nothing wrong or improper in a Christian Believer bowing to touch the feet of someone, doing this is only a sign of giving honor or respect, nothing more" make some substitutions to see how after the paraphrasing it actually comes out to be. In place of ‘Christian Believer’ put in the afore mentioned attributes of a Christian Believer – "child of Godtemple of the Holy Spirit...", in place of “someone” put in the state and attributes of a carnal man – "sinnerfull of evilmortal...", and in place of “touch the feet” put in its implications, "I respect and honor your age, experience, status, qualities and attributes etc. and consider myself as the dust of your feet, and I need your blessingsand thus reconstruct the sentence.

On doing so the form of this sentence will be something like this : "For a [Christian Believer] child of Godtemple of the Holy Spiritdwelling place of Godlikeness of the Lord JesusBride of Christjoint-heir with Christlight of the Lord for the guidance of the world to bow down to a [personsinnera fool before Goddevoid of anything good withinall of whose imaginations are evilwho cannot bring forth anything gooda mortal manwho by his very nature stays contrary to God’ and to imply [touch his feet] that I respect and honor your age, experience, status, qualities and attributes etc. and consider myself as the dust of your feet, and I need your blessings there is nothing wrong or improperit is only a sign of respect, ।nothing more.On the basis of constructing the sentence in this manner now decide, does it still sound proper and appropriate as before?

Now think it over whether for a person who isa child of Goda temple of the Holy Spirit, is being conformed to the likeness of Lord Jesus Christ, and has been placed before the world as to reveal the light of the Lord Jesuswould it be appropriate for him to imply to a person having a sin natureis mortalis devoid of God’s wisdomand by nature is contrary to Godthat I need your blessings because I am like the dust of your feet!

The answer is self-evident, that for a Christian Believer, by virtue of the reality of his spiritual state and the status and position bestowed upon him by God, it is inappropriate for him to bow before a person and touch his feet, for what this act implies.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

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रविवार, 5 अप्रैल 2020

कौन है?



     कल्पना कीजिए, आप धूल भरे रास्ते के किनारे अनेकों लोगों के साथ खड़े हैं; लोग जानने के लिए उत्सुक्त, ताक रहे हैं, उचक-उचक कर देख रहे हैं कि कौन आ रहा है। लोगों को दूर कोई गदहे पर सवार हो कर आता हुआ दिखाई देता है। जैसे जैसे वह निकट आता जाता है, लोग अपने वस्त्र उसके आगे मार्ग पर बिछाते हैं, कोई पेड़ों से डालियाँ काटकर उसके मार्ग पर बिछाता है, तो कोई खजूर की डालियाँ काटकर बिछाता है। उसके आदर और स्तुति में लोग चिल्ला रहे हैं, परमेश्वर की बड़ाई कर रहे हैं।

     उनके क्रूस पर चढ़ाए जाने से कुछ दिन पहले, उनके अनुयायियों ने प्रभु यीशु का यरूशलेम में बड़े सम्मान के साथ स्वागत किया। वे आनंदित थे और परमेश्वर की स्तुति कर रहे थे, “...चेलों की सारी मण्‍डली उन सब सामर्थ के कामों के कारण जो उन्होंने देखे थे, आनन्‍दित हो कर बड़े शब्द से परमेश्वर की स्‍तुति करने लगी” (लूका 19:37)। प्रभु यीशु के भक्त उसके चारों और एकत्रित थे और कह रहे थे, “कि धन्य है वह राजा, जो प्रभु के नाम से आता है; स्वर्ग में शान्‍ति और आकाश मण्‍डल में महिमा हो” (पद 38)। उनके द्वारा किया जा रहा यह आदर और सम्मान यरूशलेम के लोगों को प्रभावित कर रहा था, और “जब उसने यरूशलेम में प्रवेश किया, तो सारे नगर में हलचल मच गई; और लोग कहने लगे, यह कौन है?” (मत्ती 21:10)।

     आज भी लोग प्रभु यीशु के बारे में जानने को जिज्ञासु हैं की वह कौन है। आज हम उनके मार्ग पर अपने वस्त्रों, पेड़ों तथा खजूर की डालियों को नहीं बिछा सकते हैं, परन्तु हम लोगों के सामने प्रभु का आदर और सम्मान, उनका बखान और गुणगान, आज भी कर सकते हैं। हम लोगों के साथ उनके अद्भुत कार्यों की चर्चा कर सकते हैं; प्रभु के समान ज़रूरतमंदों की सहायता के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, धैर्य के साथ आलोचना और बुराई को सहते हुए लोगों का भला कर सकते हैं; और प्रभु के समान प्रेम के द्वारा लोगों के सामने मसीही विश्वास के जीवन की एक गवाही रख सकते हैं। और तब, जब लोग आकर्षित होकर पूछेंगे, तो हम उन्हें बता सकते हैं कि प्रभु यीशु कौन है! – जेनिफर बेनसन शुल्ट

जब हम उसकी संतान के समान जीवन व्यतीत करते है, 
हम प्रभु परमेश्वर को आदर और सम्मान देते हैं।

पर मसीह को प्रभु जान कर अपने अपने मन में पवित्र समझो, और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ। - 1 पतरस 3:15

बाइबल पाठ: लूका 19:28-40
लूका 19:28 ये बातें कहकर वह यरूशलेम की ओर उन के आगे आगे चला।
लूका 19:29 और जब वह जैतून नाम पहाड़ पर बैतफगे और बैतनियाह के पास पहुंचा, तो उसने अपने चेलों में से दो को यह कहके भेजा।
लूका 19:30 कि साम्हने के गांव में जाओ, और उस में पहुंचते ही एक गदही का बच्‍चा जिस पर कभी कोई सवार नहीं हुआ, बन्‍धा हुआ तुम्हें मिलेगा, उसे खोल कर लाओ।
लूका 19:31 और यदि कोई तुम से पूछे, कि क्यों खोलते हो, तो यह कह देना, कि प्रभु को इस का प्रयोजन है।
लूका 19:32 जो भेजे गए थे; उन्होंने जा कर जैसा उसने उन से कहा था, वैसा ही पाया।
लूका 19:33 जब वे गदहे के बच्‍चे को खोल रहे थे, तो उसके मालिकों ने उन से पूछा; इस बच्‍चे को क्यों खोलते हो?
लूका 19:34 उन्होंने कहा, प्रभु को इस का प्रयोजन है।
लूका 19:35 वे उसको यीशु के पास ले आए और अपने कपड़े उस बच्‍चे पर डालकर यीशु को उस पर सवार किया।
लूका 19:36 जब वह जा रहा था, तो वे अपने कपड़े मार्ग में बिछाते जाते थे।
लूका 19:37 और निकट आते हुए जब वह जैतून पहाड़ की ढलान पर पहुंचा, तो चेलों की सारी मण्‍डली उन सब सामर्थ के कामों के कारण जो उन्होंने देखे थे, आनन्‍दित हो कर बड़े शब्द से परमेश्वर की स्‍तुति करने लगी।
लूका 19:38 कि धन्य है वह राजा, जो प्रभु के नाम से आता है; स्वर्ग में शान्‍ति और आकाश मण्‍डल में महिमा हो।
लूका 19:39 तब भीड़ में से कितने फरीसी उस से कहने लगे, हे गुरू अपने चेलों को डांट।
लूका 19:40 उसने उत्तर दिया, कि तुम से कहता हूं, यदि ये चुप रहें, तो पत्थर चिल्ला उठेंगे।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 शमुएल 1-3
  • लूका 8:26-56



मंगलवार, 12 नवंबर 2019

उपहार



      हाल ही में मेरे पति ने अपना महत्वपूर्ण जन्मदिन मनाया, ऐसा जिसके अंत में शून्य आता है। इस महत्वपूर्ण अवसर पर उन्हें सम्मान देने के सबसे उत्तम तरीके के बारे में मैंने बहुत विचार किया। मैंने अपने विचारों के बारे में अपने बच्चों के साथ भी चर्चा की, जिससे मैं सर्वोत्तम विचार पर पहुँच सकूँ। मैं चाहती थी कि हमारा उत्सव उनके जीवन के उस नए दशक के महत्व को दिखाए और इसे भी कि हमारे परिवार के लिए वे कितने महत्वपूर्ण हैं। मैं चाहती थी कि हमारा उन्हें दिया जाने वाला उपहार उनके जीवन के इस महत्वपूर्ण अवसर के महत्त्व के अनुरूप हो।

      परमेश्वर के वचन बाइबल में राजा सुलैमान भी परमेश्वर को एक बहुत महान भेंट अर्पित करना चाहता था, जो किसी भी अन्य भेंट से बढ़कर हो। उसकी इच्छा थी कि जो मंदिर वह बनवा रहा था वह उसमें परमेश्वर की उपस्थिति के योग्य हो। उस मंदिर के निर्माण में लगने वाले सामान के लिए उसने सोर के राजा को सन्देश भेजा। अपने सन्देश में सुलैमान ने बताया की मंदिर भव्य होगा क्योंकि “हमारा परमेश्वर सब देवताओं में महान है” (2 इतिहास 2:5)। उसने यह माना की परमेश्वर की महानता और भलाई उस सब से कहीं अधिक बढ़कर है जो मनुष्य अपने हाथों से बना कर दे सकता है, परन्तु फिर भी परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम और भक्ति के अंतर्गत उसने मंदिर बनाने के कार्य को आरंभ कर दिया।

      निःसंदेह हमारा परमेश्वर सब देवताओं में महान है। उसने हमारे जीवनों में अद्भुत कार्य किए हैं, जिससे हमारे हृदय उसे प्रेम के बहुमूल्य उपहार अर्पित करने के लिए प्रेरित होते हैं, चाहे उनका भौतिक मूल्य जो भी हो। सुलैमान जानता था कि उसके उपहार की कीमत कभी भी परमेश्वर के तुल्य नहीं हो सकेगी, परन्तु फिर भी उसने आनन्द के साथ अपने उपहार को परमेश्वर के सम्मुख अर्पित किया; परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बने रहकर हम भी ऐसा ही कर सकते हैं। - कर्स्टिन होल्म्बर्ग

परमेश्वर को जो सबसे मूल्यवान उपहार हम अर्पित कर सकते हैं, 
वह उसके प्रति सप्रेम आज्ञाकारिता है।

शमूएल ने कहा, क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है? सुन मानना तो बलि चढ़ाने और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। - 1 शमूएल 15:22

बाइबल पाठ: 2 इतिहास 2:1-10
2 Chronicles 2:1 और सुलैमान ने यहोवा के नाम का एक भवन और अपना राजभवन बनाने का विचार किया।
2 Chronicles 2:2 इसलिये सुलैमान ने सत्तर हजार बोझिये और अस्सी हजार पहाड़ से पत्थर काटने वाले और वृक्ष काटने वाले, और इन पर तीन हजार छ: सौ मुखिये गिनती कर के ठहराए।
2 Chronicles 2:3 तब सुलैमान ने सोर के राजा हूराम के पास कहला भेजा, कि जैसा तू ने मेरे पिता दाऊद से बर्त्ताव किया, अर्थात उसके रहने का भवन बनाने को देवदार भेजे थे, वैसा ही अब मुझ से भी बर्त्ताव कर।
2 Chronicles 2:4 देख, मैं अपने परमेश्वर यहोवा के नाम का एक भवन बनाने पर हूँ, कि उसे उसके लिये पवित्र करूं और उसके सम्मुख सुगन्धित धूप जलाऊं, और नित्य भेंट की रोटी उस में रखी जाए; और प्रतिदिन सबेरे और सांझ को, और विश्राम और नये चांद के दिनों में और हमारे परमेश्वर यहोवा के सब नियत पर्ब्बों में होमबलि चढ़ाया जाए। इस्राएल के लिये ऐसी ही सदा की विधि है।
2 Chronicles 2:5 और जो भवन मैं बनाने पर हूं, वह महान होगा; क्योंकि हमारा परमेश्वर सब देवताओं में महान है।
2 Chronicles 2:6 परन्तु किस की इतनी शक्ति है, कि उसके लिये भवन बनाए, वह तो स्वर्ग में वरन सब से ऊंचे स्वर्ग में भी नहीं समाता? मैं क्या हूँ कि उसके साम्हने धूप जलाने को छोड़ और किसी मनसा से उसका भवन बनाऊं?
2 Chronicles 2:7 सो अब तू मेरे पास एक ऐसा मनुष्य भेज दे, जो सोने, चान्दी, पीतल, लोहे और बैंजनी, लाल और नीले कपड़े की कारीगरी में निपुण हो और नक्काशी भी जानता हो, कि वह मेरे पिता दाऊद के ठहराए हुए निपुण मनुष्यों के साथ हो कर जो मेरे पास यहूदा और यरूशलेम में रहते हैं, काम करे।
2 Chronicles 2:8 फिर लबानोन से मेरे पास देवदार, सनोवर और चंदन की लकड़ी भेजना, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तेरे दास लबानोन में वृक्ष काटना जानते हैं, और तेरे दासों के संग मेरे दास भी रहकर,
2 Chronicles 2:9 मेरे लिये बहुत सी लकड़ी तैयार करेंगे, क्योंकि जो भवन मैं बनाना चाहता हूँ, वह बड़ा और अचम्भे के योग्य होगा।
2 Chronicles 2:10 और तेरे दास जो लकड़ी काटेंगे, उन को मैं बीस हजार कोर कूटा हुआ गेहूं, बीस हजार कोर जव, बीस हजार बत दाखमधु और बीस हजार बत तेल दूंगा।

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 51-52
  • इब्रानियों 9



शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

प्रयास


   बचपन में मुझे पेड़ों पर चढ़ना बहुत पसंद था। जितना ऊँचा मैं चढ़ता था, उतनी दूर तक का दृश्य मुझे दिखाई देता था। कभी-कभी और अच्छा देख पाने के प्रयास में मैं पेड़ की डाली पर और आगे की ओर बढ़ता जाता था, जब तक कि वह डाली मेरे भार के कारण झुकने नहीं लगती थी। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मेरे व्यसक हो जाने के साथ ही अब मेरे पेड़ों पर चढ़ने के दिन भी समाप्त हो चुके हैं – ऐसा करना न तो सुरक्षित लगता है, और न ही सम्मानजनक।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में हम प्रभु यीशु के समय की एक घटना को पढ़ते हैं। ज़क्कई, जो कि एक धनी किन्तु नाटा व्यक्ति था, प्रभु यीशु को देखना चाहता था। परन्तु अपने कद के कारण वह भीड़ के पार प्रभु यीशु को देख न्हीं पाता था। प्रभु यीशु को देखने के प्रयास में एक दिन ज़क्कई ने एक निर्णय लिया; अपने सम्मान और अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना, वह उस मार्ग के एक पेड़ पर चढ़ गया, जिससे प्रभु यीशु को होकर निकलना था। उसका यह प्रयास सफल रहा; न केवल वह प्रभु यीशु को देख सका, वरन प्रभु यीशु ने उस पेड़ के नीचे आकर ज़क्कई को बुलाया और उसके घर भोजन करने भी गए। प्रभु यीशु से मिलने के पश्चात ज़क्कई का जीवन बदल गया, प्रभु यीशु ने सबके सामने उसके विषय में कहा, “...आज इस घर में उद्धार आया है...” (लूका 19:9)।

   हो सकता है कि कुछ बातें आज हमें भी प्रभु यीशु को देख पाने से रोक रही हों। घमण्ड हमें उसे अद्भुत युक्ति करने वाले के रूप में देखने से रोक सकता है। चिंताएं हमें उसे शान्ति के राजकुमार के रूप में जानने से रोक सकती हैं (यशायाह 9:6)। सँसार की वस्तुओं और स्तर पाने की लालसाएं हमें उसे वास्तविक तृप्ति के स्त्रोत – जीवन की रोटी (यूहन्ना 6:48) के रूप में देखने से रोक सकतीं हैं।

   प्रभु यीशु को बेहतर देख पाने, उसे निकट से जान पाने के लिए आप क्या प्रयास करने के लिए तैयार हैं? उसकी ओर बढ़ने का कोई भी ईमानदारी से किया गया प्रयास निश्चय ही अच्छे परिणाम लाएगा। जो उसे सच्चे मन से खोजते हैं, प्रभु परमेश्वर उन्हें अच्छा प्रतिफल देता है (इब्रानियों 11:6)।


परमेश्वर में अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए, परमेश्वर के मुख के खोजी हों।

और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आने वाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है। - इब्रानियों 11:6

बाइबल पाठ: लूका 19:1-10
Luke 19:1 वह यरीहो में प्रवेश कर के जा रहा था।
Luke 19:2 और देखो, ज़क्कई नाम एक मनुष्य था जो चुंगी लेने वालों का सरदार और धनी था।
Luke 19:3 वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कौन सा है परन्तु भीड़ के कारण देख न सकता था। क्योंकि वह नाटा था।
Luke 19:4 तब उसको देखने के लिये वह आगे दौड़कर एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि वह उसी मार्ग से जाने वाला था।
Luke 19:5 जब यीशु उस जगह पहुंचा, तो ऊपर दृष्टि कर के उस से कहा; हे ज़क्कई झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।
Luke 19:6 वह तुरन्त उतर कर आनन्द से उसे अपने घर को ले गया।
Luke 19:7 यह देख कर सब लोगे कुड़कुड़ा कर कहने लगे, वह तो एक पापी मनुष्य के यहां जा उतरा है।
Luke 19:8 ज़क्कई ने खड़े हो कर प्रभु से कहा; हे प्रभु, देख मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूं, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय कर के ले लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूं।
Luke 19:9 तब यीशु ने उस से कहा; आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी इब्राहीम का एक पुत्र है।
Luke 19:10 क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है।

एक साल में बाइबल: 
  • गिनती 7-8
  • मरकुस 4:21-41



गुरुवार, 16 मार्च 2017

नाम


   चार्ल्स पॉन्ज़ी का नाम सदा आर्थिक धोखेबाज़ी के साथ, जिसे उसने जीवन-शैली बना लिया था, जुड़ा रहेगा। कुछ छोटे वित्तीय अपराधों और थोड़ा समय जेल में बिताने के पश्चात, उसने निवेशकों को उनके द्वारा निवेश किए गए धन का 45 दिनों में 50% और 90 दिनों में 100% मुनाफे का प्रस्ताव दिया। यद्यपि लोगों को ऐसा हो पाना संभव प्रतीत नहीं होता था, परन्तु फिर भी निवेशकों द्वारा पैसा बहुतायत से आने लगा। पॉन्ज़ी ने नए निवशकों के पैसे से पुराने निवेशकों को पैसा दिया और अपनी खर्चीली जीवन शैली में व्यय किया। जब तक अगस्त 1920 में उसकी धोखेबाज़ी का पर्दाफाश हुआ, निवेशक 2 करोड़ डॉलर गँवा चुके थे और पाँच बैंक डूब गए थे। पॉन्ज़ी ने 3 वर्ष जेल में बिताए, फिर उसे इटली निर्वासित कर दिया गया, जहाँ 1949 में 66 वर्ष की आयु में, कंगाली में उसका देहांत हो गया।

   परमेश्वर के वचन बाइबल के पुराने नियम खण्ड में, नीतिवचन नामक पुस्तक में बुद्धिमान और मूर्ख लोगों की प्रसिद्धि की तुलना कई बार की गई है: "धर्मी को स्मरण कर के लोग आशीर्वाद देते हैं, परन्तु दुष्टों का नाम मिट जाता है। जो खराई से चलता है वह निडर चलता है, परन्तु जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रगट हो जाती है" (नीतिवचन 10:7, 9)। सुलेमान ने इसका सार बताते हुए कहा, "बड़े धन से अच्छा नाम अधिक चाहने योग्य है, और सोने चान्दी से औरों की प्रसन्नता उत्तम है" (नीतिवचन 22:1)।

   हम एक अच्छे नाम को चाहते हैं, अपने आप को सम्मानित करने के लिए नहीं परन्तु हमारे प्रभु परमेशवर यीशु मसीह के साथ हमारा नाम जुड़े होने के कारण क्योंकि उसका नाम सब नामों में सर्वश्रेष्ठ और सबसे ऊपर है। डेविड मैक्कैसलैण्ड


अच्छा नाम हमारे महान परमेश्वर का आदर करता है।

जो उसने मसीह के विषय में किया, कि उसको मरे हुओं में से जिलाकर स्‍वर्गीय स्थानों में अपनी दाहिनी ओर। सब प्रकार की प्रधानता, और अधिकार, और सामर्थ, और प्रभुता के, और हर एक नाम के ऊपर, जो न केवल इस लोक में, पर आने वाले लोक में भी लिया जाएगा, बैठाया। - इफिसियों 1:20-21

बाइबल पाठ: नीतिवचन 10:1-15
Proverbs 10:1 सुलैमान के नीतिवचन।। बुद्धिमान पुत्र से पिता आनन्दित होता है, परन्तु मूर्ख पुत्र के कारण माता उदास रहती है। 
Proverbs 10:2 दुष्टों के रखे हुए धन से लाभ नहीं होता, परन्तु धर्म के कारण मृत्यु से बचाव होता है। 
Proverbs 10:3 धर्मी को यहोवा भूखों मरने नहीं देता, परन्तु दुष्टों की अभिलाषा वह पूरी होने नहीं देता। 
Proverbs 10:4 जो काम में ढिलाई करता है, वह निर्धन हो जाता है, परन्तु कामकाजी लोग अपने हाथों के द्वारा धनी होते हैं। 
Proverbs 10:5 जो बेटा धूपकाल में बटोरता है वह बुद्धि से काम करने वाला है, परन्तु जो बेटा कटनी के समय भारी नींद में पड़ा रहता है, वह लज्जा का कारण होता है। 
Proverbs 10:6 धर्मी पर बहुत से आर्शीवाद होते हैं, परन्तु उपद्रव दुष्टों का मुंह छा लेता है। 
Proverbs 10:7 धर्मी को स्मरण कर के लोग आशीर्वाद देते हैं, परन्तु दुष्टों का नाम मिट जाता है। 
Proverbs 10:8 जो बुद्धिमान है, वह आज्ञाओं को स्वीकार करता है, परन्तु जो बकवादी और मूढ़ है, वह पछाड़ खाता है। 
Proverbs 10:9 जो खराई से चलता है वह निडर चलता है, परन्तु जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रगट हो जाती है। 
Proverbs 10:10 जो नैन से सैन करता है उस से औरों को दुख मिलता है, और जो बकवादी और मूढ़ है, वह पछाड़ खाता है। 
Proverbs 10:11 धर्मी का मुंह तो जीवन का सोता है, परन्तु उपद्रव दुष्टों का मुंह छा लेता है। 
Proverbs 10:12 बैर से तो झगड़े उत्पन्न होते हैं, परन्तु प्रेम से सब अपराध ढंप जाते हैं। 
Proverbs 10:13 समझ वालों के वचनों में बुद्धि पाई जाती है, परन्तु निर्बुद्धि की पीठ के लिये कोड़ा है। 
Proverbs 10:14 बुद्धिमान लोग ज्ञान को रख छोड़ते हैं, परन्तु मूढ़ के बोलने से विनाश निकट आता है। 
Proverbs 10:15 धनी का धन उसका दृढ़ नगर है, परन्तु कंगाल लोग निर्धन होने के कारण विनाश होते हैं।

एक साल में बाइबल: 
  • व्यवस्थाविवरण 28-29
  • मरकुस 14:54-72


रविवार, 28 दिसंबर 2014

भला और बुरा


   आग जलाते समय कभी-कभी हवा तेज़ होती है और मुझे आग जलाने नहीं देती; कभी जब आग जल रही होती है और मध्यम पड़ने लगती है तो हवा के झोंके उसे तेज़ कर देने में सहायक हो जाते हैं। वही हवा एक परिस्थिति में तो मेरे लिए बुरी और दूसरी में मेरे लिए अच्छी हो जाती है! जहाँ वह मेरी योजना और कार्य में बाधा बनती है मैं उसे बुरा मान लेता हूँ, और जहाँ वह मेरी सहायक हो जाती है, मैं उसे अच्छा मान लेता हूँ। हवा तो वही है, फर्क केवल मेरे परिपेक्ष और आँकलन का है।

   यह एक उदाहरण है उस विरोधाभास का जिसके अन्तर्गत हम परिस्थितियों अथवा लोगों के विषय में निर्णय लेते हैं या राय व्यक्त करते हैं। यदि वे हमारी योजनाओं और कार्यविधियों में सहायक होते हैं तो अच्छे हैं, यदि बाधा बनते हैं या सहायक नहीं होते तो बुरे हैं।

   लेकिन भले और बुरे की सही पहचान हमें परमेश्वर से मिलती है, जिसके मानक सदा सिद्ध और पक्षपात रहित होते हैं, जो समय, परिस्थितियों, लोगों और आवश्यकताओं के अनुसार बदलते नहीं हैं। उसकी नज़र में भला या बुरा वह नहीं है जो हम मनुष्यों की योजना और सोच के अनुसार भला या बुरा है; वरन भला या बुरा वह है जो उसके स्थापित मानकों के अनुसार भला या बुरा है, जो उसकी योजनाओं की पूर्ति में सहायक या बाधक है। हम मसीही विश्वासियों के लिए परमेश्वर की योजना है कि हम "...एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा हो, इसलिये कि जिसने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो" (1 पतरस 2:9)।

   परमेश्वर की इस योजना की पूर्ति के लिए हमें सब लोगों को आदर देना है, सभी मसीही विश्वासियों से प्रेम रखना है, परमेश्वर के भय और भक्ति में जीवन व्यतीत करना है और अपने ऊपर अधिकार रखने वालों का सम्मान करना है चाहे वे हमारे मन के अनुरूप हों अथवा नहीं (पद 17-18)। हमारे इस व्यवहार को देख कर उन अविश्वासियों में विश्वास की चिंगारी जगने की संभावना बन जाएगी जो बुरी परिस्थितियों में भी हमारे भले व्यवहार को देखेंगे; और हमारा ऐसा व्यवहार परमेश्वर की महिमा और गौरव का कारण ठहरेगा। - जूली ऐकैरमैन लिंक


जब परिस्थितियाँ बुरी प्रतीत हों तो स्मरण रखिए कि परमेश्वर सदैव भला रहता है।

जो मन के टेढ़े है, उन से यहोवा को घृणा आती है, परन्तु वह खरी चाल वालों से प्रसन्न रहता है। - नीतिवचन 11:20

बाइबल पाठ: 1 पतरस 2:9-25
1 Peter 2:9 पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा हो, इसलिये कि जिसने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो। 
1 Peter 2:10 तुम पहिले तो कुछ भी नहीं थे, पर अब परमेश्वर ही प्रजा हो: तुम पर दया नहीं हुई थी पर अब तुम पर दया हुई है।
1 Peter 2:11 हे प्रियों मैं तुम से बिनती करता हूं, कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जान कर उस सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो। 
1 Peter 2:12 अन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; इसलिये कि जिन जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जान कर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देख कर; उन्‍हीं के कारण कृपा दृष्टि के दिन परमेश्वर की महिमा करें।
1 Peter 2:13 प्रभु के लिये मनुष्यों के ठहराए हुए हर एक प्रबन्‍ध के आधीन में रहो, राजा के इसलिये कि वह सब पर प्रधान है। 
1 Peter 2:14 और हाकिमों के, क्योंकि वे कुकिर्मयों को दण्‍ड देने और सुकिर्मयों की प्रशंसा के लिये उसके भेजे हुए हैं। 
1 Peter 2:15 क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम भले काम करने से निर्बुद्धि लोगों की अज्ञानता की बातों को बन्‍द कर दो। 
1 Peter 2:16 और अपने आप को स्‍वतंत्र जानो पर अपनी इस स्‍वतंत्रता को बुराई के लिये आड़ न बनाओ, परन्तु अपने आप को परमेश्वर के दास समझ कर चलो। 
1 Peter 2:17 सब का आदर करो, भाइयों से प्रेम रखो, परमेश्वर से डरो, राजा का सम्मान करो।
1 Peter 2:18 हे सेवकों, हर प्रकार के भय के साथ अपने स्‍वामियों के आधीन रहो, न केवल भलों और नम्रों के, पर कुटिलों के भी। 
1 Peter 2:19 क्योंकि यदि कोई परमेश्वर का विचार कर के अन्याय से दुख उठाता हुआ क्‍लेश सहता है, तो यह सुहावना है। 
1 Peter 2:20 क्योंकि यदि तुम ने अपराध कर के घूंसे खाए और धीरज धरा, तो उस में क्या बड़ाई की बात है? पर यदि भला काम कर के दुख उठाते हो और धीरज धरते हो, तो यह परमेश्वर को भाता है। 
1 Peter 2:21 और तुम इसी के लिये बुलाए भी गए हो क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिये दुख उठा कर, तुम्हें एक आदर्श दे गया है, कि तुम भी उसके चिन्ह पर चलो। 
1 Peter 2:22 न तो उसने पाप किया, और न उसके मुंह से छल की कोई बात निकली। 
1 Peter 2:23 वह गाली सुन कर गाली नहीं देता था, और दुख उठा कर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौपता था। 
1 Peter 2:24 वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ गया जिस से हम पापों के लिये मर कर के धामिर्कता के लिये जीवन बिताएं: उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए। 
1 Peter 2:25 क्योंकि तुम पहिले भटकी हुई भेड़ों की नाईं थे, पर अब अपने प्राणों के रखवाले और अध्यक्ष के पास फिर आ गए हो।

एक साल में बाइबल: 
  • प्रकाशितवाक्य 9-12