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गुरुवार, 4 जुलाई 2013

क्रूस

   अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक मुकद्दमा आया - क्या एक धार्मिक चिन्ह, विशेषतः क्रूस को, किसी सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए? इस संबंध में ऐसोशियेटेड प्रेस के लिए मार्क शर्मन ने लिखा, यद्यपि जिस क्रूस को लेकर यह मुकद्दमा हो रहा था वह सन 1934 में प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि के लिए उस स्थान पर खड़ा किया गया था, उसके वहाँ होने का विरोध करने वाले एक सेवा-निवृत सैनिकों के दल का तर्क था कि क्योंकि क्रूस केवल मसीही धर्म का एक प्रबल चिन्ह है ना कि सभी धर्मों का, इसलिए उसे यह वरियता नहीं मिलनी चाहिए।

   क्रूस सदा ही विवादित रहा है। प्रभु यीशु के स्वर्गारोहण के बाद, पहली शताब्दी में ही, पौलुस ने अपने मसीही विश्वास के प्रचार के संबंध में लिखा: "क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्‍दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे। क्योंकि क्रूस की कथा नाश होने वालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ है" (1 कुरिन्थियों 1:17-18)। हम मसीही विश्वासियों के लिए प्रभु यीशु मसीह का क्रूस केवल एक प्रबल मसीही चिन्ह ही नहीं है, वरन उस से भी बहुत बढ़कर क्रूस प्रमाण है मनुष्य जाति को पाप के क्रूर शासन से मुक्त करने के परमेश्वर के मार्ग और सभी मनुष्यों के प्रति परमेश्वर के प्रेम का।

   एक बहुविचारवादी और भिन्न आस्थाओं को रखने वाले समाज में धार्मिक चिन्हों को लेकर विवाद तो चलता ही रहेगा और क्या क्रूस किसी सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शित किया जा सकता है या नहीं, इसका निर्णय न्यायालय कर लेंगे; परन्तु हमारे जीवनों के द्वारा क्रूस की सामर्थ प्रदर्शित होती है या नहीं, यह निर्णय हमें व्यक्तिगत रीति से लेना है।

   क्या आपने परमेश्वर के प्रेम और क्षमा के सर्वोच्च चिन्ह - प्रभु यीशु मसीह के क्रूस को अपने हृदय में स्थापित किया है? क्या पापों की आधीनता से मुक्त करने वाली क्रूस की सामर्थ आपके जीवन से प्रदर्शित होती है? - डेविड मैक्कैसलैंड


मानव जाति के प्रति परमेश्वर के प्रेम को क्रूस से बढ़कर अन्य कुछ भी बयान नहीं कर सकता।

क्योंकि क्रूस की कथा नाश होने वालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ है। - 1 कुरिन्थियों 1:18

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 1:17-25
1 Corinthians 1:17 क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्‍दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे।
1 Corinthians 1:18 क्योंकि क्रूस की कथा नाश होने वालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ है।
1 Corinthians 1:19 क्योंकि लिखा है, कि मैं ज्ञानवानों के ज्ञान को नाश करूंगा, और समझदारों की समझ को तुच्‍छ कर दूंगा।
1 Corinthians 1:20 कहां रहा ज्ञानवान? कहां रहा शास्त्री? कहां इस संसार का विवादी? क्या परमेश्वर ने संसार के ज्ञान को मूर्खता नहीं ठहराया?
1 Corinthians 1:21 क्योंकि जब परमेश्वर के ज्ञान के अनुसार संसार ने ज्ञान से परमेश्वर को न जाना तो परमेश्वर को यह अच्छा लगा, कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करने वालों को उद्धार दे।
1 Corinthians 1:22 यहूदी तो चिन्ह चाहते हैं, और यूनानी ज्ञान की खोज में हैं।
1 Corinthians 1:23 परन्तु हम तो उस क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह का प्रचार करते हैं जो यहूदियों के निकट ठोकर का कारण, और अन्यजातियों के निकट मूर्खता है।
1 Corinthians 1:24 परन्तु जो बुलाए हुए हैं क्या यहूदी, क्या यूनानी, उन के निकट मसीह परमेश्वर की सामर्थ, और परमेश्वर का ज्ञान है।
1 Corinthians 1:25 क्योंकि परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से ज्ञानवान है; और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से बहुत बलवान है।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 28-29 
  • प्रेरितों 13:1-25


बुधवार, 3 जुलाई 2013

मन खोल के

   बसन्त ऋतु के आरंभ में मुझे और मेरी पत्नि को हमारी रसोई की खिड़की से एक रोचक दृश्य देखने को मिला। एक पक्षी युगल अपनी चोंच में घास और तिनके लिए पड़ौसी के घर की दीवार में बने एक छेद में आते और जाते थे। फिर कुछ सप्ताह बाद वहाँ से ज़ोर से चहचहाने की आवाज़ें आने लगीं और चिड़िया के चार बच्चे उस छेद से सिर निकाल और पूरा मूँह खोल कर, अपने माता-पिता से भोजन माँगते दिखने लगे; तथा चिड़िया माता पिता बारी बारी उनके लिए भोजन लाकर उनके मूँह और पेट भरने के प्रयास में लगे हुए दिखने लगे।

   चिड़िया के बच्चों के चौड़े खुले मूँह और अपना पेट भरा होने की तीव्र लालसा देख कर मुझे स्मरण हो आया कि कैसे परमेश्वर का वचन बाइबल हम मसीही विश्वासीयों को आत्मिक भोजन की लालसा रखने को कहती है। प्रेरित पतरस ने अपनी पहली पत्री में इस बात को समझाने के लिए छोटे बच्चों की भोजन पाते रहने की लालसा की उपमा दी है: "नये जन्मे हुए बच्‍चों की नाईं निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ" (1 पतरस 2:2)। जिस शब्द का अनुवाद "लालसा" हुआ है वह एक संयुक्त शब्द है जिसका मूल युनानी भाषा में अर्थ है एक अति तीव्र इच्छा या बड़ी उत्सुकता से किसी चीज़ को पाने की इच्छा रखना।

   यह विचित्र लग सकता है कि परमेश्वर का वचन हम मसीही विश्वासियों को किसी चीज़ को पाने की तीव्र या उत्सुकता से इच्छा रखने की आज्ञा देता है। लेकिन पक्षियों या मनुष्य के भूखे बच्चों के व्यवहार के विपरीत, हम व्यसक विश्वासीयों को यह स्मरण दिलाने की आवश्यकता रहती है कि हमारी आत्मा को भी उपयुकत भोजन की, जो यथासमय और पौष्टिक हो, की आवश्यकता रहती है। चाहे हम ने बीते समय में बाइबल का अध्ययन किया हो, तो भी हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि शारीरिक भोजन की आवश्यकता के समान ही हमारी आत्मा को भी समय समय पर आत्मिक भोजन की आवश्यकता रहती है, और यदि समय समय पर यह आवश्यकता पूरी नहीं की गई तो हम आत्मिक रीति से कमज़ोर होते जाएंगे।

   परमेश्वर ने अपने बच्चों को भरपेट आत्मिक भोजन भी देने का प्रबंध किया हुआ है, बस हमें मन खोल कर उसे ग्रहण करने भर की आवश्यकता है। - डेनिस फिशर


परमेश्वर के वचन की उपेक्षा आपकी आत्मा को कमज़ोर कर देगा; लेकिन उस पर मनन करते रहने से आप आत्मिक रीति से बलवंत होते जाएंगे।

नये जन्मे हुए बच्‍चों की नाईं निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ। - 1 पतरस 2:2

बाइबल पाठ: 1 पतरस 2:1-5
1 Peter 2:1 इसलिये सब प्रकार का बैर भाव और छल और कपट और डाह और बदनामी को दूर करके।
1 Peter 2:2 नये जन्मे हुए बच्‍चों की नाईं निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ।
1 Peter 2:3 यदि तुम ने प्रभु की कृपा का स्‍वाद चख लिया है।
1 Peter 2:4 उसके पास आकर, जिसे मनुष्यों ने तो निकम्मा ठहराया, परन्तु परमेश्वर के निकट चुना हुआ, और बहुमूल्य जीवता पत्थर है।
1 Peter 2:5 तुम भी आप जीवते पत्थरों की नाईं आत्मिक घर बनते जाते हो, जिस से याजकों का पवित्र समाज बन कर, ऐसे आत्मिक बलिदान चढ़ाओ, जो यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर को ग्राह्य हों।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 25-27 
  • प्रेरितों 12


मंगलवार, 2 जुलाई 2013

आप क्या कर रहे हैं?

   मेरी पोती ऐड्डी, एक छोटी सी बच्ची, कुछ दिन के लिए हमारे घर रहने आई हुई थी। वहाँ रहते हुए वह मुझसे बार बार एक प्रश्न करने लगी: "आप क्या कर रहे हैं?" चाहे मैं कंप्यूटर पर कार्य कर रहा होता या कहीं बाहर जाने के लिए जूते पहन रहा होता, या बैठ कर कुछ पढ़ रहा होता या रसोई के कार्य में अपनी पत्नि की सहायता कर रहा होता, वह मेरे पास आकर मुझ से चिपक कर खड़ी हो जाती और बड़ी मासूमियत से यही प्रश्न पूछती। अनेकों बार उसके प्रश्न के उत्तर में "मैं बिल चुका रहा हूँ", "मैं बाज़ार जा रहा हूँ", "मैं अखबार पढ़ रहा हूँ", "मैं दादी की सहायता कर रहा हूँ" आदि कहने के बाद मुझे समझ में आया कि वह बच्ची जो प्रश्न मुझ से बार बार पूछ रही है वह मेरे जीवन और आत्मिक दशा के लिए भी एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

   एक छोटी सी उम्र की जिज्ञासु लड़की को अपनी हर गतिविधि के बारे में उत्तर देना एक बात है लेकिन हर बात के बारे में परमेश्वर को इसी प्रश्न का उत्तर देना एक अलग ही बात है, और बहुत महत्वपूर्ण भी। ज़रा विचार कीजिए यदि मेरी पोती के समान ही परमेश्वर भी हमारे समीप आ कर खड़ा हो जाए और हर बात में, अपनी हर गतिविधि के लिए हमें परमेश्वर को लगातार उत्तर देते रहना पड़े तो कितनी ऐसी गतिविधियाँ होंगी जिन्हें हम ज़ारी रखना चाहेंगे, या कितने ऐसे उत्तर होंगे जिनके कारण हम शर्मिंदा होंगे: "मैं सारी शाम टी०वी० देखने में बर्बाद कर रहा हूँ", "मैं अपनी आवश्यकता से अधिक खाकर, खाना और अपनी सेहत, दोनो बरबाद रहा हूँ", "मैं एक और दिन बिना आपसे बातचीत किए बिताने जा रहा हूँ", "मैं अपने जीवन-साथी के साथ बहस कर रहा हूँ" - यह सूची और भी बड़ी हो सकती है और साथ ही हमारी शर्मिंदगी भी। परमेश्वर तो परमेश्वर, यदि किसी मनुष्य को भी लगातार हमें इस प्रश्न का उत्तर देते रहना पड़े तो कितनी ही बातें ऐसी होंगी जिन्हें हम करने से बचते रहेंगे। परिणामस्वरूप हमारे जीवनों तथा संबंधों में कितना भारी परिवर्तन आ जाएगा और हमारे जीवन तथा समाज कितना सुधर जाएंगे।

   परमेश्वर अभी हम से यह प्रश्न करे या ना करे, लेकिन एक दिन तो हमें हर बात और हर कार्य का हिसाब उसे देना ही होगा: "और मैं तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे" (मत्ती 12:36); "क्योंकि परमेश्वर सब कामों और सब गुप्त बातों का, चाहे वे भली हों या बुरी, न्याय करेगा" (सभोपदेशक 12:14); "फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखा, और पुस्‍तकें खोली गई; और फिर एक और पुस्‍तक खोली गई, अर्थात जीवन की पुस्‍तक; और जैसे उन पुस्‍तकों में लिखा हुआ था, उन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया" (प्रकाशितवाक्य 20:12)। इसीलिए परमेश्वर ने हमें अपने वचन बाइबल में कुछ निर्देश दिये हैं जिससे हम अपने समय का सदुपयोग करें - परमेश्वर की इच्छा और महिमा को ध्यान में रखते हुए (1 कुरिन्थियों 10:31; कुलुस्सियों 3:23) और अपनी जीवनशैली के विषय में सचेत रहें (इफिसियों 5:15) और शर्मिंदा होने से बचे रह सकें।

   "आप क्या कर रहे हैं?" - हम सब के लिए यह एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है और परमेश्वर चाहता है कि इस प्रश्न का उत्तर उसे देने के लिए हम सदा सचेत और सजग रहें। - डेव ब्रैनन


महत्वहीन बातों पर समय बर्बाद करने से सावधान रहें।

इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो। - इफिसियों 5:15 

बाइबल पाठ: कुलुस्सियों 3:12-17
Colossians 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो।
Colossians 3:13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।
Colossians 3:14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्‍ध है बान्‍ध लो।
Colossians 3:15 और मसीह की शान्‍ति जिस के लिये तुम एक देह हो कर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।
Colossians 3:16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ।
Colossians 3:17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 22-24 
  • प्रेरितों 11


सोमवार, 1 जुलाई 2013

राय

   हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जहाँ लगभग हर बात के लिए लोगों के मत, राय और विचार जानने के लिए कोई ना कोई सर्वेक्षण होता रहता है और उन के परिणाम प्रसारण तथा चर्चा के विषय बने रहते हैं। ऐसे सर्वेक्षणों से हमें पता चलता रहता है कि लोगों के अनुभव किसी वस्तु अथवा उत्पाद के विषय में क्या हैं और हम उन्हें खरीदने तथा उपयोग करने के सम्बंध में बुद्धिमता के साथ निर्णय लेने पाते हैं। इन सर्वेक्षणों द्वारा सरकारी अधिकारी अपनी नीतियाँ भी निर्धारित कर सकते हैं और जनता द्वारा उन्हें स्वीकार करने के विषय में पूर्वानुमान भी लगा सकते हैं। हालाँकि एकत्रित सूचना और जानकारी प्रत्येक की अपनी अपनी राय ही है किंतु फिर भी यह कई स्तरों पर निर्णय लेने में उपयोगी होती है क्योंकि बहुत से निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, और यह अच्छा भी होता है।

   प्रभु यीशु ने अपने विषय में जनमत को ले कर अपने चेलों से एक प्रश्न पूछा: "यीशु कैसरिया फिलिप्पी के देश में आकर अपने चेलों से पूछने लगा, कि लोग मनुष्य के पुत्र को क्या कहते हैं?" (मत्ती 16:13); उत्तर अनेक थे, सभी उत्तर उसके लिए सम्मानदायक भी थे, लेकिन कोई भी उत्तर यथोचित तथा प्रभु यीशु को स्वीकारयोग्य नहीं था। फिर प्रभु यीशु ने यही प्रश्न अपने चेलों से पूछा: "उसने उन से कहा; परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?" (मत्ती 16:15); और उसके चेले पतरस ने सही उत्तर दिया: "शमौन पतरस ने उत्तर दिया, कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है" (मत्ती 16:16), जिसके लिए प्रभु यीशु ने पतरस को धन्य कहा और बताया कि यह पहचान और समझ-बूझ किसी मान्वीय क्षमता से नहीं वरन परमेश्वर पिता से प्राप्त होती है।

   लोकमत कुछ प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं, लेकिन जब प्रश्न आता है जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक दूरगामी प्रभाव रखने वाले प्रश्न के उत्तर और संबंधित निर्णय का तो जनमत और बहुमत इसमें कतई सहायक नहीं है - इसका निर्णय तो हम में से प्रत्येक जन को व्यक्तिगत रीति से ही करना है; यहाँ किसी अन्य की राय अथवा मत हमारे लिए लागू नहीं हो सकता। यह प्रश्न है इस पृथ्वी के जीवन के बाद के अनन्त जीवन का - हम उस अनन्त जीवन को कहाँ बिताएंगे? यदि अभी उस अनिवार्यतः आने वाले अनन्त जीवन के बारे में विचार नहीं किया और सही निर्णय नहीं लिया, तो बाद में सही निर्णय की ओर लौट आने का कोई मार्ग नहीं होगा। हम इस पृथ्वी पर जो अनन्त अपने लिए निर्धारित कर लेंगे, वही पृथ्वी छोड़ने के बाद हमारे लिए लागू हो जाएगा - सदा सदा के लिए।

   आज आपकी राय प्रभु यीशु के बारे में क्या है? आप क्या कहते हैं कि प्रभु यीशु कौन है? स्मरण रखिए कि पतरस के उत्तर को छोड़, प्रभु यीशु को अन्य कोई भी उत्तर स्वीकार नहीं था। यदि आप पतरस और परमेश्वर के वचन बाइबल से प्रभु यीशु के विषय में सहमत हैं तो उसे अपने व्यक्तिगत उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करके अनन्त आशीषों और स्वर्ग में निवास के अधिकारी बन जाईये; अन्यथा विकल्प बहुत भयानक और वर्णन तथा समझ से बाहर कष्टदायक होगा। जो आप अपने लिए यहाँ चुनेंगे वही आपको वहाँ मिलेगा। - बिल क्राउडर


लोकमत परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई को बदल नहीं सकता।

परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। - यूहन्ना 1:12 

बाइबल पाठ: मत्ती 16:13-19
Matthew 16:13 यीशु कैसरिया फिलिप्पी के देश में आकर अपने चेलों से पूछने लगा, कि लोग मनुष्य के पुत्र को क्या कहते हैं?
Matthew 16:14 उन्होंने कहा, कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते हैं और कितने एलिय्याह, और कितने यिर्मयाह या भविष्यद्वक्ताओं में से कोई एक कहते हैं।
Matthew 16:15 उसने उन से कहा; परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?
Matthew 16:16 शमौन पतरस ने उत्तर दिया, कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।
Matthew 16:17 यीशु ने उसको उत्तर दिया, कि हे शमौन योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।
Matthew 16:18 और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।
Matthew 16:19 मैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियां दूंगा: और जो कुछ तू पृथ्वी पर बान्‍धेगा, वह स्वर्ग में बन्‍धेगा; और जो कुछ तू पृथ्वी पर खोलेगा, वह स्वर्ग में खुलेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 20-21 
  • प्रेरितों 10:24-48


रविवार, 30 जून 2013

खोया और पाया

   जिस दिन तक मुझे "ढूँढ" नहीं लिया गया, मुझे पता ही नहीं था कि मैं "खोई" हुई हूँ!

   मेरा जीवन सामन्य रीति से चल रहा था, मैं अपने कार्य में व्यस्त रहती थी, ज़िम्मेदारियाँ और दिनचर्या पूरी करती थी, कभी कभी कुछ मौज मस्ती भी कर लेती थी। फिर एक दिन मुझे एक ई-मेल मिला जिसका शीर्षक था "शायद आप मेरे रिश्तेदार हैं।" मैंने वह सन्देश पढ़ा तो पाया कि वह एक महिला द्वारा भेजा गया है, जो अपने एक अन्य रिश्तेदार के साथ मिलकर पिछले 10 वर्ष से एक पुराने परिवार की मेरी तरफ के परिवार जनों की शाखा को खोज रही है क्योंकि उन्होंने अपने पिता से उनकी मृत्युशैया पर यह वायदा किया था कि वे परिवार की इस खोई हुई शाखा के लोगों को अवश्य ही ढूँढ निकालेंगे।

   मुझे "खो जाने" के लिए कुछ भी तो नहीं करना पड़ा था, मैं तो अपने जन्म से ही "खोई" हुई थी; इसी प्रकार मुझे ढूँढे जाने के लिए भी कुछ नहीं करना पड़ा सिवाय इसके कि मैं स्वीकार कर लूँ कि मैं उस खोई हुई परिवार शाखा की सदस्या हूँ, शेष कार्य तो मुझे ढूँढने वालों ने स्वयं ही पहले से ही कर लिया था। क्योंकि परिवार के उन सदस्यों के साथ मेरा कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं था इसलिए मुझे उन से दूर और "खोए हुए" होने का एहसास भी नहीं था और ना ही इस बात की जानकारी कि कोई मुझे ढूँढ रहा है।  यह जानकर कि मुझे ढूँढने के लिए उन्होंने इतनी मेहनत करी, इतना समय लगाया मुझे बहुत अच्छा लगा और आभास हुआ कि मैं कुछ विशिष्ट हूँ।

   इस घटना पर विचार करते हुए मुझे परमेश्वर के वचन बाइबल के लूका 15 अध्याय में प्रभु यीशु द्वारा दीये तीन "खोए और पाए" दृष्टांतों का स्मरण हो आया -  खोई हुई भेड़, खोया हुआ सिक्का और खोया हुआ पुत्र। जब कभी हम परमेश्वर पिता से भटक जाते हैं, चाहे जानबूझ कर उस खोए हुए पुत्र के समान, या अनजाने में उस खोई हुई भेड़ के समान - परमेश्वर हमें "ढूँढने" और लौटा लाने के प्रयास में लग जाता है। चाहे हमें यह आभास ना भी हो कि हम खोए हुए हैं, किंतु यदि परमेश्वर के साथ हमारा व्यक्तिगत सम्पर्क और संबंध नहीं है तो हम खोए हुए ही हैं और हमारे जीवन का पाप हमें परमेश्वर के साथ सही संबंध बनाने नहीं देता। इसलिए पाप में अपने खोए हुए होने को स्वीकार करना और परमेश्वर द्वारा प्रभु यीशु में उस पाप के निवारण को स्वीकार कर लेना ही ढूँढे जाने की ओर पहला कदम है।

   परमेश्वर ने तो एक बड़े प्रयास और कीमत के चुकाए जाने के द्वारा संसार के हर पाप में खोए हुए व्यक्ति के वापस उसके पास लौट आने और स्वर्गीय परिवार में स्वीकार होने का मार्ग तैयार कर के दे दिया है। हमें केवल प्रभु यीशु से पापों की क्षमा माँगकर अपना जीवन उसे समर्पण करना है और उसकी आज्ञाकारिता में चलना है। वह प्रेमी स्वर्गीय पिता संसार और पाप में खोई हुई अपनी सन्तानों को बड़ी लालसा और प्रेम से वापस घर लौट आने को बुला रहा है; क्या आज आप उसकी इस पुकार को सुन कर स्वीकार करेंगे और उसके पास लौट आएंगे? - जूली ऐकैरमैन लिंक


ढूँढे जाने की आशीषों को पाने के लिए अपने खोया हुआ होने की दशा को स्वीकार करना अनिवार्य है।

क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है। - लूका 19:10 

बाइबल पाठ: लूका 15:1-10
Luke 15:1 सब चुंगी लेने वाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उस की सुनें।
Luke 15:2 और फरीसी और शास्त्री कुड़कुड़ा कर कहने लगे, कि यह तो पापियों से मिलता है और उन के साथ खाता भी है।
Luke 15:3 तब उसने उन से यह दृष्‍टान्‍त कहा।
Luke 15:4 तुम में से कौन है जिस की सौ भेड़ें हों, और उन में से एक खो जाए तो निन्नानवे को जंगल में छोड़कर, उस खोई हुई को जब तक मिल न जाए खोजता न रहे?
Luke 15:5 और जब मिल जाती है, तब वह बड़े आनन्द से उसे कांधे पर उठा लेता है।
Luke 15:6 और घर में आकर मित्रों और पड़ोसियों को इकट्ठे कर के कहता है, मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरी खोई हुई भेड़ मिल गई है।
Luke 15:7 मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिराने वाले पापी के विषय में भी स्वर्ग में इतना ही आनन्द होगा, जितना कि निन्नानवे ऐसे धर्मियों के विषय नहीं होता, जिन्हें मन फिराने की आवश्यकता नहीं।
Luke 15:8 या कौन ऐसी स्त्री होगी, जिस के पास दस सिक्के हों, और उन में से एक खो जाए; तो वह दीया बारकर और घर झाड़ बुहार कर जब तक मिल न जाए, जी लगाकर खोजती न रहे?
Luke 15:9 और जब मिल जाता है, तो वह अपने सखियों और पड़ोसिनियों को इकट्ठी कर के कहती है, कि मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरा खोया हुआ सिक्‍का मिल गया है।
Luke 15:10 मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिराने वाले पापी के विषय में परमेश्वर के स्‍वर्गदूतों के साम्हने आनन्द होता है।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 17-19 
  • प्रेरितों 10:1-23


शनिवार, 29 जून 2013

परमेश्वर के अतिरिक्त

   अपनी पुस्तक Through the Valley of the Kwai में स्कॉटलैंड के एक सेना अधिकारी, 6 फुट 2 इन्च कद के एर्नेस्ट गौर्डन, ने दूसरे विश्वयुद्ध में कैदी बनाए जाने के अपने संस्मरण लिखे हैं। युद्ध बंदी बनाए जाने के समय गौर्डन एक नास्तिक था। बन्दीयों को रखने की दशा के कारण उसे मलेरिया, डिप्थीरिया, टायफाइड, बेरीबेरी, डाय्सेन्ट्री, शरीर के घाव आदि बिमारियों से होकर गुज़रना पड़ा। बिमारियों से उत्पन्न कमज़ोरी, कठिन परिश्रम और भोजन की कमी के कारण उसका वज़न शीघ्र ही घटकर 50 किलो से भी कम रह गया।

   युद्ध बन्दीयों के अस्पताल में व्याप्त गन्दगी के कारण गौर्डन ने आग्रह किया कि उसे एक ऐसे स्थान पर रखा जाए जहाँ कुछ सफाई होती है - वहाँ का मुर्दाघर। उस मुर्दाघर की ज़मीन पर लेटा हुआ वह प्रतिदिन अपनी मृत्यु की बाट जोहता था। लेकिन रोज़ एक साथी युद्ध बन्दी, डस्टी मिलर, उसके पास आकर उसके घावों को साफ करता, उसे आशा बन्धाता और मिलने वाले भोजन को स्वीकार करने के लिए समझाता, यहाँ तक कि डस्टी अपने भोजन में से भी गौर्डन को खाने के लिए दे देता। शांत और विनम्र स्वभाव का डस्टी उसकी मरहम-पट्टी करते समय गौर्डन से परमेश्वर में अपने दृढ़ विश्वास के बारे में बातें करता और बताता कि इस क्लेष में भी उसे एक अलौकिक आशा है।

   जिस आशा की बात परमेश्वर का वचन बाइबल करती है वह कोई अस्पष्ट, अनिश्चित, काल्पनिक आशावाद नहीं है। इसके विपरीत बाइबल में वर्णित आशा एक मज़बूत और निश्चयपूर्ण उम्मीद है कि जो कुछ परमेश्वर ने अपने वचन में वायदा किया है उसे वह अवश्य ही पूरा भी करेगा। बाइबल हमें यह भी सिखाती है कि परमेश्वर पर विश्वास करने और उसमें आशा बनाए रखने वालों के लिए क्लेष अकसर एक उत्प्रेरक का कार्य करते हैं और उनके चरित्र में धीरज तथा खराई को बढ़ाकर उन्हें और भी अधिक निखार देते हैं (रोमियों 5:3-4)।

   एक कठोर और कष्टदायक युद्ध बन्दीगृह में, 70 वर्ष पूर्व, एर्नेस्ट गौर्डन ने व्यक्तिगत अनुभव से परमेश्वर के वचन में दिया आशा का यह पाठ सीखा, और कल के उस नास्तिक का आज यह कहना है कि "सच्चा विश्वास वहीं पनपता और बढ़ता है जहाँ परमेश्वर के अतिरिक्त कोई आशा नहीं होती।" (रोमियों 8:24-25)। - सिंडी हैस कैस्पर


मसीह यीशु विश्वासी की आशा की अटूट और स्थिर चट्टान है।

आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है परन्तु जिस वस्तु की आशा की जाती है जब वह देखने में आए, तो फिर आशा कहां रही? क्योंकि जिस वस्तु को कोई देख रहा है उस की आशा क्या करेगा? परन्तु जिस वस्तु को हम नहीं देखते, यदि उस की आशा रखते हैं, तो धीरज से उस की बाट जोहते भी हैं। - रोमियों 8:24-25

बाइबल पाठ: रोमियों 5:1-5
Romans 5:1 ​सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।
Romans 5:2 जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।
Romans 5:3 केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज।
Romans 5:4 ओर धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है।
Romans 5:5 और आशा से लज्ज़ा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।

एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 14-16 
  • प्रेरितों 9:22-43


शुक्रवार, 28 जून 2013

दृष्टिकोण

   विश्व के दो महाशक्तियों अमेरिका और उसके साथी देश, तथा रूस और उसके साथी देशों के बीच 1947 से 1991 तक एक लंबा शीत युद्ध चला जिसमें दोनों ही एक दूसरे से बढ़कर सैन्य क्षमता रखने वाले और एक दूसरे से बलवन्त रहने के प्रयास में लगे रहे। एक दूसरे पर शीर्षता पाने के लिए विकसित किए जाने वाले उनके हथियारों में प्रमुख स्थान था परमाणु हथियारों का। इस होड़ के दौरान प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक एल्बर्ट आईन्सटाइन ने एक बहुत अर्थपूर्ण बात कही जो आज तक भी बहुत प्रसिद्ध और उद्धरित होने वाली बात रही है; उन्होंने कहा, "मैं यह तो नहीं जानता कि तीसरा विश्वयुद्ध किस प्रकार के हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध अवश्य ही लाठियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा।" आईन्स्टाइन के लिए परमाणु हथियारों से युद्ध लड़े जाने के परिणामों का यह एक स्पष्ट भावी दृष्टिकोण का क्षण था। वह भलि-भाँति यह समझ सके कि चाहे परमाणु युद्ध लड़ने के कारण कोई भी हों, परिणाम संसार भर के लिए अति भीष्ण और अति विध्वंसकारी होंगे।

   दुर्भाग्यवश हम साधारणतया इतने स्पष्ट भावी दृष्टिकोण के साथ आते समय और परिणामों की ओर नहीं देखते। कभी कभी हमारे द्वारा किए गए चुनाव और निर्णयों के संभावित परिणाम आंकना कठिन होता है, और कभी कभी हम केवल अपने वर्तमान के बारे में ही सोच रहे होते हैं ना कि दूरगामी परिणामों के बारे में।

   परमेश्वर के वचन बाइबल के एक महानायक मूसा के विषय में इब्रानियों 11:24-26 में लिखी बात दिखाती है कि मूसा ने अपने निर्णय के लिए भावी दृष्टिकोण रखा और होने वाले संभावित परिणामों को ध्यान में रखते हुए अपने जीवन के लिए निर्णय लिया: "विश्वास ही से मूसा ने सयाना हो कर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया। इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना और उत्तम लगा। और मसीह के कारण निन्‍दित होने को मिसर के भण्‍डार से बड़ा धन समझा: क्योंकि उस की आंखे फल पाने की ओर लगी थीं" (इब्रानियों 11:24-26)।

   मूसा के लिए यह चुनाव सरल नहीं था लेकिन वह अपने उस चुनाव की खराई और सार्थकता को पहचान सका और इसीलिए उसने आते अनन्त समय के सुखद प्रतिफलों के लिए वर्तमान में दुख उठाना अधिक भला समझा। उसके भावी दृष्टिकोण ने ही उसे वर्तमान के कष्ट सहने में सहायता करी। क्या आज हम जो मसीही विश्वासी कहलाते हैं, मूसा के समान ऐसा ही भावी दृष्टिकोण रखते हुए, मसीह यीशु के लिए निंदित होने के लिए तैयार हैं? क्या परमेश्वर के साथ बिताए जाने वाले उस आते जीवन के अनन्त सुख के लिए हम वर्तमान जीवन में मसीह यीशु के कष्टों में संभागी होने के लिए सहमत हैं? पौलुस प्रेरित ने रोम के विश्वासीयों को लिखी अपनी पत्री में स्पष्ट लिखा है "... जब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं" (रोमियों 8:17)।

   आज आपका दृष्टिकोण और चुनाव क्या है? - बिल क्राऊडर


यदि हम हर बात के लिए मसीह यीशु पर निर्भर रहेंगे तो हर बात को सहने की सामर्थ भी पाते रहेंगे।

यह बात सच है, कि यदि हम उसके साथ मर गए हैं तो उसके साथ जीएंगे भी। - 2 तिमुथियुस 2:11

बाइबल पाठ: इब्रानियों 11:23-31
Hebrews 11:23 विश्वास ही से मूसा के माता पिता ने उसको, उत्पन्न होने के बाद तीन महीने तक छिपा रखा; क्योंकि उन्होंने देखा, कि बालक सुन्‍दर है, और वे राजा की आज्ञा से न डरे।
Hebrews 11:24 विश्वास ही से मूसा ने सयाना हो कर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया।
Hebrews 11:25 इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना और उत्तम लगा।
Hebrews 11:26 और मसीह के कारण निन्‍दित होने को मिसर के भण्‍डार से बड़ा धन समझा: क्योंकि उस की आंखे फल पाने की ओर लगी थीं।
Hebrews 11:27 विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डर कर उसने मिसर को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानों देखता हुआ दृढ़ रहा।
Hebrews 11:28 विश्वास ही से उसने फसह और लोहू छिड़कने की विधि मानी, कि पहिलौठों का नाश करने वाला इस्त्राएलियों पर हाथ न डाले।
Hebrews 11:29 विश्वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए, जैसे सूखी भूमि पर से; और जब मिस्रियों ने वैसा ही करना चाहा, तो सब डूब मरे।
Hebrews 11:30 विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह, जब सात दिन तक उसका चक्कर लगा चुके तो वह गिर पड़ी।
Hebrews 11:31 विश्वास ही से राहाब वेश्या आज्ञा ने मानने वालों के साथ नाश नहीं हुई; इसलिये कि उसने भेदियों को कुशल से रखा था।


एक साल में बाइबल: 
  • अय्युब 11-13 
  • प्रेरितों 9:1-21