ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें : rozkiroti@gmail.com / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

सोमवार, 16 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 4


            सृष्टि और अंतरिक्ष से संबंधित बातों को बाइबल में से देखने के बाद, पृथ्वी से संबंधित बाइबल में लिखी कुछ वैज्ञानिक बातों को देखते हैं, जिन्हें विज्ञान के जानने से पहले ही परमेश्वर ने अपने वचन में लिखवा दिया था। साथ ही हम यह भी देखेंगे कि पृथ्वी को लेकर जो बाइबल के बारे में प्रचलित गलत धारणाएं हैं, वे निराधार और झूठ हैं; बाइबल ऐसा कुछ नहीं कहती है जैसा उसके विषय गलत फैलाया जाता रहा है।  

            पृथ्वी पर जीवन अनायास अथवा आकस्मिक ही नहीं पनप गया। परमेश्वर ने पृथ्वी को एक बहुत योजनाबद्ध तरीके से बनाया है। पृथ्वी की भीतरी, सतही, वायुमंडलीय, आकाश, और अंतरिक्ष में स्थिति तथा पृथ्वी पर इन सब बातों के प्रभाव बहुत ही बारीकी से रचे और स्थिर किए गए हैं, जिससे जीवन, विशेषकर मानवीय जीवन इस पृथ्वी पर संभव हो सके। पृथ्वी की संरचना और सूर्य से उसकी दूरी, तथा उसकी धुरी का झुकाव जीवन को बनाए रखने के लिए उपयुक्त है। यदि सूर्य से दूरी बढ़ जाए, तो पृथ्वी पर ठंड बहुत हो जाएगी,  तथा जल जम जाएगा, जिससे जीवन संभव नहीं रहेगा; यदि पृथ्वी की दूरी सूर्य के कुछ निकट हो जाए, तो गर्मी बहुत बढ़ जाएगी और पानी भाप कर उड़ जाएगा, और जीवन संभव नहीं होगा; सूर्य से इस उपयुक्त दूरी के क्षेत्र को “Goldilock’s Zone” या “वास योग्य क्षेत्र कहते हैं (Goldilock’s Zone : https://hi.wikipedia.org/wiki/वासयोग्य_क्षेत्र ;अंग्रेजी में यह विवरण अधिक विस्तृत और रोचक है)। पृथ्वी की संरचना और जीवन के योग्य होने के लिए विशेषताओं का वर्णन, जिसे वैज्ञानिकों ने पिछले कुछ समयों से समझना आरंभ किया है, बहुत बड़ा है (Earth: https://hi.wikipedia.org/wiki/पृथ्वी)। पृथ्वी की धुरी का झुकाव, पृथ्वी पर मौसम उत्पन्न करता है, जिससे जीव-जन्तुओं  और वनस्पतियों  की विविधता तथा जीवन के लिए सहायता, साधन और उपयुक्त वातावरण बना रहता है। इसी प्रकार पृथ्वी की भीतरी रचना, उसकी सतह की धरती की गतिविधियां, उसके चारों ओर का वातावरण, उसके चारों ओर बना हुआ उसका चुंबकीय क्षेत्र, चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा उसे मिलने वाली स्थिरता तथा सुरक्षा, आदि भी उसे जीवन के लिए विशिष्ट और उपयुक्त बनाते हैं; क्योंकि ये बातें अन्य किसी गृह में नहीं पाई जाती हैं, इसलिए किसी भी अन्य गृह पर जीवन नहीं है।

            बाइबल में यशायाह नबी (सेवकाई का काल लगभग 700 ईस्वी पूर्व, या आज से लगभग 2700 वर्ष पूर्व) और यिर्मयाह नबी (सेवकाई का काल लगभग 600 ईस्वी पूर्व, या आज से लगभग 2600 वर्ष पूर्व) की पुस्तकों से हम कुछ पदों को देखेंगे जो यह प्रकट कर देते हैं कि पृथ्वी को परमेश्वर ने मनुष्य को बसाने के लिए बनाया था “क्योंकि यहोवा जो आकाश का सृजनहार है, वही परमेश्वर है; उसी ने पृथ्वी को रचा और बनाया, उसी ने उसको स्थिर भी किया; उसने उसे सुनसान रहने के लिये नहीं परन्तु बसने के लिये उसे रचा है। वही यों कहता है, मैं यहोवा हूं, मेरे सिवा दूसरा और कोई नहीं है” (यशायाह 45:18); और “अपने अपने स्वामी से यों कहो कि पृथ्वी को और पृथ्वी पर के मनुष्यों और पशुओं को अपनी बड़ी शक्ति और बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा मैं ने बनाया, और जिस किसी को मैं चाहता हूँ उसी को मैं उन्हें दिया करता हूँ” (यिर्मयाह 27:5)। परमेश्वर द्वारा पृथ्वी को मनुष्यों के निवास के लिए बनाए जाने, उसे इस उद्देश्य के लिए स्थिर या उपयुक्त करने, और इसके लिए आकाश को उसके ऊपर 'तानने' के संदर्भ में बाइबल के कुछ अन्य पदों को भी देखिए: यशायाह 45:12; यिर्मयाह 10:12; 32:17; 51:15। यह सब तब लिखा गया जब न विज्ञान था, न खगोल-शास्त्र और खगोल-विद्या थी, और न ही आज के समान दूरबीन, उपकरण और कंप्यूटर थे जिनके द्वारा इन जटिल बातों का विश्लेषण और आँकलन किया जा सकता। किन्तु परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में यह आज से लगभग 2700 -2600 वर्ष पहले ही लिखवा दिया था कि उसने पृथ्वी की विशेष रीति से मनुष्य के निवास के लिए रचना की है; और उसे इस उद्देश्य के लिए स्थिर भी किया।

 

पृथ्वी से संबंधित कुछ अन्य बातें हैं:

            जबकि अन्य धर्म और मतों की पौराणिक कथाओं में पृथ्वी को किसी पशु अथवा मनुष्य द्वारा उठा कर रखा गया बताया गया है, बाइबल में अय्यूब की पुस्तक में, जो लगभग 2000 ईस्वी पूर्व अर्थात, आज से लगभग 4000 वर्ष पुरानी है, स्पष्ट लिखा है कि  पृथ्वी अंतरिक्ष के रिक्त स्थान में मुक्त लटकी हुई है: "वह उत्तर दिशा को निराधार फैलाए रहता है, और बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखता है" (अय्यूब 26:7)।

            जबकि प्रचलित विश्वास, और विज्ञान की भी धारणा यही थी कि पृथ्वी सपाट (flat) है, बाइबल में यशायाह नबी की पुस्तक में (आज से लगभग 2700 वर्ष पहले) लिखा गया था कि पृथ्वी गोलाकार है "यह वह है जो पृथ्वी के घेरे के ऊपर आकाशमण्डल पर विराजमान है; और पृथ्वी के रहने वाले टिड्डी के तुल्य है; जो आकाश को मलमल के समान फैलाता और ऐसा तान देता है जैसा रहने के लिये तम्बू ताना जाता है" (यशायाह 40:22)।

            आज से लगभग 2000 वर्ष पहले लिखी गई प्रभु यीशु मसीह की जीवनियों में इस बात का संकेत विद्यमान है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। प्रभु यीशु मसीह ने अंत के दिनों के एक विशिष्ट समय के संदर्भ में कहा था "मैं तुम से कहता हूं, उस रात दो मनुष्य एक खाट पर होंगे, एक ले लिया जाएगा, और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियां एक साथ चक्की पीसती होंगी, एक ले ली जाएगी, और दूसरी छोड़ दी जाएगी। जन खेत में होंगे एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ा जाएगा" (लूका 17:34-36)। एक ही साथ, एक ही घटना के लिए पृथ्वी के अलग अलग स्थानों पर रात, प्रातः (चक्की पीसना), और दिन-दोपहर (खेत में कार्य करना) के उल्लेख देना एक गोलाकार और घूमती हुई पृथ्वी के द्वारा ही संभव है।

            विज्ञान को यह 1970 के दशक में पता चला, जब समुद्र की गहराइयों के दबाव को सहन कर पाने वाली पनडुब्बियाँ और सागर तल के गहरे अंधकार में रौश्नी डालकर चित्र लेने वाले कैमरे बन गए, कि गहरे सागर तल में पानी के सोते भी हैं, जिनसे निकलकर पानी सागरों के जल के साथ मिलता रहता है; केवल वर्षा और नदियां ही सागरों के जल का स्त्रोत नहीं हैं। किन्तु आज से लगभग 4000 वर्ष पुरानी अय्यूब की पुस्तक में यह बात परमेश्वर ने अय्यूब को बता रखी थी "क्या तू कभी समुद्र के सोतों तक पहुंचा है, या गहिरे सागर की थाह में कभी चला फिरा है?" (अय्यूब 38:16); उस समय पर जब अय्यूब या किसी अन्य के लिए सागर की अंधियारी गहराइयों में जाकर कुछ देख पाना कदापि संभव नहीं था।

            इसी प्रकार से इन गहरे सागरों की गहराइयों की खोज करने की क्षमता विकसित होने के बाद ही वैज्ञानिक यह भी जानने पाए के सागर तल में विशाल पर्वत तथा गहरे खाइयाँ भी हैं। किन्तु लगभग 750 ईस्वी पूर्व, अर्थात आज से लगभग 2750 वर्ष पहले लिखी गई योना नबी की पुस्तक में सागर के अंदर के पर्वत और उन पहाड़ों की 'जड़', उनकी भूमि के अंदर 'गड़हे', अर्थात सागर तल की खाइयों का उल्लेख है  "मैं जल से यहां तक घिरा हुआ था कि मेरे प्राण निकले जाते थे; गहरा सागर मेरे चारों ओर था, और मेरे सिर में सिवार लिपटा हुआ था। मैं पहाड़ों की जड़ तक पहुंच गया था; मैं सदा के लिये भूमि में बन्द हो गया था; तौभी हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तू ने मेरे प्राणों को गड़हे में से उठाया है" (योना 2:5-6)।

            इस अद्भुत और विलक्षण पृथ्वी को अद्भुत और विलक्षण योजनाबद्ध रीति से रच कर, उस पर रहने के लिए आपकी भी रचना करने वाला, प्रेमी परमेश्वर है। उसे आपकी लालसा है, आप चाहे जैसे भी हों – भले-बुरे, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, किसी भी जाति, समाज, रंग, देश, धर्म के मानने वाले या न मानने वाले, या परमेश्वर को न भी मानने वाले क्यों न हों, फिर भी उसे आप से प्रेम है, आपके जीवन की कोई भी बात या बुराई उसकी क्षमा की सीमा से बाहर नहीं है। चाहे आप अपने आप को कितना भी क्षमा के अयोग्य क्यों न समझते हों, वह तब भी आप से प्रेम करता है, आपको अपने साथ लेना चाहता है - यदि आप आने को तैयार हैं तो!। आपको केवल स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों को मानते हुए, उससे क्षमा माँगनी है, और अपना जीवन उसे समर्पित करना है। स्वेच्छा और सच्चे मन से की गई एक छोटी प्रार्थना, "हे  प्रभु यीशु मेरे पाप क्षमा कर, और मुझे अपनी शरण में लेकर अपनी आज्ञाकारी संतान बना, मुझे मेरे पापों से मुक्त करके अपने लिए उपयोगी जन बना" आपको अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए परमेश्वर की संतान होकर उसके साथ स्वर्ग में निवास करने का आदर प्रदान कर देगी। क्या आप यह निर्णय करेंगे?

 

बाइबल पाठ: भजन 94:1-11

भजन 94:1 हे यहोवा, हे पलटा लेने वाले ईश्वर, हे पलटा लेने वाले ईश्वर, अपना तेज दिखा!

भजन 94:2 हे पृथ्वी के न्यायी उठ; और घमण्डियों को बदला दे!

भजन 94:3 हे यहोवा, दुष्ट लोग कब तक, दुष्ट लोग कब तक डींग मारते रहेंगे?

भजन 94:4 वे बकते और ढिठाई की बातें बोलते हैं, सब अनर्थकारी बड़ाई मारते हैं।

भजन 94:5 हे यहोवा, वे तेरी प्रजा को पीस डालते हैं, वे तेरे निज भाग को दु:ख देते हैं।

भजन 94:6 वे विधवा और परदेशी का घात करते, और अनाथों को मार डालते हैं;

भजन 94:7 और कहते हैं, कि याह न देखेगा, याकूब का परमेश्वर विचार न करेगा।।

भजन 94:8 तुम जो प्रजा में पशु सरीखे हो, विचार करो; और हे मूर्खों तुम कब तक बुद्धिमान हो जाओगे?

भजन 94:9 जिसने कान दिया, क्या वह आप नहीं सुनता? जिसने आंख रची, क्या वह आप नहीं देखता?

भजन 94:10 जो जाति जाति को ताड़ना देता, और मनुष्य को ज्ञान सिखाता है, क्या वह न समझाएगा?

भजन 94:11 यहोवा मनुष्य की कल्पनाओं को तो जानता है कि वे मिथ्या हैं।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 94-96
  • रोमियों 15:14-33

रविवार, 15 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 3

 

            पिछले लेख में हमने सृष्टि की रचना से संबंधित कुछ वैज्ञानिक बातों के द्वारा देखा था कि वे बातें और जानकारियाँ परमेश्वर के वचन बाइबल का समर्थन करती हैं, और वैज्ञानिकों द्वारा उनके खोजे जाने से सदियों पहले, परमेश्वर ने अपने वचन में उन्हें लिखवा दिया था।

            आज हम देखेंगे कि किस प्रकार से अंतरिक्ष से संबंधित बातें भी यही दिखाती हैं कि वैज्ञानिकों की खोज परमेश्वर के वचन बाइबल के तथ्यों की ही पुष्टि करती है; जिसे वे नई खोज कहते हैं, वह बाइबल में हजारों वर्ष पहले ही लिख दी गई थी।

अंतरिक्ष अर्थात खगोल-शास्त्र से संबंधित कुछ तथ्यों पर ध्यान कीजिए:

·        दूरबीन और अंतरिक्ष में स्थापित किए गए हबल टेलिस्कोप से भी लगभग 4000 हजार वर्ष पहले बाइबल में व्यवस्थाविवरण 10:14 में "स्वर्ग(आकाश) और सबसे ऊंचा स्वर्ग (आकाश)" ("heavens and the highest heavens") तथा "सबसे ऊंचे स्वर्ग; heaven of heavens" (1 राजाओं 8:27) की बात लिखी है। अब दूरबीन तथा हबल टेलिस्कोप के द्वारा विज्ञान यह कहने पाया है कि आकाशमण्डल में एक तो हमारे चारों ओर का वातावरण वाला 'आकाश' है, तथा उससे आगे फिर सुदूर अंतरिक्ष है जिसमें सितारे और नक्षत्र आदि स्थित हैं।

·        बिना किसी उपकरण की सहायता के, मानवीय आँखों से देखे जा सकने वाले सितारों की संख्या लगभग 5000 ही आँकी गई है। दूरबीन के आविष्कार से हजारों वर्ष पहले, जब किसी भी मनुष्य के पास अंतरिक्ष में दूर तक देख पाने का कोई साधन नहीं था, आज से लगभग 2600 वर्ष पहले परमेश्वर ने अपने नबी, यिर्मयाह की भविष्यवाणी में अपने लोगों की संख्या में बढ़ोतरी की तुलना देने के लिए लिखवाया था, "जैसा आकाश की सेना की गिनती और समुद्र की बालू के किनकों का परिमाण नहीं हो सकता है उसी प्रकार मैं अपने दास दाऊद के वंश और अपने सेवक लेवियों को बढ़ा कर अनगिनत कर दूंगा" (यिर्मयाह 33:22); अर्थात समुद्र-तट  के बालू के किनकों के समान आकाशमंडल के सितारों की संख्या अनगिनत है। गैलीलियो ने 17वीं शताब्दी में दूरबीन का आविष्कार किया और आकाशमंडल के सितारों और नक्षत्रों को देखना तथा अध्ययन करना आरंभ किया, और पहचाना कि अंतरिक्ष कितना विशाल है और उसके खगोलीय पिंड कितने अनगिनत हैं। आज भी वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में अनेकों प्रकार के बहुत दूर तक देख पाने वाले उपकरणों के द्वारा अरबों-खरबों सितारों, नक्षत्रों, खगोल पिंडों के होने का अनुमान लगाया है, उनके बारे में बहुत सी बातों की खोज की है, किन्तु अंतरिक्ष की सीमाएं और सितारों की सही संख्या अभी भी एक अनुमान है, स्थापित तथ्य नहीं। यिर्मयाह में होकर परमेश्वर द्वारा बाइबल में लिखवाई गई बात, लिखवाए जाने के 2600 वर्ष बाद भी सही है, अकाट्य है।

·        यद्यपि सितारों, नक्षत्रों और विभिन्न खगोल पिंडों की कुल संख्या मनुष्य आज तक ठीक जान नहीं पाया है, किन्तु यह भी एक वैज्ञानिक तथ्य है कि यह संख्या चाहे बहुत विशाल हो, किन्तु अंततः सीमित (finite) है। बाइबल में परमेश्वर के एक अन्य नबी, यशायाह ने यह बात आज से लगभग 2750 वर्ष पहले अपने भविष्यवाणी की पुस्तक में परमेश्वर की प्रेरणा से लिख दी थी: "अपनी आंखें ऊपर उठा कर देखो, किस ने इन को सिरजा? वह इन गणों को गिन गिनकर निकालता, उन सब को नाम ले ले कर बुलाता है? वह ऐसा सामर्थी और अत्यन्त बली है कि उन में के कोई बिना आए नहीं रहता" (यशायाह 40:26)। न केवल यहाँ पर, वरन भजन संहिता में भी परमेश्वर ने लिखवा दिया था कि वह तारों को गिनता है, उनमें से प्रत्येक का नाम रखता है: "वह तारों को गिनता, और उन में से एक एक का नाम रखता है" (भजन 147:4) - अर्थात उनकी संख्या कितनी भी विशाल क्यों न हो, सीमित है।

·        दूरबीन के आविष्कार से सदियों पहले बाइबल में लिख दिया गया था कि प्रत्येक सितारा या नक्षत्र अपने आप में अनुपम है, अनूठा है:  "सूर्य का तेज और है, चान्‍द का तेज और है, और तारागणों का तेज और है, (क्योंकि एक तारे से दूसरे तारे के तेज में अन्तर है)" (1 कुरिन्थियों 15:41)। जिसे वैज्ञानिक अब जानने और पहचानने लगे हैं, वह बाइबल में लगभग दो हज़ार वर्ष पहले लिखा जा चुका था।

·        बाइबल में परमेश्वर ने बारंबार यह कहा है कि वह आकाश या आकाशमण्डल को 'तानता' या 'फैलाता' है:

o   अय्युब 9:8 – वह आकाशमण्डल को अकेला ही फैलाता है, और समुद्र की ऊंची ऊंची लहरों पर चलता है;

o    यशायाह 42:5 – ईश्वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को सांस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहोवा है, वह यों कहता है:

o   यिर्मयाह 51:15 – उसी ने पृथ्वी को अपने सामर्थ्य से बनाया, और जगत को अपनी बुद्धि से स्थिर किया; और आकाश को अपनी प्रवीणता से तान दिया है

o   ज़कर्याह 12:1 इस्राएल के विषय में यहोवा का कहा हुआ भारी वचन: यहोवा को आकाश का तानने वाला, पृथ्वी की नेव डालने वाला और मनुष्य की आत्मा का रचने वाला है, उसकी यह वाणी है

            बीसवीं सदी के आरंभिक समय तक भी वैज्ञानिकों (आईंस्टाईन सहित) का यही मानना था कि अंतरिक्ष या आकाशमण्डल गतिहीन या स्थिर (static) है। कुछ अन्य यह कहते थे कि गुरुत्वाकर्षण के बल के कारण अंतरिक्ष को सिकुड़ कर संक्षिप्त (collapsed) हो जाना चाहिए था। फिर खगोल-शास्त्री और अंतरिक्ष वैज्ञानिक एडविन हबल ने 1929 में यह दिखाया कि दूर स्थित नक्षत्र (galaxies) पृथ्वी से और भी दूर होते चले जा रहे हैं, तथा वे जितने अधिक दूर स्थित हैं, उतनी ही अधिक तेजी से और दूर होते चले जा रहे हैं। इस खोज ने अंतरिक्ष विज्ञान में खलबली मचा दी, और अनेकों नई धारणाओं को जन्म दिया, तथा आईंस्टाईन ने भी अपनी गलती को माना और सुधारा। जिसे अंतरिक्ष वैज्ञानिक आज तथ्य मानने लगे हैं, वह परमेश्वर ने 4000 वर्ष से भी पहले अपने वचन बाइबल में लिख दिया था।

·        बाइबल की प्राचीनतम पुस्तकों में से एक, अय्यूब की पुस्तक में, लगभग 4000 वर्ष पहले, परमेश्वर अय्यूब से प्रश्न करता है, “क्या तू कचपचिया (Pleiades) का गुच्छा गूंथ सकता वा मृगशिरा (Orion) के बन्धन खोल सकता है? ["Can you bind the cluster of the Pleiades, Or loose the belt of Orion?]” (अय्यूब 38:31)। यह विज्ञान को अब पता चला है कि कचपचिया (Pleiades) का गुच्छा गुरुत्वाकर्षण के बल के द्वारा परस्पर गूँथा या बंधा हुआ है; जबकि मृगशिरा (Orion) के बन्धन खुले हुए हैं और इस कारण उसके सितारे एक-दूसरे से दूर होते चले जा रहे हैं क्योंकि उनका परस्पर गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें एक साथ बांधे रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।

·        बाइबल में लगभग 3000 वर्ष पहले भजन 19:6 में, सूर्य के विषय लिखा है “वह आकाश की एक छोर से निकलता है, और वह उसकी दूसरी छोर तक चक्कर मारता है; और उसकी गर्मी सब को पहुंचती है।” एक समय था जब वैज्ञानिक बाइबल के इस पद का उपहास करते थे, और उन्हें लगता था कि यह पद पृथ्वी को केंद्र और सूर्य को उसके चारों ओर घूमने वाला बताता है। साथ ही, उनकी यह भी धारणा थी कि सूर्य अंतरिक्ष में अपने स्थान पर स्थिर (stationary) है। किन्तु अब विज्ञान यह जान गया है कि बाइबल की बात सही है, सूर्य एक स्थान पर स्थिर नहीं है, वरन वास्तव में अंतरिक्ष में एक बहुत विशाल चक्र की परिधि पर लगभग 600,000 मील प्रति घंटे की गति से चक्कर लगा रहा है।

 

            एक बार फिर, सृष्टि अपने सृष्टिकर्ता की पुष्टि करती है, उसकी महिमा करती है; उसके विरुद्ध कोई गवाही नहीं देती है। यही अद्भुत सृष्टिकर्ता, आपके प्रति अपने महान प्रेम के अंतर्गत, आपको अपने साथ रहने और संसार पर आने वाले विनाश से बच जाने के लिए निमंत्रण दे रहा है। क्योंकि उसने अपने इस महान प्रेम के अंतर्गत आपके पापों की सजा को अपने ऊपर लेकर क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा सह लिया, और आपके लिए उस सजा से मुक्त होने का प्रावधान तैयार कर के दे दिया है; इसलिए सच्चे मन और वास्तविक पश्चाताप से की गई आपकी एक प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मेरे पाप क्षमा करें, और मुझे अपनी शरण में ले लें; मुझे अपना लें” आपके अनन्तकाल को सदा के लिए बदल कर सुरक्षित कर देगी।

            क्या आप अपने सृष्टिकर्ता के इस प्रेम और क्षमा भरे निमंत्रण को स्वीकार करेंगे, और उसकी शरण में आ जाएँगे, और सुरक्षित हो जाएँगे? वह आपसे प्रेम करता है, आपका भला ही चाहता है, और आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

 

बाइबल पाठ: भजन 139:1-14

भजन 139:1 हे यहोवा, तू ने मुझे जांच कर जान लिया है।

भजन 139:2 तू मेरा उठना बैठना जानता है; और मेरे विचारों को दूर ही से समझ लेता है।

भजन 139:3 मेरे चलने और लेटने की तू भली भांति छानबीन करता है, और मेरी पूरी चालचलन का भेद जानता है।

भजन 139:4 हे यहोवा, मेरे मुंह में ऐसी कोई बात नहीं जिसे तू पूरी रीति से न जानता हो।

भजन 139:5 तू ने मुझे आगे पीछे घेर रखा है, और अपना हाथ मुझ पर रखे रहता है।

भजन 139:6 यह ज्ञान मेरे लिये बहुत कठिन है; यह गम्भीर और मेरी समझ से बाहर है।

भजन 139:7 मैं तेरे आत्मा से भाग कर किधर जाऊं? या तेरे सामने से किधर भागूं?

भजन 139:8 यदि मैं आकाश पर चढूं, तो तू वहां है! यदि मैं अपना बिछौना अधोलोक में बिछाऊं तो वहां भी तू है!

भजन 139:9 यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़ कर समुद्र के पार जा बसूं,

भजन 139:10 तो वहां भी तू अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा।

भजन 139:11 यदि मैं कहूं कि अन्धकार में तो मैं छिप जाऊंगा, और मेरे चारों ओर का उजियाला रात का अन्‍धेरा हो जाएगा,

भजन 139:12 तौभी अन्धकार तुझ से न छिपाएगा, रात तो दिन के तुल्य प्रकाश देगी; क्योंकि तेरे लिये अन्धियारा और उजियाला दोनों एक समान हैं।

भजन 139:13 मेरे मन का स्वामी तो तू है; तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा।

भजन 139:14 मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूं। तेरे काम तो आश्चर्य के हैं, और मैं इसे भली भांति जानता हूं।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 91-93
  • रोमियों 15:1-13 

शनिवार, 14 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 2

 

            पिछले लेख में हमने देखा था कि सृष्टि अपने सृष्टिकर्ता के विरुद्ध गवाही नहीं देगी, उसका इनकार नहीं करेगी। परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखा है: 

·        भजन 19:1-3 — “आकाश ईश्वर की महिमा वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है। दिन से दिन बातें करता है, और रात को रात ज्ञान सिखाती है। न तो कोई बोली है और न कोई भाषा जहां उनका शब्द सुनाई नहीं देता है।”

·        यिर्मयाह 10:12 — “उसी [परमेश्वर] ने पृथ्वी को अपनी सामर्थ्य से बनाया, उसने जगत को अपनी बुद्धि से स्थिर किया, और आकाश को अपनी प्रवीणता से तान दिया है।”

·        रोमियों 1:20 "क्योंकि उस [परमेश्वर] के अनदेखे गुण, अर्थात उस की सनातन सामर्थ्य, और परमेश्वरत्व जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते है, यहां तक कि वे निरुत्तर हैं।"

साथ ही हमने इस पर भी ध्यान किया था कि बाइबल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गई पुस्तक नहीं है, और इसकी विभिन्न पुस्तकें, जब अपने-अपने समय में लिखी गई थीं, तो साधारण सामान्य लोगों के पढ़ने, सुनने और समझने के लिए लिखी गई थीं, जिनमें से अधिकांश अशिक्षित या बहुत कम शिक्षा-प्राप्त होते थे; तथा विज्ञान जैसा आज है, वैसा उस समय नहीं था। इसलिए, बाइबल में विज्ञान की बातें, न तो वैज्ञानिक शब्दावली में दी गई हैं, और न ही किसी वैज्ञानिक व्याख्या अथवा चर्चा के समान दी गई हैं। वरन उन शिक्षाओं और चर्चाओं में जो उन पुस्तकों में है, ये बातें सामान्य साधारण भाषा में सम्मिलित की गई हैं। आज हम सृष्टि से संबंधित कुछ बातों को देखेंगे, जो बाइबल की पुस्तकों में तो हजारों वर्षों से विद्यमान हैं, किन्तु विज्ञान और वैज्ञानिकों ने उन्हें कुछ सदियों अथवा दशकों पहले जाना है। सृष्टि से संबंधित कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को देखते हैं जो बाइबल की पुस्तकों में पहले से विद्यमान हैं:

·        सृष्टि की हर चीज अति-सूक्ष्म कणों से बनी है जो आँखों से नहीं देखे जा सकते हैं, अनदेखे हैं:  - इब्रानियों 11:3 "विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।"

·        सृष्टि का एक समय पर आरंभ हुआ है: बीसवीं सदी के आरंभ में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्बर्ट आईनस्टाईन के कार्यों के बाद से विज्ञान ने यह स्वीकार करना आरंभ किया कि सृष्टि का किसी समय पर आरंभ हुआ था; जबकि उससे पहले अधिकांश लोग यही मानते थे कि सृष्टि अनन्त काल से चली आ रही है। जबकि बाइबल के पहले ही पद में इस 'आरंभ' को बताया गया है: उत्पत्ति 1:1 "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" और , इब्रानियों 1:10 "और यह कि, हे प्रभु, आदि में तू ने पृथ्वी की नेव डाली, और स्वर्ग तेरे हाथों की कारीगरी है।"

·        विज्ञान इस सृष्टि को चार बातों के अंतर्गत व्यक्त करता है – समय (Time), स्थान (Space), पदार्थ (Matter), और ऊर्जा (Energy)। सारी सृष्टि इन्हीं चार बातों से संबंधित नियमों तथा कार्यों और इनके परस्पर सामंजस्य तथा व्यवहार के द्वारा कार्य कर रही है। बाइबल के पहले तीन पद, सृष्टि के साथ इन चारों बातों को बताते हैं: उत्पत्ति 1:1-3 “आदि [समय/Time] में परमेश्वर ने आकाश [स्थान/Space] और पृथ्वी [पदार्थ/Matter] की सृष्टि की। और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था। तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला [रौश्नी – ऊर्जा/Energy] हो: तो उजियाला हो गया।”

·        थर्मोडायनमिक्स का प्रथम नियम स्थापित किया गया: समस्त सृष्टि में विद्यमान ऊर्जा और पदार्थ के व्यवहार की व्याख्या करने वाले थर्मोडायनमिक्स के तीन सिद्धांत हैं। इनमें से प्रथम सिद्धांत कहता है कि समस्त सृष्टि में विद्यमान कुल ऊर्जा और पदार्थ के मात्रा स्थाई है – ऊर्जा और मात्र परस्पर परिवर्तित हो सकते हैं, किन्तु उनका कुल योग बढ़ या घट नहीं सकता है। बाइबल की पहली पुस्तक में ही लिख दिया गया था कि परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की समाप्ति भी की; और उस समाप्ति के बाद उसमें फिर कभी और कुछ बढ़ाया या घटाया नहीं गया है: उत्पत्ति 2:1-2 “यों आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया। और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया। और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया­ इसके बाद से सृष्टि का सारा कार्य उसी प्रथम रचना के समय में सृजे गए पदार्थ (Matter) और ऊर्जा (Energy) के माध्यम से ही हो रहा है।

·        थर्मोडायनमिक्स का द्वितीय नियम स्थापित किया गया: थर्मोडायनमिक्स का द्वितीय नियम है कि सृष्टि की हर वस्तु क्षय होती जा रही है, नष्ट हो रही है, निरंतर घटती, और अव्यवस्थित होती जा रही है (Entropy – deteriorating or running down)। पहले लोगों का मानना था कि सृष्टि अपरिवर्तनीय है। किन्तु अब विज्ञान ने पहचाना है कि ऐसा नहीं है, सारी सृष्टि की हर वस्तु इस दूसरे नियम के अनुसार क्षय होती चली जा रही है (Evolution या क्रमिक विकासवाद इस दूसरे नियम के विरुद्ध है, क्योंकि उसके अनुसार विकासवाद में जीव-जन्तु सुधरते और उन्नत होते चले गए, और अभी भी यही हो रहा है)। किन्तु बाइबल में इस क्षय होने को पहले ही लिख दिया गया था: भजन 102:25-26 “आदि में तू ने पृथ्वी की नेव डाली, और आकाश तेरे हाथों का बनाया हुआ है। वह तो नाश होगा, परन्तु तू बना रहेगा; और वह सब कपड़े के समान पुराना हो जाएगा। तू उसको वस्त्र के समान बदलेगा, और वह तो बदल जाएगा;”; तथा इब्रानियों 1:11-12 “वे तो नाश हो जाएंगे; परन्तु तू बना रहेगा: और वे सब वस्त्र के समान पुराने हो जाएंगेऔर तू उन्हें चादर के समान लपेटेगा, और वे वस्त्र के समान बदल जाएंगे: पर तू वही है और तेरे वर्षों का अन्त न होगा।”

       साथ ही बाइबल यह भी बताती है कि यह क्षय होना सृष्टि में पाप के प्रवेश के द्वारा हुआ: उत्पत्ति 3:17 “और आदम से उसने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साथ खाया करेगा” तथा “रोमियों 8:20-22 क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करने वाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई। कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी। क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है।”

 

बाइबल पाठ: भजन 89:11-18

भजन 89:11 आकाश तेरा है, पृथ्वी भी तेरी है; जगत और जो कुछ उस में है, उसे तू ही ने स्थिर किया है।

भजन 89:12 उत्तर और दक्खिन को तू ही ने सिरजा; ताबोर और हर्मोन तेरे नाम का जयजयकार करते हैं।

भजन 89:13 तेरी भुजा बलवन्त है; तेरा हाथ शक्तिमान और तेरा दाहिना हाथ प्रबल है।

भजन 89:14 तेरे सिंहासन का मूल, धर्म और न्याय है; करुणा और सच्चाई तेरे आगे आगे चलती है।

भजन 89:15 क्या ही धन्य है वह समाज जो आनन्द के ललकार को पहचानता है; हे यहोवा, वे लोग तेरे मुख के प्रकाश में चलते हैं,

भजन 89:16 वे तेरे नाम के हेतु दिन भर मगन रहते हैं, और तेरे धर्म के कारण महान हो जाते हैं।

भजन 89:17 क्योंकि तू उनके बल की शोभा है, और अपनी प्रसन्नता से हमारे सींग को ऊंचा करेगा।

भजन 89:18 क्योंकि हमारी ढाल यहोवा की ओर से है हमारा राजा इस्राएल के पवित्र की ओर से है।।

 

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 89-90
  • रोमियों 14

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 1

 

            एक आम धारणा है कि बाइबल और विज्ञान परस्पर सहमत नहीं हैं, और बाइबल की बातें विज्ञान के समक्ष ठहर नहीं पाती हैं, क्योंकि वे सभी काल्पनिक किस्से-कहानियाँ हैं; निराधार बातें हैं। यदि थोड़ा थम कर सोचा जाए, कि विज्ञान क्या  है, तो एक भिन्न ही चित्र हमारे सामने उभर कर आता है। विज्ञान हमारे संसार और सृष्टि की रचना और संचालन, सृष्टि के सभी कार्यों तथा कार्यविधियों का अध्ययन है। जैसे-जैसे नई बातें सामने आती जाती हैं, उन नई बातों के संदर्भ में पुरानी बातों और धारणाओं की समीक्षा, विश्लेषण, और पुनः अवलोकन भी होता रहता है। इस कारण विज्ञान सदा परिवर्तनशील रहता है। आज जो सत्य है, कल किसी अन्य बात की खोज या किसी अन्य तथ्य के सामने आने के कारण वही असत्य भी हो सकता है, बदला भी जा सकता है। विज्ञान के कितने ही सिद्धांत जो पहले तथ्य के रूप में बताए और सिखाए जाते थे, वे बदले जा चुके हैं।

            परन्तु  एक अन्य, सत्य किन्तु काम ही जानी तथा मानी जाने वाली बात यह भी है कि विज्ञान की बातों की आधार पर तर्क देने वाले सभी जन अब यथार्थ और सत्यवादी नहीं रह हैं। अब सामान्य धारणा जैसे भी हो सके परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार करने और बाइबल को गलत प्रमाणित करने की है। इसलिए विज्ञान के बहुत से तथ्य, खोज, जानकारियाँ, जो प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध हैं, उन्हें दबा दिया जाता है, उनकी चर्चा नहीं की जाती है, उन्हें प्रमुखता प्रदान नहीं की जाती है, और उनकी उपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए “Evolution Hoaxes” अर्थात, क्रमिक विकसवाद में छल को लेकर इंटरनेट पर ढूंढ लीजिए, और आप विस्मित रह जाएँगे कि कितनी बातें छिपाई गई हैं कितने तथ्य दबाए गए हैं, और किस प्रकार से सही को दबा कर गलत को प्रमुख करने के द्वारा इस अस्वीकार्य धारणा को स्वीकार्य बनाने के प्रयास किए जाते रहे हैं, और अभी भी हो रहे हैं।

            कुछ दशक पहले अणु को पदार्थ का सबसे सूक्ष्म कण समझा जाता था; कुछ ही समय में अणु के स्थान पर परमाणु को सबसे सूक्ष्म कण कहा जाने लगा; फिर पता चला कि परमाणु तीन अति-सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है; और अब परमाणु की रचना करने वाले सूक्ष्म कणों की संख्या और अधिक हो गई है। साथ ही यह भी समझा जा रहा है कि ये कण अपने आप में कोई ठोस पदार्थ नहीं हैं वरन ऊर्जा का एक स्वरूप हैं। अब यह दिमाग को चकरा देने वाली बात है कि हम और हमारे चारों के ओर के सभी पदार्थ, चाहे वे ठोस हों, या द्रव्य हों, अथवा गैस हों, किसी ठोस पदार्थ से नहीं वरन ऊर्जा के विशिष्ट रीति से एकत्रित होकर एक विशेष रीति से व्यवहार और कार्य करने के द्वारा अस्तित्व में आए हैं। कैसे, वह जो पदार्थ नहीं है, उसने पदार्थ का स्वरूप और गुण प्राप्त कर लिया और सृष्टि की हर वस्तु, बात, और रूप में आ गया? और वह भी स्वतः ही, क्योंकि विज्ञान तो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता है! क्योंकि यह बात विज्ञान और वैज्ञानिक कहते हैं, इसलिए संसार के लोग इसे स्वीकार करते हैं, मानते हैं, और इसमें कोई त्रुटि होने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। किन्तु यही असंभव प्रतीत होने वाले बात यदि बाइबल में लिखी होती, तो इसका उपहास होता, आलोचना होती, और इसपर विश्वास करने में लोगों को बहुत समस्या होती। अब क्या विज्ञान भी व्यक्तिगत विश्वास की बात नहीं है?

            यह भी माना जाता था कि रौश्नी की गति एक ही रहती है, बदलती नहीं है; और यह भी  माना जाता था कि अंतरिक्ष वैक्यूम या शून्य है जिसमें रौश्नी निर्बाद्ध जाती है। किन्तु अब यह पता चल चुका है कि रौश्नी की गति हर स्थिति में एक ही नहीं रहती है, बदल सकती है; और अंतरिक्ष वैक्यूम या शून्य नहीं है, वरन अति-सूक्ष्म कण विद्यमान हैं जो रौश्नी की गति को प्रभावित कर सकते हैं। तो फिर अब उन धारणाओं और सिद्धांतों का क्या जो इस आधार पर बनाए गए थे कि रौश्नी की गति अपरिवर्तनीय है तथा अंतरिक्ष वैक्यूम या शून्य है, जिसके आधार पर सितारों और नक्षत्रों की पृथ्वी से दूरी और उनकी गति आदि का आँकलन किया गया है ?

            चिकित्सा विज्ञान में आए दिन परिवर्तन होते रहते हैं, और जो कभी इलाज के स्थापित तरीके माने जाते थे, उनमें कितने ही परिवर्तन आ चुके हैं, और उन पुराने इलाजों को अब कोई स्वीकार नहीं करता है। इसी प्रकार जीव-विज्ञान, भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र आदि में भी बहुत सी बातों में परिवर्तन आए हैं। इसलिए यह मान लेना कि विज्ञान की बातें सदा ही दृढ़ और स्थिर तथा अपरिवर्तनीय रहती हैं, सदा सत्य ही होती हैं, सत्य नहीं है। विज्ञान की बातें भी बदलती रहती हैं। केवल एक ही सदा स्थिर, दृढ़ और अपरिवर्तनीय है - परमेश्वर और उसका शाश्वत वचन।

            बाइबल के अनुसार, यह समस्त सृष्टि, जिसे अभी तक वैज्ञानिक ठीक से देख और समझ नहीं पाए हैं, और जिसकी जटिलता तथा बारीकियों को लेकर आए दिन अचरज में पड़ते रहते हैं, परमेश्वर द्वारा बनाई गई है। अब यह कैसे संभव है कि परमेश्वर की रची गई सृष्टि उसके ही विरुद्ध गवाही देगी? सृष्टि का अध्ययन सृष्टिकर्ता परमेश्वर के अस्तित्व को ही नकार देगा? वरन, इसके विपरीत, सृष्टि तो अपने सृष्टिकर्ता के पक्ष में बताएगी; उसकी अद्भुत बुद्धिमता और कारीगरी की पुष्टि करेगी – यदि उसे ठीक से देखा, परखा, पहचान, और समझा जाए तो। यह बात बाइबल के साथ भी पूर्णतः लागू होती है। बाइबल अवैज्ञानिक नहीं है; और न ही सभी वैज्ञानिक बाइबल को गलत समझते हैं। तथ्य तो ये है कि संसार के महानतमवैज्ञानिकों में से अधिकांश, जैसे के न्यूटन, फैराडे, रॉबर्ट बॉयल, जेम्स मैक्सवेल,बाइबल पर विश्वास करते थे; वर्तमान सदी के भी अनेकों वैज्ञानिक मसीही हैं विज्ञान की बातें बाइबल की बातों को गलत नहीं प्रमाणित करती हैं। परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में हजारों और सैकड़ों वर्ष पहले अनेकों बातें लिखवा दी थीं, जिन्हें विज्ञान ने बहुत बाद में, या कुछ समय पहले ही पहचाना है।

            बाइबल में लिखी इन बातों को पहचानने में सहायक होने के लिए एक आधारभूत बात का ध्यान रखना होगा - जिस समय और जिन परिस्थितियों में बाइबल की पुस्तकें, अपने-अपने समय में लिखी गईं थीं, तब विज्ञान इस स्वरूप में नहीं था जैसा आज है, और न ही वैज्ञानिक शब्दावली, जो वर्तमान में होती है, प्रयोग हुआ करती थी। बाइबल की बातें सामान्य, साधारण लोगों के लिए लिखी गई थीं; ऐसे लोगों के लिए, जिनमें से बहुत ही कम शिक्षित होते थे, या कुछ गूढ़ समझने की क्षमता रखते थे। बाइबल की बातें उनके दिन-प्रतिदिन के जीवन और व्यवहार के संदर्भ में लिखी गई थीं, इसलिए उन बातों को लिखने के लिए उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया है, जो उन लोगों के लिए सहज और समझ में आने वाली हो। बाइबल वैज्ञानिक सिद्धांत बताने या समझाने के दृष्टिकोण से लिखी गई विज्ञान की पुस्तक नहीं है। किन्तु फिर भी इन सीमाओं में भी परमेश्वर ने अपने वचन में ऐसी बहुत सी बातें लिखवाई हैं, जो जनसाधारण के लिए भी उपयोगी हैं, किन्तु उन में विज्ञान के रहस्य भी सांकेतिक अथवा प्रत्यक्ष रीति से लिखे गए हैं, और जिन्हें वर्तमान समय में पहचाना गया है, तथा बाइबल के ज्ञाताओं ने दिखाया है कि ये बाइबल में पहले से लिखा था। हम अगले लेख में ऐसी ही कुछ बातों को देखेंगे।

 

बाइबल पाठ: भजन 86:11-17

भजन 86:11 हे यहोवा अपना मार्ग मुझे दिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूंगा, मुझ को एक चित्त कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूं।

भजन 86:12 हे प्रभु हे मेरे परमेश्वर मैं अपने सम्पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम की महिमा सदा करता रहूंगा।

भजन 86:13 क्योंकि तेरी करुणा मेरे ऊपर बड़ी है; और तू ने मुझ को अधोलोक की तह में जाने से बचा लिया है।।

भजन  86:14 हे परमेश्वर अभिमानी लोग तो मेरे विरुद्ध उठे हैं, और बलात्कारियों का समाज मेरे प्राण का खोजी हुआ है, और वे तेरा कुछ विचार नहीं रखते।

भजन 86:15 परन्तु प्रभु तू दयालु और अनुग्रहकारी ईश्वर है, तू विलम्ब से कोप करने वाला और अति करुणामय है।

भजन 86:16 मेरी ओर फिर कर मुझ पर अनुग्रह कर; अपने दास को तू शक्ति दे, और अपनी दासी के पुत्र का उद्धार कर।।

भजन 86:17 मुझे भलाई का कोई लक्षण दिखा, जिसे देख कर मेरे बैरी निराश हों, क्योंकि हे यहोवा तू ने आप मेरी सहायता की और मुझे शान्ति दी है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 87-88
  • रोमियों 1