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शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 9

 

पाप का समाधान - उद्धार - 5

       पिछले चार लेखों से हम बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए प्रथम पाप और उसके परिणामों और प्रभावों के विवरण पर आधारित पाप के समाधान, तथा उद्धार से संबंधित तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों को देख रहे हैं। हमने पहले प्रश्न –उद्धार किससे और क्योंपर विचार करने और उसके निष्कर्ष पर पहुँचने के पश्चात, पिछले लेख में दूसरे प्रश्नव्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?” पर विचार आरंभ किया था। इस दूसरे प्रश्न के अंतर्गत हमें देखा कि पाप व्यक्ति के द्वारा व्यक्तिगत रीति से की गई परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता है; जब प्रथम पाप किया गया, उस समय न तो वहाँ कोई धर्म था, और न ही किसी धर्म का कोई उल्लंघन हुआ, और न ही परमेश्वर ने किसी धर्म के द्वारा उस पाप के समाधान और निवारण की बात की। पाप करने का आधार तथा कारण मनुष्य का परमेश्वर की मनुष्य के प्रति योजनाओं और इच्छाओं में अविश्वास करना था। इसीलिए, परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन में आई पाप की इस समस्या का समाधान मनुष्य के स्वेच्छा और सच्चे मन से उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता में आ जाने और पापों से पश्चाताप तथा प्रभु यीशु मसीह को उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेने और उसके साथ उस खोए हुए विश्वास के संबंध को बहाल कर लेने के द्वारा दिया। 

पाप के इस समाधान में निहित कुछ अन्य आधारभूत और अति महत्वपूर्ण तात्पर्य हैं। इस संबंध की पुनः स्थापना के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रीति से इन तात्पर्यों को भी स्वीकार करना और उनके अनुसार अपने जीवन के विषय निर्णय लेना और जीवन को सुधारना भी अनिवार्य है। 

ये निहित तात्पर्य हैं:

  • क्योंकि पाप का प्रवेश व्यक्तिगत अनाज्ञाकारिता के कारण हुआ - अनाज्ञाकारी होकर उस वर्जित फल को हव्वा ने भी खाया और आदम ने भी खाया (उत्पत्ति 3:6), इसीलिए पाप का समाधान और निवारण भी किसी धर्म विशेष को मानने वाले परिवार में जन्म लेने, और उस धर्म से संबंधित रीति-रिवाज़ों के निर्वाह के द्वारा नहीं, वरन, प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने पापों के लिए परमेश्वर के समक्ष व्यक्तिगत पश्चाताप, परमेश्वर को सम्पूर्ण समर्पण, और फिर उसकी आज्ञाकारिता में बने रहने के निर्णय के द्वारा ही है। 
  • यह समाधान पैतृक विरासत अथवा वंशागत नहीं व्यक्तिगत है; अर्थात, माता-पिता या परिवार के किसी अन्य सदस्य अथवा परिवार के प्राचीनों के पश्चाताप और समर्पण के द्वारा उनकी संतान, संबंधी, और भावी पीढ़ी उद्धार नहीं पाती है। हर पीढ़ी, और हर व्यक्ति को, अपने पापों के लिए स्वयं ही पश्चाताप और समर्पण करना होता हैपरन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (यूहन्ना 1:12-13) 
  • कोई भी व्यक्ति मसीही विश्वासी के रूप में जन्म नहीं लेता है; प्रत्येक व्यक्ति को मसीही विश्वासी तथा परमेश्वर की संतान बनने के लिए शारीरिक जन्म के बाद स्वेच्छा और सच्चे समर्पण के द्वारा, परमेश्वर के परिवार में, एक आत्मिक जन्म लेना पड़ता है – अपने पापों के पश्चाताप और प्रभु यीशु मसीह को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करने के द्वारा यह नया जन्मलेना पड़ता है। उसके सांसारिक परिवार के लोगों और पूर्वजों की धार्मिकता और उनका उद्धार, उसे उद्धार प्रदान नहीं करते हैं। 
  • मनुष्य किसी भी प्रकार से परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए इस सिद्ध कार्य को न तो संवार सकता है, न ही सुधार कर और बेहतर कर सकता है। अपनी बुद्धि, समझ, और योजनाओं को इसमें मिलाने के द्वारा इसे बिगाड़ कर व्यर्थ अवश्य कर सकता हैक्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे” (1 कुरिन्थियों 1:17) 
  • इस उद्धार के लिए जो भी करना था, जो भी कीमत चुकानी थी, वह सब कुछ परमेश्वर ने पूर्णतः कर के दे दिया है। मनुष्य को परमेश्वर द्वारा किए गए इस उद्धार के कार्य में अब और कुछ नहीं जोड़ना है, कुछ नहीं करना है, “क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारा निकम्मा चाल-चलन जो बाप दादों से चला आता है उस से तुम्हारा छुटकारा चान्दी सोने अर्थात नाशमान वस्तुओं के द्वारा नहीं हुआ। पर निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने अर्थात मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा हुआ” (1 पतरस 1:18-19)। न कोई कर्म-कांड, न कोई विधि-विधान, न किसी अन्य मनुष्य की मध्यस्थता अथवा सहयोग की आवश्यकता। बस स्वेच्छा से प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेना है, उसके प्रति समर्पित होकर, अपने जीवन को उसके प्रति आज्ञाकारी कर लेना है – इसे ही नया जन्म पाना कहते हैं, जिसके बिना कोई स्वर्ग में प्रवेश तो दूर, उसे देख भी नहीं सकता हैयीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता” “यीशु ने उत्तर दिया, कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता” (यूहन्ना 3:3, 5) 
  • बाइबल यह स्पष्ट बताती है कि मनुष्य के लिए धर्म के निर्वाह की धार्मिकता अपर्याप्त हैक्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे” (मत्ती 5:20); परमेश्वर के दृष्टि में मैले चिथड़ों के समान व्यर्थ है “हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6)। 

 

       पाप और उद्धार से संबंधित चर्चा के इस महत्वपूर्ण दूसरे प्रश्न का निष्कर्ष है कि पाप का समाधान और उद्धार किसी धर्म के कार्य अथवा धर्म के निर्वाह के द्वारा नहीं है; न ही यह किसी धर्म विशेष की बात है; और न ही पैतृक अथवा वंशागत है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पापों के लिए स्वयं पश्चाताप करना होगा, उनके लिए स्वयं प्रभु यीशु से क्षमा माँगनी होगी, स्वयं ही अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित करना होगा, उसका आज्ञाकारी शिष्य बनने का स्वयं ही निर्णय लेना होगा।

     क्या आपने वास्तव में उद्धार पाया है? यदि नहीं, तो स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 

बाइबल पाठ: रोमियों 7:15-8:1

रोमियों 7:15 और जो मैं करता हूं, उसको नहीं जानता, क्योंकि जो मैं चाहता हूं, वह नहीं किया करता, परन्तु जिस से मुझे घृणा आती है, वही करता हूं।

रोमियों 7:16 और यदि, जो मैं नहीं चाहता वही करता हूं, तो मैं मान लेता हूं, कि व्यवस्था भली है।

रोमियों 7:17 तो ऐसी दशा में उसका करने वाला मैं नहीं, वरन पाप है, जो मुझ में बसा हुआ है।

रोमियों 7:18 क्योंकि मैं जानता हूं, कि मुझ में अर्थात मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते।

रोमियों 7:19 क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूं, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता वही किया करता हूं।

रोमियों 7:20 परन्तु यदि मैं वही करता हूं, जिस की इच्छा नहीं करता, तो उसका करने वाला मैं न रहा, परन्तु पाप जो मुझ में बसा हुआ है।

रोमियों 7:21 सो मैं यह व्यवस्था पाता हूं, कि जब भलाई करने की इच्छा करता हूं, तो बुराई मेरे पास आती है।

रोमियों 7:22 क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूं।

रोमियों 7:23 परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है, और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है।

रोमियों 7:24 मैं कैसा अभागा मनुष्य हूं! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?

रोमियों 7:25 मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं: निदान मैं आप बुद्धि से तो परमेश्वर की व्यवस्था का, परन्तु शरीर से पाप की व्यवस्था का सेवन करता हूँ।

रोमियों 8:1 सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।

एक साल में बाइबल:

·      भजन 140-142

·      1 कुरिन्थियों 14:1-20

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 8

 

पाप का समाधान - उद्धार - 4 

 पिछले तीन लेखों में हमने उद्धार से संबंधित पहले प्रश्न –उद्धार किससे और क्योंको बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए विवरण के अनुसार विस्तार से देखा है; और पिछले लेख में हम इस प्रश्न के निष्कर्ष पर पहुंचे थे। निष्कर्ष में हमें दोनों बातों, “उद्धार किससेतथाउद्धार क्योंको देखा था, जो संक्षेप में इस प्रकार है:

  • किस से - उद्धार या बचाव पाप के दुष्प्रभावों से होना है, जिन के कारण मनुष्यों में आत्मिक एवं शारीरिक मृत्यु, डर, अहं, दोष, लज्जा, परमेश्वर से दूरी, अपनी गलतियों के लिए बहाने बनाना तथा दूसरों पर दोषारोपण करने, परमेश्वर की कृपा को नजरंदाज करने जैसी प्रवृत्ति और भावनाएं आ गई हैं।
  • क्यों - क्योंकि हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर हमारे पापों में पड़े हुए होने की दशा में भी, हम सभी मनुष्यों से अभी भी प्रेम करता है, हमारे साथ संगति में रखना चाहता है; वह चाहता है कि हम उस से मेल-मिलाप कर लें, और उसके पुत्र-पुत्री होने के दर्जे को स्वीकार कर लें (यूहन्ना 1:2-13)। वह हमें विनाश में नहीं आशीष में देखना चाहता है और अपने साथ स्वर्ग में स्थान देना चाहता है। परमेश्वर की इस मनसा को स्वीकार करना अथवा नहीं करना, प्रत्येक मनुष्य का अपना निर्णय है।

 

       आज से हम दूसरे प्रश्न, “व्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?” पर विचार आरंभ करेंगे, और हमारे विचार का आधार बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिया गया पहले पाप का विवरण ही रहेगा। 

हम देख चुके हैं कि उद्धार, उस प्रथम पाप द्वारा कार्यान्वित हुई विनाशक प्रक्रिया और उसके परिणामों को उलट कर वापस सृष्टि के समय की हमारी प्रथम स्थिति में बहाल किए जाने, तथा परिणामस्वरूप परमेश्वर के साथ टूटी हुई इस संगति में पुनः पहले के समान स्थापित हो जाना, तथा मृत्यु अर्थात परमेश्वर से उस अनन्त दूरी से बच जाना है।

 

मनुष्य उद्धार कैसे प्राप्त करे के संदर्भ में कुछ अति-महत्वपूर्ण, समझने के लिए अनिवार्य, एवं समाधान के लिए निर्णायक बातों पर ध्यान कीजिए: 

  • मनुष्य के उस प्रथम पाप के कारण किसी धर्म के निर्वाह का उल्लंघन नहीं हुआ था – क्योंकि जब वह प्रथम पाप हुआ, तब वहाँ कोई धर्म तो था ही नहीं! क्योंकि परमेश्वर का न तो कोई धर्म है, और न ही परमेश्वर ने कभी कोई भी धर्म बनाया अथवा बनवाया। संसार के सभी धर्म, ईसाई धर्म सहित, पाप में गिरे हुए मनुष्य के मन और विचारों की उपज हैं और पाप के कारण मनुष्यों में आई हुई परमेश्वर से विमुख कर देने वाली प्रवृत्ति एवं मानसिकता, मनुष्य को परमेश्वर की ओर फेर देना वाला उपाय नहीं प्रदान कर सकती हैअशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:4) 
  • इसीलिए, अपने सभी दावों और आश्वासनों के बावजूद, आज तक कभी भी कोई भी धर्म किसी भी मनुष्य को निष्पाप, पवित्र, और परमेश्वर के समक्ष खड़ा होने योग्य नहीं बना सका हैहम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6) 
  • मनुष्य को पाप से उभारने का एक मात्र उपाय पापों से पश्चाताप करना, उनके लिए प्रभु यीशु मसीह से क्षमा माँगना, और स्वेच्छा तथा सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बनना, ईसाई या किसी धर्म में नहीं मसीही विश्वास में आना है, “इसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30)यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा। क्योंकि धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है” (रोमियों 10:9-10)
  • क्योंकि पाप धर्म के उल्लंघन से नहीं है, इसलिए इसके निवारण में भी किसी भी धर्म का (वह चाहे कोई भी धर्म, चाहे ईसाई धर्म ही क्यों न हो), कोई भी स्थान या महत्व नहीं हैक्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है। और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफिसियों 2:8-9) 
  • समस्या व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर और मनुष्य के मध्य विश्वास में विच्छेद से उत्पन्न हुई; आदम और हव्वा ने व्यक्तिगत रीति से, अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार, अनाज्ञाकारिता, अर्थात, पाप करने का निर्णय लिया। मनुष्य ने शैतान की बातों में आकर परमेश्वर की कही बातों, उसके द्वारा मनुष्य के लिए दिए प्रावधानों, तथा मनुष्य के प्रति परमेश्वर की इच्छा तथा योजना के सर्वोत्तम और भले होने पर अविश्वास किया; और इसी अविश्वास के अन्तर्गत मनुष्य ने अपनी समझ-बूझ, अपने आँकलन को परमेश्वर की समझ-बूझ और उसके आँकलन से बेहतर समझा, जिसके कारण फिर उन्होंने परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता भी की। 
  • इसीलिए प्रत्येक मनुष्य के पाप का समाधान भी परमेश्वर और प्रत्येक मनुष्य के मध्य व्यक्तिगत रीति से विश्वास को पुनः स्थापित करने के द्वारा ही है। 
  • इसके लिए अनिवार्य है कि प्रत्येक मनुष्य स्वेच्छा से परमेश्वर की हर बात को, हर बात के लिए परमेश्वर की समझ-बूझ और हर बात के लिए परमेश्वर के आँकलन एवं समाधान को, अपनी बात, अपनी समझ-बूझ और अपने आँकलन से उत्तम तथा सर्वोपरि स्वीकार करे, और अपने आप को, अपनी हर सोच-समझ, दृष्टिकोण, प्रवृत्ति, सूझ-बूझ और व्यवहार को पूर्णतः परमेश्वर के हाथों में समर्पित कर दे। 
  • अपनी नहीं वरन केवल और केवल परमेश्वर के कहे के अनुसार ही करे - उस आज्ञाकारिता की दशा में आ जाए, जिसमें उसकी रचना की गई थी, और जिसके निर्वाह के लिए उसे कहा गया था।

 

       हम इस प्रश्न पर विचार को ज़ारी रखेंगे; किन्तु अभी के लिए आपके सामने यह प्रश्न है - आप अपने आप को परमेश्वर के समक्ष ग्रहण योग्य किस प्रकार बना रहे हैं - अपने धर्म-कर्म के द्वारा, अथवा प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा? परमेश्वर के वचन बाइबल में दिया गया उद्धार का मार्ग केवल प्रभु यीशु मसीह ही हैयीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता” (यूहन्ना 14:6)। यदि आपने अभी तक उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार नहीं किया है, तो अभी यह करने का अवसर आपके पास है। आपकी स्वेच्छा, सच्चे मन और अपने पापों के लिए पश्चाताप के साथ की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मैं मान लेता हूँ कि मैंने मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता करके पाप किया है। मैं धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे स्थान पर उनके मृत्यु-दण्ड को कलवरी के क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा सह लिया। आप मेरे स्थान पर मारे गए, और मेरे उद्धार के लिए मृतकों में से जी भी उठे। कृपया मुझ पर दया करें और मेरे पाप क्षमा करें। मुझे अपना शिष्य बना लें, और अपनी आज्ञाकारिता में अपने साथ बना कर रखेंआपको पाप के विनाश से निकालकर परमेश्वर के साथ संगति और उसकी आशीषों में लाकर खड़ा कर देगी। क्या आप यह प्रार्थना अभी समय रहते करेंगे - निर्णय आपका है?

 

बाइबल पाठ: रोमियों 5:1-10 

रोमियों 5:1 ​सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।

रोमियों 5:2 जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।

रोमियों 5:3 केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज।

रोमियों 5:4 ओर धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है।

रोमियों 5:5 और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।

रोमियों 5:6 क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा।

रोमियों 5:7 किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो र्दुलभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे।

रोमियों 5:8 परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

रोमियों 5:9 सो जब कि हम, अब उसके लहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे?

रोमियों 5:10 क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 137-139

·      1 कुरिन्थियों 13

बुधवार, 1 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 7


पाप का समाधान - उद्धार - 3

       पिछले दो लेखों में हमने उद्धार से संबंधित पहले प्रश्न – “उद्धार किससे और क्यों” को देखा है। बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए विवरण के अनुसार इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए, आज हम इस प्रश्न के निष्कर्ष को देखेंगे। 

       पिछले लेखों में हमने देखा था कि पाप के कारण मनुष्य में दोष-बोध, लज्जा, सत्य का सामना करने का डर, परमेश्वर से छिपना, अपनी लज्जा और दोष को अपने प्रयासों से छुपाने की प्रवृत्ति, अपने आप को सही दिखाने के लिए बहाने बनाने तथा दूसरों पर दोषारोपण करने की प्रवृत्ति, और उसमें अहं, अर्थात अपनी गलती को स्वीकार न करने, वरन दूसरों को ही दोषी देखने का स्वभाव आ गया। साथ ही पाप के कारण सृष्टि भी पाप के श्राप में पड़ गई, और उससे निकाले जाने की बाट जोह रही है (रोमियों 8:19-21)। मनुष्य को अपनी गलती मान लेने और पश्चाताप करने, के अवसर देने के बाद भी जब मनुष्य ने परमेश्वर द्वारा दिए गए अवसर को स्वीकार नहीं किया, उसका लाभ नहीं उठाया, अपने अहं में ही बना रहा, तो अन्ततः परमेश्वर को फिर उसे क्षमा की संभावना से निकाल कर अपने न्याय के नीचे लाना पड़ा।  

जैसे परमेश्वर ने मनुष्य को आरंभ से ही चेतावनी दी थी (उत्पत्ति 2:17), इस पाप के कारण मनुष्य मृत्यु के अधीन आ गया - जो दो प्रकार से उसके जीवन में कार्यान्वित हुई। आत्मिक रीति से वह परमेश्वर की संगति से बिछड़ गया, और शारीरिक रीति से उसी समय से (और तब से मनुष्य के जन्म लेते ही) उसके पल-पल करके मरते चले जाने की अपरिवर्तनीय प्रक्रिया आरंभ हो गई, जो अन्ततः उसकी शारीरिक मृत्यु के साथ पूरी होती है। साथ ही ये सभी बातें, पाप के प्रभाव और मृत्यु, वांशिक, अर्थात फिर उसकी संतान में भी आने वाली भी हो गईं। न केवल पाप के दण्ड के अंतर्गत मनुष्य मृत्यु के अधीनता में आया, वरन उसे अन्य बातों को भी सहना पड़ गया। स्त्री को कहा गया कि उसके प्रसव की पीड़ा और भी अधिक बढ़ जाएगी और वह पीड़ा के साथ बच्चे जनेगी; तथा उसे उसके पति की प्रभुता में दे दिया गया (उत्पत्ति 3:16)। आदम के पाप के कारण भूमि भी श्रापित ठहराई गई, और ठहराया गया कि आदम वाटिका के अच्छे फलों (उत्पत्ति 2:9, 16) के स्थान पर अब जीवन भर बहुत परिश्रम और दुख के साथ पृथ्वी की उपज खाएगा, और पृथ्वी से उसके परिश्रम में व्यर्थ की उपज भी उत्पन्न होती रहेगी (उत्पत्ति:17-19) उसे उस आशीषित स्थान, अदन की वाटिका से निकाल दिया गया (उत्पत्ति 3:23-24) 

किन्तु केवल ये दुखद बातें ही पाप के प्रति परमेश्वर के न्याय के व्यवहार का प्रकटीकरण नहीं थीं। ये बातें उसके न्याय को दिखाती हैं; किन्तु साथ ही परमेश्वर ने अपने प्रेमी, दयालु, और अनुग्रहकारी, कृपालु स्वभाव को भी इनके साथ व्यक्त किया। परमेश्वर ने अपने विषय बाइबल में लिखवाया है कि उसकी हर योजना उसके लोगों की भलाई के लिए ही होती है:क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा” (यिर्मयाह 29:11); “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। इस प्रथम पाप, प्रथम न्याय, और प्रथम दण्ड की प्रक्रिया में भी हम परमेश्वर के इन गुणों को देखते हैं। परमेश्वर ने दण्ड के साथ ही उनके प्रति अपने प्रेम और देखभाल को भी व्यक्त किया:

·        उसने उनके बनाए हुए नाशमान और अस्थाई पत्तों के अँगरखों के स्थान पर उन्हें चमड़े के अँगरखे बना कर पहना दिए, जो लंबे समय तक चल सकते थे। (उत्पत्ति 3:21)

·        परमेश्वर ने स्त्री को यह प्रतिज्ञा भी दी कि पाप से छुड़ाने और पहली स्थिति में बहाल करने वाला जगत का उद्धारकर्ता भी उसी में से होकर आएगा, पुरुष का नहीं, उसका वंश होगा (उत्पत्ति 3:16)। यह बात प्रभु यीशु में होकर पूरी हुई, जो अपनी माता मरियम के कुँवारेपन में, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से गर्भवती हुई, और आदम के नहीं, परमेश्वर के पुत्र की माता बनाई गई, “जब वह इन बातों के सोच ही में था तो प्रभु का स्वर्गदूत उसे स्वप्न में दिखाई देकर कहने लगा; हे यूसुफ दाऊद की सन्तान, तू अपनी पत्नी मरियम को अपने यहां ले आने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा। यह सब कुछ इसलिये हुआ कि जो वचन प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था; वह पूरा हो। कि, देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा जिस का अर्थ यह हैपरमेश्वर हमारे साथ” (मत्ती 1:20-23)। परमेश्वर के कृपालु होने का यह अद्भुत उदाहरण है - जिस के द्वारा पाप और उसकी बरबादी ने संसार में प्रवेश किया, उसे नष्ट, नहीं तो कम से कम नजरंदाज करने के स्थान पर, उसी के द्वारा पाप और उसके दुष्प्रभावों का निवारण करने वाले को भी संसार में भेजे जाने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने इस आरंभिक स्थिति में ही दे दी।

·        पति की ओर स्त्री की लालसा रखने तथा स्त्री को पति के अधिकार में रखने के द्वारा परमेश्वर ने अब परिवार का मुख्या होने का अधिकार आदम को दे दिया। 

·        परमेश्वर चाहता तो आदम और हव्वा को नष्ट कर के, एक नए मनुष्य की रचना कर सकता था; किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। उसने उसी मनुष्य के साथ, जिसे उसने अपने स्वरूप में अपने हाथों से बनाया था, और जिसे अपनी श्वास के द्वारा जीवित प्राणी बनाया था, आगे भी कार्य पृथ्वी पर कार्य करते रहने को चुना, और उसी में से संसार को पाप से छुड़ाने वाले को लाने का प्रयोजन किया। 

·        परमेश्वर ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका, उस आशीष और परमेश्वर की संगति के स्थान से तो निकाला, किन्तु पृथ्वी पर से नहीं निकाला; और न ही उनसे समस्त पृथ्वी और जीव-जंतुओं पर दिए गए अधिकार (उत्पत्ति 1:26-28) को वापस लिया। 

·        अदन की वाटिका के बाहर भी परमेश्वर उनकी देखभाल करता रहा, उनकी सहायता करता रहा:

o   अपने प्रथम संतान के प्रसव के समय हव्वा ने कहा, जब आदम अपनी पत्नी हव्वा के पास गया तब उसने गर्भवती हो कर कैन को जन्म दिया और कहा, मैं ने यहोवा की सहायता से एक पुरुष पाया है” (उत्पत्ति 4:1)। यह पृथ्वी पर मनुष्य का पहला जन्म था; न अदन को और न हव्वा को कुछ पता था कि क्या और कैसे करना है; किन्तु इसमें परमेश्वर ने स्वयं उनकी सहायता की। 

o   अपने भाई की हत्या करने, और परमेश्वर से झूठ बोलने वाले कैन के प्रति भी परमेश्वर ने सहनशीलता का बर्ताव किया, उसे सुरक्षा प्रदान की (उत्पत्ति 4:13-16) 

 

       इसके बाद भी बाइबल और शेष मानव इतिहास में भी हम परमेश्वर के पापी, अनाज्ञाकारी, और ढीठ मनुष्यों के प्रति भी इसी प्रकार प्रेमी, अनुग्रहकारी, और कृपालु होने के अनेकों उदाहरणों देखते हैं। इन बातों के आधार पर हम अपने इस पहले प्रश्नयह उद्धार, अर्थात बचाव, या सुरक्षा किस से और क्यों होना है?” के विषय क्या निष्कर्ष देख सकते हैं? निष्कर्ष स्पष्ट प्रकट हैं:

  • किस से - उद्धार या बचाव पाप के दुष्प्रभावों से होना है, जिन के कारण मनुष्यों में आत्मिक एवं शारीरिक मृत्यु, डर, अहं, दोष, लज्जा, परमेश्वर से दूरी, अपनी गलतियों के लिए बहाने बनाना तथा दूसरों पर दोषारोपण करने, परमेश्वर की कृपा को नजरंदाज करने जैसी प्रवृत्ति और भावनाएं आ गई हैं। प्रभु यीशु मसीह हमें पाप के प्रभावों से मुक्त कर केपवित्र, निष्कलंक, निर्दोष, बेदाग और बेझुर्रीबनाकर अपने साथ, अपनी कलीसिया, अर्थात मसीही विश्वासियों के कुल समुदाय को, अपनी दुल्हन बनाकर खड़ा करना चाहता है (इफिसियों 5:25-27) 
  • क्यों - क्योंकि हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर हम सभी मनुष्यों से अभी भी प्रेम करता है, हमारे साथ संगति में रखना चाहता है, चाहता है कि हम उस से मेल-मिलाप कर लें, और उसके पुत्र-पुत्री होने के दर्जे को स्वीकार कर लें (यूहन्ना 1:2-13)। वह हमें विनाश में नहीं आशीष में देखना चाहता है। उसने केवल मनुष्य बनाए; मनुष्यों ने अपने आप को स्थान, धर्म, जाति, कुल, रंग, स्तर, शिक्षा, कार्य आदि हर बात के अनुसार विभाजित कर लिया, अपने अंदर ऊँच-नीच ले आया, एक दूसरे से बैर, विरोध, ईर्ष्या, घमंड, दुर्भावना आदि रखने लगा। ये परमेश्वर का किया हुआ नहीं है, वरन पापी मनुष्य की बिगड़ी हुई सोच का परिणाम है, वेअंजीर के पत्तेहैं जिनसे मनुष्य अपनी लज्जा को ढाँपना चाहता है, किन्तु ढाँपने के स्थान पर अपनी लज्जा और दोष को और बढ़ाता रहता है। परमेश्वर उससे फिर भी प्रेम करता है, और इन सभी बातों से ऊपर उठकर उसे अपने साथ स्वर्ग में स्थान देना चाहता है। परमेश्वर की इस मनसा को स्वीकार करना अथवा नहीं करना, मनुष्य का अपना निर्णय है। 

 

क्या आपने परमेश्वर के इस प्रेम, सहनशीलता, अनुग्रह और कृपया के पक्ष में निर्णय लिया है? यदि नहीं, तो आप अभी यह कर सकते हैं; आपकी स्वेच्छा, सच्चे मन और अपने पापों के लिए पश्चाताप के साथ की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मैं मान लेता हूँ कि मैंने मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता करके पाप किया है। मैं धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे स्थान पर उनके मृत्यु-दण्ड को कलवरी के क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा सह लिया। आप मेरे स्थान पर मारे गए, और मेरे उद्धार के लिए मृतकों में से जी भी उठे। कृपया मुझ पर दया करें और मेरे पाप क्षमा करें। मुझे अपना शिष्य बना लें, और अपनी आज्ञाकारिता में अपने साथ बना कर रखेंआपको पाप के विनाश से निकालकर परमेश्वर के साथ संगति और उसकी आशीषों में लाकर खड़ा कर देगी। क्या आप यह प्रार्थना अभी समय रहते करेंगे - निर्णय आपका है?

        

 

बाइबल पाठ: भजन 136:1-9, 23-26  

भजन संहिता 136:1 यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है, और उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:2 जो ईश्वरों का परमेश्वर है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:3 जो प्रभुओं का प्रभु है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:4 उसको छोड़कर कोई बड़े बड़े आश्चर्यकर्म नहीं करता, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:5 उसने अपनी बुद्धि से आकाश बनाया, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:6 उसने पृथ्वी को जल के ऊपर फैलाया है, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:7 उसने बड़ी बड़ी ज्योतियों बनाईं, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:8 दिन पर प्रभुता करने के लिये सूर्य को बनाया, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:9 और रात पर प्रभुता करने के लिये चन्द्रमा और तारागण को बनाया, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:23 उसने हमारी दुर्दशा में हमारी सुधि ली, उसकी करुणा  सदा की है।

भजन संहिता 136:24 और हम को द्रोहियों से छुड़ाया है, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:25 वह सब प्राणियों को आहार देता है, उसकी करुणा सदा की है।

भजन संहिता 136:26 स्वर्ग के परमेश्वर का धन्यवाद करो, उसकी करुणा सदा की है।

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 135; 136

·      1 कुरिन्थियों 12

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 6

 

पाप का समाधान - उद्धार - 2

       पिछले लेख में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल से उद्धार के बारे में देखना आरंभ किया था। हम इस विषय को तीन प्रश्नों के उत्तर के रूप में देखेंगे। ये प्रश्न हैं:

·        यह उद्धार, अर्थात बचाव, या सुरक्षा किस से और क्यों होना है?

·        व्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?

·        इसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?

       कल हमने पहले प्रश्न, किससे और क्यों को देखना आरंभ किया था; और देखा था कि पाप, अर्थात परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करने से, और करते ही, प्रथम मनुष्यों, आदम और हव्वा में क्या परिवर्तन आ गए। उनमें अपने किए के कारण दोष का बोध आ गया; उनमें अपनी दशा को लेकर लज्जा आ गई जिससे वे उस पूर्व उन्मुक्त भाव से परमेश्वर के सम्मुख नहीं आने पाए; वे परमेश्वर से छिपने लगे; और उन्होंने अपनी लाज को ढाँपने के लिए अपने ही प्रयास तो किए, किन्तु वे अपर्याप्त और अस्थाई थे। फिर हमने शिक्षा ली थी कि मनुष्य का पाप उसके अंदर एक दोषी होने के स्थिति, एक ग्लानि को उत्पन्न करता है। पाप के कारण मनुष्य सच्चे परमेश्वर के सामने आने से कतराने लगता है। यद्यपि मनुष्य का समस्त हाल परमेश्वर के सामने बेपरदा है, बिल्कुल खुला है, फिर भी मनुष्य अपनी लज्जा को स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी धार्मिकता और भलाई के कामों से ढाँपने का प्रयास करता है, जो अपर्याप्त हैं, और अपने इन प्रयासों के बावजूद फिर भी अपने आप को परमेश्वर से छुपाए रखता है, उससे दूर रहने के प्रयास करता है। पाप के कारण आए परिणामों को आज और आगे देखते हैं। 

       बाइबल की पहली पुस्तक, उत्पत्ति के तीन अध्याय में इस प्रथम पाप की स्थिति का वर्णन दिया गया है। परमेश्वर जब मनुष्य से संगति करने अदन की वाटिका में आया, तो उसके विचरण के शब्द को सुनकर आदम और हव्वा वाटिका के वृक्षों के बीच में जाकर उससे छुप गए। किन्तु इस पाप में गिरे और उससे छुपने का प्रयास करने वाले मनुष्य को परमेश्वर ने ऐसे ही नहीं छोड़ दिया। परमेश्वर चाहता तो सीधे से उन पर अपने उस दण्ड की आज्ञा सुना सकता था, जिसकी चेतावनी वह पहले उस वर्जित फल के विषय उनको दे चुका था (उत्पत्ति 2:17)। किन्तु उस प्रेमी, दयालु, कृपालु, अनुग्रहकारी परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया। उसने उन्हें अपनी गलती को, अपने पाप को मान लेने का अवसर दिया। गलती मनुष्य ने की थी; पतित दशा में मनुष्य था; अपनी लज्जा और दोष के निवारण को पता करने का कर्तव्य मनुष्य का था। किन्तु उसकी इस दशा का समाधान प्रदान करने के लिए उसे ढूँढता हुआ परमेश्वर आया। जैसे प्रभु यीशु मसीह ने अपने संसार में आने के लिए कहाक्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है” (लूका 19:10) 

       परमेश्वर ने वाटिका में, उनके छिपने के स्थान के निकट आकर उन पर दोषारोपण नहीं किया, वरन उन्हें प्रेम से बुलाया; उनसे पूछातू कहाँ है?” इसलिए नहीं कि परमेश्वर को उनके बारे में पता नहीं था, वरन इसलिए ताकि वे अपने पाप का, अपनी गलती का अंगीकार कर सकें। इससे पहले कि परमेश्वर को उनपर अपने न्याय को लागू करना पड़े, वह उन्हें पूरा-पूरा अवसर दे रहा था कि वे अपनी गलती को मान लें, क्योंकि परमेश्वर का एक और अद्भुत गुण उसकी क्षमा भी है, “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)। आदम बाहर निकल कर आया, और परमेश्वर से बात भी की; किन्तु उसे वास्तविकता बताने के स्थान पर बहाना और स्पष्टीकरण देने लगा; उसने कहा मैं तुझ से डर गया था, इसलिए छुप गया। यह पाप का मनुष्य के जीवन में एक और प्रभाव है - पाप डर उत्पन्न करता है। यह सामान्य व्यवहार की बात है, जब भी हम कोई गलती करते हैं, तो उस गलती के कारण हम में एक डर बना रहता है। मान लीजिए आप अपनी गाड़ी लेकर निकले हैं, और लाइसेंस लेना भूल गए, तो हर पुलिस वाले को देखते ही मन में डर आएगा, “कहीं इसने रोक कर लाइसेंस पूछ लिया तो परेशानी हो जाएगी!

       परमेश्वर ने उसे फिर से अपने पाप को मान लेने का एक और अवसर भी दिया साथ ही पाप का संकेत भी दिया; उससे सीधे से पूछा किक्या उसने वह वर्जित फल खा लिया है?” फिर से मनुष्य ने इस अवसर को गँवा दिया, और अब अपना दोष स्वीकार करने के स्थान पर, अपनी गलती दूसरों पर मढ़ने लगा। आदम ने परमेश्वर को और हव्वा दोनों को दोषी ठहराया - हव्वा को तो परमेश्वर ही ने उसे दिया था, इसलिए उसके लिए परमेश्वर ही जिम्मेदार था। हव्वा ने अपने आप को दोषी मानने के स्थान पर उसे बहकाने वाले सांप को दोषी ठहराया। गलती मान लेने और पश्चाताप करने का इस अवसर भी उन्होंने औरों पर दोषारोपण करने में गँवा दिया। आज भी हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया अपनी गलती स्वीकार करने के स्थान पर किसी अन्य को उसके लिए जिम्मेदार और दोषी ठहराने की होती है। अब परमेश्वर को न्याय का कदम उठाना पड़ा। 

       उनपर पीड़ा, परिश्रम, और मृत्यु को लागू कर दिया गया, और उन्हें उस आशीष के स्थान अदन के वाटिका से बाहर कर दिया गया। मृत्यु, जैसा हम पहले देख चुके हैं, एक मानवीय प्रयासों से अपरिवर्तनीय बिछड़ने की दशा को दिखाता है। पाप के कारण मनुष्य की संगति परमेश्वर से टूट गई; उसकी आत्मिक मृत्यु तुरंत हो गई, और वह शारीरिक मृत्यु के लिए भी निर्धारित कर दिया गया। मूल इब्रानी भाषा में जो वाक्यांश इसके लिए उत्पत्ति 2:17 में प्रयोग हुआ है, उसका वास्तविक अंग्रेजी अनुवाद है “dying thou dost die (YLT); dying thou shalt die (SLT)” जिसका हिन्दी अनुवाद होता हैमरते मरते तू मर जाएगा। अर्थात, उसी दिन से तेरी निरंतर कभी न रुकने और पलटे जाने वाली मरते चले जाने की प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी, और अंततः तू मर जाएगा।जिस दिन आदम और हव्वा ने पाप किया उनके लिए मृत्यु दो रीति से आ गई - आत्मिक रीति से वे परमेश्वर की संगति से अलग हो गए; और शारीरिक रीति से उन्होंने मरना आरंभ कर दिया, और अंततः अपनी आयु पूरी करके मर गए, मिट्टी में मिल गए। यही दशा तब से प्रत्येक मनुष्य के साथ रहती है; वह आत्मिक रीति से परमेश्वर से दूरी की दश में और शारीरिक रीति से एक दिन-प्रतिदिन घटती जाती आयु के साथ जन्म लेता है, और आयु पूरी करके मर जाता है, मिट्टी में मिल जाता हैइसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, इसलिये कि सब ने पाप किया” (रोमियों 5:12)

       पहले पाप से उत्पन्न हुई स्थिति के प्रति परमेश्वर की प्रतिक्रिया के बारे में हम और आगे अगले लेख में देखेंगे। अभी के लिए आप से निवेदन है कि अपने जीवनों की वास्तविक स्थिति का आँकलन करके देखें। पाप प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों पर दोषारोपण करने वाला, अपनी गलती के लिए औरों को जिम्मेदार ठहराने वाला, यहाँ तक कि परमेश्वर को भी दोषी ठहराने वाला बना देता है। मनुष्य सत्य के सामने आने, उसे स्वीकारने से डरता है, और हर हाल में अपने आप को सही दिखाना चाहता है। किन्तु परमेश्वर आपकी यह वास्तविकता जानता है, फिर भी वह आप से प्रेम करता है, आपके साथ अपनी संगति को बहाल करना चाहता है। लेकिन यह संभव हो पाना आपके निर्णय पर आधारित है। आपकी स्वेच्छा और सच्चे पश्चाताप तथा समर्पित मन से की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मैं मान लेता हूँ कि मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता करके मैंने पाप किया है। मैं धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे स्थान पर उनके मृत्यु-दण्ड को कलवरी के क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा सह लिया। आप मेरे स्थान पर मारे गए, और मेरे उद्धार के लिए मृतकों में से जी भी उठे। कृपया मुझ पर दया करें और मेरे पाप क्षमा करें। मुझे अपना शिष्य बना लें, अपनी आज्ञाकारिता में अपने साथ बना कर रखें।परमेश्वर आपकी संगति की लालसा रखता है, आपको दण्ड के अधीन नहीं, वरन आशीषित देखना चाहता है; इसे संभव करना या न करना, आपका अपना व्यक्तिगत निर्णय है। 

 

बाइबल पाठ: उत्पत्ति 3:8-24 

उत्पत्ति 3:8 तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था उसका शब्द उन को सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए।

उत्पत्ति 3:9 तब यहोवा परमेश्वर ने पुकार कर आदम से पूछा, तू कहां है?

उत्पत्ति 3:10 उसने कहा, मैं तेरा शब्द बारी में सुन कर डर गया क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया।

उत्पत्ति 3:11 उसने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे बर्जा था, क्या तू ने उसका फल खाया है?

उत्पत्ति 3:12 आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।

उत्पत्ति 3:13 तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया।

उत्पत्ति 3:14 तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तू ने जो यह किया है इसलिये तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा:

उत्पत्ति 3:15 और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।

उत्पत्ति 3:16 फिर स्त्री से उसने कहा, मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित हो कर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।

उत्पत्ति 3:17 और आदम से उसने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साथ खाया करेगा:

उत्पत्ति 3:18 और वह तेरे लिये कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा ;

उत्पत्ति 3:19 और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।

उत्पत्ति 3:20 और आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदि-माता वही हुई।

उत्पत्ति 3:21 और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अंगरखे बना कर उन को पहना दिए।

उत्पत्ति 3:22 फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है: इसलिये अब ऐसा न हो, कि वह हाथ बढ़ा कर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़ के खा ले और सदा जीवित रहे।

उत्पत्ति 3:23 तब यहोवा परमेश्वर ने उसको अदन की वाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिस में से वह बनाया गया था।

उत्पत्ति 3:24 इसलिये आदम को उसने निकाल दिया और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की वाटिका के पूर्व की ओर करूबों को, और चारों ओर घूमने वाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्त कर दिया।

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 132; 133; 134

·      1 कुरिन्थियों 11:17-34